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Magazine - Year 1956 - Version 2

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यज्ञ द्वारा विश्व शांति की संभावना

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(ले. श्री ज्योतिः स्वरूप जी आचार्य–एटा.)

मनुज देह से अशुद्ध वायु, पसीना, मल मूत्र आदि निकलते रहने के कारण वायु मण्डल दूषित होता रहता है, इसके अतिरिक्त मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नाना प्रकार के पदार्थों तथा धूम्र व भाप आदि के यंत्रों से वायु जल में विकृति उत्पन्न करता रहता है जिससे अनेक रोगों की वृद्धि होती है, वही दूषित जल सूर्य के द्वारा आहरण होकर फिर वर्षा रूप में हमें प्राप्त होता है। यज्ञ करने से वायु हलकी होकर ऊपर उठती है, वायु की गति में तीव्रता आ जाती है, इस कारण पहली अशुद्ध वायु बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर बाहर की शुद्ध वायु प्रवेश करती है। अग्नि में भेदक शक्ति होने के कारण इसमें डाला हुआ घृत तथा अनेक प्रकार की औषध-मिष्ट पदार्थ छिन्न-भिन्न होकर सूक्ष्म रूप में वायु के साथ दूर-दूर पहुँच जाते हैं हमारी नासिका के द्वारा यह यह विज्ञान सदैव प्रत्यक्ष होता रहता है।

महर्षि यास्क ने वेदार्थ प्रक्रिया के अनुपम ग्रन्थ निरुक्त में वेदार्थ की महत्ता सिद्ध करते हुए “अर्थ” वाचः पुष्पफलमाह-याज्ञदैवतेपुष्पफले दैवताध्यात्मे बा” अ. 1 खण्ड 20 । कहकर यज्ञ ज्ञान को वेद का पुष्प प्रतिपादित किया है और निरुक्त में वेद का अर्थ करते हुए यज्ञ की हवि व सोम से इन्द्र को तृप्त करते हुए वर्षा की याचना की है। शतपथ ब्राह्मण में “अग्नेर्वै धूमो जायते धूमाद्भ्रमभ्राद्धष्टिरेताजायन्ते तस्मादाह तपोजाः” 5-6- यज्ञाग्नि से जो धुंआ उत्पन्न होता है, वह वनस्पतियों के रस में मिश्रित होकर उनका शोषण करता हुआ ऊपर जाता है और सूर्य के द्वारा आकर्षित जल में मिलकर ऋतु के अनुकूल वृष्टि होने में निमित्त बनता है। भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है “यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म रुमुद्भवः” अर्थात् यज्ञ से मेघ बनते हैं और यज्ञ कर्म से प्रादुर्भूत होता है।

यज्ञ से प्राणिमात्र का जो उपकार होता है उसका प्रतिफल प्राप्त करने की आकाँक्षा याजक को अन्य प्राणियों से नहीं होती है। यह एक ऐसा पक्षपातरहित शत्रु, मित्र के लिए किया जाने वाला दान है जिसका कि समान रूप में विभाग होता है याजक यह किसी को भी उपालम्भ नहीं दे सकता कि मैंने तुम्हारे साथ यह उपकार किया है इसका यह प्रत्युपकार तुम्हें मेरे साथ करना चाहिए-इत्यादि। श्रौत सूत्र-मीमांसा-ब्राह्मणादि ग्रन्थों में अग्नि होत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त जो यागों का विस्तृत रूपेण निरूपण अनेक क्रियाकलापों के साथ किया गया है उनमें भी ‘र्स्वगकाभो यजेते’ इत्यादि वचन तथा अदृष्ट फल के वर्णन में मूलभूत यही सिद्धाँत है कि यज्ञ करने से अपने कर्तव्य का पालन करते हुए प्राणिमात्र का जो अप्रत्याशित उपकार होता है, उससे स्वर्ग (सुख विशेष) जिसे मीमाँसा के भाष्यकार शबर स्वामी ने विस्तृत शास्त्रार्थ लिखते हुए प्रतिपादित किया है ‘तस्मात्प्रीतिसाधने स्वर्ग शब्दः अ. 6।1)’ की प्राप्ति होती है। मनुष्य ने अपने शरीर तथा अन्यान्य प्रयोगों से जलवायु को दूषित किया अतः उस पाप का प्रायश्चित्त भी तो करना आवश्यक है इसके अतिरिक्त प्रभु ने मानव के लिये इस महत्ती सृष्टि की रचना करके मनुष्य को दूसरों के प्रति उपकार करने का आदेश दिया है जिसके लिए यज्ञ सबसे बड़ा और सरलतम साधन है योगिराज कृष्ण ने यज्ञ का महत्व दर्शाते हुए उपदेश दिया “यज्ञशिष्टशिनः सन्तो भच्यन्ते सर्वकिल्विषैः– भुञ्जनो तेत्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्” गीता अ. 3।13। यज्ञ करने के उपराँत अवशिष्ट पदार्थों का उपयोग करने वाला सब पापों से छूट जाता है वे लोग पाप खाते हैं जो केवल अपना ही पेट भरते हैं।

मानव का मन अतीव चंचल है अतः प्रभु का चिन्तन करते हुए भी इधर-उधर, दौड़ने का प्रयत्न करता है, ऐसे अस्थिर मन को अनेक क्रियाकलापों से युक्त यज्ञकर्म में जो कि अध्यात्म रूपी फल का देने वाला पुष्प है फँसा दिया जाता है, मंत्रोच्चारण से, तदर्थ भावना से व अग्नि की प्रदीप्त ज्वाला से कुछ सोचने विचारने की प्रेरणा मिलती है। यज्ञमय प्रभु की सृष्टि को देख कर कुछ परोपकार करने की सुध आती है, मन को शान्ति मिलती है, हृदय में आनन्द का सञ्चार होता है, स्वार्थ भावना मिटकर परमार्थ में, दीन दुखियों-अनाथों के त्राण में कल्याण प्रतीत होता है। अरोग्य-सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है अथर्ववेद में एक मन्त्र आता है

“ओम् प्रातः प्रातर्गृहपतिर्नोऽग्निः सायं सायं सौमन सस्य दाता वसोर्वसोर्वसुदान एधीकन्धानास्वा। ऋ. शत हमाधेमकाण्ड 19।

अर्थात् प्रातः सायं अग्नि को प्रज्वलित करके यज्ञ करते हुए हम 100 वर्ष तक धनादि पदार्थों को प्राप्त करके पुष्टि शरीर वाले बने रहें।

एक समय था जब भारत के सम्राट घोषणा किया करते थे ‘न में स्तेनोजनपदे न कदर्यो न मद्यपः- नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः” छान्दोग्य प्र. अनु. 5 खंड 11 प्रवा. 5। केकय पुत्र महाराज अश्वपति ने ऋषियों को संबोधित करते हुए कहा- हे महा श्रोत्रियो! मेरे राज्य में कोई चोर-कृपण-शराबी विद्यमान नहीं है, ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो प्रतिदिन यज्ञ न करता हो मेरे राष्ट्र में कोई भी व्यक्ति व्यभिचारी नहीं है। अहो! वह कैसा स्वर्गमय युग रहा होगा। जब कि घर-घर प्रातःकाल ही मंत्रोच्चारण की ध्वनि से आकाश गुंजायमान हो जाता होगा यज्ञ की सुगन्धि से वायु मण्डल सुवासित होकर प्राणिमात्र को आह्लादित करता होगा फिर भला चोरी-जारी आधि-व्याधियां वहाँ कैसे ठहर सकती होंगी। आज मानव प्रायिक रूपेण चिन्ता चिंताग्रस्त नाना रोग पीड़ित पके आम जैसा पीतवर्ण स्वार्थ भावना परिपूर्ण छल-कपट-ईर्ष्या-द्वेप से दूषित घोर अशान्ति के वातावरण से आवृत न जाने किधर दौड़ा चला जा रहा है। आन-नगर हाट-बाट में बालक-जवान-बूढ़े शिक्षित-अशिक्षित सब हुक्का-बीड़ी-सिगरेट के धुँए से प्रातः सायं ही नहीं, उठते बैठते जागते सोते भी अपने आप व अन्य जनों को भी तृप्त करने में सुख मान रहे हैं, इस धूम्र पान में करोड़ों रुपये का व्यय हो रहा है। हारमोनियम बजाकर नाच गाकर बीड़ी का प्रचार किया जा रहा है मानों आज का यही धर्म प्रचार हो। दूध का स्थान चाय ने ले लिया, घी से अधिक डालडा में शक्ति मानी जाने लगी, सोमरस का आनन्द शराब में आने लगा ऐसा मालूम पड़ता है कि मानों कलियुग में यही हवन आवश्यक हो। जहाँ देखो वैद्यराजों-डाक्टर साहिबों की दुकानों पर हाथों में शीशी थामे प्रातःकाल ही धरना दिये अधिक संख्या में व्यक्ति विराजमान दीखेंगे आज के युग में जिससे पूछो कोई व कोई रोग अवश्य होगा। तपैदिक जैसे संक्रामक रोग से आक्रान्त रोगियों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। नये-नये इंजेक्शनों का आविष्कार हो रहा है किन्तु मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है। वायु शुद्धि की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है नये-नये आविष्कारों इंजेक्शनों के स्थान पर यदि आविष्कारों के आविष्कार विज्ञान पूर्ण यज्ञ का प्रचार किया जाये स्वास्थ्य विभाग-नगरपालिकाएं आदि संस्थाएं इस कार्य में रुचि दिखलायें तो जनता जनार्दन का कल्याण हो जाये। वेद शास्त्रों को मानने वाले व्यक्ति यज्ञ-हवन को मानते ही हैं मुसलमान भी लोवान जलाते हैं- पारसी अग्निहोत्र में अत्यन्त श्रद्धा रखते हैं, बौद्ध-ईसाई आदि भी धूप जलाने में बुरा नहीं मानते। आवश्यकता इसके प्रचार की है इसमें देश-काल जाति पाँति का भेद नहीं। जो भी प्राणी श्वास लेता है उसे वायु की प्रतिक्षण अपेक्षा है, मानव मात्र को शुद्ध वायु चाहिये। रोगी कोई बनना नहीं चाहता। अतः यदि रोगों से निवृत्त होकर शरीर को पुष्ट बनाना है, ठीक समय पर वृष्टि के द्वारा उदर पूर्ति के लिये शुद्ध अन्नादि पदार्थ प्राप्त करने की अभिलाषा है, स्वार्थ भाव, छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, घूँस-खोरी, चोर बाजारी दूर कर परोपकार करके मानवता का प्रसार करने की उत्कंठा है, आत्मिक-शान्ति प्राप्त कर दुःख दारिद्रय से रहित होकर शाश्वत सुख पाने की आवश्यकता है, तो “न चाहं कामये राज्यं न स्वर्ग नापुनर्भवम्- कामये दुःखतप्तानाम्प्रणिनामार्त्तिनाशनम्” का पाठ करते हुए दुखियों का दुःख दूर करने के लिये इस भौतिकाग्नि में यज्ञ करते हुए अपने जीवन को यज्ञमय बनाना होगा, तब “अयन्तइध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्ववर्धस्व चेद्धवर्धय” यह आत्मा उस परमपिता परमात्मा की प्रदीप्त से तेजोमय होकर संसार का कल्याण करने में रत हो जायगी। परमार्थ ही स्वार्थ बन जायगा, इस प्रकार जब मानव मात्र तेजोमय हो जायगा यज्ञमय भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त होगा- लोक का कल्याण हो जायेगा और सब एक स्वर से कह उठेंगे।

यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म। यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म॥

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