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Magazine - Year 1956 - Version 2

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यज्ञ की भावना

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(ले. श्री. सीताराम एडवोकेट, आगरा)

इतिहासकारों के मत के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य वृक्ष की पत्तियों या जानवरों के चमड़े से अपने शरीर को ढकते थे। शीत और धूप से अपनी रक्षा वृक्षों की छाया से करते थे तथा गुफाओं में रहते थे।

एक मनुष्य ने वृक्षों की छाया को शरीर की रक्षा के लिये अपर्याप्त समझकर और गुफाओं के रहने को असुविधाजनक समझकर एक घर बनाने की सोची। उसने समीप की धरती को खोदकर उसकी मिट्टी से एक कोठे की चार दीवारें बनाई। फिर उसके ऊपर छत बनाने के लिये वह वृक्षों की शाखाओं को तोड़ लाया और उनको कोठे की छत के बराबर जमीन पर रखकर वृक्ष की टहनियों व पत्तों से उसे ढक कर तथा बाँध कर उसने एक छप्पर तैयार कर लिया। यह सब कुछ कर लेने पर जब उसने उस छप्पर को कोठे की दीवारों पर रखने के लिये उठाना चाहा तो वह इतना भारी था कि वह उसे उठा न सका। कोई अन्य उपाय न देखकर उसने आस-पास के अपने पड़ौसियों को आवाज दी कि ‘भाइयों आओ, मेरे, इस छप्पर को मेरे कोठे पर रखवा दो,’ पड़ौसी दौड़े। सब ने अपना-अपना हाथ उस छप्पर से लगाया और कुछ ही क्षण में उस छप्पर को उसके कोठे की दीवारों पर रख दिया। यह था सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ।

उपरोक्त कथा चाहे काल्पनिक ही क्यों न हो परन्तु यज्ञ के वास्तविक अर्थ व उद्देश्य को समझने के लिये इससे सुन्दर दृष्टान्त मुझे तो अब तक नहीं मिला।

प्रायः हम लोग अग्नि में घृत आदि की आहुतियाँ देकर हवन करने को ही यज्ञ का पूर्ण रूप समझ लेते हैं। हवन तो यज्ञ का केवल प्रतीक मात्र है। वह हम में यज्ञ की भावना उत्पन्न करने में सहायक होता है।

हवन का अर्थ “दान” है। यदि जरा विचार करें तो हम देखेंगे कि हवन में हम अपनी प्रिय से प्रिय वस्तुओं को जैसे घृत, मिष्ठान ,अन्न, मेवे, औषधियाँ तथा सुगन्धित पदार्थों को अग्नि भगवान को अर्पित करते हैं और वह भी अपने लिये नहीं परन्तु सबके कल्याण के लिये और उनको भी अपना कह कर या समझकर नहीं परन्तु “इदन्नमम” की भावना के साथ।

अतः यज्ञ का अर्थ हुआ दूसरों के हित व कल्याण के लिये अपनी प्यारी से प्यारी वस्तु का दान दे देना। अपने में दान की भावना उत्पन्न करना। परोपकार के लिये अपने आपको मिटा देना।

यदि हम अपने में उपरोक्त भावनाएं उत्पन्न नहीं कर सकते, यदि हम अपने मुहल्ले व पड़ौस के बच्चों को अपने बच्चों के बराबर नहीं समझ पाते, यदि हम अपने आस-पास के व्यक्तियों के दुख दर्द को अपना दुख दर्द नहीं समझ पाते तो चाहे हम कितना बड़ा हवन क्यों न कर लें, वह यज्ञ न होगा।

अपना जीवन यज्ञमय बनाने के लिये हमें अपने में दान और प्रेम की भावना को निरन्तर विकसित करना होगा। तभी हम सही अर्थ में याज्ञिक हो सकेंगे।

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