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Magazine - Year 1956 - Version 2

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यज्ञ पुरुष और उसकी महिमा

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(श्री पं. भगवद्दत्त जी वेदालंकार एम.ए., रजोडी सहारनपुर)

प्रलयावस्था में चहुँ ओर तम ही तम था। सृष्टि के सर्जनहार भगवान् ने “ईक्षण” किया तो साम्यावस्था में शाँत भाव में पड़ी त्रिगुणात्मक प्रकृति में एक विशिष्ट प्रकार की गति व क्रिया प्रारम्भ हुई। उस समय भगवान् ‘यज्ञ पुरुष’ ¹ नाम से सम्बोधित हुए। इसी यज्ञपुरुष से अन्य अनेक यज्ञों की उत्पत्तियाँ प्रारम्भ हो गईं और कालान्तर में विविध यज्ञों का समूह यह सृष्टि ² यज्ञ परिपूर्ण रूप में सामने आ उपस्थित हुआ। जब भगवान् स्वयं यज्ञ रूप हैं और तदुत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टि भी यज्ञ है तो यज्ञ के अतिरिक्त संसार में कुछ है ही नहीं, यह हम निस्संकोच भाव से कह सकते हैं। वेद भी इस यज्ञ रूप भगवान् से उत्पन्न हुए हैं अतः ये भी ³ यज्ञ रूप हैं और इनमें जो कुछ भी हैं वह यज्ञ के अतिरिक्त कुछ नहीं, और होता भी क्या? यज्ञ से पृथक् कुछ हो तभी तो। जो यज्ञ के क्षेत्र से बाहर हुआ वही विनष्ट हो गया। यज्ञों की विद्यातक जो आसुरी शक्ति कही जाती है, वह तो भगवान् की ⁴ माया है और विश्व यज्ञों की एक आवश्यक लड़ी है।

श्रीमद्भगवद्गीता में आता है कि प्रजापति ने यज्ञों व प्रजाओं को साथ-साथ उत्पन्न कर प्रजाओं को यह आदेश दिया कि अपनी अभीष्ट की प्राप्ति हम इन यज्ञों द्वारा किया करें। अथर्व वेद के उच्छिष्ट सूक्त में प्रायः सब यज्ञों का परिगणन किया गया है। और वहाँ यह भी बता दिया गया है कि भगवान् से ही इनकी उत्पत्ति हुई है। वे यज्ञ दर्शपौर्ण मास, वाजपेय, अश्वमेध, राजसूय आदि नामों से प्रख्यात हैं। इन यज्ञों की उत्पत्ति प्रमुख रूप से मनुष्यों के लिये की गई है। वेद में आता है

ऋषीणां च स्तुतीरूप यज्ञं च मानुषाणाम् ऋ. 1।84।2

अर्थात् वह इन्द्र ऋषिओं की स्तुति में और मनुष्यों के यज्ञो में पहुँचता है।

1—यजु. 31 अध्याय यज्ञो वैभुवनम्। तै. ब्रा 3।3।7।5

2—यजु. 31 अध्याय यज्ञो वैभुवनम्। तै. ब्रा 3।3।7।5

3—यजु. 31।7 सैपात्रयी विद्या यज्ञः। श.प, 1।1।4।3

4—मायेत्सा ते याति युद्धान्याहुर्नाध शत्रुं ननुपुराविवित्से ऋ. 10।55।2

इस मन्त्र से ऋषियों और मनुष्यों में क्या विशेषता है, यह स्पष्ट हो गया है। और भी मन्त्र हैं जहाँ ऋषियों और मनुष्यों का पृथक् रूप से वर्णन मिलता है। इस उपर्युक्त मन्त्र का यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ऋषि यज्ञ नहीं करते कराते थे। वे यज्ञ भी करते थे। परन्तु मन्त्र की ध्वनि यह है कि अभीष्ट की सिद्धि में मनुष्यों के पास प्रमुख रूप से यज्ञ ही साधन है। मनुष्य यज्ञ द्वारा जो कुछ प्राप्त कर सकता है वह सब और उससे भी अधिक ऋषि लोग संकल्प व ¹ स्तुति से प्राप्त कर लेते थे। परन्तु ऋषिओं का यह स्तुति बल अग्नि ² पूजा से ही प्रकट हुआ था। ³ त्रेतायुग के प्रारम्भ में वैवस्वत मनु हुए। अतः मानव सृष्टि त्रेतायुग के प्रारम्भ में हुई। यज्ञों का विशेष प्रचलन भी इसी काल में जाकर हुआ। क्योंकि युगह्रास से संकल्प व स्तुति में वह बल नहीं रहा अतः यज्ञों द्वारा ही अभीष्ट की प्राप्ति की जाने लगी। इसी बात को दृष्टि में रख कर ³ मन्त्र ने यज्ञों का मनुष्य के साथ विशेष सम्बन्ध बताया है। कृतयुग देवयुग है। इससे प्राकृतिक यज्ञ सुचारु रूप से यथाकाल चलते रहते हैं, अतः मानव यज्ञों की इस समय विशेष आवश्यकता नहीं। इस समय याज्ञिक विधियों में भी विभिन्नता व बहुलता नहीं होती। पृथिवी पर उस समय देवयुग था। जब देव ही स्वयं पृथिवी पर अवतरित हों तो आहुति किसके लिये? उस समय के ऋषि व देव विश्वयज्ञों के ही कर्ताधर्ता थे।

ये मानव यज्ञ विश्व यज्ञों के समझने के साधन मात्र ही नहीं हैं अपितु विश्व यज्ञों के सहायक नियामक (Controler)भी हैं। पिण्ड यज्ञों को ब्रह्माण्ड यज्ञों के समक्ष बनाने वाले हैं। कल्पना (कल्पनात् कल्पः करने के कारण इन यज्ञों का नाम कल्प नहीं है अपितु दिव्य सामर्थ्य वाले (कप् सामर्थ्ये) होने से ये कल्प कहलाते हैं। विधि के अनुसार यज्ञ करने वाले में वह ब्राह्मी शक्ति पैदा हो जाती है कि वह विश्वयज्ञों पर नियन्त्रण कर सके। उस यज्ञ रूप प्रभु द्वारा रचित इन विश्वयज्ञों में कभी कभी व्याघात हो जाता है यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि अकाल आदि। प्रश्न यह हैं कि क्या ये भगवान् की देन है। नहीं नहीं, यह भगवान् की देन नहीं है। यह तो हमारे कर्मों की उपज है। भगवान् ऐसा निर्दयी नहीं है, कि अकाल, ऋतु विकार, व्याधि आदि आपत्तियों को पैदा कर अपने पुत्रों को कष्ट देवें। उसने तो प्रारम्भिक कृतयुग इन सब व्याधि आदि आपत्तियों से रहित किया था। अतः ये सब विकृत दोष हमारे ही पैदा किए हुए हैं। जब हम अति वृष्टि आदि पैदा कर सकते हैं तो सुवृष्टि, सुकाल व श्रेष्ठ ऋतुओं को भी पैदा कर सकते हैं। एक प्रकार से ऋतु नियन्त्रण व परिवर्तन करने वाले हम ही तो हैं। इस प्रकार विश्वयज्ञों को समय-समय पर नियमित व निश्चित करने के लिये भगवान् ने यज्ञ रूपी नियामक यन्त्र सृष्टि के आदि में ऋषियों को प्रदान कर दिये थे। भगवान् के नित्य

1. त आयजन्त द्रविणां समस्या ऋषियः पूर्वे जरितारो न भूना। यजु. 17। 28

2. येन ऋषियो बलद्योतमन् युजा। अ. 4। 23।5 अग्नि ऋषियः सहस्रासनोति। ऋ. 10। 80।4

3. त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान् भनवे ददौ। महाभारत शांतिपर्व

4. ऋषीणां च स्तुतीरूप यज्ञ च मानुषाणाम्। ऋ. 1। 84।2

5. यजु. 17।28, अथर्व. 6। 133। 5, मनुस्मृति. अ. 1। 41 4 1। 3।

के नियमों द्वारा समय पर वृष्टि का विधान है पर हम देखते यह हैं कि उसमें व्याघात हो जाता है। ऋषि कारीरिष्ठ द्वारा वर्षा ऋतु को पैदा करते हैं। प्राकृतिक घर को, स्थानों व स्थानों व ऋतुओं में उत्पन्न रोगजनक कृमिकीटों को ऋषि भैषज्य यज्ञों द्वारा विनष्ट करते हैं। निःसन्तान दंपत्ति में पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा पुत्रोत्पत्ति की सामर्थ्य पैदा करते हैं। अश्वमेध राजसूय, वाजपेय आदि महायज्ञों द्वारा पिण्डान्तर्गत आँशिक यज्ञों को व उनकी शक्तियों को विश्वयज्ञों के समकक्ष बना देते हैं। अतः हम यह कह सकते हैं। कि ये मानव यज्ञ विश्वयज्ञों को समझने के लिये साधन मात्र ही है, वे उनके नियात्मक सहायक, सुधारक आदि भी हैं। पापों के विनाशक, ऐश्वर्य व दिव्य शक्ति सम्पादक भी हैं।

अग्निहोत्र आदि जो यज्ञ हम करते हैं उसमें प्रदीप्त अग्नि को हमें सामान्य भौतिक अग्नि ही नहीं समझना चाहिये। ¹ वेद कहता है कि इस भौतिक अग्नि में एक और अग्नि प्रविष्ट हुई हैं। उस अग्नि को दिव्य दृष्टि व दिव्य शक्ति सम्पन्न ऋषि लोग ही देख पाते हैं। अथवा यह भी कहा जा सकता है उस भौतिक अग्नि में अपनी शक्ति द्वारा एक और अग्नि पैदा कर देते हैं क्योंकि इस गुहानिहित अंतरग्नि को ऋषियों का पुत्र कहा गया है। वे ऋषि उस अग्नि को किस प्रकार पैदा कर देते हैं। इसका सामान्य उत्तर यह है कि मन्थन द्वारा, रगड़ द्वारा। यह मन्थन दिव्य दृष्टि, दिव्य वाणी व दिव्य विचार का सूक्ष्म मंथन है।

इससे पूर्व के मन्त्रों में ¹ मंत्रों द्वारा अग्नि का मन्थन कहा गया है। विचारणीय यह है कि मन्थन द्वारा उत्पन्न यह दूसरी अग्नि सर्व व्यापक अग्नि रूप भगवान् है या अन्य कोई अग्नि है इस पर विद्वान् लोग विचार करें। परन्तु हमारा कथन इतना ही है कि सामान्य यज्ञाग्नि को भौतिक अग्नि ही न समझा जाये। इसमें अन्तर्निहित अन्य भी अग्नि है जिसकी ओर वेद संकेत कर रहा है। इसी आन्तरिक अग्नि को उद्देश्य करके हमें ¹ मंत्रोच्चारण करना चाहिये। और ³ श्रद्धा से करना चाहिये। यदि श्रद्धा नहीं है तो यज्ञ की सफलता असम्भव है। ⁴ यज्ञ में ही ऐश्वर्य है। यज्ञ की सबका रक्षक है यह से ही सब पापों का विनाश है। यज्ञ से ही अग्नि अद्भुत कर्म करने वाला बनता है। यज्ञ में श्रद्धा रखने वाले व्यक्तियों के समक्ष एक महान् उत्तरदायित्व है और वह यह कि यज्ञों को प्रभाव व शक्ति को सत्य सिद्ध करें। अन्त में वेद सूक्ति सबको चेतावनी दे रही है कि—“अयज्ञियो हतवर्चा भवति। अथर्व, 12। 2। 37

अर्थात् यज्ञ न करने वाले का तेज नष्ट हो जाता है। तेजस्विता की रक्षा के लिये भी यज्ञ आवश्यक हैं।

अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋपीणां पुत्रो अभिशस्तिपावा। स नः स्योनः सुयजा यजेह, देवेस्यो हव्यं समप्रयुच्छन्स्वाहा॥ यजु. 5। 4

1—गायत्रेणत्वा छन्दसा मन्याग्नि त्रैष्टुधेनत्वा छन्दसा मन्थाग्नि॥ यजु. 5। 2

2—उपप्रयन्तो अध्वरम् मन्त्रं वोचेमाग्नये। आरे अत्त्मेच शृण्वते। यजु. 3। 11

3—स यः श्रद्दधानो यजते तस्येष्टं तक्षीयते। कौ— 6। 4

4—यज्ञो बसुः। यज. 1। 2

यज्ञोविदद्वसु। ता. ब्र. 8। 3। 3

यज्ञो वा भवति। ता. ब्रा. 6। 4। 5

भव यज्ञोमिरीमहविभिः। ऋ 1। 24। 14

नांहोमते तशते नप्रदप्तिः। ऋ 6। 3। 5

यज्ञोभिरद्भ तक्रतुं। ऋ. 8। 23। 8

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