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Magazine - Year 1956 - Version 2

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यज्ञ के प्रत्यक्ष अनुभव

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(श्री पं. जय देव शर्मा मीमांसातीर्थ वनस्थली-विद्यापीठ)

यज्ञ को वेद में श्रेष्ठतम कर्म कहा है। यज्ञ से संसार के सब पदार्थों को लभ्य कहा है। यज्ञ प्रजापति का स्वरूप कहा है। प्रजाओं को परमेश्वर ने उत्पन्न करके साथ ही यज्ञ को कामधेनु के रूप में उत्पन्न किया और आदेश दिया कि इससे तुम अपने सब इष्ट पदार्थ प्राप्त करो ऐसा गीता में बतलाया है। तब यज्ञ कोई पदार्थ घर कर रख लेने के लिये नहीं है। वह तो करने की वस्तु है।

यज्ञ ऐसी कामधेनु नहीं है कि उसे गाय के समान घर के आँगन में बाँध ले जब जरूरत हुई उसी समय वस्तु माँग लाये। और न यह ऐसा कल्पवृक्ष है कि जब चाहा उसका फल तोड़ लिया। यज्ञ तो एक अध्यात्म क्षेत्र का गम्भीर कार्यकरण रूप भावनामय गौ है। कर्ममय कल्पतरु है जिसके यथावत् सम्पादन करने से काल में फल फलता है। और वैगुण्य होने से नहीं भी फलता है या अल्प फलता है।

विगुणता कहाँ रहती है यह समझना कुछ सूक्ष्म दर्शिता का काम है जो सर्व साधारण से हो नहीं सकता। उनको तो स्थूल वस्तु चाहिये। उनको सूक्ष्म तर्क नहीं चाहिये। उनको रोग है तो दवा चाहिये जिसे वे अल्प आयास से खा लें और उनका रोग टूट जाय, उनको वह नरक की त्रिदोष चिकित्सा की विवेचना नहीं चाहिये कि जिसे वे समझ न सके इसलिये ऋषियों ने यज्ञ का क्रियात्मक धर्म के रूप में उसका स्थूल रूप नियत किया है, ऐसा करो, इस अनुक्रम से करो यह दूर्तिकर्त्तयताडडडडड डडडडयता करो। जिस तर्क की सूक्ष्मता में तुम जाना नहीं चाहते उसे पुनः मत उठाओ, चाहे दूसरे शब्दों में आप आँख मीचकर करो, ऐसा भी कह सकते हैं, शब्दान्तर में डडडडडसे भक्ति, श्रद्धा विश्वास तर्क रहितता रूप में करो ऐसा ही कहना चाहिये।

प्रश्न—तो फिर क्या यज्ञ-सिद्धान्त अन्ध विश्वास सिद्धान्त है। उत्तर- नहीं, और हाँ।

जिसे रोग निवृत्ति चाहिये उसे वैद्य से तर्क नहीं चाहिये प्रत्युत वैद्य वचन में विश्वास चाहिये। जिसे वैद्य से तर्क करना अभीष्ट है उसे रोग से मुक्ति नहीं चाहिये, उसे वैद्य की कटु भेष से बचने का बहाना चाहिये। इस दृष्टि से तो यज्ञ सिद्धान्त अन्ध विश्वास का सिद्धान्त है। और जो कर्म-क्रिया-उपचार-प्रयोग करने की वस्तु है वह तर्क से होने वाली नहीं, उसे कर लेने के बाद ही उस का तथ्य-अतथ्य विदित होता है तब वह एक प्रकार से ‘इन्डक्टिव लॉजिक’ क्रियासिद्ध तर्क का विषय हो जाता है, जिसके आधार पर विज्ञान की डडडडसम्पना सिद्ध होती है। इस प्रकार यज्ञ भी एक विज्ञान सिद्ध परमार्थ है। आप अधिक इस शुष्क विवेचना में न जाकर हम पाठकों के अपने यज्ञ के अनुभव बतलाना चाहते हैं। (1) जिस यज्ञ को हम अपने चित्त में रखकर प्रयोजन बतलाना चाहते हैं वह है अग्नि में सुगन्ध द्रव्यों की आहुति करना अन्य उसकी पृष्ठभूमि में लोक कल्याण भावना और स्वहित भावना भी निहित है।

1915 ई. के दिवाली के दिन थे। मैं उन दिनों जयपुर राज्य के ठिकाने जोवनेर में कर्णगढ़ हाईस्कूल का मुख्याध्यापक था। एक कार्यवश मुझे एक आर्य सज्जन द्वारका प्रसाद सेवकजी के पास इन्दौर जाने का आवश्यक कार्य हुआ। इस निमित्त मैं इन्दौर पहुँचा।

स्टेशन पहुँचते ही सुना कि शहर में भारी प्लेग फैली है। ताँगे वाले भी सब मोहल्ले में नहीं जाते क्योंकि कुछ मोहल्ले भारी प्लेग के आतंक से खाली हो गये थे, वहाँ उनको जाते डर लगता था। खैर मुझे तो पारसी मोहल्ले जाना था। ज्यों ही मैंने पारसी मोहल्ले का नाम लिया ताँगे वाले ने साफ इन्कार कर दिया। कोई ताँगे वाला भी उस मोहल्ले जाने के लिये तैयार न हुआ।

मैंने कुछ अधिक किराये का प्रलोभन दिया एक ने हिम्मत की और मैं चल पड़ा। रास्ते भर में प्लेग के अद्भुत आतंक की बातें सुनता आया। ताँगे वाले ने बतलाया कि पारसी मोहल्ले में से पारसियों के घरों में से जब उनके घरों के ताले खोल-खोल कर सफाई की गई तो बोरियां भर-भर कर मरे हुए चूहे निकाले गये। भय तो मुझे भी लगता रहा कि कहीं यह प्लेग मुझे जाते ही न पकड़ ले। परन्तु मैं भी हिम्मत न हारा। लक्ष्य तक पहुँचा। वहाँ अपने मित्र द्वारकादास सेवक के घर पहुँचा, वे बड़े आनन्द में थे।

प्रातः 7-8 बजे मैं पहुँच गया था। जाकर स्नानादि किया। और सन्ध्या के पश्चात् यज्ञ करके प्रातराश किया, तब मार्ग की सब चर्चा चली। मैंने देखा कि घर में जीती जागती चुहिया इधर उधर उछल रहीं हैं। मैंने फिर ताँगे वाले की कही बात कही कि—सुना था पारसियों के घर में तो मनो चूहे मरे हुए निकले। आपके यहाँ तो सब चूहे जी रहे हैं। बात क्या है।

द्वारकाप्रसाद बोले—भगवान् की कृपा है। दोनों समय अग्निहोत्र करता हूँ। मेरे घर में एक भी चूहा नहीं मरा। और सब भाग गये। निर्दय माता पिता- तड़पते लड़के लड़कियों को घर में छोड़कर ताले डालकर चले गये। उनको जब पानी तक देने वाला कोई न मिला तो मुहल्ले भर में चीखें उठ रही थी हमने ताले तोड़े, उन रोगियों की सेवा की, पानी भोजन का प्रबन्ध किया, उनको स्थानान्तरित किया। ये सब नरक के दृश्य नरक पाने योग्य काम करने वाले निर्दय लोगों के घर में न दीखें तो कहाँ दीखें।

मेरे घर में यज्ञ होता है इसलिये मेरे यहाँ स्वर्ग है, यहाँ चुहिया भी अप्सरा की सी खुशी से नाचे तो क्या विस्मय है। मेरे तो सब घर के सुखी और प्रसन्न हैं। इन नारकियों की सेवा करते हुए भी हमें नरक का स्पर्श नहीं होता। और तो और, यहाँ के नरेश के राज्य सिंहासन तक पर मरे चूहे पाये गये।

ये सब वृत्तांत सुनकर मेरा ध्यान गया कि अहो यह दैनन्दिन अग्निहोत्र क्यों घर घर में प्रत्येक स्त्री पुरुष के लिये आवश्यक ठहराया है, इसका यह रहस्य है, जनपदों ध्वंस करने वाली महामारी जैसी नारकीय बीमारियाँ प्रजा के सामूहिक पाप और राजा के अधार्मिक होने से उत्पन्न होती है। और जब फैलती है तो उनके पापों का प्रत्यक्ष फल उनको घर बैठे मिलता है। और उसी समय नित्य धर्माचरण करने वालों को वह पाप इसी प्रकार नहीं छूता जैसे कमल पत्र को जल। स्वर्ग और नरक को देखने के लिये भूतल से दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। स्वर्ग और नरक के सुफल और कुफल साथ-साथ देखने को मिल सकते हैं। केवल विवेक से देखने की शक्ति चाहिये।

वर्तमान में मैं वनस्थली विद्या पीठ में 10 वर्ष से रहता हूँ। यहाँ कोई नित्य यज्ञ क्या कदाचित् सन्ध्या अर्चन या देवता दर्शन भी नियम से नहीं करता होगा। मेरे गृह में नित्य कर्म के रूप में अग्निहोत्र होता है आस पास के कुछ व्यक्ति जब कभी भी दिन में एक आध बार मेरे क्वार्टर पर आते हैं, वे यश के गन्ध बहुत प्रसन्न होते हैं। कुछ ने तो नियम बाँध रखा है वे दो चार मिनट बैठकर उस सुगन्ध का वैयक्तिक सुख लेते हैं।

मैं सोचता हूँ कि यदि मुहल्ले भर में मैं अपने 10 मिनट के इस यज्ञ से इतने व्यक्तियों के अनायास सुख का कारण बनता हूँ तो इस धर्म का पालन करने पर हम सभी एक बड़ा भारी अनायास सुख का विशाल वातावरण उत्पन्न कर सकते हैं। परन्तु इसके लिये सामूहिक व्यापक उद्योग अपेक्षित है।

ये तो यज्ञ के प्रत्यक्ष सुखानुभव हैं। इसके साथ जो अध्यात्म लाभ करने वाले को होते हैं वे डडडडडडडप्रत्यगात्म वेदनीय हैं जो करने पर स्वयं ही अनुभव किये जा सकते हैं, उनको लेखनी से लिखकर बतला नहीं जा सकता।

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