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Magazine - Year 1956 - Version 2

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यज्ञ से स्वर्ग की प्राप्ति

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(श्री स्वामी ब्रह्मानन्दजी दंडी महाराज एटा)

“स्वर्गकामो यजेत्” दर्शपूर्णमासाभ्याँ स्वर्ग कामो यजेत। मीमाँसा- ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत। शाबर भाष्य-

स्वर्ग की कामना इच्छा वाला पुरुष दर्शपूर्णमास यज्ञ करे।

स्वर्गकाम पुरुष ज्योतिष्टोम यज्ञ करे। यह वाक्य श्री शाबर स्वामी ने मीमाँसा का भाष्य करते हुए।

द्रव्याणाँ कर्मसंयोगे गुसात्वेनाभिसम्बन्धः।

मीमा. अ. 6 पा.1

सू. 1। स्वर्गकामो यजेत् इत्यादि वाक्य लिखा है- शावर भाष्य में यह वाक्य शबर स्वामी ने कहाँ से प्राप्त किया यह प्रश्न है इसका उत्तर है वेद से प्राप्त किया है यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। तेहनाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वेसाध्याः सन्ति देवाः।

यजु. अ. 31 मन्त्र 16।

अर्थात्- उस पूजनीय परमात्मा को ज्ञान रूप यज्ञ से विद्वान पूजन करते हैं और पूजा रूप धर्म को धारण करते हैं तो दुख से सर्वथा छूट जाते हैं और स्वर्ग को प्राप्त होते हैं, जिस स्वर्ग को साधन सम्पन्न पुरुष पूर्व सृष्टियों में प्राप्त हुए हैं।

सूर्य्याचन्द्रमसौधातायथा पूर्वमकल्पयत्।

ऋ. मं. 10 सू. 190 मं. 3-

जैसी सृष्टि पूर्व कल्प में रची वैसी ही इस कल्प में अर्थात् सृष्टि प्रवाह से अनादि-अनन्त है। अतः वेद में कहा कि साधन सम्पन्न पुरुष यज्ञ से स्वर्ग को अर्थात् सुख विशिष्ट प्राप्त करते रहे।

न कर्मकर्त्तृसाधन वैगुण्यात्।

न्याय-अ. 2 सू. 58

अर्थात्—कर्म-कर्त्ता-और साधन यह तीनों ठीक हो तो यज्ञ से स्वर्ग प्राप्त हो जायेगा।

यही स्वर्ग मीमाँसा शास्त्र का एक मात्र लक्ष्य है इसी के लिये, ज्ञानयज्ञ कर्मयज्ञ द्रव्य यज्ञादि को साधन वर्णन किया गया है। इसी स्वर्ग की सिद्धि के लिये परमात्मा के बृहद् ब्रह्माण्ड में प्रतिदिन वसन्त ऋतु रूप घृत ग्रीष्म ऋतु रूप समिधा, और शरद ऋतु रूप हविः से हवन हो रहा है। जो मनुष्य मात्र को वैदिक यज्ञों की शिक्षा दे रहा है। इसी स्वर्ग के साधन सर्व कर्म मीमाँसा में वर्णन किये गये हैं इसका विस्तार शास्त्र में भले प्रकार से पाया जाता है।

वेदों में यज्ञ का बीज रूप से वर्णन है यज्ञों की विधि ब्राह्मण ग्रन्थों में है यज्ञों के नाम भी “ब्राह्मण” शत पथ में है। अर्थात् प्रधान यज्ञ 3 तीन ही है। दर्शपूर्णमास 1 ज्योतिष्टोम 2 और अश्वमेध 3। यह तीनों प्रकृतियाग कहलाते हैं। दर्शपूर्णमास। घृत-दधि-पय-ओर अन्न साध्य यज्ञ है। यह यज्ञ दर्श=अमावस्या ओर पूर्णमास=चन्द्रमा के पूर्ण होने वाले पर्व में किया जाता है इसीलिये इसका नाम-दर्शपूर्णमास है। और(2) ज्योतिष्टोम यज्ञ-सोमररा औषधियों से साध्य है इसमें ज्योतिः—स्वतः प्रकाश परमात्मा की स्तुति की जाती है इस यज्ञ की सात 7 संस्था है। 1 अग्निष्टोम—2 षोडशी—3 अतिरात्र—4 अत्यग्निष्टोम—5 आप्तार्यामः—6 उकथ्य—7 वाजपेय-अर्थात् ज्योतिष्टोम यज्ञ 7 संस्था—नाम स्तोत्र की समाप्ति का है अर्थात् जिन मन्त्रों से परमात्मा की स्तुति की जाती है उसका नाम स्तोत्र है। याजक इनको संस्था कहते चले आये हैं। (3 तृतीय अश्वमेध यज्ञ में देने योग्य पशुओं का दान किया जाता है। अश्वमेध यज्ञ ही विचारणीय है।

प्रथम वेद ऋग्वेद है द्वितीय यजुर्वेद—तृतीय सामवेद-चौथा अथर्ववेद है। वेदत्रयी ज्ञान-कर्म—उपासना—तीन ही काण्ड वेद में हैं। चौथा विज्ञान काण्ड है ज्ञान अर्थात् गुण गुणी का ज्ञान ऋग्वेद में कर्म का यजुर्वेद में, उपासना का सामवेद में वर्णन है विज्ञान का अथर्ववेद में है किन्तु तीनों वेदों में प्रथम “यज्ञ” शब्द का प्रयोग है। अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारम्। ऋग्वेद के पहले मन्त्र में यज्ञ शब्द सबसे पूर्व है यज्ञस्य-अग्निम् ईले। शेष सब अग्नि के विशेषण है। अतः यज्ञ शब्द पूर्व, यज्ञ नाम परमेश्वर का है। तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः। इत्यादि यजुर्वेद के मन्त्र में यज्ञ रूप प्रभु से 4 वेद प्राप्त हुए यज्ञों वै विष्णु-शत पथ में भी यज्ञ नाम परमात्मा का है दूसरे वेद में इसे त्वोर्जे त्वावाचवस्थ देवोबः—सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमायकर्मण इत्यादि यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र में, श्रेष्ठतम शब्द पहले आया है ‘यज्ञोवै श्रेष्ठतम कर्म” अतः यज्ञ का अर्थ यजुर्वेद में सर्वोत्तम कर्म कर दिया श्रेष्ठतमाय कर्मण आध्यायध्वम्। कस्मै प्रयोजनाय इसे अन्न और विज्ञान की रक्षार्थ यज्ञ कर्म को प्राप्त कराइये। अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्य दातये। निहातासत्सि बर्हिर्षि। सर वेद का प्रथम मन्त्र है इसमें भी बर्हिर्षि (यज्ञे) यज्ञ में देवताओं के लिये हवि अर्थात् उत्तम अन्न जो यज्ञ से उत्पन्न किया है वह हव्यान्न ‘भौतिकाग्नि’ यज्ञ में आहुति देते हैं। अर्थात् तीनों वेदों में यज्ञ शब्द पूर्व आता है।

“रशून् पाहि” अर्थात् गौ-सहिषी-बकरी आदि की यज्ञार्थ रक्षा करो यथा मनु ने लिखा यज्ञार्थ पशवः सृष्टाः, यज्ञ के लिये पशु भगवान ने बनाये हैं गौ आदि के बैलों से (खेती) कृषि का काम और दुग्ध वृत से यज्ञ करो। यज्ञों में हिंसा का नाम नहीं। कल्पना करो, अतिथि यज्ञ है क्या उसमें अतिथि की हिंसा की जाती है नहीं अतिथि की पूजा दूध दही आदि से सत्कार किया जाता है।

राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः। अर्काश्वमेवावुच्छिष्टे जीव बर्हिर्मदिन्तम, अफर्ववेद—

11।9-7।

राजसूय 1। वाजपेय 2। अग्निष्टोम 3 अध्वरः 4 अर्क 5 अश्वमेध 6 जीवबर्हि 7 मन्दितम 8 इत्यादि ईश्वर से ही सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ हैं इसमें पशु बलि का नाम नहीं अश्वमेध का अर्थ घोड़ा को छोड़ना सबको विजय करना घोड़े को मार कर हवन करना यह अर्थ को अश्वमेध शब्द का अनर्थ मंत्र है।

अतः हम सब मिल कर दृव्य याग से संसार रोग रहित बनाने का उद्योग करें। द्रव्य यज्ञ ही सब यज्ञों का जनक है ज्ञान जप यज्ञादि बिना इसके नहीं हो सकते। जब द्रव्य यज्ञ करेगा तो उत्तमान्न होगा उत्तमान्न से उत्तम मन (बुद्धि) बनेगा तो ज्ञान (वेद को) पढ़ेगा पुनः उत्तम मन्त्र का जप करेगा तो पुनः आध्यात्मिक तत्व सर्व व्यापक प्रभु का प्राप्त करेगा तो प्रभू का आनन्द प्राप्त करेगा यही मोक्ष में प्राप्त कर “आनन्दं लब्ध्वा आनन्दी भवति”- दृव्य यज्ञ इसी प्रकार अभ्युदय और निःश्रेयस का साधन है (स्वर्गकामो यजेत) सुख की इच्छा हो तो यज्ञ करो देवपूजा अर्थात् चेतन देवता विद्वान् और महादेव प्रभु की पूजा तथा भूमि जलवायु अग्नि आदि 33 देवता को पवित्र बनाओ यही इनकी पूजा है। संगतिकरण सब मिल कर रहो प्रेम से रहो। दान देश-काल पात्र को देख कर दान करो। इत्यादि सब दृव्य यज्ञ में ही निहित है। जो भाई चार प्रकार के दृव्यों से यज्ञ करते हैं, कस्तूरी केसर-अगर तगर चन्दन इलायची जावित्रा जायफल इत्यादि सुगन्धित है। 7 घृत दूध फल यव चावल इत्यादि पुष्टिकारक 2 शंकर गिरी छुआरे किसमिस मेवादि इत्यादि मिष्ट 3 रोगनाशक गिलोय सोमलतादि 4 इन 4 प्रकार के दृव्यों से यज्ञ से सब प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इन सुखों में स्वर्ग सुख भी सम्मिलित है।

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