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Magazine - Year 1956 - Version 2

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यज्ञ का महान तत्व ज्ञान

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(श्री अभवदेव, चरथावल)

वैदिक साहित्य में यज्ञ की बड़ी महिमा है। बहुत से लोग ‘वेद में केवल यज्ञ-विषय की ही चर्चा हैं, ऐसा मानते हैं। साधारण याज्ञिक लोग जिसे यज्ञ कहते हैं, उसकी अपेक्षा कहीं विशाल और व्यापक है। स्वयं वेद भी यज्ञ से ही उत्पन्न हुआ है।

तस्माँद् यज्ञार्त्सवहुतः ऋचः सामानिजज्ञिरे। छन्दांसिजज्ञिरे तस्माद् यजुत्त्तस्वादजायत॥

अर्थ—उस सर्वहुत यज्ञ से ऋक्, यजुः, साम और अथर्व, चारों वेद उत्पन्न हुए। ब्राह्मण, उपनिषद् गीता महाभारत) आदि छंदों (शास्त्रों) में हुआ यज्ञ व्याख्यान बतलाता है कि वैदिक धर्म में यज्ञ की महिमा को समझते हुए, हम जानें कि यज्ञ क्या है?

ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में प्रश्न पूछा है कि, “मैं तुमसे पूछता हूँ कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडों को बान्धने वाली वस्तु कौन है? इसका उत्तर दिया है कि यह यज्ञ ही इस विश्व-ब्रह्मांड को बान्धने वाला है।

तो फिर हमें यह जानना चाहिये कि यज्ञ क्या है, जिससे सब संसार बंधा हुआ है।

यहाँ पर यज्ञ का असली अर्थ समझना आवश्यक है। साधारण शब्दों में कहा जाय तो—“मेल, मिलना, जुड़ना, सम्बन्ध रखना, ठीक तरह से जुड़ना, ठीक तरह से सम्बन्ध स्थापित रखना”, इन सारे शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। इन सारे शब्दों का केंद्रीय अभिप्राय है—सुसंगतिकरण।

प्राचीन साहित्य में यज्ञ के अर्थों के सम्बन्ध में एक सूत्र है; जिसमें उक्त शब्दों के द्वारा ‘यज्ञ’ के अर्थों का स्पष्टीकरण किया गया है। पाँच प्रकार के यज्ञवाच्य अर्थों में यह सूत्र गया हुआ है। वे अर्थ इस प्रकार है

1—परमात्मा यज्ञ है।

2—यह संसार यज्ञ है।

3—सुसंगठित मानव समुदाय यज्ञ है।

4—मानव जीवन, यज्ञ है।

5—मनुष्य का प्रत्येक कल्याणकारी-कर्त्तव्य-कर्म, यज्ञ है

इन पाँचों का स्पष्टीकरण—

1--“यज्ञो यत्र पराक्रान्तः।” यज्ञ की उच्चतम पराकाष्ठा परमात्मा में होती है। अतः परमात्मा को भी पुरुष सूक्त में ‘यज्ञ’ कह कर पुकारा गया है।

2—यह संसार यज्ञ है। इस यज्ञ का कर्त्ता परमात्मा है। यह संसार, खूब अच्छी तरह से ठीक-ठीक जुड़ा हुआ है। इसमें सब कार्य ठीक-ठीक अटल नियमों द्वारा, ठीक स्थान; ठीक समय और ठीक-ठीक सम्बंध में विद्यमान् रहती है। यह संसार इतनी अच्छी तरह बंधा हुआ—सुसम्बद्ध है कि यह सब मिलकर ‘पूर्ण’ है। कहा है—

“पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।”

3—मनुष्य यज्ञ- मानव समुदाय का सुसंगठित स्वरूप ही मनुष्य यज्ञ है। यही हमें-मनुष्य मात्र को विशेष रूप से करना है। सब संगठन, सम्बन्ध संस्था इस यज्ञ में समाविष्ट हैं। कर्म काण्ड के सुप्रसिद्ध, बड़े-बड़े यज्ञ (राजसूय, विश्वजित् आदि) इसी के अंतर्गत है।

4—मनुष्य का “सुव्यवस्थित-जीवन” ही चौथा यज्ञ है। परमात्मा के विशाल विश्व यज्ञ की ही सीमित प्रतिमा ‘मानत-जीवन यज्ञ है। मनुष्य को इसे ठीक रूप से व्यवस्थित और चालू रखना चाहिये।

मनुष्य का प्रत्येक कल्याणकारी- श्रेष्ठ कर्त्तव्य भी यज्ञ है। विश्व-विधान और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीवन को चलाने से संसार के साथ उसकी सुसंगति रहती है। उसके प्रतिकूल चलने से संसार बिगड़ता है, ये बुरे कर्म हैं, ये संसार को भी दुःखी बनाते हैं तथा करने वाले को भी क्लेश पहुँचाते हैं। यह अयज्ञ है।

मनुष्य यज्ञ के अनेक रूप होते हैं। समाज की भलाई के लिये चातुर्वर्ण्यं एवं आश्रम-व्यवस्था का संगठन एक महायज्ञ है। राष्ट्र यज्ञ है, स्वराज्य-संगठन यज्ञ है, बुराइयों के विनाश के लिये किया जाने वाला संग्राम भी यज्ञ है, सबों के लाभ का ध्यान रखते हुए किया जाने वाला व्यापार संगठन यज्ञ है। प्राचीन भारतीय-गृहस्थ परिवार का व्यवस्थित गार्हस्थ्य धर्म, संपादन यज्ञ है, इस भाँति छोटे बड़े सभी संगठन, जो कल्याण के लिए होते हैं, यज्ञ हैं।

अशुभ के लिये किया गया संगठन यज्ञ नहीं होता। दूसरों के—गरीब और निर्बलों को सताने के लिये, अशक्तों और बुद्धिहीनों का खून चूसने के लिए बड़े-बड़े संगठन किये जा सकते हैं, पर ये पापों को डडडड करने वाले कर्म, यज्ञ नहीं होते। दुर्लघ्य सामने आते ही संगठन में से यज्ञ के देवता निकल जाते हैं, उस पर असुरों का अधिकार होता है।

यज्ञ एक दिव्य महाशक्ति तथा उसका उत्पादन केंद्र है। इसे आसुरी शक्तियाँ सदा नष्ट कर देने के प्रयत्न में लगी होती हैं, अतः इसकी रक्षा आवश्यक है। शक्ति प्राप्त होने पर उसे सदुपयोग करने की अपेक्षा दुरुपयोग करने का प्रलोभन ही अधिक खींचता है। यही सबसे बड़ा खतरा है, जिससे यज्ञ को प्रतिक्षण बचाना होता है। ऋषिगण यज्ञों की रक्षा करने के लिये सदैव तत्पर रहते थे, उसका यही तात्पर्य था। आज भारतवासियों को उसी प्राचीन यज्ञ (सुसंगठन) कला को पुनर्जीवित करने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

अब प्रश्न यह है कि राष्ट्र में—विश्व में देवताओं का राज्य स्थिर करने का उपाय क्या है? सबों को यज्ञ भूमि बना देना, सर्वत्र सोमरस (प्रेस) का सागर लहरा देना, जिसका क्रियात्मक रूप है, आत्मबलिदान, आत्मोत्सर्ग या स्वार्थ-परित्याग। यही यज्ञ का प्रकट या क्रियाशील प्राण है। इसके बिना कदापि जीवन धारण नहीं कर सकता। यह सभी देवों का देव महादेव है। इसके उत्क्राँत होने से श्रद्धा-सेवा आदि सारे देव उत्क्राँत हो जाते हैं और इसकी स्थापना होने से सभी स्थापित हो जाते हैं। इसके बिना यज्ञ मृतवत् है, इसी से कई विद्वान्, यज्ञ का अर्थ बलिदान (अपने सारे स्वार्थों का बलिदान) करते हैं। यह बलिदान की अग्नि मानव जीवन में सदा जलती रहे, इसीलिये बाहर के अग्निहोत्र में सदा ‘स्वाहाः स्वाहाः’ ध्वनियों के साथ ही हवि या बलि दी जाती है। यह ‘स्वाहाः’ ही यज्ञ की जान है। यज्ञ के उत्तमाँग में श्रद्धा और अनुशासन, मध्यमाँग में ‘सुसंगतिकरण’ तथा आधार अंग में वात्सल्य, करुणा और दान इसी बलिदान की बदौलत ही स्थिर और प्रतिष्ठित होता है। यह नहीं होने से उत्तमाँग में, अश्रद्धा, अविश्वास संदेह, शंका, अनुशासनहीनता, स्वेच्छाचारिता रूपी आसुरी शक्तियाँ प्रवेश कर उस अंग को क्षत विक्षत, क्षीण और रोगी बना देते हैं।

इसी भाँति मध्यमाँग में उत्सर्ग या बलिदान की भावना का अभाव होने से उसका सुसंगतिकरण बिखर जाता है और ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध असुर प्रवेश कर व्यष्टि लाभ के लिए समष्टि के कल्याण को ठुकराते रहता है और इसी तरह यज्ञ के तीसरे अंग ‘दान’ जो स्वभावतः ही बलिदान रूप है। इसमें छोटों की सहायता के लिए—उनकी कमी पूर्ति करने के लिये जो कुछ हमारे पास है, वह सब कुछ देना होता है। प्रेम ही बलिदान की प्रेरक—शक्ति है, अतः बिना प्रेम के बलिदान जीवित नहीं रह सकता। जहाँ प्रेम से बलिदान होता है, वहाँ बलिदान से प्रेम भी बढ़ता है, जैसे रस से प्राण पुष्ट होता है और प्राण पुष्ट होने से रस भी अधिक बनता है। यहाँ भी अहंकार और स्वार्थ-असुर प्रवेश कर इस अंग को नाश करने का प्रयत्न करने लगता है।

मनुष्य, इस पुरे संसार का एक छोटा सा नमूना है। जैसे मनुष्य में सब देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार उसमें पशु भी रहते हैं। स्वार्थ भाव पशु है—‘कामः पशु’। क्रोध, लोभ, द्वेषादि इसी के भेद हैं। इन पशु भावों को एक-एक पशुओं का प्रतीक कहा गया है, जैसे—बाज, घमण्ड का प्रतीक है, गिद्ध लोभ का, कुत्ता चापलूसी का, अज्ञान उल्लू का, मूर्खता गधे का, ऐसे ही अनेकों पशु भावों को प्रतीक रूप में पशु के नामों से ही वर्णन किया गया है। यज्ञ में इन पशुओं का बलिदान करने से (पशु भावापन्न) पशु-मनुष्य, मनुष्य बनता है, और मानव भावों का भी उत्सर्ग कर देने से वह दिव्य भावापन्न—देव बन जाता है। यही यज्ञ में पशुओं के बलिदान का रहस्य है। अज्ञानी--असुर लोग प्रतीक नामधारी पशुओं की ही यज्ञ में वलि देते हैं जो यज्ञ नहीं अयज्ञ और यज्ञ का विरोधी कर्म है।

यज्ञ का घातक शत्रु स्वार्थ-खुदगर्जी है। (पहले मैं, पीछे दूसरे सब) स्वार्थ, प्रेम रूपी इन्द्र का शत्रु वृत्र (वृत्रासुर) है, यह प्रेम सुर्य को सदा ही ढकने की चेष्टा किया करता है। बलिदान दिन है, तो स्वार्थ, रात्रि । जिस भाँति बलिदान, यज्ञ-देवों में महादेव है, उसी तरह इसके विरोधी असुर दलों में सर्व प्रधान स्वार्थ है। अहंकार, मोह, अपनापन ये सब इसी के भिन्न-भिन्न रूप हैं। यज्ञ में जिन-जिन वस्तुओं को छोड़ना पड़ता है, बलिदान करना पड़ता है, उसका एक ही नाम स्वार्थ है। प्राणाग्निहोत्र उपनिषद् में शरीरस्थ यज्ञ का चित्र खींचते हुए लिखा है—“कामः पशुः”। काम अर्थात् पहले अपनी इच्छा। यही यज्ञ (संगठन) में बलिदान करने योग्य पशु है। स्वार्थ के लिये ‘काम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। यज्ञ में अपनी अलग इच्छा (स्वार्थ) रखना, उसे भ्रष्ट कर देना है।

सभी यज्ञों में देने-लेने की प्रक्रिया होती रहती है हम अग्निहोत्र में घृत, औषधि, बलवर्धक पवित्र अन्नों की आहुति देते हैं, उसे ही यज्ञ के देव गण ग्रहण कर सन्तुष्ट होते हैं और उसे ही सूक्ष्म—सूक्ष्मातिसूक्ष्म बना कर सारे विश्व ब्रह्मांडों में फैला देते हैं, जिससे पांचों तत्व या अन्य सारे तत्व ही परिशुद्ध निर्मल, आरोग्यमय एवं पुष्ट बन जाते हैं। फिर उन तत्वों को वृष्टि, विद्युत, वायु आकाश आदि के द्वारा हम पुनः प्राप्त कर अधिक पुष्ट, आरोग्य और निर्मल बनते हैं। शास्त्रों में ‘पर्जन्य’ इस शब्द के माध्यम द्वारा हमें उसकी पुनः प्राप्ति, वर्णित है, पर यह वृष्टि केवल जलों की ही वृष्टि नहीं है—यह ‘पर्जन्य’ सा कल्याणकारी तत्वों की वृष्टि का एक प्रतीक है।

यज्ञ में जिन वस्तुओं को बलिदान-उत्सर्ग किया जाता है, उसे हवि कहते हैं। यह हवि अनेकों प्रकार की होती है और भाँति-भाँति के यज्ञों में इसकी वलि दी जाती है। गुरुदेव रूपी यज्ञाग्नि में शिल्प श्रद्धा भक्ति और सेवा की समिधा लेकर हवन करते और उसे अनन्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। व्यक्ति अपना स्वार्थ छोड़कर अपनी सारी उत्पादन और उपार्जन शक्ति समाज-यज्ञ में हवन करता है, फलितार्थ वह समाज द्वारा निर्मित अनेकों वस्तुओं, रसों और सुखों का उपभोग करता है, जिसे वह केवल वैयक्तिक श्रम से कभी पा ही नहीं सकता था। इसी भाँति समाज, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, प्राँत आदि जब डडडडड लिये अपना सब कुछ स्वाहा कर देता है, तो इस डडडड यज्ञ से उन्हें व्यापक विशालता में सुख, सुविधा ऐश्वर्य संस्सति और ज्ञान के साधनादि प्राप्त होते हैं। यज्ञ के इन्हीं मूल रूपों से भारत के पूज्य ऋषिगणों ने पञ्च महायज्ञ निरूपित कर सबों को यज्ञशिष्ट भोग कर निष्पाप और भगवद् प्राप्ति के योग्य बनने का निर्देश दिया था वे ये हैं:-

1—ब्रह्म यज्ञ

2—देव यज्ञ

3—पितृ यज्ञ

4—नृ यज्ञ

5—भूत वलि (वैश्वदेव यज्ञ)

ब्रह्म यज्ञ:—ऋषियों की भाँति अपना सब कुछ धन-सम्पत्ति-ऐश्वर्य-शरीर-प्राण-मन-बुद्धि-हृदय आदि सभी परमात्मा को अर्पित कर दें और फिर उनके आदेश के अनुसार ही अपने जीवन में इन सबों का उपयोग करें। (सब कुछ वस्तुतः परमात्मा को सौंपते ही उनका निर्देश अन्तर में क्रमशः स्पष्ट होकर प्राप्त होने लगता है।) यह ब्रह्म यज्ञ है।

2—देव यज्ञ- विश्व के कल्याण के लिए प्रत्यक्ष अग्नि में ऐसे आरोग्यमय, पुष्ट और मंगल द्रव्यों की श्रद्धा और भक्ति से आहुति दें, जिसे विश्व में फैले अनन्त देव ग्रहण कर सबों के कल्याण और शुभ के लिये पर्जन्य रूप में विविध वृष्टि कर पुनः विस्तृत रूप में हमें प्रदान करते हैं।

3—पितृ-यज्ञ- जीवन में पोषण, रक्षण एवं विविध कल्याणों की अभिवृद्धि करने-कराने वाले गुरु-पितृ बड़ों की भक्ति और सेवा ही पितृ यज्ञ है। शरीर छोड़ने के उपरान्त भी उनकी आज्ञा मान कर चलना तथा उनके आत्म कल्याण के लिये सत्कर्मों का अनुसरण करना भी पितृ यज्ञ ही है।

4—नृ यज्ञ—अपने स्वार्थ की संकीर्णता को विशाल परार्थताडडडडडडडड में परिणत करने के लिए अपरिचित डडडडयचित अभ्यागतों की, देव और ईश्वर मान कर डडडड-अर्चन-भोजन-शयन-आदर और स्वागत वाणी से डडडडत्कार करना ही नृयज्ञ है।

5—भूत वलि या वैश्वदेव यज्ञ—स्थूल, सूक्ष्म, डडडडव्य जितने भी प्राणी या देव हैं, सबों को तृप्त करने की भावना से भोज्य सामग्री की हवि प्रदान करना ही भूत या वैश्वदेव यज्ञ है। इससे व्यक्ति का हृदय और आत्मा विशाल होकर अखिल विश्व के प्राणियों के साथ एकता सम्मिलन का अनुभव करने में होता है।

यज्ञ कर्त्ता को क्या खाना चाहिये?-इसका भी एक आवश्यक नियम और व्रत है। उसे ‘यज्ञाशिष्ट’ ही ग्रहण करते-भोग करने का विधान है। तो यह ‘यज्ञशिष्ट’ क्या है, जिसे खाने-उपभोग करने वाले ‘सनातन ब्रह्म’ यानी परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं और सर्व किल्विष्यों से मुक्त हो जाते हैं।

यज्ञ शिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः॥

—गीता

ये भोगे जाने वाले पदार्थ उपभोक्ता को जहाँ और जिससे प्राप्त होते हैं, उसे (उस वस्तु को) उनको बिना अर्पित किये ही जो उसे अपने उपभोग में लाना चाहता- या लाता है, वह चोर है।

तैर्दत्तान प्रदायैभ्यो यो मुक्तेस्तेन एवं सः॥

गीता 3।12

साधारण तौर से व्यक्ति को समाज से, समाज को राष्ट्र से, राष्ट्र को विश्व से और विश्व को यज्ञ पुरुष-परमात्मा से ही उपभोग-सामग्रियों की प्राप्ति होती है, अतः इसे भोगने का विधान है- ‘त्यक्तेन भुञ्जीथा’ ईशो.॥ त्याग कर, उत्सर्ग कर भोग करो।

व्यक्ति अपने प्राप्त सारे उपभोग-वस्तुओं को समाज के लिये उत्सर्ग कर दे, समाज राष्ट्र के लिये, राष्ट्र, विश्व के लिए और विश्व, यज्ञ पुरुष के लिये इसी भाँति हवि प्रदान करे। यह यज्ञ करने के उपरान्त उनके हिस्से में यज्ञ देवों द्वारा जो कुछ दिया जाय, वही ‘यज्ञशिष्ट’ है। इसे ही उपभोग करने वाले निष्पाप-निर्मल होकर (यज्ञपुरुष विष्णु) विश्व व्यापकता को प्राप्त कर लेते हैं। यही शुद्ध और आध्यात्मिक समाजवाद है, जिसे इन यज्ञ प्रक्रियाओं के द्वारा ही स्थापित किया जा सकता है।

वेद में बहुत जगह ‘यज्ञम् विततम्,’ ‘यज्ञम् वर्चयानः,’ ‘यज्ञ वर्धन्’—इस प्रकार के वाक्य या शब्द आते हैं, जिनमें यज्ञ के विस्तार करने—बढ़ाने का वर्णन होता है। यह यज्ञ का विस्तार क्या है? एक दूसरे से मिलने की प्रवृत्ति ही सभी के अन्तर में स्थित यज्ञ बीज हैं। यह बीज ही क्रमशः बढ़ता हुआ सारे विश्व में फैल जाता है, तभी मनुष्य को सर्व व्यापक यज्ञ पुरुष परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यही यज्ञ विस्तार का तात्पर्य है। मनुष्य सर्व प्रथम अपनी डडडडडअयज्ञता को छोड़कर कुटुम्ब (गार्हपत्य) यज्ञ में संगठित होता है। इससे आगे बढ़ कर वह ग्राम पंचायत (आह्वनीय) बनाता है। ग्राम पञ्चायत क्रमशः विकसित होकर, जनपद, प्राँत और राष्ट्र के रूप में संगठित होता है। दक्षिणाग्नि॥ और अन्त में सब राष्ट्रों की अंतर्राष्ट्रीय सार्वभौम महासभा में मनुष्य-संगठन का यज्ञ परिपूर्ण होता है, परन्तु मनुष्य हृदयस्थ यज्ञ तब पूरा होता है, जब वह ईश्वरीय महा संगठन अपने को संगठित अनुभव करता है। तब वह सर्वमेध यज्ञ को पूरा करता है। यज्ञ विस्तार की यही अवधि या सीमा है।

जब तक भारत वर्ष के जीवन में यज्ञ के द्वारा यज्ञ का यजन नहीं होगा, अर्पण या बलिदान की वृक्षि नहीं जगेगी, तब तक यहाँ की उन्नति का इन आसुरी अयज्ञों द्वारा सदा व्याघात और बाध होता ही रहेगा, और हमारी व्यापक तथा सर्वांगीण उन्नति की कोई सम्भावना नहीं है।

प्राचीन यज्ञ:—

1. राजसूय यज्ञ— जिस सम्मेलन में सुसंगठित होकर राजा का चुनाव किया जाता है, ऐसे संगठन को राजसूय यज्ञ कहते हैं। इसका वर्णन अथर्ववेद के 4।8 सूक्त में देखा जा सकता है।

2. विश्वजित् यज्ञ—इस द्वारा एक राष्ट्र या मानव समुदाय अपनी विशाल हृदयता, प्रेम और शक्ति के प्रभाव से सारे विश्व पर अपना आधिपत्य कायम कर सकता है।

3. अश्वमेध यज्ञ—शतपथ के “राष्ट्रं वा अश्वमेधः” “वीर्यं वा अश्वः” वचनानुसार राष्ट्र और उसकी शक्तियों का भली भाँति संगठन करना ही अश्वमेध यज्ञ है।

4. पुरुषमेध—अपने-अपने वैयक्तिक स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्र के ही उत्थान के लिये अपना जीवन अर्पित कर देना पुरुषमेध यज्ञ है। ऐसे लोगों को कभी कभी संग्राम और दुष्टों के दमन करने में प्रत्यक्ष ही जीवन या प्राण का बलिदान कर देना पड़ता है। इसका वर्णन बौद्ध ग्रन्थों में मिलता है।

5. गोमेध—गौ जाति के उपयोग से भूमि को जोतकर तथा खाद्य से उर्वरा बनाकर भूमि को अधिक तय भोज्य सामग्री उत्पन्न करने के योग्य बनाना ही गोमेध है।

सर्वमेध—किसी डडडड यज्ञ के लिए जब निचला यज्ञ (संगठन) सब कुछ बलिदान कर देता है, तो उसे ‘सर्वमेध’ कहा जाता है।

अंत में भारत देश का यज्ञ द्वारा उद्धार करने के लिए प्रेम से प्रार्थना की जाती है:—

यस्यां सदो हविर्धाने यूपो यस्यां निपीयते।

ब्राह्मणो यस्यामर्चन यृग्भिः साम्ना यजुर्विदाः युज्यन्ते यस्यामृत्विजःसोभमिन्द्राय पातवे ॥38॥ यस्यां पूर्व भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः। सप्त सत्त्रेण वेधडडडड यज्ञेनतपसा सह ॥39॥ अथर्व 12।1।38।39

हे यज्ञभूमि! क्या अब फिर तेरा उद्धार होगा यह यज्ञभूमि-भारतभूमि, जिस भूमि पर सभास्था और हविस्थान होते थे, जहाँ यज्ञ स्तम्भ गाड़ा जाता था, जहाँ ब्रह्मा और अध्वर्यु आदि ऋचाओं और डडडडडडडसामों से अर्चन करते थे, जहाँ इन्द्र को सोमरस पिलाने के लिए नित्य यज्ञशील लोग संगठित होते थे, जहाँ भूतडडडड को बनाने वाले पूर्व महर्षिगण संतों-विश डडडडलतर यज्ञों द्वारा सातों गौओं-किरणों-दिव्यडडडड लोकों की पूजा करते थे तथा ब्रह्मा, तपस्या के द्वारा यज्ञ (संगठन) करते थे—क्या वह भारत भूमि डडडड फिर यज्ञभूमि बनेगी?

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