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Magazine - Year 1957 - Version 2

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अपने ज्ञान को विकसित कीजिए।

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(स्व. लाला हरदयाल जी)

व्यक्ति को जिस प्रकार अपना जीवन-सूत्र अक्षुण्ण रखने के लिए भोजन, जल और वायु की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार अपने ज्ञानतंतुओं को और अधिक विकसित करने के हेतु अपना बौद्धिक दृष्टिकोण व्यापक बनाने के लिए ज्ञानार्जन की भी आवश्यकता पड़ती है। मनुष्य को दो अत्यन्त महत्वपूर्ण निधियाँ मिली हैं- एक तो मस्तिष्क और दूसरी सामाजिक भावना। मस्तिष्क और सामाजिक भावना का मानवीय विकास के इतिहास में प्रमुख स्थान है। मस्तिष्क की महिमा का तो कहना ही क्या है! मनुष्य इसी की बदौलत पशु वर्ग से ऊँचा और उन्नतिशील माना जाता है। गिद्ध, चींटी, कुत्ते आदि के ज्ञान-तंतु मनुष्य से अधिक सजग होते है, परन्तु उनका मस्तिष्क मनुष्य के मस्तिष्क की समता नहीं कर सकता। मनुष्य की-सी प्रखर बुद्धि उनके पास कहाँ।

परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य यह जान कर ही सन्तोष कर ले कि उसका मस्तिष्क तो संसार के अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक विकसित एवं पूर्ण है। इसलिए उसे बिना अधिक ज्ञान प्राप्त किये ही संसार के निम्न वर्गों पर शासन करने का अधिकार मिल गया। जिस व्यक्ति का मस्तिष्क आलस के वशीभूत होकर दिन व दिन गुँठित होता जाता है वह धीरे-धीरे पशु श्रेणी का ही गिना जाने लगता है। वह स्वयं अपने लिए भारस्वरूप होकर दूसरों के लिए भी अखरने वाला प्राणी बन जाता है। उससे किसी को किसी प्रकार की आशा नहीं होती और वह समाज द्वारा उसी प्रकार की उपेक्षा-पूर्वक अलग हटा दिया जाता है, जिस प्रकार एक स्पन्दनहीन जीव।

विश्व में अवतरित होने का अर्थ है, अधिकाधिक ज्ञानार्जन करके विश्व का कल्याण करना। मनुष्य को तो होश सम्हालते ही ज्ञान की खोज में निकल पड़ना चाहिए। जीवन-यापन के लिए वैसे तो किसी भी विशेष कला में पारंगत हो लेना निताँत आवश्यक है, परन्तु बौद्धिक विकास के बिना जीवन प्रत्येक दृष्टि से असंतोष-जनक और अपरिपूर्ण रह जाता है और ऐसे मनुष्य को समाज में वह आदर नहीं प्राप्त हो पाता, जिसका वह इच्छुक रहता है। वास्तव में ज्ञान ही सत्य है। सत्य के दर्शन होने पर ही आत्मा को पूर्णत्व प्राप्त होता है। मनुष्य का यह सबसे बड़ा कर्त्तव्य है कि वह अपने आपको ऐसे वातावरण में संलग्न रखे, जिसमें उसे सर्वत्र ज्ञान मालाओं के ही दर्शन हों।

ज्ञान और बौद्धिक संस्कृति आपके लिए विविध प्रकार के फल देने वाले हैं। यदि आप इनके अर्जन में, इनकी साधना में तल्लीन हैं, तो आपको न तो अन्धविश्वास ही पथ-भ्रष्ट कर सकेंगे और न आप राजनीति अथवा धर्म के क्षेत्रों में झूठी नेतागीरी के बहकावे में आयेंगे। आपको ज्ञानरूपी सत्य की खोज करते-करते अपने सच्चे कर्त्तव्य का भान हो जायेगा और आप इसकी पूर्ति में लग जायेंगे। यदि आप चाहते हैं कि स्वार्थांध पुरोहितों, मुल्लाओं या पादरियों से बचें, यदि आप शोषण पर आधारित योजनाओं के चंगुल में फंसने से बचना चाहते हैं तो राजनीति और धर्म के विषयों में खुली आँख से काम लें। खुली आँख की ज्योति आपको तभी प्राप्त होगी जब मस्तिष्क भली-भाँति पुष्ट एवं परिपक्व होगा। क्या ऐसी कल्याणमयी ज्योति की उपलब्धि के अभिलाषी आप नहीं हैं? अधिकांश पुरुष तथा महिलाएँ आज की ध्वजा फहराने वालों और राजनीति का झण्डा ऊँचा करने वालों के भार से कुचल-से रहे हैं। ये गरीब प्राणी उन पतंगों की भाँति हैं, जिनकी डोर धर्माधिकारियों और राजनीतिज्ञों के हाथ में है। दुर्भाग्यवश विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा अन्य शास्त्रों का ज्ञान न होने के कारण, ज्ञान-चक्षुओं के मूँदे रहने के कारण धर्माधिकारी और राजनीतिज्ञ इन्हें पीसते रहते हैं। इनकी अधिकाँश कठिनाइयाँ इनकी भयंकर अज्ञानता के कारण हैं और बची-खुची इनके अहंभाव के कारण। अज्ञानी होते हुये भी ये अकड़कर चलना चाहते हैं, पर ठोकर पर ठोकर लगती है और अन्त में गिर जाते हैं। परिणामस्वरूप अंतर्चक्षु खुलते हैं और साफ सुथरा मार्ग सामने आ जाता है।

आपको अपने ज्ञान की वृद्धि करने के लिए विशाल क्षेत्र उपलब्ध है। हाँ, इधर-उधर न भटक कर दत्तचित्त होकर आपको वैज्ञानिक ढंग से कार्य करना है और समय के प्रत्येक क्षण का पूर्ण उपयोग करना है। अपने दैनिक कार्यों से छुट्टी पाकर आप अधिक से अधिक समय लिखने-पढ़ने और सुनने-सुनाने में लगाएँ। जिस प्रकार आप दिन भर में कई बार खाने-पीने के आदि हैं, उसी प्रकार आप अध्ययन करने के अधिकाधिक नवीनताओं के जानने के आदि हो जायं।

बहुधा कुछ लोगों की आदत होती है कि पढ़ते तो पर्याप्त हैं, पर स्मरण कम रखते हैं, यहाँ तक कि कुछ समय के बाद पहले का पढ़ा हुआ भूल जाते हैं। प्राप्त की हुई ताजगी के स्थान पर फिर अज्ञानरूपी बासीपन आ जाता है। इससे बचने का उपाय उतना ही आवश्यक है जितना कि खाये हुए भोजन को भली-भाँति पचा लेना। रस ही न बनेगा तो पुष्टता कैसे आ सकती है? जो कुछ पढ़ें उसे बराबर दोहराते रहें।

आप जहाँ कहीं भी हों, आप के पास एक डायरी होनी आवश्यक है, जिससे आप देखी-सुनी हुई नई चीजों, पढ़ी हुई नई पुस्तकों, मिले हुए नए व्यक्तियों आदि का संक्षिप्त-संकेतात्मक विवरण रखें। अवसर आने पर आप देखेंगे कि ये विवरण आपकी कितनी सेवा करते हैं।

बाजारों में आपको बहुत से ऐसे पुस्तक विक्रेता मिलेंगे, जो पुरानी किताबें बेचा करते हैं। उनके पास आप अवश्य जाइए और कुछ न कुछ अवश्य खरीदिए। यह कहना ठीक नहीं कि आपके पास पुस्तकों के लिए पैसा नहीं। विभिन्न विषयों पर आप उत्तमोत्तम पुस्तकें खरीद कर लाइए। इसके लिए आप अपनी आमदनी का एक निश्चित भाग पुस्तक कोष के रूप में अलग रख दीजिए और कुछ न कुछ प्रतिमास अवश्य खरीदिए। ये पुस्तकें आपको घर पर एक भव्य पुस्तकालय स्थापित कर लेने में अमूल्य सहायता देंगी। आपको अपने पुस्तकालय पर गर्व होगा। पुस्तकों को खरीदने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि आप उन्हें महज सजाने के विचार से घर ले जायं और दूसरों को उनकी बढ़ती हुई संख्या से आतंकित करें। पुस्तकों का संचयन रोब जमाने का साधन नहीं, बल्कि उनमें भरे हुए रस को निचोड़ कर पी जाने व पचा लेने का तात्पर्य रखता है।

आपको क्या पढ़ना है इसकी योजना अथवा रूपरेखा महीनों एवं वर्षों पहले बना लें तो यह आप की दूरदर्शिता ही होगी। यह न सोचिए कि पता नहीं भविष्य में कब क्या हो जाय- कौन-कौन सी कठिनाइयाँ आगे बढ़ने के समय उठ खड़ी हों दृढ़ संकल्प के साथ अनवरत परिश्रम करते हुए अग्रसर होते जाइये, आपकी विजय होगी।

स्वाध्याय के बिना किसी भी व्यक्ति का विकास होना असम्भव है, परन्तु दूसरों के अध्ययन का लाभ उठाना तो उससे भी अधिक उपयोगी तथा आवश्यक है। अपने पास-पड़ोस की साहित्य एवं साँस्कृतिक संस्थाओं और गोष्ठियों की सदस्यता स्वीकार कीजिए और वहाँ नियम बनवाइये कि बारी-बारी से प्रत्येक सदस्य अपनी मौलिक कृति या पढ़ी हुई नवीन पुस्तक का साराँश लाकर पढ़ें। पुस्तकों के साराँशों में मूल पुस्तक के उत्तम-उत्तम अंश भी कहीं-कहीं उद्धृत किए जाने चाहिए। इस प्रकार का सामुदायिक अध्ययन आप के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध होगा।

आपको ज्ञान की प्रत्येक शाखा पर चढ़ना है। इसमें जल्दी करें। जीवन के क्षण थोड़े हैं, अन्यथा यही कहना पड़ेगा कि हम तो कुछ जान लेने के पहले ही बूढ़े हो गये। प्रसिद्ध इतिहासकार जे.आर. ग्रीन ने लिखा है, “मैं जानता हूँ कि मेरे पीछे लोग मेरे विषय में क्या कहेंगे! वे कहेंगे कि वह सीखते-सीखते मरा।” आप भी इन शब्दों के अधिकारी क्यों नहीं बनते?

बौद्धिक संस्कृति के विकास के रास्ते में दो रुकावटें हैं। पहली यह कि बहुत से लोग धनोपार्जन के पीछे इस प्रकार हाथ धोकर पड़ते हैं कि उन कामों में कोई दिलचस्पी नहीं रह जाती, जिनसे उन्हें कुछ आर्थिक लाभ न हो। वे ऐसे कामों को निरर्थक और मूर्खों के योग्य समझते हैं। उनकी समझ में ज्ञान-वृद्धि भौतिक उन्नति का साधनमात्र ही है। व्यक्तिगत बौद्धिक विकास का उनके लिए विशेष मूल्य नहीं भौतिक उन्नति की यह मान्यता समाज के सभी वर्गों में बुरी तरह फैली है। अमीर-गरीब सभी इस रोग से ग्रसित हैं।

ऐसे लोगों से मेरा कहना है कि उन्होंने चित्र का चमकीला पहलू देखना ही पसन्द किया है। वे पैसा चाहे पले, पर ईश्वर प्रदत्त अमूल्य निधि अर्थात् मस्तिष्क की शक्ति का ह्रास कर रहे हैं। बौद्धिक विकास के लिए उनकी यह उपेक्षा यह उदासीनता बहुत बड़ा अभिशाप है, उन्हें जान लेना चाहिए कि बौद्धिक विकास की साधना करने से दो प्रमुख समस्याएँ हल हो जाती हैं। एक तो व्यक्तिगत विकास के लिए बहुत बड़ा साधन हाथ लग जाता है और दूसरे समाज की सेवा करने की परम क्षमता प्राप्त हो जाती है।

हाँ, यहाँ एक चेतावनी दे देनी आवश्यक है। ज्ञान-वृद्धि करने के बाद कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे का अहित न करे! यदि आप अपने अगाध ज्ञान के बल पर अपने साथी-नागरिकों को चूसने लगें, तो आप कर्त्तव्यच्युत और पथ-भ्रष्ट प्राणी कहे जायेंगे। पूँजीवादी वर्ग में इस रोग का कीड़ा इस गहराई से घुस गया है कि आपको भी इसका घुसा रहना प्राकृतिक या व्यावहारिक लगने लगता है और आप इसका विरोध न करके उल्टे उसी कीड़े की मारणशक्ति के शिकार हो जाते हैं। प्रकृति ने आपको मस्तिष्क के रूप में ऐसी शक्ति दी है कि आप सोच सकते हैं समझ सकते हैं प्रयोग में ला सकते हैं, खोज सकते हैं, ईजाद कर सकते हैं और अन्त में वो आनन्द प्राप्त कर सकते हैं, जो प्राकृतिक नियम के पालन करने के पश्चात स्वतः प्राप्त होता है। ज्ञान की वृद्धि करने वाले व्यक्तियों के आनन्द का अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। उसका सच्चा रस उन्हें ही मिलता है। सुख सम्पन्न होकर जीवन व्यतीत करने में तो आनन्द है ही, परन्तु सफलता है अधिक से अधिक जानने में।

दूसरी रुकावट यह है कि कुछ व्यक्ति, जिन्हें किसी एक विषय का कुछ ज्ञान होता है दूसरे विषयों पर व उनके जानने वालों पर व अनेक प्रकार के लाँछन लगाते हैं। कुछ धर्मवेत्ताओं की मान्यता है कि मनुष्य केवल दो भूतों से बना है- शरीर व आत्मा। बुद्धि को एकदम भूल ही गये। उनके समर्थक शरीर रक्षा करते हैं और मृत्यु के पश्चात आत्मा को संतोष मिले, ऐसे उपाय भी करते रहते हैं, पर दिमाग की ओर उनका ध्यान नहीं जाता।

अनेक महापुरुष यही उपदेश देकर चले गये कि भूखे को खिलाओ, रोगी की परिचर्या करो, और अपराधियों को शुद्ध कर लो। उन्होंने अज्ञानी को शिक्षा देने और वैज्ञानिक पद्धति से ज्ञानार्जन करने की बात कभी उठायी ही नहीं।

इस प्रकार आप अपना सर्वांगीण विकास करने पर कटिबद्ध हो जायं। यही सत्य है, यही शिव है यही सुन्दर है। अतएव अपने ज्ञान के दायरे को विस्तृत बनाने का प्रयास कीजिए। आपके सामने का क्षेत्र विशाल है, व्यापक है, आपके समक्ष महाकूप है, जिसके तल में से अजस्र धारा वाले निर्झर प्रवाहित हो रहे हैं। क्या आप में इतना अदम्य उत्साह और सच्ची लगन है कि आप अपनी बाल्टी भर-भर कर इस महाकूप का अमृत पान करके कृतकृत्य हैं।

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