बौद्ध तपस्वियों की कुछ उच्च भावनाएँ
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(श्री रामचन्द्र टण्डन)
पालि श्लोक को गाथा कहते हैं। थेरगाथा और थेरीगाथा दोनों संग्रहों के स्वर स्वभावतः भिन्न हैं। भिक्खुओं की गाथाओं में गहन आँतरिक खोज है। भिक्खुनियों की गाथाओं में एक विशेष मृदुता और आत्म-समर्पण है। जहाँ तक इनकी काव्यात्मक उत्कृष्टता का प्रश्न है। डॉ. वितनीर्ज ने कहा था कि ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर कालिदास और अमरु के गीत काव्यों तक इस समस्त प्रसार में अपनी शक्ति और सौंदर्य में, यह गीत किसी रचना से नीचे न पड़ेंगे।
विशेषकर थेरीगाथा में रचयित्रियों की वैयक्तिकता फूट पड़ती हैं। उसमें जीवन के चित्रण स्पष्ट हैं। थेरीगाथा से हम जान पाते हैं कि किस प्रकार दुख से पीड़ित और अभिभूत होकर स्त्रियाँ संघ के प्रति आकर्षित होती थीं। कभी-कभी अधम वृत्तियों में अनुरक्त स्त्रियाँ अपने जीवनयापन से खिन्न हो वृद्ध, धाम व संघ की शरण में जाती थीं। इन सभी ने अपने पूर्व और बाद के जीवन के अन्तर का अपनी गाथाओं में चित्रण किया है।
भिक्खुनियों के उद्गार
थेरीगाथा में 522 गाथाएं आई हैं। इनकी रचने वाली 73 भिक्खुनियाँ हैं। ये सभी भिक्खुनियाँ बुद्ध भगवान की शिष्याएं थीं। महाराज शुद्धोदन की मृत्यु के अनन्तर, बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द के आग्रह से अपनी विमाता महाप्रजापति गौतमी को धम्म में प्रव्रजित किया था और उन्हें भिक्खुनी बनने की अनुमति दी थी। गौतमी के साथ पाँच सौ और स्त्रियाँ भी प्रव्रजित हुई थीं। कालाँतर में भिक्खुनियों का एक अलग संघ ही बन गया और अनेक कुलों और जीवन के विभिन्न स्तरों की स्त्रियों ने इस संघ में स्थान पाया। इन्हीं में से 73 भिक्खुनियों ने आत्मानुभव के अपने उद्गारों को गीतबद्ध किया, जिनका संग्रह थेरीगाथा के रूप में हमें प्राप्त है।
बौद्ध पिटकों में, सुत्तपिटक के अंतर्गत एक निकाय है, जो सुद्दकनिकाय कहलाता है। इस निकाय में 15 विभिन्न ग्रंथ हैं, जिसमें एक थेरीगाथा है। थेरीगाथा की एक टीका, पाँचवीं सदी ईस्वी की है, जो परमात्थदीपिनी के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें प्रत्येक भिक्खुनी के जीवन वृत्त के साथ उसकी गाथी का संबन्ध मिलाया गया है और उन विशेष परिस्थितियों का वर्णन किया गया है, जिनमें ये उद्गार निकले थे।
आइए, इन गाथाओं में से कुछ का रसास्वादन करें :-
‘चन्द्र, सूर्य, अग्नि, अनेक देवताओं की मैं अर्चना-पूजा करती थी।’
नदी जल में अवगाहन करती थी।
मैंने शिकार का मुँडन किया, धरती पर शयन छोड़ा, रात्रि का भोजन त्याग दिया और तरह-तरह के व्रतों का पालन करती रही, फिर भी विजय-वासना जगाए रखने के लिए और काया को आकर्षक बनाने के लिए मैं अपने शरीर को आभूषणों से सजाए रखती थी और उस पर सुगंधित लेप लगाती थी।
जब देह का वास्तविक रूप मैंने पहचाना, तब घर-बार छोड़ कर मैं प्रव्रजिता हुई। भोग कामना में अब मेरी रति पूर्णतया नष्ट हो गई। मेरे सभी बन्धन टूटे।
‘कामनाएं नष्ट हुई, मन को परम शाँति मिली।’
ये उद्गार हैं, नन्दुत्तरा के, जो कुरुराज्य के एक ब्राह्मण वंश में जन्मी थी और जिसने शिल्प और विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की थी। इसकी वाग्मिता विख्यात थी, किन्तु बुद्ध के प्रमुख शिष्य महामोदगालान से शास्त्रार्थ में हारकर ये धम्म प्रवर्जित हुई।
एक दूसरी भिक्खुनी, पटाचारा के उद्गार देखिए :-
‘धरती को हल से जोत कर लोग उसमें बीज रोपते हैं, स्त्री तथा बाल बच्चों का पालन करते हुए वे धन कमाते है।
मैं साधिका होकर, निर्वाण कैसे न प्राप्त करती? मैं जो शीलयुक्त और शास्ता की सेविका हूँ, और प्रमादहीन, अचंचल तथा विनयपूर्ण हूँ। एक बार पैर धोने पर मैंने देखा कि बहाया हुआ जल ऊपर से नीचे जा रहा है। मैंने अपना चित्त समाधि में लगाया। दीपक लेकर, मैं फिर बिहार के एक कक्ष में गई, प्रकाश में शय्या पर बैठी और दीपक की लौ पर ध्यान करने लगी। फिर दीपक की बत्ती को सुई के सहारे नीची करने लगी कि दीप बुझ गया। दीपक ने निर्वाण प्राप्त किया। मेरी तृष्णा की लौ भी सदा के लिए बुझ गई।
पटाचारा श्रावस्ती के एक सेठ की पुत्री थी, जो आचारभ्रष्ट होकर अनेक कष्टों को झेलकर भगवान बुद्ध की शरण में आई थी और जिसे भगवान ने धर्मोपदेश दिया था जिससे उसके चित्त को शान्ति मिली थी।
पटाचार की भिक्खुनी शिष्याएं बहुत सी हुई, जो विभिन्न कुलों की थी। सभी ने पारिवारिक जीवन का भोग किया था, किन्तु उन्हें संतान का वियोग का दुःख उठाना पड़ा था। एक भिक्खुनी पर पटाचार के उपदेश का क्या प्रभाव पड़ा था, उसकी झलक इस गीत में मिलती है :-
‘वह किस रास्ते आया और कहाँ गया?’
“जब तू इतना भी नहीं जानती, तो बेटा-बेटा कहकर उसके लिए क्यों रोती है, जो तेरे पास चार दिन रहा। वह किस रास्ते आया और कहाँ गया? तू इसे जाने भी तो क्यों रोए? आना जाना तो प्राणियों का स्वभाव है। बिना बताए वह आया, बिना पूछे वह चला गया। चार दिन ठहर कर वह चला गया।
एक मार्ग से वह आया, दूसरे से चला गया। यह प्राणी का धर्म है, फिर शोक क्यों?
पुत्र शोक का जो काँटा मुझ दुःखिनी के अन्तस्तल में चुभा हुआ था, वह आज निकल गया। आज मेरा हृदय शाँत है। मैं परिनिवृत्त हुई।”
महाप्रजापति गौतमी
और अब स्वयं महाप्रजापति गौतमी के उद्गार देखिए, जो भगवान बुद्ध की माता मायादेवी की सबसे छोटी बहन थी। दोनों राजा शुद्धोदन को ब्याही थी। बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद मायादेवी की मृत्यु हो गई महाप्रजापति गौतमी ने ही उनका पालन किया। शुद्धोदन की मृत्यु पर महाप्रजापति गौतमी ने संसार त्याग करने की इच्छा प्रकट की, किन्तु भगवान ने इनकी अनुमति उन्हें नहीं दी। बाद में उन्हें कुछ ओर शाक्य स्त्रियों के साथ धर्म प्रव्रजित होने की आज्ञा दी और इस प्रकार भिक्खनियों का एक अलग संघ ही बना। भगवान बुद्ध के प्रति गहरी आस्था महाप्रजापति गौतमी की गाथाओं में प्रकट होती हैं। यहाँ एक अंश दिया जाता है :-
“हे बुद्ध, हे वीर, हे प्राणियों में श्रेष्ठ, मैं तेरे आगे सिर झुकाती हूँ। तूने मेरा और कितने ही प्राणियों का दुःख से उद्धार किया है। यथार्थ ज्ञान न जानती हुई मैं संसार-चक्र में घूमती रही। मैंने उन भगवानर बुद्ध के दर्शन किए। यह मेरा अन्तिम शरीर है। “
कृशा गौतमी
कृशा गौतमी की कथा तो बहुत ही प्रसिद्ध है। श्रास्वती के एक निर्धन कुल में इसका जन्म हुआ था। नाम गौतमी था और बहुत ही दुबली होने के कारण यह कृशा गौतमी कहलाई। इसका पुत्र जाता रहा। शोक के उन्माद में मृत को गोद में लेकर गरीब घर-घर जाकर कहती मेरे बच्चे की दवा दो। किसी ने दया कर उसे भगवान बुद्ध के पास जाने को कहा और मार्ग दिखा दिया। वहाँ पहुँच कर उसने कहा-भगवान मेरे बच्चे को दवा दो। भगवान बोले नगर में जाकर किसी ऐसे घर से मुट्ठी भर सरसों ले आओ, जहाँ मृत्यु नहीं हुई हो। जो आज्ञा कह कर वह गई। घर-घर भटकी। कौन घर ऐसा था जहाँ मृत्यु न हुई हो कृशा को ज्ञान हुआ लौट कर उसने भगवान बुद्ध से कहा, भन्ते, अब सरसों पाने का प्रयोजन नहीं रहा। मुझे प्रव्रज्या दें। अपनी शरण में लें। कृशा गौतमी की गाथा का एक अंश इस प्रकार है-
“हतभाग्य नारी जन्म-जन्माँतर में तूने अपरिमित दुःख उठाया है, हजारों जन्मों में तूने आंसुओं की अजस्र धारा बहाई है।
न जाने कितनी बार तूने अपने पुत्रों के माँसों को श्मशान में बनैले पशुओं द्वारा खाये जाते देखा है।
तेरा सब कुछ लुट गया है, पति ने भी तुझे छोड़ दिया।
यह महान आश्चर्य है, इस अवस्था में इस समय मृत्यु से परे हूँ। मैंने अमृत पा लिया है, निर्वाण का मैंने साक्षात्कार किया है। मैंने धर्म के दर्पण में अपना मुँह देखा है।
अम्बपाली की कथा
अम्बपाली की कथा कम प्रसिद्ध नहीं। इसका जन्म वैशाली के राजोपवन में एक आम वृक्ष के नीचे हुआ था, इसी से यह अम्बपाली कहलाई। यह परम सुन्दरी थी और वैशाली के राजकुमारों में उससे विवाह करने की स्पर्द्धा थी। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में जब भगवान बुद्ध वैशाली गए, तो अम्बपाली के ही उपवन में ठहरे। अम्बपाली ने उन्हें भोजन के लिये निमंत्रित किया और तदन्तर उनसे उपदेश ग्रहण किया। अम्बपाली ने उपवन बुद्ध-संघ को दान कर दिया और कुछ समय बाद अपने प्रव्रजित पुत्र विमल कोंडन्य से उपदेश लेकर प्रव्रज्या ग्रहण की। जब उस ने अपने जर्जर होते शरीर को देखा तो उसे बुद्ध-वचन की सत्यता जंची। उसे शरीर की अनित्यता का ज्ञान हुआ। उसकी गाथा के कुछ अंश देखिए-
“किसी समय, मेरे केश काले भौंरे के रंग के थे और उसके अगले भाग घुँघराले थे।
वह जरावस्था में अब सन जैसे हो गए हैं। सत्यवादी के वचन व्यर्थ नहीं होते। कभी मेरा सिर सुवासित और सोने के आभूषणों से सुसज्जित रहता था, जरावस्था में आज झुर्रियों से भर गया है।
सत्यवादी के वचन व्यर्थ नहीं जाते। जीर्ण-शीर्ण घर की भाँति यह जराग्रस्त शरीर अपने आप नष्ट हो जायेगा।
सत्यवादी के वचन कभी व्यर्थ नहीं जाते।
सुमेधा का उद्गार
सुमेधा मंतावती की राजपुत्री थी। माता-पिता ने उपयुक्त वर चुना किन्तु उसने कहा, “मुझे घर बसाने से क्या तात्पर्य? मैं तो प्रव्रजित होऊँगी। अन्त में उसने अपना हठ रखा। उसकी गाथा के कुछ अंश ये हैं -
“सुमेधा के पिता ने कहा-
रानी बन कर तू प्रचुर धन और ऐश्वर्य का भोग कर। तू तरुणी है, जीवन के सुख का उपभोग कर। सब कुछ तेरे अधिकार में है। स्वामी का वरण कर।
सुमेधा ने उत्तर दिया- यह नहीं सम्भव है पिताजी। बार-बार जन्म लेने में क्या सार है?
मैं प्रव्रज्या ही लूँगी या प्राण त्याग करूंगी, यही एकमात्र मेरा वरण है। जब अमृत प्रत्यक्ष हो तब क्या कोई विषयों की ज्वाला में दहन होना पसन्द करेगा!
यह निर्वाण अजर है, अमर है। यहाँ शोक नहीं शत्रु नहीं, विघ्न नहीं। यह अचल है “भयहीन है, संतापहीन है।”
इस प्रकार बौद्ध भिक्खुनियों ने अपने उद्गारों द्वारा न केवल अपने समय के, वरन् सभी आने वाले काल के जन समाज का उद्बोधन किया है।

