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Magazine - Year 1957 - Version 2

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गायत्री उपासना के अनुभव

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सच्ची श्रद्धा से गायत्री उपासना करने वालों को समय-समय पर अनेक प्रकार के बड़े उत्साह वर्धक आध्यात्मिक एवं भौतिक अनुभव होते हैं। उपासक समय-समय पर उनकी सूचना तपोभूमि में भेजते हैं। इन अनुभवों का सार आगे से इन पृष्ठों में देते रहेंगे। गायत्री उपासना के मार्ग में हुए अपने अनुभवों का सार भेजते रहने की उपासकों से प्रार्थना है।

नास्तिक से आस्तिक बना

श्री सत्य प्रकाश जी कुल श्रेष्ठ, सिकन्दरपुर, भाण्डेर अपनी जीवन दिशा बदलने का वर्णन करते हैं-कालेज की शिक्षा ने मुझे पूरा नास्तिक बना लिया था। पूजा-उपासना तो दूर-ईश्वर के आस्तित्व तक में, मेरा विश्वास नहीं रह गया था।

एक स्वजन गायत्री उपासक का अनुभव सुनकर मैंने प्रयोग रूप में गायत्री जपना प्रारम्भ किया। एक लघु अनुष्ठान कर डाला। रात को स्वप्न में एक तेजोमयी कुमारिका ने मुझे आदेश दिया-तदुपरान्त मैंने विधिपूर्वक सवालक्ष का अनुष्ठान पूरा किया। इसके बाद तो अनेकों भविष्य में घटने वाली संभावनाओं को मैं स्वप्नादि द्वारा जान लेने लगा। एक बार घर में डकैती होने का स्वप्न देखा। दो चार दिन बाद पिताजी के पत्र में स्वप्न देखी घटना का वर्णन पढ़ने को मिला। ऐसी अनेकों घटनाएं मेरे जीवन में घटती ही जा रही हैं।

विद्या लाभ का अवसर मिला

श्री शिवनन्दन कश्यप, लश्कर से अपनी सफलता के विषय में लिखते हैं। 1952 में प्राइवेट रूप में बी.ए. की परीक्षा देनी चाही, ज्ञासन की ओर से ऐसी परीक्षा देने की आज्ञा नहीं दी जा रही थी, पर समय आने पर अनायास मुझे आज्ञा मिल गयी और परीक्षा भी दे दी। योग्यता या अध्ययन की कमी के कारण मुझे असफल होने का भय हो रहा था। जिस माता की (गायत्री माता) उपासना कर रहा था सदा उनसे प्रार्थना किया करता। एक दिन स्वप्न में आश्वासन मिला-तुम दूसरे दर्जे में पास हो और यही चरितार्थ हुआ।

निराशा में आशा

श्री ध्रुवराम शर्मा, अठगाँव जराखर (हमौरपुर) अपना गायत्री उपासना के प्रति खिंचने का कारण लिखते हैं- मेरा भाई विश्वनाथ दसवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। उसकी योग्यता से जरा भी उत्तीर्ण होने की आशा नहीं थी, इसलिए उसके पास होने के लिए मैंने गायत्री उपासना प्रारम्भ की और वह अच्छी तरह उत्तीर्ण हो गया। तभी से मेरी आँख खुली और नियमित रूप से मैं गायत्री उपासना करने लग गया हूँ।

पेशाब का खून बन्द हुआ

श्री नीलम भटनागर, भूसावल, माता की कृपा का वर्णन करती हुई लिखती हैं- मेरे पति का स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता ही जा रहा था। एक दिन मैंने उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने कहा- पेशाब से खून जाता है, इसी से दुर्बलता बढ़ती जा रही है। मुझे तो गायत्री माता का पूरा भरोसा था। तुरन्त ही मैंने गायत्री मंत्र से जल अभिमंत्रित कर उन्हें पिला दिया। उसी के बाद खून जाना बन्द ही हो गया। पीछे रही-सही जलन भी कुछ दिन तक अभिमंत्रित जल पीते रहने से छूट गया।

अनेक व्याधियों से छुटकारा

श्री सालिगराम पाण्डेय, मऊरानीपुर अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव लिखते हैं। मैं सत्रह वर्ष से लकवे एवं बारह वर्ष दमा रोग से कष्ट भोग रहा था।

सन्तान के भाग्य से भी वंचित था। एक उपासक बन्धु की राय से सवालक्ष का अनुष्ठान किया। आश्चर्य से सभी ने देखा जो दमा अनेक इलाजों में भी दूर नहीं हुआ था वह केवल माता की उपासना से ही नष्ट हो गया। इसके बाद मुझे एक पुत्री रत्न की भी प्राप्ति हुई, जिसका नाम श्रद्धा से गायत्री ही रखा। गायत्री तपोभूमि में होने वाले यज्ञ की भागीदारी के लिए मैं भी जप करता था। तीन महीने जप करने के बाद अनायास ही लकवे ने भी मेरे शरीर से विदाई ले ली। आज मैं युगों का पीड़ित-सुखी जीवन का आनन्द ले रहा हूँ। इससे अधिक और माता की क्या कृपा हो सकती है।

दस वर्ष बाद सन्तान

श्रीराम कृष्णा डोंगरे, कटनी (जबलपुर) माता के प्रति अपनी कृतज्ञता का प्रकाश करते हैं- वर्षों के दाम्पत्य जीवन के बाद भी जब संतान के दर्शन नहीं हुए तो मेरा पत्नी सहित सारा परिवार एवं कुटुम्बीजन निराश थे, पर मेरी आस्था अचल बनी रही। अन्त में माता की करुणा फूटी और घर में पुत्र रत्न को देख कर सभी प्रसन्नता से उत्फुल्ल हो उठे।

स्कालर शिप मिली

श्री द्विजेन्द्र प्रसाद शर्मा, पाली (पटना) अपनी गायत्री उपासना के लाभों का वर्णन करते हैं :- मैं नित्य टूटे-फूटे रूप से गायत्री जप लिया करता था। विद्यालय में स्कॉलर शिप की दरखास्तें पड़ रही थीं, मैं अयोग्य तो था ही, फिर भी दरखास्तें दे दिया करता था। जब वह रुपया आया तो स्वयं मुझे अपना नाम देख कर आर्श्चय हुआ और माता की कृपा की याद से परिप्लुत हो रहा था। अब पढ़ने और गायत्री उपासना में मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी। इस बार की परीक्षा देने के बाद मेरे सहपाठी मेरी खिल्ली उड़ाते-कहते तुम अपनी श्रेणी में सबसे ऊँचा नम्बर पाओगे। आज परीक्षा फल निकलने वाला था। स्कूल जाते ही मेरे सहपाठीगण हँसी उड़ाने के लिए मेरी ओर जुट गये-उसी समय नम्बर सुनाने का अवसर आया। मेरे सहित सभी को मेरा प्रथम नम्बर से पास होना विस्मित कर रहा था।

सन्तोषजनक स्थिति प्राप्त

श्री चन्द्रकान्त गुप्ता, बैकुण्ठपुर (सरगुजा) अपनी गायत्री उपासना के अनुभव का वर्णन करती हैं :-

मेरे अभिभावक मेरे लिए अच्छे वर की तलाश में परेशान थे, पर मैं माता के प्रति विश्वास कर निश्चिंत थी। उन लोगों की परेशानी मैं देख कर लज्जित और पीड़ित हो जाती। अन्त में मैंने एक लघु अनुष्ठान इसके लिए कर लिया। फिर अनायास जैसे, एक सुशिक्षित एवं सम्पन्न वर मिल गये।

मेरे गाँव में लड़कियों को मिड्ल से आगे पढ़ाने की कोई प्रवृत्ति नहीं दीखती। मैं मिड्ल पास कर माता से प्रार्थना करती रही-फलतः मेरी आगे की पढ़ाई के लिए परिवार वालों ने जबलपुर में व्यवस्था कर दी।

खोया लड़का मिला

श्री हरदयालू जी श्रीवास्तव, गोहाँड़ (हमीरपुर) माता की दयालुता का वर्णन करते कहते हैं- मेरा ज्येष्ठ पुत्र घर से बैरागी बनकर चुपचाप निकल गया। 15 महीने उसकी खोज करते बीत गये-कहीं पता न चला। सब तरफ से निराश हो कर मैंने एक मात्र गायत्री माता का श्लोक पकड़ लिया। सोलहवें मास में अचानक ही उसका पूरा पता हमें मिला, पता मिलते ही हम कुछ सज्जनों के साथ वहाँ गये। उसने लौटना स्वीकार कर लिया। गेरुआ वस्त्र छोड़ कर गृहस्थ के रूप में हमारे साथ आकर रहने लगा। हमारे प्रयत्न और आशा से अधिक सफलता मिलने का कारण एकमात्र माता की ही कृपा है।

वात व्याधि से छुटकारा

श्री जगन्नाथ मिश्र बीहट (मुँगेर) सूचित करते हैं- 1953 में मुझे बात व्याधि की (पीड़ा ) का अनुभव हुआ। पहले तो परवाह नहीं की। रोग बढ़ने पर लाचार होकर दवा खाना शुरू किया। फायदा नहीं होते देख एक सिविल सर्जन के विचारानुसार एक माह तक सुई और दवा के फेर में रहा, पर विशेष फायदा नहीं रहा। अन्ततः मेरी हालत इतनी दयनीय हो गयी कि उठना-बैठना तक बन्द सा हो गया। फिर पटना जाकर बिजली द्वारा चिकित्सा करायी, कुछ लाभ हुआ पर फिर ज्यों की त्यों हालत हो गयी। इस बार सब ओर से निराश होकर नौ दिनों में विधिपूर्वक छत्तीस हजार जप पूरा किया। चौथे दिन लाभ होना शुरू हुआ। अनुष्ठान समाप्त होते-होते रोग भी ऐसे समाप्त हो गया मानों कभी हुआ ही न था।

दुर्घटना से प्राण रक्षा

श्री राजवंशजी, मसौढ़ी-पटना, माता के वात्सल्य का वर्णन करते हैं-

हमारे अनेकों सन्तान मरे हुए पैदा हुए और कुछ ने दुनिया को एक बार देख कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं। व्यथा से सन्तप्त हम सभी माता की प्रार्थना करते रहते थे। इस बार 17 फरवरी 56 के मध्याह्न में अस्पताल में मेरी धर्मपत्नी ने माता की कृपा से संरक्षित पुत्र रत्न प्रसव किया। हम लोग उल्लसित हो उठे। अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर चाची जी के साथ बच्चे सहित उसकी माँ गाड़ी पर घर जा रही थी कि एक दूसरी गाड़ी जोरों से टकरा गयी। वह गाड़ी उलटकर टूट-फूट गयी। मैंने समझ लिया यह बच्चा भी गया- पर माता ने गाड़ी उलटने के समय ही जच्चा-बच्चा सहित हमारी चाची को करीब 6 फीट दूर फेंक दिया। हल्की सी चोट लगी और सभी तरह से सुरक्षा में हम साक्षात माता की कृपा का दर्शन कर गदगद हो रहे थे।

सूनी गोद भर गई

श्री इंदिरा देवी शुक्ला, भरारी (बिलासपुर) लिखती हैं- सुसम्पन्न परिवार में मेरा विवाह हुआ था संतान बिना घर सूना-सूना लगता था। दो बार संतान हो-हो कर मर गयी। तीसरी बार जब मैं गर्भवती थी, मेरे पतिदेव की एक गायत्री उपासक से भेंट हो गयी। वे हमारे लिए देवदूत ही थे। उनके कहे अनुसार हम दोनों ने गायत्री जप करना प्रारम्भ किया। माता का कृपा-रस पीकर पुष्ट चिरंजीव पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आज उस निश्चिंत संरक्षण में विकास पा रहा है। माता धन्य हैं!

टाइफ़ाइड दूर हुआ

लेडी डॉ. श्री दमयन्ती, गोरे गाँव अपना अनुभव वर्णन करती हैं- एक बार डिस्पेंसरी का काम करते हुए सिर दर्द से फटने लगा। कर्त्तव्य पूरा कर घर आयी। दर्द के साथ जाड़ा भी बढ़ता जा रहा था, पर मैंने अपनी साँध्य उपासना पूरी कर ही ली। तपोभूमि के यज्ञ भस्म से थोड़ी सी शान्ति हुई पर पीड़ा बनी रही। अन्दर से ध्वनी हुई। टाइफ़ाइड! चौबीस घण्टे में टाइफ़ाइड का निर्णय कोई डॉक्टर स्वीकार नहीं कर सकता, पर मैंने अपनी बुद्धि से अन्तर के आदेश को अधिक महत्व दिया और टाइफ़ाइड की प्रसिद्ध ऐडियोपेथी गोली खाना आरम्भ किया। दूसरे दिन शाम को तीन दस्त आए-जो संपूर्णतः टाइफ़ाइड के लक्षणों को प्रमाणित करते थे। उसके बाद भयंकर बुखार का आक्रमण हुआ। मुझे सारे वस्त्र फेंक कर भाग जाने का वेग उठता। श्री अवधूत ने ज्वर शाँति के लिए सफलता पूर्वक जप प्रारम्भ किया। 20 माला जपते-जपते ज्वर घट कर 101 हो गया। मेरे ध्यान में सरसों देखने में आया फिर गुरगुल एवं सरसों से हवन करने पर बुखार ठीक हो गया। इस प्रकार औषध के पराजय के बाद भी माता की कृपा की विजय हुई।

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