कर्त्तव्य और अधिकार का तत्वज्ञान
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(श्री स्वामी शरणानंद जी)
यद्यपि किसी का कर्त्तव्य ही किसी का अधिकार और किसी का अधिकार ही किसी का कर्त्तव्य होता है पर दूसरे के कर्त्तव्य को अपना अधिकार मान जाने पर अधिकार लालसा की वृद्धि हो जाती है। यदि किसी कारण उसकी पूर्ति न हुई हो तो क्षोभ तथा क्रोध आदि विकार उत्पन्न होने लगते हैं, जिससे धन द्वारा निर्मित सौंदर्य नष्ट हो जाता है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि दूसरे के कर्त्तव्य को अपना अधिकार मानना उचित नहीं है, पर दूसरे के अधिकार को अपना कर्त्तव्य मानना तो सर्वथा अनिवार्य है, क्योंकि कर्त्तव्य परायणता से उत्तरोत्तर विकास ही होता है।
क्रोध तथा क्षोभ आदि विकारों से मन में मलिनता, हृदय में अशुद्धि, बुद्धि में अविवेक आ जाता है, जो पतन का मूल है। अतएव प्राप्त सौंदर्य को सुरक्षित रखने के लिए क्षोभ रहित होना अत्यन्त आवश्यक है। क्षोभ का उदय होते ही धीरता, वीरता और गंभीरता क्षीण हो जाती है, जिससे अनेक निर्बलताएँ अपने आप आ जाती हैं।
गुणों का अभिमान दोषों का मूल है, कारण कि वास्तविक निर्दोषिता भी गुणों से अतीत है। यदि वाणी अपने प्रति होने वाले सद्व्यवहार को करने वाले की उदारता न मान कर अपना गुण मान लेगा तो गुण में आबद्ध हो जायगा और दूसरे की उदारता का आदर न कर पायेगा, जिससे उसकी हृदय शीलता विकसित न हो सकेगी।
हृदयशीलता के बिना सरसता नीरसता में और मधुरता कटुता में बदल जाती है, जिससे परस्पर स्नेह की वृद्धि नहीं हो पाती। इतना ही नहीं, कालान्तर में गुण दोषों में बदलने लगते हैं, क्योंकि गुणों का उपयोग करने से सीमित अहंभाव तथा परिच्छिन्नता दृढ़ होती है और परिच्छिन्नता दृढ़ होने से वासनाओं का उदय होने लगता है, जो ह्रास का मूल है।
प्रत्येक गुण के उपभोग में किसी न किसी अंश में दोष विद्यमान रहते हैं। इतना ही नहीं, उपभोग स्वयं एक बड़ा दोष है, क्योंकि उपभोग के रस में आबद्ध प्राणी एकता को सुरक्षित नहीं रख पाता। उसके जीवन में अनेक प्रकार के भेद उत्पन्न हो जाते हैं, जो भय के मूल हैं। यह नियम है कि भयभीत प्राणी ही दूसरों को भय देता है। भयरहित हुए बिना अभिन्नता आ नहीं सकती। अभिन्नता के बिना वासनाओं का अन्त संभव नहीं है और निर्वासन के बिना निर्वैरता, समता, मुदिता आदि दिव्य गुण उत्पन्न ही नहीं होते-जो मानव की माँग है। जो बल दूसरों की निर्बलता को दूर नहीं कर सकता वह वास्तव में बल ही नहीं है। बल के द्वारा निर्बलों पर विजयी होना अपने बल को दूषित करना है, क्योंकि पराजित होने पर एक गहरी वेदना उत्पन्न होती है और विजयी होने पर अभिमान आ जाता है। अभिमान प्रमाद को और वेदना जागृति को उत्पन्न करती है। प्रमाद से शक्तिहीनता का और जागृति से उत्तरोत्तर शक्ति का संचय होने लगता है और फिर पारस्परिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, जो पराजित को विजयी और विजयी को पराजित करता रहता है।
यदि किसी की निर्बलता को अपना बल न माना जाय तो निराभिमानता स्वतः आ जाती है। निराभिमानता आ जाने पर आपस में एकता का संचार होने लगता है और बल निर्बलों की सेवा में लग जाता है, जिससे निर्बलता तथा बल का अभिमान मिट कर वास्तविक सफलता आ जाती है, जो सभी को प्रिय है।

