बुद्धि की स्फुरणा का गीत
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(श्री रामनाथ वेदालंकार, एम.ए. गुरुकुल काँगड़ी)
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
अर्थ- (सवितुः) सविता देव का (तत्) वह प्रकाश (वरेण्यम्) वरणीय है, चाहने योग्य है। (देवस्य) सविता देव के (भर्गः) उस प्रकाश को (धीमहि) हम ध्यान करें धारण करें। (यः) जो वह प्रकाश (नः धियः) हमारी बुद्धियों को (प्रचोदयात्) प्रेरित कर देवे-स्फुरित कर देवे।
युगों से आर्य जाति मूल यन्त्र के रूप में जिसकी उपासना करती चली आई है, वह यह पवित्र गायत्री मन्त्र है। शास्त्रों ने इसके जप का बहुत माहात्म्य गाया है। इसे सब वेदों का सार माना गया है। किन्तु इसके अन्दर वह क्या उच्च भाव है, जिसके कारण इसे सर्वोपरि स्थान प्राप्त हुआ है?
मन्त्र का देवता सविता है। सविता शब्द ‘षूं प्राणिगर्भविमोचने’ या ‘षू प्रेरणे’ धातुओं से सिद्ध होता है ‘षूं’ धातु से बनाने पर- “यः सूते चराचर जगद् उत्पादयति से सविता”- जो चराचर जगत् को उत्पन्न करता है वह सविता है। ‘षू’ धातु से बनाने पर- यः सुवति प्रेरयति सर्वान् स सविता’ -जो सकल जनों को शुभ प्रेरणा करता है वह सविता है। इन योगार्थों के अनुसार चराचर को उत्पन्न करने वाले तथा सब के मनों में शुभ प्रेरणा करने वाले भगवान सविता हैं। प्रकृति में सूर्य को सविता कहते हैं। सूर्य स्वयं प्रकाशमान तथा दूसरों के लिए प्रकाश को प्रेरित करने वाला है। उसी प्रकार सविता प्रभु भी स्वयं प्रकाश के पुँज हैं तथा सब मनुष्यों के प्रति अपने उस प्रकाश को प्रेरित करने वाले हैं।
सविता का यह स्वरूप देखने के पश्चात् अब मन्त्र के भाव पर आते हैं। मन्त्र के तीन भाग किये जा सकते हैं। तीन ही इसके चरण हैं एक-एक चरण में एक-एक भाग आ जाता है। प्रथम चरण है- “तत् सवितुर्वरेण्यम्।” भक्त पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्युलोक में, अग्नि में, विद्युत में, सूर्य में, सर्वत्र अपने भगवान सविता के तेज और प्रकाश की झाँकी पाकर उस पर मुग्ध हो कर कह उठता है-अहा! देखो, सविता प्रभु की ज्योति कैसी वरणीय है। जो एक बार इसकी झाँकी पा ले, वह इस पर लट्टू होकर आनन्द से नाचने लगे। जो एक बार दर्शन इसके कर ले, फिर वह इसे पाने के लिए लालायित हो उठे। सचमुच सविता की ज्योति ऐसी ही उज्ज्वल है। उपनिषद्कार उसकी ज्योति की महिमा का गान करते हुए कहते हैं-
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारक
नेमा विद्युतो भाँति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनु भाति सर्व
तस्य भासा सर्वमिदं? विभाति॥
-कठ, मुण्डक, श्वेताश्वतर,
अर्थात् ‘ऐसी दिव्य उसकी ज्योति है कि उसके आगे-सूर्य, चाँद, तारे सब फीके पड़ जाते हैं। बिजली की चमक उसके आगे कुछ नहीं, अग्नि की तो बात ही क्या! उसी ज्योति के पुँज में से थोड़ी सी ज्योति लेकर ये सब चमक रहे हैं। उसी ज्योति के लिए इस गायत्री मन्त्र में भक्त कह रहा है कि उस सविता की ज्योति बड़ी स्पृहणीय है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि जब कोई व्यक्ति किसी अद्भुत वस्तु को देखता है या उसके विषय में सुनता है तब एक दम उसके मुख से उस वस्तु की स्तुति निकल पड़ती है। वैसे ही उपासक भगवान की दिव्य ज्योति को देख कर उसकी स्तुति कर रहा है कि उस सविता की ज्योति वरणीय है अर्थात् ऐसी है कि उसे देख कर सब कोई चाहेगा कि यह ज्योति मुझे भी मिल जाये।
स्तुति के अनन्तर प्रार्थना की बारी आती है। मनुष्य जिसकी स्तुति करता है उसे फिर अपने लिए माँगता है। इसलिए सविता के प्रकाश की स्तुति के उपरान्त भक्त कह पड़ता है- ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ अर्थात् सविता के जिस प्रकाश की ऐसी प्रशंसा है उसका हम ध्यान करते हैं, हम चाहते हैं कि वह प्रकाश हमारे अंदर भी स्थित हो जाय। उसके दिव्य आलोक से हमारा हृदय जगमगा उठे।
मंत्र का तीसरा भाग है- “धियो यो नः प्रचोदयात्।” सविता के प्रकाश को हम अपने अन्दर क्यों धारण करना चाहते हैं? इस कारण कि वह आकर हमारी बुद्धि को प्रेरित कर देवे। हमारी बुद्धि प्रसुप्त पड़ी है, सविता प्रभु का प्रकाश आकर उसे जगा देगा और क्रिया में प्रेरित कर देगा, जैसे कि सविता सूर्य का प्रकाश प्रातःकाल आकर सोये हुए प्राणियों को जगा देता और कर्मों में प्रवृत्ति कर देता है। हमारे हृदयों में प्रकाशक व प्रेरक सविता का उदय हो जाने पर हमारी बुद्धि के आगे एक उजाला खिल उठेगा, जिस उजाले में वह गहन से गहन विषयों का विवेचन कर सकेगा। हमारे आगे से अज्ञान का अन्धेरा मिट जायेगा और ज्ञान-प्रकाश से हमारा अन्तःकरण आलोकित हो उठेगा। जैसे निष्क्रिय पड़ी हुई किसी मशीन को कारीगर आकर प्रेरणा दे देता है, फिर वह चल पड़ती है और नयी-नयी वस्तुएँ उस मशीन से बन कर निकलती हैं वैसे ही निष्क्रिय सी हुई हमारी बुद्धि को सविता का प्रकाश आ कर एक प्रेरणा दे देगा, उस प्रेरणा को पाकर हमारी बुद्धि नवीन-नवीन कल्पनाओं और नवीन-नवीन विज्ञानों की सृष्टि करने में और हमें आध्यात्म-मार्ग पर चलाने में समर्थ हो सकेगी। सविता के प्रकाश की किरण को पाकर हमारी बुद्धि कुण्ठित व किंकर्त्तव्यविमूढ़ नहीं रहेगी किन्तु कुशाग्र तथा विवेक की ज्योति से आभासित व स्फुरित हो उठेगी।
यह इस गायत्री मन्त्र का भाव है। इसके तीन चरणों में क्रमशः प्रभु के तेज की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का वर्णन है। मन्त्र का जो संक्षिप्त सा आशय यहाँ वर्णित किया गया है उससे पाठक कल्पना कर सकते हैं कि इस मन्त्र को इतना अधिक गौरवास्पद स्थान क्यों प्राप्त हुआ है और क्यों यह समस्त आर्य जाति का मूलमन्त्र बना है। यह है- ‘बुद्धि की स्फुरणा’ का गीत। हमने अपने मूलमन्त्र में उत्तमोत्तम स्वादिष्ट भोजन नहीं माँगे, असीम धन-दौलत नहीं माँगी, स्त्री-पुत्र-परिजन नहीं माँगे। हमने माँगी है-‘दिव्य प्रकाश से जगमगाती हुई बुद्धि।’ यद्यपि अन्य अनेक वेदमन्त्रों में ऐसी प्रार्थनाएँ हैं कि हमें उत्तमोत्तम भोजन मिले, भरपूर ऐश्वर्य मिले, सौ वर्ष की आयु मिले, स्त्री-पुत्र-परिजन मिलें, पर अपने मूलमन्त्र में हमने इन वस्तुओं को नहीं माँगा है। हमारी मूल माँग है-‘बुद्धि की स्फुरणा।’ बुद्धि का झरना हमारे अन्दर झर पड़े तो बुद्धि के बल से अन्य सब ऐश्वर्यों को हम सहज में उपलब्ध कर सकते हैं। बुद्धि की स्फूर्ति हो गई, मानो सब कुछ मिल गया। किसी भी स्तर पर खड़े हुए मानव के लिए बुद्धि का आगे की दिशा में स्फूर्ति होना आवश्यक है। अन्यथा वह उन्नति नहीं कर सकता। संसार में अनेक मानवों की यह अवस्था होती है कि अपने जीवन के मध्य में वे जिस सीढ़ी पर खड़े होते हैं, जीवन के अन्त तक उसी सीढ़ी पर खड़े रहते हैं। बिल्कुल भी ऊपर नहीं चढ़ पाते। इसका कारण यही है कि ऊर्ध्वारोहण के लिए उनकी बुद्धि प्रेरणा और स्फुरणा नहीं पाती।
आओ, हम सब मिल कर सविता प्रभु से उसके दिव्य प्रकाश की याचना करें, प्रकाश आकर हमारी बुद्धियों को प्रकाशित, उद्भासित, तीक्ष्ण, सजग, सक्रिय तथा ऊर्ध्व दिशा में दौड़ने वाला कर देवे। ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ ‘धियो यो नः प्रचोदयात्॥’

