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Magazine - Year 1962 - Version 2

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बड़प्पन की बात सोचें, बड़े काम करें

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जीव— अणु से विभु, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा और नर से नारायण बनने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है। यह आकांक्षा अपूर्णता को हटाते हुए पूर्णता प्राप्त करने के उद्देश्य से है। उसे ही बड़प्पन प्राप्त करने की आकांक्षा कहते हैं। बड़ा बनने की, विकसित होने की, प्रगति करने की अभिलाषा से प्रेरित होकर जीव विविध-विधि प्रयत्न करता रहता है। शारीरिक क्षुधाओं की पूर्ति के अतिरिक्त मनुष्य की शेष सभी क्रियाएँ प्रायः महत्त्व को उपलब्ध करने के उद्देश्य से ही होती हैं।

उचित और उत्तम आकांक्षा

बड़प्पन की इच्छा सबको होती है, पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि उसे कैसे प्राप्त किया जाए। जो जानते हैं, वे उस ज्ञान को आचरण में लाने का साहस नहीं करते। आमतौर से यह सोचा जाता है कि जिसका ठाठ−बाट जितना बड़ा है, वह उसी अनुपात से बड़ा माना जाएगा। मोटर, बंगला, सोना, जायदाद, कारोबार, सत्ता, पद आदि के अनुसार किसी को बड़ा मानने का रिवाज चल पड़ा है। इससे प्रतीत होता है कि लोग मनुष्य के व्यक्तित्त्व को नहीं, उसकी दौलत को बड़ा मानते हैं। यदि ऐसा ही है तो पहाड़ों को बड़ा माना जाना चाहिए, जिनके पास किसी बड़े जमींदार से अधिक जमीन और किसी बड़े किले से अधिक पत्थर होता है। धातुओं की खानें भी बहुत मूल्यवान होती हैं, फिर उन्हें ही महान क्यों न मान लिया जाए?

यह दृष्टिदोष ही है कि बड़प्पन को लोग दौलत में खोजते हैं । पैसा तो कोई चोर-बेईमान भी इकट्ठा कर सकता है। उत्तराधिकार में बाप−दादों की बहुत बड़ी संपत्ति किसी मूर्ख व्यक्ति को भी मिल सकती है। गुणों के अभाव में भी किसी को धन-संपत्ति के आधार पर बड़प्पन की मान्यता का होना एक बड़ा गलत दृष्टिकोण है। इस मान्यता को जनमानस में स्थान मिल जाने से लोग किसी भी मूल्य पर धनी बनना चाहते हैं और जिनके पास धन नहीं है, वे भी बड़प्पन के प्रमाणस्वरूप ठाठ बनाने में इतना खरच करते हैं कि उनकी आर्थिक कमर ही टूट जाती है। कर्ज, तंगी और परेशानी से वे निरंतर घिरे रहते हैं।

अपव्यय और ठाठ−बाट की बालबुद्धि

विवाह-शादियों में, दावतों में, फैशन बनाने में, ठाठ−बाट जोड़ने में जो अंधाधुंध खरच किया जाता है, उसकी व्यर्थता को समझते हुए भी लोग करते इसलिए हैं कि दूसरों की आँखों में अपनी अमीरी सिद्ध हो जाए। जब अमीरी को ही बड़प्पन का चिह्न मान लिया गया तो स्वभावतः उसकी प्राप्ति के लिए हर किसी की लालसा लगी रहना स्वाभाविक है। इस लालसा के कारण खरच बढ़ता है, फिर उसकी पूर्ति की चिंता बढ़ती है। कमाई के जितने साधन बढ़ते जाते हैं, खरच का अनुपात उससे अधिक बढ़ता जाता है। सुरसा के मुँह की तरह इसकी पूर्ति होती ही नहीं। चिंतित और परेशान रहने वाला व्यक्ति बड़प्पन तो क्या प्राप्त करेगा, गाँठ की अपनी शाँति और हँसी−खुशी भी खो बैठता है।

कर्ज के बोझ से लदे हुए, व्यक्तियों में से अधिकांश ऐसे लोग होते हैं, जिसने अपना खरच अंधाधुंध बढ़ाया है। इस बड़े खरच से उनके शरीर, मन, आत्मा तथा परिजनों के विकास में बहुत थोड़ा लगा होता है, शेष तो शान−शौकत के कामों में ही बर्बाद हुआ होता है। कीमती पोशाक और सोने-चाँदी के जेवर इसलिए ही तो पहने जाते हैं कि उन्हें देखकर लोग अपने बड़प्पन का अनुमान लगा सकें। यह बचपन जैसी नासमझी की बातें हैं।

अमीरी और बड़प्पन का अंतर

धनी होना कोई बुरी बात नहीं है, उससे कई सुविधाएँ मिलती हैं और प्रसन्नता देने वाली परिस्थितियाँ भी प्राप्त होती हैं, उसका कोई विरोध नहीं किया जा रहा है और न उपार्जन करने से किसी को रोका जा रहा है। इन पंक्तियों में हमारा उद्देश्य यह कहने का है कि ठाठ−बाट से अमीरी सिद्ध हो सकती है, बड़प्पन प्रमाणित नहीं किया जा सकता। बड़प्पन व्यक्तित्व से संबंधित है : गरीब घरों में उत्पन्न हुए लोग भी बड़े होते हैं। धन का अभाव किसी की महत्ता को कुंठित नहीं कर सकता। संत-महात्मा तो स्वेच्छापूर्वक गरीबी का जीवन निर्वाह करते हैं, क्या उन्हें तुच्छ समझा जाएगा?

उदारता और दूरदर्शिता का ही दूसरा नाम बड़प्पन है। जो जितना उदार है, वह उतना ही बड़ा माना जाएगा। जिसकी भावना आकांक्षा और विचारधारा ऊँची होगी, जो आदर्शवाद के प्रति जितनी ही आस्था रखता होगा, उसकी कृतियाँ श्रेष्ठ पुरुषों जैसी होंगी। सज्जन व्यक्ति ऊँचे स्तर की बात सोचते और ऊँचे काम करते हैं। जिससे मानवता कलंकित होती हो, जिससे व्यक्तित्व का मूल्य घटता हो, ऐसे काम वे कितना ही कष्ट आने या दूसरों के द्वारा कितने ही परेशान किए जाने पर भी करने को तैयार नहीं होते। यों सुविधा के समय हर कोई बड़ी−बड़ी आदर्श की बातें कर सकता है, पर परीक्षा की घड़ी आने पर ही यह पता चलता है कि कौन उदार और कौन अनुदार है, कौन छोटा और कौन बड़ा है।

भय, रोष और प्रलोभन का अवसर आने पर जो श्रेष्ठता टिक न सके, उसे अवास्तविक और दिखावटी ही माना जाएगा। छोटे बच्चे छोटी चीजें चाहते हैं और उनके मिलने पर प्रसन्न हो जाते हैं। जिनका अंतःकरण छोटा है, वे भी एक प्रकार के बच्चे ही हैं, उनकी आकांक्षा तुच्छ और नश्वर वस्तुओं तक सीमित बनी रहती है। तृष्णा-वासना में ही उनकी इच्छा लिपटी रहती है और उन्हीं की प्राप्ति तथा अप्राप्ति में उन्हें सुख−दुःख अनुभव होता रहता है। यह मिट्टी के खिलौने खेलने वाले, बालू के महल बनाने वाले बच्चों जैसा क्रीड़ा−विनोद है। इनसे शरीर की कुछ क्षण के लिए तृप्ति हो सकती है, पर आत्मा का तो कुछ भी भला नहीं होता, अपना भावनास्तर तो जरा भी ऊँचा नहीं उठता।

ऊँचा सोचें, ऊँचा करें

बड़े आदमी ऊँची बात सोचते हैं, ऊँचे काम करते हैं और ऊँची सूझ−बूझ का परिचय देते हैं। दुनियाँ किसी को तब बड़ा मानती है, जब वह औसत दरजे के आदमी से अधिक ऊँचा सिद्ध होता है। जिसका सोचने का तरीका उच्च आदर्शों पर अवलंबित है, जो किसी कार्य में हाथ डालने से पहले, किसी मार्ग पर पैर बढ़ाने से पहले सौ बार यह सोचता है कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए यह उचित है या नहीं, वस्तुतः वही बड़प्पन का अधिकारी है। प्रलोभनों की ओर जो खिंचता रहता है, डर से जो काँपता रहता है, वह तो संसार की क्षुद्रता द्वारा नचाई जाने वाली कठपुतली के समान है। ऐसे लोग बड़प्पन का दावा नहीं कर सकते।

छोटे बच्चे उत्पात करते रहते हैं, कहनी-अनकहनी कहते रहते हैं, पर बड़े न तो उससे उत्तेजित होते हैं और न अपना मन क्षुब्ध करते हैं। लड़कपन में नासमझी ही तो भरी रहती है, ऐसा सोचकर वे मुस्करा भर देते हैं। बच्चे को कुछ कहना होता है तो मीठे-कडुवे शब्दों में कहते भी हैं, पर क्षोभ होने का अवसर नहीं आने देते। बड़े आदमी, जिनका दिल और दिमाग दोनों बड़े हैं, ओछे लोगों की छोटी हरकतों से उद्विग्न नहीं होते। गलती को सुधारने का प्रयत्न करते हुए भी वे अपना मानसिक संतुलन नहीं बिगाड़ते। बड़े आदमी का प्रमुख चिह्न यह है कि वह न घटनाओं से, न व्यक्तियों से, किसी से भी उद्विग्न नहीं होता। धीरज उसके हाथ से कभी छूटता नहीं, शोक-संताप की घड़ियों में भी वह चट्टान की तरह अडिग भाव से अपने स्थान पर अड़ा रहता है।

न द्वेष न दुर्भाव

'जैसे को तैसा' यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जबाब गाली से और घूँसे का जबाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंदयुद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है, उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे 'नेकी कर कुए में डाल' की नीति अपनाते हैं, किसी के साथ कुछ उपकार किया है तो उसकी चर्चा करना तो दूर, स्मरण भी नहीं करते; पर छोटे आदमी पग−पग पर अपने राई से अहसान को उस पर जताते हैं, जिसके साथ उसने कुछ उपकार किया है। वे इतना तक नहीं जानते कि जितनी बार अहसान जताया जाएगा, उतना ही उसका मूल्य घटता जाएगा और कई बार कह देने के पश्चात तो वह बिलकुल ही समाप्त हो जाएगा।

बड़े आदमी अपने आपको सज्जनता की कसौटी पर निरंतर कसते रहते हैं और जहाँ कहीं जरा−सा भी खोट दिखाई देता है, वहाँ तुरंत सँभलने और सुधरने को तत्पर हो जाते हैं। क्षुद्र व्यक्ति अपनी हर बात को सही सिद्ध करने की कोशिश करते हैं और जो भी खराबी दिखाई पड़ती है, उसका दोष दूसरों पर मढ़ देते हैं, बड़े आदमियों का तरीका इससे भिन्न होता है। वे प्रत्येक कार्य में यह देखते हैं कि मेरा जितना कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व था, वह पूरा किया या नहीं? अपनी गलतियाँ वे स्वयं सोचते और दूसरों से पूछते हैं; पर मूर्ख तो यही सोचता है कि उसमें कोई खोट नहीं, गलतियाँ तो दूसरे ही करते हैं।

विचारशैली और कार्यपद्धति

बड़े आदमी आज की ही नहीं कल की भी सोचते हैं। उन्हें दूरदर्शिता प्रिय होती है। अपना कल्याण किस बात में है? जीवन की सार्थकता किस नीति को अपनाने में है? जो अमूल्य अवसर आज उपलब्ध है, उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग क्या है? वे यही सोचते रहते हैं और इन्हीं प्रेरणाओं के प्रकाश में वे अपना कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। दूसरों का शोषण नहीं, उनकी सहायता ही करें, किसी से लेकर नहीं, किसी को देकर ही यहाँ से चलें, यही उनकी आकांक्षा रहती है। बड़े आदमी सादगी अपनाते हैं, नम्र रहते हैं, मधुर बोलते हैं और प्रत्येक कार्य में शिष्टाचार एवं सज्जनता का पुट बनाए रहते हैं । उनकी यह आंतरिक महानता ही दूसरों की आँखों में बड़ा आदमी प्रमाणित करती हैं और इस प्रमाणिकता के आधार पर उन परिस्थितियों को भी प्राप्त कर लेते हैं, जो बड़प्पन की प्रतीक मानी जाती हैं।

बड़प्पन बाहर नहीं, भीतर रहता है। बाहरी ठाठ−बाट से नहीं, दिल और दिमाग को चौड़ा, उदार और दूरदर्शी रखकर ही उसे प्राप्त किया जाता है। हम बड़े बनने का सच्चे अर्थों में प्रयत्न करें तो सचमुच ही वैसे बन सकते हैं।

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