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Magazine - Year 1962 - Version 2

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हम ईश्वर से विमुख न हों

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जिंदगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है, जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बताए, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही संपन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिंदगी की लंबी मंजिल बड़ी हँसी−खुशी और सुविधा के साथ पूरी जाती है। अकेले चलने में यह लम्बा रास्ता भारी हो जाता है और कठिन प्रतीत होता है।

जीवन का सच्चा सहचर

ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरंतर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे; केवल एक ईश्वर ही हो सकता है। ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि यह धरती ही ईश्वर के लोक— स्वर्ग जैसी आनंदयुक्त प्रतीत होने लगती है। यों ईश्वर सबके साथ है और वह सबकी सहायता भी करता है, पर जो उसे समझते और देखते हैं, वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है। किसी के घर में सोना गड़ा है और वह प्रतीत न हो तो गरीबी ही अनुभव होती रहेगी, किंतु यदि मालूम हो कि हमारे घर में इतना सोना है तो उसका भले ही उपयोग न किया जाए, मन में अमीरी का गर्व और विश्वास बना रहेगा। ईश्वर को भूले रहने पर हमें अकेलापन प्रतीत होता है, पर जब उसे अपने रोम−रोम में समाया हुआ, अजस्र प्रेम और सहयोग बरसाता हुआ अनुभव करते हैं तो साहस हजारों गुना अधिक हो जाता है। आशा और विश्वास से हृदय हर घड़ी भरा रहता है।

जिसने ईश्वर को भुला रखा है, अपने बलबूते पर ही सब कुछ करता है और सोचता है, उसे जिंदगी बहुत भारी प्रतीत होती है, इतना वजन उठाकर चलने में उसके पैर लड़खड़ाने लगते हैं। कठिनाइयाँ और आपत्तियाँ सामने आने पर भय और आशंका से कलेजा धक−धक करने लगता है। अपने साधनों में कमी दिखने पर भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगता है; पर जिसे ईश्वर पर विश्वास है, वह सदा यही अनुभव करेगा, कोई बड़ी शक्ति मेरे साथ है। जहाँ अपना बल थकेगा, वहाँ उसका बल मिलेगा। जहाँ अपने साधन कम पड़ रहे होंगे, वहाँ उसके साधन उपलब्ध होंगे। इस संसार में क्षण−क्षण पर प्राणघातक संकट और आपत्तियों के पर्वत मौजूद हैं, जो उनसे अब तक अपनी रक्षा करता रहा है, वह आगे क्यों न करेगा?

निरंतर की दैवी सहायताएँ

अब तक के जीवन पर यदि हम ध्यान दें तो ऐसे ढेरों प्रसंग याद आ जावेंगे जब चारों ओर अन्धेरा छाया हुआ था और यह प्रतीत होता था कि नाव अब डूबी; पर स्थिति बदलीं, विपत्ति की घटाएँ हटीं और सुरक्षा के साधन बन गए। लोग इसे आकस्मिक अवसर कहकर ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को भुलाते रहते हैं। वास्तविकता यह है कि समय-समय पर हमें दैवी सहायता मिलती है और अपने स्वल्प साधन रहते हुए भी कोई बड़ी शक्ति सहायता करने के लिए आ पहुँचती है। कृतघ्नता को हमने स्वभाव में यदि सम्मिलित नहीं किया है, तो अपने निज जीवन में ही अगणित अवसर दैवी सहायता के ढूँढ सकते हैं और वह विश्वास कर सकते हैं कि उसकी अहेतु की कृपा निरंतर हमारे ऊपर बरसती रहती है।

अब तक जिसने समय−समय पर इतनी सहायता की है। जन्म लेने से पहले ही हर घड़ी गरम, मीठे और ताजे दूध से निरंतर भरे रहने वाले दो−दो डिब्बे जिसने तैयार करके रख दिए थे, माता के रूप में धोबिन, भंगन, डाॅक्टर, नर्स, आया तथा मनमाना खरच और दुलार करने वाली एक चौबीस घंटे की बिना वेतन की सेविका जिसने नियुक्त कर रखी थी। प्रत्येक अवसर पर जिसकी सहायता मिलती रही है, वह आगे भी मिलेगी ही और अपना भविष्य उज्ज्वल बनेगा ही, यह विश्वास करने वाला व्यक्ति कभी निराश नहीं हो सकता, उसकी हिम्मत कभी टूट नहीं सकती। आस्तिकता के आधार पर ही हमारी हिम्मत बढ़ती है और साहसी शूरवीरों जैसा कलेजा बना रहता है।

निर्भयता का वरदान

डरता वह है, जिसे ईश्वर का डर नहीं होता। जो ईश्वर से डरता है उसके आदेशों का उल्लंघन नहीं करता, उसे इस संसार में किसी से भी डरना नहीं पड़ता। संसार की हर वस्तु से डरने और सशंकित रहने का एक ही कारण है। ईश्वर से न डरना, उसकी अवज्ञा करना, जो ऐसा नहीं करते, उसे अपना मित्र, सहायक और मार्गदर्शक मानते हैं, उन्हें सबसे पहला उपहार निर्भयता का प्राप्त होता है। उन्हें फिर किसी से भी डरना नहीं पड़ता, आपत्तियाँ उसे खिलवाड़ सरीखी दिखती हैं। वस्तुतः इस पुण्य उपवन संसार में डरने का कहीं कोई कारण नहीं है। कागज का डरावना चेहरा पहनकर छोटे बच्चों को डराने का विनोद किया जाता है, वैसा ही विनोद कठिनाइयाँ दिखाकर हमारे साथ किया जाता रहता है।

पिता अपने बच्चे को तलवार घुमाकर डराना चाहे तो क्या बच्चा कभी डरता है? ईश्वर के हाथ में इस संसार की सारी बागडोर है। दीखने वाली कठिनाइयाँ भले ही तलवार जैसी चमकें, उनके मूँठ तो अपने परम स्नेही के हाथ में हैं, फिर डरने की क्या बात रही। ईश्वरविश्वासी का सोचना इसी ढंग का होता है। हर डराने वाली घटना उसे खिलवाड़ जैसी लगती है और विषम घड़ियों में भी न तो उसे घबराहट होती है और न परेशानी।

सच्चा स्वजन और सहायक

अपना सहायक, पिता−माता सहायक, स्वामी, सखा, भ्राता, सखा-परिजन और धन, जिसने ईश्वर को मान रखा है, उसे किसी बड़े-से-बड़े अमीर से, राजाधिराज से अधिक आत्मविश्वास बना रहेगा। राजा-रईसों के लड़के अपने पिता की जरा-सी शक्ति और संपत्ति पर गर्व कर सकते हैं तो अनंत सामर्थ्यों और असीम विभूतियों के स्वामी ईश्वर को जो अपना पिता मानेगा, उसे इस संसार से फैला हुआ सब कुछ ही अनुभव होगा। इतना अतुल वैभव जब अपना— अपने पिता का ही है, तब दरिद्रता और गरीबी की बात सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता। गरीब वे हैं, जो केवल अपनी ही संपत्ति को अपना मानते हैं। ईश्वर को अपने से पृथक, दूर एवं असंबद्ध मानने वाले को ही गरीबी दुःख देती है और उसे ही तृष्णा सताती है। जब सब कुछ अपने ईश्वर का ही है तो फिर असंतोष किस चीज का? कमी किस बात की?

शिक्षक और मार्गदर्शक

रास्ता वह भूलता है, जिसे बताने वाला नहीं होता या बताने वाले की बात सुनने की जिसे फुरसत नहीं होती। अंतरात्मा में बैठा हुआ ईश्वर, उचित और अनुचित की, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की प्रेरणा निरंतर देता रहता है। जो उसे सुनेगा, उसका महत्त्व समझेगा और सम्मान करेगा, उसे सीधे रास्ते पर चलने में कोई कठिनाई न होगी और जो सीधे रास्ते चलता है, उसे लोक में सुख और परलोक में शांति की कमी नहीं रहती। यश, प्रतिष्ठा और सम्मान उसके पीछे फिरते हैं। भले ही धन की दृष्टि से वह अमीर न हो पावे, पर महत्ता उसके चरणों पर लोटती रहती है। महापुरुषों और नररत्नों में ही वह गिना जाता है। ईश्वर को जिसने पहचाना और अपनाया, वह नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बनकर रहता है। सदाचार और कर्त्तव्यपरायणता, आत्मविश्वास और निर्भयता, आशा और धैर्य, आनंद और संतोष यही सब तो आस्तिकता के चिह्न हैं। जैसे−जैसे ईश्वर विश्वास बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे यह महानताएँ अपने आप उत्पन्न होती जाती हैं। जीवन की सार्थकता और सफलता इन्हीं बातों पर तो निर्भर है।

न उपेक्षा करें, न विमुख हों

ईश्वर की उपेक्षा करने में परमात्मा की कोई हानि नहीं। हमारे भजन-ध्यान से उनका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, न उसकी कृपा में इससे कोई अंतर आता है। वे तो अपने पुत्रों का हित-चिंतन वैसे ही करते रहते हैं, जैसे माता−पिता छोटे शिशु का करते हैं। उपेक्षा से हानि अपनी ही है। अकेलापन सदा अखरता है। दूसरे स्वजन-संबंधी एक समय तक ही साथ रह सकते हैं, उनका प्रेम भी बदले की प्रक्रिया पर निर्भर रहता है, फिर उनकी क्षमता और उदारता भी उतनी बढ़ी-चढ़ी कहाँ होती है। सबसे श्रेष्ठ और सबसे सस्ता साथी ईश्वर ही हो सकता है। उसकी उपेक्षा करके अपना ही सबसे अधिक अहित होता है। हम उन सब लाभों से वंचित रह जाते हैं, जो भगवान के सान्निध्य में रहने से प्राप्त होते थे, हो सकते थे।

गाड़ी दो पहिये से चलती है। अपनी गाड़ी में एक पहिया अपना और एक ईश्वर का लगा लें तो जो गति आती है, वह एक पहिये से नहीं आ सकती। ईश्वरविहीन जीवन ऐसा ही है जैसा बिना शरीर के प्रेत-पिशाच की योनि में विचरण करने वाली आत्मा। उसे अशांति ही मिलती है, असंतोष, द्वेष, क्लेश से ही ऐसी मनोभूमि जलती और संत्रस्त रहती है। परमात्मा से विमुख होकर हम पाते कुछ नहीं, खोते बहुत हैं। समय रहते इस भूल को सुधार लिया जाए तो ही अच्छा है।

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