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Magazine - Year 1962 - Version 2

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जिंदगी जीने की विद्या भी सीखी जाए

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प्रत्येक उद्योग-धंधे को चलाने से पूर्व उसके संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता होती है कि उसे किस प्रकार ठीक तरह चलाया जाए, यह जानना भी जरूरी होता है। कल-कारखाने, खेती, व्यापार, मशीन, फैक्ट्री आदि कुछ भी काम करना हो, पहला प्रयत्न यही किया जाता है कि इसके संबंध में बारीकी से सब कुछ जान लें और इन उद्योगों को किस प्रकार चलाया जाता है, इसका ठीक−ठीक अनुभव प्राप्त कर लें। कुछ आलसी व्यक्ति अपने प्रमादवश जानकारी की तो उपेक्षा करते हैं और उस कार्य को आरंभ कर देते हैं, तो उन्हें घाटा उठाना पड़ता है और अंततः उनका कारोबार चौपट हो जाता है।

शिक्षणरहित व्यापार

मोटर चलाना आरंभ कर दिया जाए और न तो ड्राइवरी सीखी हो और न उसके कल-पुरजों की कोई जानकारी हो तो दुर्घटना की ही आशंका रहेगी। मोटर का टूटना और बैठने वालों का खतरे में पड़ जाना स्वाभाविक है। हिसाब−किताब, क्रय-विक्रय का अनुभव हुए बिना व्यापार क्या चलने वाला है? जिसे कृषि करना आता नहीं है, वह खेतों में बीज बखेरता फिरे तो इतने मात्र से अच्छी फसल की आशा कैसे की जाएगी? फौज, पुलिस, प्रशासन, रेलवे आदि के सरकारी महकमों में काम करने वाले व्यक्ति पहले ट्रेनिंग प्राप्त करते हैं पीछे उनकी नियुक्ति होती है। यदि ट्रेनिंग के बिना अनाड़ी रंगरूट इन विभागों में नियुक्त कर दिया जाए तो किसी अच्छे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती, वे अनाड़ी व्यक्ति जहाँ जावेंगे, वहाँ संकट ही उत्पन्न करेंगे।

जिंदगी जीना एक भारी उद्योग है। किसी बड़े मिल-मालिक को जिस प्रकार छोटी से लेकर बड़ी तक अगणित समस्याओं को प्रतिक्षण सुलझाते रहना पड़ता है, उसी प्रकार मानव जीवन में अगणित समस्याएँ हर घड़ी प्रस्तुत रहती हैं और उन्हें समय−समय पर सुलझाना आवश्यक होता है। यदि यह सुलझाव ठीक न हुआ तो गुत्थियाँ और अधिक उलझ जाती हैं। गलत दृष्टि वाले व्यक्ति अपनी मामूली समस्याओं को गलत मार्ग अपनाकर इतनी उलझा लेते हैं कि मूल समस्या की अपेक्षा वह उलझन अधिक परेशानी उत्पन्न करती है।

जीवन भी एक शासन

किसी देश के राजा को अपनी प्रजा के सुख−दुःख की, राज्यकोष की, कर्मचारियों की कुशलता की, शत्रुओं से सुरक्षा की, उद्दंड अपराधियों के नियंत्रण की, मंत्रिमंडल के संगठन आदि की अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है और प्रत्येक गुत्थी को सही तरीके से सुलझाना पड़ता है। कोई मूर्ख राजा उचित हल न ढूँढ सके और उलटी-सीधी गतिविधियाँ अपनाए तो प्रजा में अशांति, शासन में असंतोष तथा व्यवस्था में गतिरोध उत्पन्न हो जाएगा। ऐसा राजा स्वयं भी नष्ट होता है और अपने राज्य भर में विपत्ति की विभीषिकाएँ खड़ी कर देता है। जीवन को किसी बड़े राज-काज का संचालन करने में ही उपमा दी जा सकती है। राज्य बड़ा होता है, जीवन छोटा, पर गुत्थियाँ दोनों की एक-सी रहती हैं। हाथी बड़ा है, मच्छर छोटा, पर दोनों को ही अपने−अपने निर्वाह की बात समान रूप से सोचनी पड़ती है और उनका हल ढूँढने के लिए समान रूप से दौड़−धूप करनी होती है। जीवन के बाह्य उत्तरदायित्व छोटे हों या बड़े, हर मनुष्य को एक नियत परिधि में अपनी कठिनाइयों का हल आप खोजना पड़ता है और अपना रास्ता स्वयं साफ करना होता है।

पूर्ण निश्चिंतता संभव नहीं

इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसे पूर्ण निश्चिंतता के साथ सरल और शांतिपूर्ण जीवनयापन करने की सुविधा मिली हो। यदि ऐसा होता तो मानवीय बुद्धि का विकास ही संभव न होता। चाकू की धार तभी तेज होती है, जब पत्थर पर उसे घिसा जाता है, निष्क्रिय पड़े रहने पर तो उस पर जंग ही चढ़ती है। कठिनाइयों और समस्याओं से रहित जीवन निर्जीव और आनंदरहित ही बनेगा, उसमें जड़ता, अनुत्साह और अवसाद ही घिरा रहेगा। घिसने और टकराने से शक्ति उत्पन्न होती है, यह वैज्ञानिक नियम है। ईश्वर अपने प्रिय पुत्र जीव को शक्तिमान, प्रगतिशील, विकासोन्मुख, चतुर, साहसी और पराक्रमी बनाना चाहता है, इसीलिए उसने समस्याओं और कठिनाइयों का एक बड़ा अंबार प्रत्येक मनुष्य के सामने खड़ा किया होता है।

बिल्ली अपने छोटे बच्चों को चूहे का शिकार करना स्वयं सिखाती है। पकड़े हुए घायल चूहे को वह बच्चों के सामने छोड़ती है, बच्चे उस पर आक्रमण करते हैं, मारते और खाते हैं। इस प्रकार उन्हें शिकार करने का अनुभव हो जाता है। परमात्मा बिल्ली की तरह मनुष्यरूपी बच्चों को उलझी समस्याओं से घायल चूहे सामने छोड़ता और पराक्रम-पुरुषार्थ की, विचार और विवेक की शिक्षा का साधन प्रस्तुत करता है। यह घायल चूहे तो अधमरे पहले से ही थे। चूहे मारने में कोई कठिनाई नहीं है। उन्हें तो बिल्ली स्वयं ही मारकर दे सकती थी, पर बच्चों को शिकार खेलना सिखाना तो बड़ा प्रश्न था, इसके बिना बच्चे अपने पैरों पर खड़े ही न हो पाते। ईश्वर आसानी से हमारी समस्याएँ हल कर सकता है, वह करता भी है, पर हमें भी तो अपनी चेतना का विकास करना सीखना है; इसलिए अधमरे चूहे की तरह गुत्थियाँ भी सामने आती ही रहती हैं। एक के बाद दूसरी का ताँता लगा ही रहता है।

हलचल और हेर−फेर आवश्यक

फिल्म की तस्वीरें एक के बाद दूसरी न आवें तो सिनेमा देखने का मजा ही मिट्टी हो जाए। पूरे खेल में एक ही तस्वीर सामने खड़ी रहे तो उसे देखना कौन पसंद करेगा? अनेकों हलचल भरे दृश्य होने से ही तो मनोरंजन का आनंद मिलता है, जिसने जितनी अधिक गुत्थियाँ सुलझाई होंगी, उसका साहस उतना ही बढ़ेगा, उसका अंतःकरण उतना ही खिलेगा, उसका चेतन उतना ही विकसित होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही परमात्मा ने अपनी समस्त सृष्टि में ऐसी व्यवस्था की है कि समस्याओं से रहित कोई भी प्राणी रह न पावे। ऐसा एक भी जीव न बचे, जिसे अपने दैनिक जीवन में अगणित प्रकार की गुत्थियाँ न सुलझानी पड़े, यदि ऐसा न होता तो वहाँ जो गतिशीलता दिखाई पड़ रही है, वह कब की समाप्त हो गई होती, सब कुछ निर्जीव हो गया होगा। संघर्ष ही तो जीवन है। जीव संघर्ष में ही उत्पन्न होता है और संघर्ष करते रहते उसके श्वाँस पूरे होते हैं। संघर्ष समाप्त होने का नाम निद्रा, मूर्छा, जड़ता और मृत्यु ही होता है।

संघर्ष ही जीवन है

संघर्ष से बचे रह सकना किसी के लिए भी संभव नहीं। शांति की खोज में वन, पर्वतों में गुफा बनाकर रहने वाले योगी-यतियों को भी अपने आहार के लिए, लकड़ियों के लिए, निवास के लिए, जल के लिए, छाया के लिए और शरीर ढकने के लिए कुछ-न-कुछ साधन जुटाने पड़ते हैं और इस कार्य में उन्हें बहुत समय, श्रम, खोज तथा दौड़−धूप करनी होती है। फिर और कौन होगा, जिसे सदा शांति रहे। राजा-रईस, अमीर-उमराव, सेठ-साहूकारों के बारे में यह सोचा जाता है कि वे मौज में पड़े−पड़े जिंदगी काटते होंगे, पर सही बात यह है कि उनका ठाट−बाट तभी तक कायम है जब तक कि वे संघर्षसंलग्न है। जिस दिन चैन से रोटी खाने और मौज के दिन गुजारने की बात उनके मस्तिष्क में घुस जाएगी, उसी दिन से उनका वैभव समाप्त होने लगेगा। लक्ष्मी तो उद्योगी सिंहों को वरण करती है। निष्क्रिय लोगों के लिए तो दारिद्र्य और कुंठा का ही तिरस्कार निश्चित रहता है।

यह सोचना उचित नहीं कि किसी प्रकार हमें समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। उलझनों से रहित जीवन की व्यवस्था इस सृष्टि में नहीं हुई है। इसलिए उससे बचे रहने की कल्पना किसी को भी नहीं करनी चाहिए, वरन यह सोचना चाहिए कि आए दिन उपस्थित होने वाली समस्याओं के सुलझने का सही तरीका क्या है, उसे जानें। पैरों में जूते पहन लेने पर रास्ते में बिखरे हुए काँटों से सहज ही बचाव हो जाता है। अपने पास उलझनों को सुलझाने का यदि सही दृष्टिकोण मौजूद हो तो कठिन और भयंकर दिखने वाली समस्याएँ भी बात-की-बात में सुलझती चली जाती हैं।

प्रतिकूलता को अनुकूल बनाना

आमतौर से यह सोचा जाता है कि जैसा हम सोचते हैं, जैसा हम चाहते हैं, इसी के अनुरूप परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँ, इसी के अनुरूप दूसरे व्यक्ति आचरण करने लगें। अपनी हर सही-गलत और आकांक्षाओं को हम पूर्ण हुआ देखना चाहते हैं। मानो सामने जो कुछ है, वह सब गीली मिट्टीमात्र है, उसका जो कुछ बनाना चाहते हैं, वही तुरंत बनकर तैयार हो जाएगा, और जैसे उसे चलाना चाहते हैं, वैसे ही चलने लगेगा। यह आकांक्षा भी इसी प्रकार असफल रहने वाली है, जैसी कठिनाइयों से पूर्ण सुरक्षित रहने की कामना। जिस प्रकार कठिनाइयों से निपटने के लिए कटिबद्ध रहना आवश्यक है, वैसे ही संघर्ष को एक अनिवार्य तत्त्व मान लेना आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि यह भली प्रकार जान लिया जाए कि परिस्थितियाँ अपने अनुकूल बनें, यही सोचते रहने की अपेक्षा यह सोचना भी उचित है कि हम परिस्थितियों के अनुकूल झुकने और ढलने का प्रयत्न करें। दूसरे व्यक्ति हमारे अनुकूल ही अपना स्वभाव बदल लें और जैसा हम चाहते हैं, वैसे ही चलें, यह सोचने की अपेक्षा यह सोचना अधिक युक्तिसंगत है कि इस बहुरंगी दुनियाँ से मिल−जुलकर चलने और जैसा कुछ यहाँ है, उसी से काम चलाने के लायक लचक अपने अंदर उत्पन्न करें। समझौते की नीति पर यहाँ सारा काम चल रहा है। रात और दिन परस्पर विरोधी होते हुए भी जब संध्या-समय एक जगह एकत्रित हो सकते हैं तो क्या यह उचित नहीं कि विरोधी तत्वों का भी समन्वय खोजें और मिल-जुलकर चलने का सह-अस्तित्त्व भी अपनाया जाए?

जीवन का एक ज्वलंत प्रश्न

अपने को अप्रिय लगने वाली, दुःख देने वाली और कठिनाइयों को बढ़ाने वाली समस्याएँ किस प्रकार अपने अनुकूल बनाई जाएँ, यह जीवन विज्ञान का यह एक ज्वलंत प्रश्न है? दूसरे व्यक्ति या पदार्थ अपने ढंग के बने होते हैं, वे इच्छामात्र से अपने अनुकूल कहाँ बन पाते हैं? प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए अपने भीतर कुछ विशेषताएँ होनी चाहिए। जिनने अपने में वे विशेषताऐं पैदा कर ली हैं, उनके लिए उनकी प्रतिपक्षी परिस्थितियाँ बहुत हद तक अनुकूल बन जाती हैं। लुहार अपनी भट्टी में लोहे के टूटे−फूटे टुकड़ों को डालकर नरम करता है और उसकी इच्छित वस्तु बनाता है। अपने भीतर भी ऐसी विशेषताएँ होनी चाहिए, जिससे विपन्नता संपन्नता में बदल सके।

जिंदगी जीने की कला में प्रधानतया दो ही शिक्षण होते हैं। एकदूसरों की प्रतिकूलता को अनुकूलता से परिवर्तित करने की सामर्थ्य, दूसरे आगत प्रतिकूलता को हँसते−खेलते सहन कर लेने की क्षमता, यह सामर्थ्य और क्षमता जिसमें जितनी होगी, वह जीवन-संग्राम में उतना ही सफल रहेगा। इस बेढंगे और चित्र−विचित्र संसार में भी उसकी गाड़ी उसी तरह चलती रहेगी, जैसे फौजी टैंक ऊबड़−खाबड़ जमीन को पार करते हुए भी अपने लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

जीने की कला भी सीखें

जीवन हम जीते हैं, उसे जीना ही पड़ता है, पर यह खेद की बात है कि हम उसे विधिवत् जीने की विद्या नहीं सीखते। कृषि, व्यापार, मशीन, शिल्प, चिकित्सा आदि की अपेक्षा भी जिंदगी जीने की विद्या महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि उसकी आवश्यकता हमें प्रतिक्षण, हर समस्या के सुलझाने और हर कठिनाई के हल करने में पड़ती है। प्रगति और समृद्धि भी, सुरक्षा और व्यवस्था भी उसी पर निर्भर रहती है। जब कठिनाइयों का आते रहना अनिवार्य है, जब परिस्थितियों का प्रतिकूल रहना स्वाभाविक है, तो यह भी आवश्यक है कि हम प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए सामर्थ्य और क्षमता उत्पन्न करें। इन्हीं दोनों गुणों का समन्वयात्मक शिक्षण जीवन-विद्या कहलाता है। इसे प्राचीनकाल में भारत का प्रत्येक नागरिक सीखता था। अध्यात्म के नाम से इसी की ख्याती सारे विश्व में थी। भारत इसी का धनी समझा जाता था। अब इस ओर से उपेक्षा होने लगी तो अनाड़ी ड्राइवर की तरह हमारी जीवनरूपी मोटरें दलदलों में फँसी हुई दुर्घटनाग्रस्त हो रही हैं।

अखण्ड ज्योति इसी संजीवनी विद्या का व्यवस्थित शिक्षण अब आरंभ करने जा रही है। पत्रिका के पृष्ठों पर लेखरूप में और व्यावहारिक शिक्षण शिविर और सत्रों के रूप में जनसाधारण को प्राप्त होगा। विश्वास है कि उससे मानवता की सच्ची सेवा संभव हो सकेगी।

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