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Magazine - Year 1962 - Version 2

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सन्मार्ग का राजपथ कभी भी न छोड़ें

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घने जंगलों में पशुओं और वनवासियों के इधर−उधर चलने से छोटी−छोटी पगडंडियाँ बन जाती हैं। जहाँ से वे शुरू होती है, वहाँ अक्सर ऐसी लगती हैं मानों ये कोई सुव्यवस्थित रास्ते हैं; पर आगे कुछ दूर चलकर वे समाप्त हो जाती हैं और सघन वन रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है। कई बार इन प्रदेशों को पार करने वाले यात्री गलती से सही रास्ता छोड़कर इन ओछी पगडंडियों पर चल पड़ते हैं तो आरंभ में उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती है, वे सोचते हैं बड़ा रास्ता चक्करदार था, उस पर चलते हुए देर में मंजिल पार होती; पर यह सीधी पगडंडी जल्दी पहुँचा देगी और जहाँ हम पहुँचना चाहते हैं, वहाँ जल्दी पहुँच जाएँगे। वह प्रसन्नता देर तक नहीं रह पाती। कुछ आगे निकल जाने के बाद जब रास्ता बंद हो जाता है और घनी-कँटीली झाड़ियों में रहने वाले सिंह, व्याघ्र, रीछ, अजगर जब इधर−उधर फिरते दीखते हैं, तो प्राण सूखने लगते हैं। लंबी मंजिल चलने पर लौटना भी तो काफी दुःखदायक होता है। पगडंडी के लोभ में कितनी ही बार चतुर शिकारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।

जीवन का सघन वन

जीवन एक वन है, साधारण नहीं। सघन−सुरम्य ही नहीं, कँटीली झाड़ियों से भरा हुआ भी। इसे ठीक तरह पार करना काफी दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता द्वारा ही संभव है। सदाचार और धर्म की सीधी सड़क इसे पार करने के लिए बनी हुई है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समयसाध्य तो है, पर जोखिम उसमें नहीं है। इतनी बात न समझकर जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ढूँढते हैं, जहाँ−तहाँ उन्हें वे दिखती भी हैं। बेचारों को यह पता नहीं होता कि यह अंत तक नहीं पहुँचतीं, बीच में ही विश्वासघाती मित्र की तरह रास्ता छोड़ देती हैं और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर ऐसे दलदल में फँसा देती हैं, जहाँ से वापिस लौटना भी आसान नहीं रहता।

अनीति पर चलकर जल्दी काम बना लेने और अधिक कमा लेने का लालच एक छोटी सीमा तक ही ठीक सिद्ध होता है। आगे चलकर तो उसमें भारी विपत्तियाँ-ही-विपत्तियाँ आती हैं। आरंभ में कई बात लाभदायक दिखती हैं, पर अंत इसका कैसा होगा, यह सोचकर ही बुद्धिमान लोग उस आरंभिक लालच को स्वीकार करते हैं। जहाँ अंततः जोखिम दिखती है, समझदार लोग उससे दूर ही रहते हैं। वे जानते हैं कि विनाश आरंभ में आकर्षक ही लगता है। पाप के साथ आरंभिक प्रलोभनों की एक लालच भरी गुदगुदी जुड़ी रहती है, उसी से तो मूर्खों को जाल में फँसाया जाता है। शैतान का नुकीला पंजा रेशम की टोपी से ढँका रहता है। मछली को पकड़ने वाली डोरी के सिरे पर जरा-सा आटा लगा रहता है। चिड़ियों को पकड़ने वाले जाल के आस−पास अनाज के दाने फैले होते हैं। इस आरंभिक लालच की व्यर्थता न समझ पाने के कारण ही तो मछली और चिड़िया अपना जीवन संकट में डालती हैं।

पगडंडियों का प्रलोभन

पाप और अनीति का मार्ग ऐसा ही है, जैसा सघन वन की पगडंडियों पर चलना। ऐसा ही है जैसा मछली का काँटे समेत आटा निगलना और जाल में पड़े हुए दानों के लिए चिड़ियों की तरह आगा−पीछा न सोचना। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी-से-जल्दी, अधिक-से-अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाए, इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं, जो तुरंत सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही बातें अच्छी हैं, पर यदि उनके लिए यात्रा का उद्देश्य ही नष्ट होता हो, तब उन्हें बुद्धिमत्ता नहीं माना जाएगा।

चोरी, बेईमानी, झूठ, छल, विश्वासघात, अनीति, अपहरण, पाप, व्यभिचार आदि को आरंभ करते समय यही सोचा जाता है कि एक बढ़िया लाभ तुरंत प्राप्त होगा। ईमानदारी के राजमार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती थी, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी सीमा-बंधन है। पर पापमार्ग में चलते हुए ऐसा लगता है कि मनमाना लोगों को ठगने से, कमजोरों को डराने से सहज ही बड़ा लाभ कमाया जा सकता है। अशक्त से उनकी वस्तुएँ छीन लेना थोड़ी-सी चालाकी से ही सुगम हो जाता है। लोगों की असावधानी या भलमनसाहत का चतुरतापूर्वक आसानी से भरपूर अनुचित लाभ उठाया जा सकता है। ऐसा सोचने से यह प्रतीत होता है कि अनीति का मार्ग अपना लेने में कोई हर्ज नहीं। कितने ही ऐसे उदाहरण भी सामने आते हैं कि अमुक व्यक्तियों ने अनीति का मार्ग अपनाया और जल्दी बहुत लाभ कमा लिया; फिर हम भी ऐसा ही क्यों न करें?

आरंभ ही नहीं अंत भी देखें

आरंभिक लाभ को ही सब कुछ समझने वाले लोग मछली, चिड़ियों और पगडंडी पर दौड़ पड़ने वाले लोगों की तरह दूसरों की अपेक्षा अपने को अधिक बुद्धिमान मानते हैं और अपनी चतुरता पर गर्व भी करते हैं, पर जल्दी ही यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसा सोचा गया था; वस्तुतः वैसी बात नहीं है। पाप का दुष्परिणाम आज नहीं तो कल सामने आने ही वाला है। पारा खाकर उसे कोई हजम नहीं कर सकता, वह देर−सवेर में शरीर को फोड़कर बाहर ही निकलता है। इसी प्रकार पाप भी कभी पचता नही, हो सकता है कि आज का फल आज न मिले, पर कल तो वह मिलने ही वाला है। इस संसार में अनेकों यातनाओं से ग्रसित व्यक्ति देखे जाते हैं। यदि उन पर ध्यान दिया जाए तो सहज ही जाना जा सकता है कि व्यथा और असफलता भी यहाँ कम नहीं है। कुमार्ग पर चलते हुए सामयिक सफलता भी सदा ही मिलती रहे, ऐसी कोई बात नहीं, दंड का भी यहाँ समुचित विधि−विधान मौजूद है।

प्रतिफल से छुटकारा नहीं

अस्पतालों में ध्यानपूर्वक निरीक्षण करें तो वहाँ कराहते हुए, चिंतित, दुखी और पीड़ित मनुष्यों की भारी संख्या पीड़ा से छटपटाती हुई मिलेगी। यह सभी करुणा के पात्र हैं और उनके प्रति शुभकामना तथा सहायता की बुद्धि ही रखना हमारे लिए उचित है। पर विवेचना की दृष्टि से देखा जाए तो उनमें से अगणित ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने मर्यादाओं का उल्लंघन किया था, किसी भी प्रकार जल्दी— क्षणिक लाभ प्राप्त करने की बात सोची थी। स्वास्थ्य और संयम की मर्यादाओं का उल्लंघन किये बिना बीमार पड़ना कदाचित ही कभी होता है। सृष्टि के कोई जीव प्रकृति की मर्यादाओं का पालन करते रहने के कारण जब बीमार नहीं पड़ते तो मनुष्य को ही क्यों पड़ना चाहिए? बीमारों का घर−घर में बिस्तर हो रहा है, अस्पताल तो बिस्तर के एक नगण्य प्रतीकमात्र हैं। इनका निरीक्षण करके यह आचरण, मर्यादाओं का उल्लंघन किस सीमा तक हमारे लिए हितकर हो सकता है?

जेलखानों में जाकर देखें तो प्रतीत होगा कि एक-से- एक चतुर और उद्दंड व्यक्ति अपनी असफलता की करुण कहानी कह रहे हैं। फाँसी के फंदे अनेकों नृशंसों को उनकी करनी का फल चखा चुके हैं। जेल की कोठरियों की यदि जबान रही होती तो वह एक महापुराण सुनाती और बताती कि बदमाशी का फल तात्कालिक लाभ ही नहीं नारकीय यंत्रणा भी है।

तिरस्कार और प्रताड़ना

समाज में सर्वत्र बरसने वाली घृणा, गुंडापन की एक भारी सजा है। भोजन, वस्त्र, ऐश, आराम, जमीन-जायदाद, भोग−विलास छोटे दरजे की चीजें हैं। समाज का सम्मान इस सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और आनंददायक है। व्यक्ति गरीब रहकर यदि अपने चरित्र की रक्षा करता हुआ, श्रद्धा और सम्मान का अनुकरणीय आदर्श जीवन व्यतीत करे तो उसे अपेक्षाकृत अधिक आनंद मिलेगा। जिसके ऊपर सर्वत्र घृणा बरसती है, जिसे गुंडा, उद्दंड, पापी और कुकर्मी माना जाता है, वह कितनी ही कमाई कर ले, कितना ऐशो-आराम कर ले, एक निकृष्ट, पतित और क्षुद्र व्यक्ति की तरह सदा नीची आँखें ही किए रहेगा। उसके लिए किसी स्वजन-परिजन की आँखों में सच्ची श्रद्धा और सच्ची सहानुभूति की एक बूँद भी न मिलेगी। ऐसा अतृप्त और असफल जीवन लेकर भी अनीतिमान व्यक्ति यदि अपने को सफल और बुद्धिमान माने तो यह उनकी नासमझी ही कही जाएगी।

सबसे बड़ा दंड आत्मप्रताड़ना का है। अनीति के मार्ग पर चलने वाले को उसकी अंतरात्मा निरंतर धिक्कारती रहती है। मानव जीवन सत्कर्मों द्वारा स्वयं शांति पाने और दूसरों को सुख देने के लिए मिला है। इसी में उसकी सफलता भी है; पर यदि उसके द्वारा दूसरों का अहित होता है और अपने को आत्मप्रताड़ना की अशांति भोगनी पड़ती है तो यही कहना होगा कि नर तन प्राप्त होने का एक अमूल्य अवसर व्यर्थ ही हाथ से चला गया।

क्षुद्रता और पतन का घृणित मार्ग

संसार का इतिहास साक्षी है कि सन्मार्ग को छोड़कर जिसने कुमार्ग को अपनाया है, नीति को परित्यागकर अनीति को पसंद किया है, वह सदा क्षुद्र, पतित और घृणित ही रहा है। उसके द्वारा इस संसार में शोक-संताप, क्लेश और द्वेष ही बढ़ा है। शूल हूलते रहने वाले काँटे तो यहाँ पहले से ही बहुत थे। अपना जीवन भी यदि उन्हीं पतितों की संख्या बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ तो इसमें क्या भलाई हुई, क्या समझदारी रही? तृष्णा और वासना की क्षणिक पूर्ति करके यदि आत्मप्रताड़ना का, नारकीय यंत्रणा का, लोकमत की लानत का अभिशाप पाया तो इनमें क्या अच्छाई समझी गई?

अनीति का मार्ग असफलता की कँटीली झाड़ियों में फँसाकर हमारे जीवनोद्देश्य को ही नष्ट कर देता है। हम पगडंडियों पर न चलें। राजमार्ग को ही अपनाएँ। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी और शांतिदायक भी। पाप का प्रलोभन आरंभ में ही मधुर लगता है, पर अंत तो उसका हलाहल की भाँति कटु है। साँप और बिच्छू दूर से देखने में सुंदर लगते हैं, पर उनका दंशन प्राणघातक वेदना ही प्रदान करता है। पाप भी लगभग ऐसा ही है, वह भले ही सुंदर दिखे, लाभदायक प्रतीत हो; पर अंततः वह अनर्थ ही सिद्ध होगा। जीवन जीने की कला का एक महत्त्वपूर्ण आधार यह है कि पाप के प्रलोभनों से बचें और सन्मार्ग के राजपथ का कभी परित्याग न करें।

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