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Magazine - Year 1962 - Version 2

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मानव जीवन एक अलभ्य अवसर

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मानव जीवन भगवान का सबसे बड़ा वरदान है। परमात्मा, आत्मा को इस संसार-क्षेत्र में जो बड़े-से-बड़ा उपहार दे सकता है, वह है मानव जन्म। यह इतना बड़ा सौभाग्य है कि इसके लिए देवता भी तरसते हैं, देवताओं को स्वर्गलोक में केवल सुख ही प्राप्त है। वे केवल अपने पूर्वसंचित शुभकर्मों का सत्परिणाममात्र ही भोगते हैं, नए कर्म करने का अवसर उन्हें नहीं है। देवलोक में देवता लोग कोई और पुण्यसंचय करना चाहें तो नहीं कर सकते, क्योंकि वहाँ कोई पीड़ित-परेशान नहीं है, जिसकी सेवा-सहायता करके पुण्य-लाभ किया जा सके। ऐसी दशा में पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः धरती पर आ जाते हैं। देव योनि को भी भोग योनि माना गया है। पशु−पक्षियों, कृमि-कीटों को इसलिए भोग योनि मानते हैं कि वे पूर्वसंचित अशुभ कर्मों का फल भोगते हैं और देव योनि इसलिए है कि उन्हें शुभ कर्मों का सुख परिणाम भोगते रहने के लिए एक विशेष स्थिति में भेज दिया गया है। इस दृष्टि से पशुओं और देवताओं की योनियाँ भोग योनियाँ ही ठहरती हैं, भले ही उनमें सुख और दुःख प्राप्ति की भिन्नता रहती हो।

मनुष्य योनि इन दोनों से श्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें कर्म करने की भी सुविधा प्राप्त है और सुख-दुःख दोनों ही स्वादों को चखने का परिपूर्ण अवसर प्राप्त है। केवल मिठाई-ही-मिठाई सदा खाने को मिले तो फिर उसमें कोई आनंद न रहेगा। इसी प्रकार यदि नमक निरंतर मिले तो उससे भी अरुचि हो जाएगी। नमक से मिठाई का और मिठाई से नमक का महत्त्व बढ़ता है। रात से दिन की उपयोगिता को समझा जा सकता है। यदि सदा दिन-ही-दिन रहे या रात-ही-रात रहे तो समय काटना कठिन हो जाए। इसी प्रकार सुख और दुःख की बात भी है। सदा सुख ही भोगना पड़े तो वह जीवन भी नीरस हो जाएगा और सदा दुःख की स्थिति भी असहनीय हो जाती है। दुःख और सुख दोनों का ही निरंतर रहना उदासीनता का कारण बन जाता है।

मनुष्य योनि में दोनों ही स्थितियाँ प्राप्त करते रहने की धूप−छाँह उपलब्ध होती है, यहाँ सरदी−गरमी दोनों का मिर्च-मिठाई की तरह दो प्रकार का, एकदूसरे का पूरक सहायक— स्वाद उपलब्ध होता है और इच्छानुकूल भले−बुरे कर्म करके अपना भविष्य उज्ज्वल अथवा अंधकारमय बनाने की पूर्ण सुविधा प्राप्त है। स्वतंत्रता को सबसे बड़ा सुख माना गया है। 'सुख जग में स्वाधीन' की उक्ति प्रसिद्ध है। मनुष्य योनि में कर्म करने की जो स्वतंत्रता प्राप्त है, इसके लिए जो बुद्धिबल, अंतःकरण तथा अवसर मिला हुआ है, वह अन्य योनियों में कहाँ है?

पशुओं को बलपूर्वक काम में जोतकर उनसे कोई, कुछ लाभ भले ही प्राप्त कर ले, पर उनमें स्वयं किसी का उपकार करने की सद्भावना कहाँ होती है? उस भावना के अभाव में उनके द्वारा जो कर्म मनुष्य के लाभ के लिए किए जाते हैं, वे पुण्यरूप नहीं बनते। कोई जीव दूसरों के लिए अपना शरीर दान करे तो उसका बड़ा पुण्य माना जाएगा, पर किसी का जबरदस्ती कत्ल हो जाए तो वह आत्मदानी थोड़े ही कहलावेगा। दधीचि ने देवताओं को इंद्रवज्र बनाने के लिए अपनी अस्थियाँ दान की, शिवि ने कबूतर के बदले बाज को अपना माँस तोलकर दिया, दलीप ने ऋषि की गाय के बदले में अपना शरीर सिंह को सौंप दिया, घर आए भूखे बहेलिये के लिए कपोत-कपोती ने अपना शरीर सौंप दिया, तो उनकी गाथाएँ इतिहास के पृष्ठों में अंकित हैं और वे पुण्यफल के भागी भी हुए, पर सिंह, व्याघ्र, सर्प, डाकू, हत्यारे अनेकों का वध करते रहते हैं। जिनका वध किया गया है, उन्हें कोई पुण्य थोड़े ही मिलता है? इसी प्रकार पशुओं से बलात् दूसरों ने कुछ लाभ उठा लिया तो उसमें उन्हें कोई सद्गति का अधिकार थोड़े ही मिला। कारण यही है कि उनमें भावना-बुद्धि का अभाव होने से सेवाकर्म करते हुए भी पुण्यफल से वंचित रहना पड़ता है। देव योनि में तो सेवा का अवसर ही नहीं रहता। कहते हैं कि वे राजा-रईसों की तरह मखमली कालीनों पर पड़े ऐश-आराम करते रहते हैं। जहाँ कोई समस्याएँ ही नहीं होंगी, वहाँ सुलझाने और विकास करने का अवसर ही कहाँ मिलेगा? और जहाँ कोई दुखी-दरिद्र ही नहीं है, वहाँ सेवा का अवसर किसे प्राप्त होगा? इस प्रकार सुखी होते हुए भी उनका जीवन एकांगी रहता है।

केवल मनुष्य योनि में उभयपक्षीय सुविधाएँ प्राप्त हैं। वह चाहे शुभ करे, चाहे अशुभ। भावना की चेतना उसे परिपूर्ण मात्रा में प्राप्त है, उसी के आधार पर ही तो कर्मों की अच्छाई और बुराई आँकी जाती है और उसी के अनुरूप पुण्य-पाप का हिसाब गिना जाता है, जिनमें इस प्रकार की भावचेतना ही नहीं, उन निम्न श्रेणी के जीवों को पुण्य-लाभ कैसे मिलेगा? मनुष्य बड़ा सौभाग्यशाली है कि उसे भावनातत्त्व मिला है, ऐसे लोक में जन्मा है, जहाँ दुखी और पिछड़े हुए भी कम नहीं हैं, जिनकी सेवा करके उसे पुण्य-लाभ करने की चाह जितनी सुविधा प्राप्त है। सुख और दुख दोनों के ही ताने-बाने से मानव जीवन बुना होने के कारण उसे दुःखों से बचने और सुखों को बढ़ाने के लिए प्रयत्न करते हुए आत्मिक चेतना को बढ़ाने और इस बढ़ोत्तरी के द्वारा उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचने का अवसर मिलता है, यह दूसरी योनियों में कहाँ उपलब्ध है?

मानव प्राणी को जो सुविधाएँ प्राप्त हैं, वे पशु-पक्षियों की दृष्टि से इतनी ही बढ़ी−चढ़ी है, जितनी मनुष्य अपनी अपेक्षा स्वर्गलोकनिवासी देवताओं की सुविधाओं को बढ़ा−चढ़ा मानता है। वाणी के अभाव में दूसरे जीवों को अपनी अभिव्यक्तियाँ भीतर ही दबाए रहना पड़ता है,वे अपनी मनोभावनाएँ दूसरों पर प्रकट नहीं कर सकते हैं। पशुओं को वह बुद्धि भी प्राप्त नहीं है, जिससे वे अपने श्रम की तुलना में आवश्यक सुविधाएँ प्राप्त कर सकें। पूरे दिन परिश्रम करके वे केवल पेट भरनेमात्र का लाभ कर पाते हैं। आत्मरक्षा के लिए भी तो बेचारों के पास साधन नहीं है। कसाईखानों में रोज ही गाजर−मूली की तरह लाखों की संख्या में कट जाते हैं। पेट भरने और जीवन भर में दस-पाँच बार कामसेवन करने की क्षणिक तृप्ति के अतिरिक्त इनके संतोष का और क्या साधन है? उनकी तुलना में बोलने, गाने, लिखने, पढ़ने, स्वादिष्ट प्रकार के भोजन खाने, मकान, पलंग, स्त्री, पुत्र, कुटुंब, मनोरंजन आदि के जो विपुल साधन प्राप्त हैं, उन्हें देखते हुए यही कहा जाएगा कि अन्य जीवों की तुलना में इस धरती पर ही इतना सुख प्राप्त है जो यदि उन्हें मिल जाए तो वे स्वर्गप्राप्ति का ही अनुभव करें और यदि मनुष्य से उसका शरीर छीनकर किसी निम्न योनियों में डाल दिया जाए और साथ ही विवेक-बुद्धि भी जागृत रहे तो वह उस स्थिति में घबराकर आत्महत्या ही कर डालने पर उतारू हो जाएगा। अन्य जीवों के संतोष की बात इतनी ही है कि उन्हें बुद्धि न होने से असंतोष भी नहीं होता है और जैसी भी कुछ स्थिति प्राप्त है, उसी में वे अपना काम चलाते रहते हैं।

परमात्मा का जीव के लिए सबसे बड़ा उपहार मनुष्य शरीर है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद यह एक अवसर उसे अपनी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का परिचय देने के लिए ही मिलता है। साल भर पढ़ने वाले विद्यार्थियों को एक सप्ताह परीक्षा देनी पड़ती है और यह सिद्ध करना पड़ता है कि उनने पढ़ाई में उचित श्रम किया है। यह प्रमाणित कर देने पर उन्हें उत्तीर्ण होने का सम्मान मिलता और साथ ही उसका लाभ भी, किंतु जो छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं, उनके बारे में यही माना जाता है कि इनने उचित श्रम नहीं किया और दंडस्वरूप उन्हें पुनः उसी पुरानी कक्षा में एक वर्ष तक पड़े रहने दिया जाता है।

चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करके जीव को अपने को सुधारने और सन्मार्गगामी बनने की शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है। वह पढ़ाई पूरी होने पर मनुष्य शरीर का एक अलभ्य अवसर परीक्षाकाल जैसा मिलता है, उसमें उसे यह सिद्ध करना पड़ता है कि उसने कितनी आत्मिक प्रगति की, अपने को कितना सुधारा, दृष्टिकोण कितना परिमार्जित किया और उत्कृष्ट भूमिका की ओर कितनी यात्रा पूरी की गई? मानव जीवन का प्रत्येक दिन एक−एक प्रश्नपत्र है। इसमें जो समस्याएँ सामने आती हैं, वे ही प्रश्नपत्र हैं। इन प्रश्नों को किस भावना से, किस दृष्टिकोण से हल किया जा रहा है, हमारा परीक्षक उसे बहुत ही बारीकी से जाँचता है। यदि हमारा दृष्टिकोण पशुओं जैसा ही स्वार्थपरता और तृष्णा-वासना की क्षुद्रता से परिपूर्ण रहा, तब तो अनुत्तीर्ण होकर फिर चौरासी लाख योनियों की कक्षा में पड़े रहना होता है। यदि जीवनचर्या आदर्श रही और आचार−विचार की दृष्टि से अपनी उत्कर्षता सिद्ध हुई तो पूर्णता और परमानंद का प्रमाणपत्र परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुए छात्रों की तरह मनुष्य को भी मिलता है।

आए दिन की छोटी−मोटी असुविधाओं को हमें हलकी दृष्टि से देखना चाहिए। वे तुच्छ, नगण्य और महत्त्वहीन होती हैं, उनमें उलझने और बहुत महत्त्व देने से जीवन का मूल लक्ष्य दृष्टि से ओझल हो जाता है; इसलिए उचित यही है कि हम मानव जीवनरूप में प्राप्त हुए ईश्वरीय विशेष वरदान का महत्त्व समझें और इसे सार्थक बनाने में तत्परतापूर्वक कटिबद्ध हों।

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