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Magazine - Year 1963 - Version 2

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युग-साधक से (kavita)

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उठो, तरुण विक्षुब्ध न हो तुम नव-युग के आधार हो

युग-निर्माण-योजना की तुम सबल सुदृढ़ पतवार हो

(1)

युग-प्रेरक दृढ़ वक्ष तुम्हारा साहस से सम्पन्न हो।

आयें बाधाएँ ही कितनी पर न कभी तुम खिन्न हो॥

सदा हँसो जैसे हँसते हैं सुमन कटीली डाल पर।

ब्रह्मचर्य का तेज झलकता रहे अपरिमित, भाल पर॥

चलो स्वयं ही पथ प्रशस्त कर कितना ही अँधियार हो

ऐसी ज्योति जलाओ जिससे धरती पर उजियार हो

(2)

तुम्हें न रोक सकें आकर्षण और प्रलोभन बड़े-बड़े।

रहो देखते बन तटस्थ सब, दिव्य-लक्ष्य -हित सदा अड़े॥

जिधर बढ़ें युग-चरण तुम्हारे प्रलय उधर ही मच जाए।

छूलें जिसे भुजाएँ, दुस्तर-कार्य पूर्ण वह हो जाए॥

नई क्रान्ति की नई चुनौती, तुम्हें सहज स्वीकार हो!

अटल-साधना, श्रम-संयम के तुम्हीं दिव्य अवतार हो!!

(3)

जग में कार्य असम्भव क्या यदि लगन सत्य-शुभ-सुन्दर हो।

उर में हो विश्वास अमित, चरणों में गति-शाश्वत-स्वर हो।

क्योंकि जगत में जी सकता वह जिसकी भुज-दंडों में बल।

उसका क्या जीवन जो जर्जर चिन्तित-कायर अति निर्बल॥

अस्तु अभय बन बिचरो साथी, तुम्हें सभी से प्यार हो!

बढ़ो सदा तूफानों में तुम, चाहे भीषण ज्वार हो!!

-रामस्वरूप खरे

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