• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • हम पुरुष से पुरुषोत्तम बनें।
    • मनुष्य और उसकी महान् शक्ति
    • अपने आपको भी जानिए।
    • आध्यात्म की अनंत शक्ति-सामर्थ्य
    • दिव्य विचारों से उत्कृष्ट जीवन
    • श्रेय की सफलता विवेक से
    • क्या यही हमारी राह है ?
    • सात्विक कर्मों से ही आनन्द मिलेगा।
    • हमारा आत्म-विश्वास जागृत हो।
    • साहसी बनिये, आप जरूर सफल होंगे
    • Quotation
    • मृत्यु की भी तैयारी कीजिए?
    • हम किसी से क्यों डरें?
    • उत्तम पुस्तकें जागृत देवता हैं।
    • समाज को शक्तिशाली बनावें
    • Quotation
    • निराशा-मनुष्य की कायरता एक घृणित चिह्न
    • सेवा भावना बिना, मन-मरघट
    • वुडरो विल्सन
    • परिवार संस्था और उसका महत्व
    • समय जो गुजर गया, फिर न मिलेगा।
    • मिथ्या आडम्बर से सौ कोस दूर
    • स्वास्थ्य के लिये व्यायाम की आवश्यकता
    • केश, वस्त्र और वेष सभ्यों जैसे रखिए
    • बच्चे आपका अनुकरण करते हैं।
    • Quotation
    • चित्रों का भला और बुरा प्रभाव
    • खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या
    • चार्ल्स डार्विन
    • आश्विन मास का शिविर
    • श्रमदान से प्रवचन हाल का शुभारम्भ
    • आगामी शिविर माघ मास में
    • पाक्षिक पत्रिका का सर्वत्र स्वागत
    • हर घर में रहने लायक नव प्रकाशित पुस्तकें
    • नई धरती-नया आकाश
    • नई धरती-नया आकाश (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1964 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


निराशा-मनुष्य की कायरता एक घृणित चिह्न

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 16 18 Last
शरीर के जिस अंग में पक्षाघात हो जाता है वह अंग क्रिया-हीन निश्चेष्ट तथा निष्प्राण-सा हो जाता है। पक्षाघात की जो स्थिति शरीर में होती है, मस्तिष्क में वही अवस्था निराशा में होती है। नैराश्य, मन की सारी स्फूर्ति को कुचल कर उसे निष्क्रिय बना डालता है। निराश व्यक्ति का कभी किसी काम में जी नहीं लगता, किसी प्रकार लगा भी तो वह अधूरा ही रह जाता है। इससे एक पर एक असफलतायें ही बढ़ती जाती हैं। वैसे तो लक्ष्यहीनता, घृणा, उदासीनता, कायरता, अस्थिरता आदि मन की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ भी मनुष्य के क्रिया-व्यवसायों में दूषित प्रभाव डालती हैं किंतु निराशा के दुष्परिणाम तो इतने गम्भीर रूप से दिखाई देते हैं कि लोग इसके कारण बात की बात में अपनी जान तक गंवा देते हैं। यह निराशा-मनुष्य की घोर शत्रु है। इससे बचने में ही कल्याण है।

अनुमान है कि अमेरिका में प्रतिवर्ष पन्द्रह सौ से भी अधिक लोग आत्म-हत्या करते हैं। संसार के सभी भूभागों में निश्चित ही यह संख्या बहुत बड़ी होगी। सारे संसार में प्रतिवर्ष 1 लाख से भी अधिक व्यक्ति आत्म-घात कर लेते हैं। प्रतिदिन 500 से भी अधिक व्यक्तियों की आत्म-हत्या आज के सभ्य संसार के लिये एक बड़ा कलंक ही है - अकारण ही इस प्रकार जीवन की बाजी लगाना इस युग की सबसे बड़ी और चिन्तनीय समस्या है।

इन आत्म-हत्याओं के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से यह सिद्ध हो चुका है कि 90 प्रतिशत आत्म-हत्याओं का कारण लोगों की निराशा है। परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना, व्यवसाय में घाटा, मुकदमे की हार, मान हानि और प्रेम की असफलता आदि- ये कारण इतने बड़े नहीं कि इनसे विक्षुब्ध होकर लोग अपने जीवन का अंत ही कर डालें। आये दिन ऐसी घटनायें घटा ही करती हैं। प्रत्येक परीक्षा में पचास प्रतिशत से अधिक लोग अनुत्तीर्ण होते ही हैं, भाव की तेजी, मन्दी से व्यवसाय में घाटा आना भी सम्भव है, ऐसे समय निराश व्यक्ति ही अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं और इस प्रकार के दुष्कृत्य कर बैठते हैं।

निराशा मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु, ईश्वर का अभिशाप है। मनुष्य की शारीरिक और मानसिक शक्तियों को - समूल नष्ट करने वाली है यह निराशा। इन अवसरों पर जिन व्यक्तियों में धैर्य और आत्म-विश्वास की कमी हुई उनके पथभ्रष्ट होने में किंचित देर नहीं लगती।

निराशा का मूल कारण है आत्म-विश्वास की कमी। अपने ऊपर जिन्हें प्रत्येक क्षण अविश्वास बना रहता है। वे पूरे मन से अपना काम नहीं कर पाते, हर जगह हर बात में आशंका करते रहने से किसी काम में सफलता नहीं मिल पाती। इस कारण से उत्पन्न उद्विग्नता, विक्षोभ और दुःख के कारण निराशा का जन्म होता है। छोटी-छोटी सफलतायें भी अविश्वास का उन्मूलन करती रहती हैं और उतने ही अंगों में निराशा का अंत होता रहता है। कई बार बौद्धिक क्षमता के अभाव के कारण भी ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं। समय और सामर्थ्य से आगे बढ़ कर भी जब हम किसी बहुत बड़े लाभ या सफलता की अभिलाषा करते हैं तब भी निराशा का उदय होता है। सफलता के लिये रुचि, समय और स्थान की अनुकूलता, सामर्थ्य और योग्यतायें भी चाहियें, यदि यह न हुईं और सफलता की चाह ज्यों की त्यों बनी रही तो अंत में निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। इसलिये ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिये पहले छोटे कदम उठाने पड़ते हैं। बी. ए. पास करने के लिये प्रारम्भ में “अ” और “व” भी पढ़ने पड़ते हैं। इस तरह से किये हुये कार्यों में नवीनता और रुचि बनी रहती है। थकावट नहीं आती। अविश्वास, आलस्य आदि दोष छूटने लगते हैं और प्रतिभा का विकास होने लगता है। यदि ऐसा प्रतीत होने लगे कि इन सीमाओं का उल्लंघन कर रहे हैं तो प्रारम्भ से ही धैर्य, साहस और उत्साह का वातावरण बनाते रहने का प्रयत्न करना चाहिये ताकि अंतिम समय में असफल होने पर भी निराशा न आने पाये। यदि ऐसा कर सके तो उस कार्य को दुबारा पूरा करने की आप में पर्याप्त हिम्मत बनी रहेगी।

कदाचित आप निराशा से मुक्ति नहीं पा रहे हैं तो उसे आप अपने मन में ही डाले न रहिये। मन में ही घुलते रहने से स्वास्थ्य नाश होगा, मानसिक शक्तियाँ क्षीण होंगी। आप घबराइये नहीं, अपने मित्र से सलाह कर लीजिये, वयोवृद्ध अनुभवी व्यक्तियों से उचित परामर्श कर लीजिये। आपका दुःख बंट जायेगा, जी हल्का हो जायेगा और आगे के लिये एक नई सूझ उत्पन्न होगी। कैसी भी बात क्यों न हो, उसे गुप्त कभी भी नहीं रखना चाहिये, जहाँ तक हो सके अपने परिजनों मित्रों में व्यक्त कर देने से अपनी सारी कठिनाई तत्काल समाप्त हो जाती है। शेष के लिये कोई उचित हल निकल आता है।

अपने विचारों को कार्य-रूप में परिणत न करने में भी निराशा पैदा होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक गोथे ने लिखा है- “क्रिया में परिणत न होने वाले विचार रोग बन जाते हैं।” डॉ. हेनरी के भी ऐसे ही विचार हैं। उन्होंने लिखा है - “मस्तिष्क जब अपने ही व्यूह में द्रुतगति से चक्कर लगाने लगता है और शारीरिक अवयवों को गति नहीं दे पाता तभी निराशा उत्पन्न होती है।” अतएव यह सुनिश्चित है कि अपने विचार अपनी इच्छाओं को पूरी तरह कार्यों में अभिव्यक्त होना चाहिये। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अंतःकरण में घोर अशाँति छायी रहेगी। अपनी कठिनाईयों को समस्या का रूप मत दीजिये। परिस्थितियों के अनुसार अच्छे-बुरे सभी तरह के परिणाम भुगतने के लिये अपना दिल और दिमाग मजबूत रखिये। दिन के चौबीस घण्टे काम में लगे रहिये। न मिलेगा समय, न आयेगी निराशा का सिद्धान्त ही सर्वोत्तम है। इसी तरह उन बातों की कामना करना भी छोड़ दीजिये जो परिस्थिति साध्य हैं। जो कुछ मिले उतने से ही संतोष कर लिया कीजिये। इससे आपकी मानसिक प्रसन्नता सदैव स्थिर बनी रहेगी।

संघर्ष के क्षणों में हार मान लेना यह मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। मनुष्य में वह सभी शक्तियाँ सन्निहित हैं जिनके कारण वह असमय में भी मनचाही सफलतायें प्राप्त कर सकता है। पर इसके लिये विश्वास और लगन की आवश्यकता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब अपनी अल्प शक्तियों का उपयोग करके भी मनोवाँछित सफलतायें प्राप्त की गई हैं, इसका एक उदाहरण इस प्रकार है :-

हिंदुओं में अब भी यह विश्वास है कि रामायण और महाभारत पढ़ने से लोगों को मोक्ष मिल जाता है। इस बात का पता जब हावड़ा की 80 वर्षीय अशिक्षित पनुवती देवी को चला तो उन्होंने धैर्य साहस और आत्म-विश्वास के साथ जोतगिरी ग्राम में पढ़ना शुरू कर दिया। यह घटना लगभग 8 वर्ष हुये घटित हुई थी। अब तक इस गाँव में पनुवती के इस साहस के कारण वयस्क शिक्षा की विधिवत परम्परा चल पड़ी है। लगता है अब वहाँ कोई निरक्षर नहीं रहेगा। उद्देश्य कैसा भी हो उसकी पूर्ति के लिये अपनी चेष्टाओं को एकाग्र करके लगन और तत्परता के साथ कार्य करें तो सफलता जरूर मिलती है इसमें किसी तरह का संदेह नहीं हैं।

परेशानी तभी तक रहती है, जब तक मन में शंका तथा भय बना रहता है। साहस के हारते ही निर्णय-शक्ति समाप्त हो जाती है। मनुष्य उस विषय पर ठीक विचार नहीं कर पाता, क्योंकि उसकी तर्क शक्ति मंद पड़ जाती है। मन की इस अराजकता से ही उसकी शक्तियों का पतन होता है और किसी कार्य में सफलता नहीं मिल पाती। मानसिक शक्तियों के दबते ही मनुष्य की प्रतिभा कुन्द हो जाती है और इससे उसकी सारी कार्य-क्षमता समाप्त हो जाती है। उस समय यदि निराशा से बचने का प्रयत्न नहीं करते और आशा, उत्साह की कल्पना नहीं करते तो आप का जीवन बेकार हो जायेगा। इस विनाशकारक वृत्ति को रोकने में ही मनुष्य मात्र का कल्याण है।

हमारी समस्त निराशाओं का मूल कारण हमारी ईश्वर से भिन्नता है। मनुष्य तब तक अपने आप में बिल्कुल असहाय अरक्षित और अकेला है, जब तक कि वह अपने ही अहं भाव तक सीमित रहता है, उसकी निराशा, दुःख और छटपटाहट भी तभी तक रहती है। जो हमेशा परमात्मा को अपने पास समझता में, वह सभी निराशाओं और कष्टों से ऊपर उठ जाता है। जिन कठिनाईयों और संघर्षों से सामान्य जन भयभीत बने रहते हैं, ईश्वरवादी उन्हें अपनी प्रगति अपने विकास का माध्यम मानता है और उसका सहर्ष स्वागत करता है। आशाओं का केन्द्र भगवान ही है। जो उस पर आस्था रखता है, उसके जीवन में आशा का संचार होने लगता है।

First 16 18 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • हम पुरुष से पुरुषोत्तम बनें।
  • मनुष्य और उसकी महान् शक्ति
  • अपने आपको भी जानिए।
  • आध्यात्म की अनंत शक्ति-सामर्थ्य
  • दिव्य विचारों से उत्कृष्ट जीवन
  • श्रेय की सफलता विवेक से
  • क्या यही हमारी राह है ?
  • सात्विक कर्मों से ही आनन्द मिलेगा।
  • हमारा आत्म-विश्वास जागृत हो।
  • साहसी बनिये, आप जरूर सफल होंगे
  • Quotation
  • मृत्यु की भी तैयारी कीजिए?
  • हम किसी से क्यों डरें?
  • उत्तम पुस्तकें जागृत देवता हैं।
  • समाज को शक्तिशाली बनावें
  • Quotation
  • निराशा-मनुष्य की कायरता एक घृणित चिह्न
  • सेवा भावना बिना, मन-मरघट
  • वुडरो विल्सन
  • परिवार संस्था और उसका महत्व
  • समय जो गुजर गया, फिर न मिलेगा।
  • मिथ्या आडम्बर से सौ कोस दूर
  • स्वास्थ्य के लिये व्यायाम की आवश्यकता
  • केश, वस्त्र और वेष सभ्यों जैसे रखिए
  • बच्चे आपका अनुकरण करते हैं।
  • Quotation
  • चित्रों का भला और बुरा प्रभाव
  • खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या
  • चार्ल्स डार्विन
  • आश्विन मास का शिविर
  • श्रमदान से प्रवचन हाल का शुभारम्भ
  • आगामी शिविर माघ मास में
  • पाक्षिक पत्रिका का सर्वत्र स्वागत
  • हर घर में रहने लायक नव प्रकाशित पुस्तकें
  • नई धरती-नया आकाश
  • नई धरती-नया आकाश (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj