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Magazine - Year 1964 - Version 2

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छान्दोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है। एक बार इन्द्र और विरोचन-दो व्यक्तियों में एक जिज्ञासा पैदा हुई “मैं क्या हूँ।” वे बार-बार सोचते विचारते लेकिन उन्हें “मैं” का अता-पता नहीं लगा। आखिर दोनों मिलकर आदरपूर्वक शिष्य भाव से हाथ में समिधाएँ लेकर आचार्य प्रजापति के पास गये और नम्रतापूर्वक उनसे अपनी जिज्ञासा प्रकट की। उनके प्रश्न का जवाब देते इसके पूर्व ही प्रजापति ने उनकी योग्यता, पात्रता को जानने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने कहा “थाली में पानी भरकर अपना-अपना मुँह देखो उसमें तुम्हें अपना स्वरूप दिखाई देगा।”

इन्द्र और विरोचन दोनों झट से सजधज कर पानी से भरी थाली में अपने को देखने लगे। विरोचन को अपना सजा संवारा रूप देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और अपने साथियों में जाकर अभिमान के साथ कहने लगा “भाई मैंने तो “मैं”का पता लगा लिया है। इन्द्र कुछ बुद्धिमान था, उसे सन्तोष नहीं हुआ और वह आचार्य प्रजापति के पास जाकर कहने लगा -”भगवन् असंस्कृत शरीर की प्रतिच्छाया ही प्रतिबिम्ब में दिखाई देती है। यदि यह शरीर काना, लूला, लंगड़ा होता तो प्रतिच्छाया भी वैसी ही दिखाई देती, वस्त्र अलंकारों को उतार देने पर प्रतिबिम्ब का सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है। और शरीर के नष्ट हो जाने पर यह भी नहीं रहता इसीलिए इसे मैं अपना स्वरूप कैसे मानूँ। मुझे इससे शान्ति नहीं मिलती”(छान्दोग्य 8। 6। 2)।

इन्द्र समझदार था। सोचा इन वस्त्र अलंकारों से सजा हुआ शरीर ही यदि “मैं हूँ” तो यह निश्चित है कि इनके नष्ट होते ही मैं भी नष्ट हो जाऊंगा। इनके मैले, जीर्ण-शीर्ण होने पर “मैं” भी त्याज्य बन जाऊँगा। जो नष्ट होने वाली वस्तुयें हैं वह कदापि “मैं” नहीं हो सकती और इन्द्र को इससे शाँति नहीं हुई न उसको समाधान ही मिला। अपने इस मनोभाव को उसने आचार्य के समझ निर्भय होकर प्रकट कर दिया। उधर विरोचन अपने सजे हुए सुन्दर वस्त्रालंकारों से विभूषित शरीर के प्रतिबिम्ब को ही “मैं” का स्वरूप जानकर के चला गया।

हममें से बहुत ही कम लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है “मैं क्या हूँ”। इस पर बहुत बहुत कम लोग ही सोचने- विचारने का प्रयत्न करते हैं। अधिकाँश तो भवसागर के प्रवाह में बहने वाले ही बनकर रहते हैं। उनके मन बुद्धि चेतना पर अज्ञान का पर्दा इस तरह पड़ा रहता है कि वे कभी यह सोचते तक नहीं कि वे कौन हैं? उन्हें क्या करना है? कहाँ जाना है ?

कुछ लोग मैं के अस्तित्व को शरीर तक ही मानकर विरोचन की सी भूलकर बैठते हैं। और शरीर को सुख देने, खाने-पीने खुश रहने, मौजमजा उड़ा लेने में ही जीवन का सार समझते हैं। लेकिन यदि शरीर को ही मैं का स्वरूप मान लिया जाय तो फिर जीवन का मूल्य ही क्या रह जाता है। कोई झंझट ही फिर शेष नहीं रह जाता। कुछ करने या न करने का कोई महत्व नहीं रहता फिर ज्ञान-विज्ञान की बात कौन करें। फिर न जीने से लाभ रहता न मरने से हानि, क्योंकि सभी शरीरों की एक ही गति होती है। किसी-न-किसी समय में वे अन्ततः नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी अज्ञानी, सत्यवादी और झूठा, सज्जन और दुर्जन सभी को तो शरीर की दृष्टि से एक दिन मिट जाना ही पड़ता है। ऐसी स्थिति में तो मरने से पहले का कोई महत्व नहीं तो मरने के बाद में कोई अस्तित्व नहीं रहता। जीवन सिर्फ दो अन्धकार के बीच की पतली-सी रेखा मात्र है। देर-सवेर में फट जाने वाले, मैले पड़ जाने वाले वस्त्रों का-सा मूल्य है, हमारे जीवन का चाहे वह सादा हो या चमकदार। लेकिन क्या हमें इतना सोच लेने भर से इन्द्र की तरह असन्तोष नहीं होता ? “मैं” को जानने की जिज्ञासा कर इससे समाधान नहीं हो रहा ऐसा महसूस होने लगता है हमें।

फट जाने वाले, नष्ट हो जाने वाले वस्त्राभूषणों से युक्त प्रतिबिम्ब को ‘मैं’ का स्वरूप जान लेने से हमारी जिज्ञासा शाँत नहीं होती। क्योंकि इन्हें धारण करके हम अच्छे लगते हैं और उतार फेंकने पर कुरूप, इस तरह स्पष्ट है कि वस्त्र फट जाने पर यह भास नहीं होता कि मैं फट गया। वस्त्राभूषण उतार देने या पहने रहने पर “मैं” का अस्तित्व बना ही रहता है।

ठीक यही स्थिति शरीर के साथ भी है। वस्त्रों की तरह हमारा शरीर नित्य ही किसी न किसी रूप में नष्ट होता रहता है। मल-शरीर से निकलने वाले दूषित तत्व-क्या हैं? नष्ट हुए शरीर का अवशेष। रसायन-शास्त्री, वैज्ञानिकों के प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि शरीर में नित्य असंख्यों कोष नष्ट होते हैं असंख्यों ही नये पैदा हो जाते है इस तरह शरीर की दृष्टि से तो हम नित्य ही मरते हैं। और नित्य ही जन्म लेते हैं। लेकिन “मैं” के अस्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं होता।

इसी तरह शरीर का कोई अंग कट जाने पर कोई यह स्वीकार करने का तैयार नहीं होगा कि उसका “मैं” फट गया। अँगुली कट जाने पर, आँख फूट जाने पर, यह तो मालूम होता है कि मेरे शरीर में कुछ क्षति हो गई है। लेकिन हमें यह विश्वास नहीं होता कि हम अपूर्ण हो गये। अपनी अज्ञात पूर्णता के अस्तित्व में हमारी सहज आस्था कम नहीं होती है। “मैं हूँ” यह भावना कभी नष्ट नहीं होती।

“मैं” की खोज में हम आगे बढ़ें इससे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर “मैं” को जान लेने की आवश्यकता क्यों है? बहुत से लोग तो इस सम्बन्ध में कुछ सोचते विचारते ही नहीं। ऐसे लोगों को खाने पीने मौज -मजे उड़ाने से फुर्सत नहीं मिलती लेकिन इस तरह की प्रवृत्ति पशुत्व की द्योतक है। क्योंकि शायद ही पशुओं के मन में अपने भूत भविष्य के बारे में सोच विचार करने की तरंग उठती हो। उनको अपने प्रकृति प्रेरित कार्यों में लगे रहना ही प्रिय होता है।

कुछ बुद्धिमान कहे जाने वाले लोग इस महाप्रश्न में बेकार न लगकर अपना काम करना ही अधिक अच्छा समझते हैं। वे इस जटिल प्रश्न को सुलझाने में व्यर्थ श्रम करना अच्छा नहीं समझते। लेकिन हमें क्या करना चाहिये यह निश्चय करना इससे भी कठिन है और बिना सही निश्चय के किये गए कार्य अनन्तः मनुष्य के लिए अशाँति, असंतोष के कारण ही बनते हैं। कर्तव्य का निश्चय भी तभी हो सकता है जब हम अपने असली अस्तित्व की जानकारी कर सकें। यदि हम शरीर ही हैं तो फिर हमारे कर्तव्यों की सीमा भी शरीर तक ही सीमित रहेगी। किसी भी कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्णय हमें वहीं तक करना होगा जितना इसी जीवन से सम्बन्ध है। उदाहरणार्थ हमें किसी जगह एक माह रहना है तो वहाँ वर्षों में बनने वाले भव्य भवन बनाने की योजनायें किस काम की? इसी तरह ‘मैं’ का अस्तित्व यदि शरीर से परे महान है लम्बा है तो हमें अपने कर्तव्यों का निर्णय भी इसी आधार पर करना पड़ेगा।

तात्पर्य यह है कि अपने आपको जाने बिना जीवन पथ पर, कर्तव्य-मार्ग पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। इसके अभाव में तो हमारी स्थिति ठीक वैसी होगी जैसे कोई मनुष्य आँखें बन्द किए जंगल में तेजी से दौड़ रहा हो। उससे पूछा जाय, ‘भाई तुम क्यों दौड़ रहे हो, तुम्हें कहाँ जाना है कहाँ से आए हो?” और इनका उत्तर वह अपनी अजानकारी में दे तो हम उसे पागल ही कहेंगे। क्या हमारी स्थिति भी अपने स्वरूप को जाने बिना कुछ ऐसी ही नहीं है ? इसलिए ‘मैं’ के स्वरूप की जानकारी करना इस सम्बन्ध में प्रारम्भिक आधार खोजकर आगे बढ़ना नितान्त आवश्यक है। इसके बिना हम अपने जीवन की सही-सही रूपरेखा न बना सकेंगे, न अपने कर्तव्यों का, अपनी गति दिशा का सही-सही निर्धारण ही कर सकेंगे। अपने स्वरूप को जानना जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

सचमुच जीवन का वास्तविक लाभ वे ही उठा पाते हैं जो पहले अपने आपको बनाने का प्रयत्न करते हैं। अपने को न जानने वाले व्यक्ति आकारहीन वस्तुओं की तरह है जिन्हें वायु का झोंका तिनके की तरह बहा कर ले जा सकता है। ऐसे लोगों को संसार प्रवाह में बेकार ही बहते रहना पड़ता है।

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