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Magazine - Year 1964 - Version 2

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बच्चे आपका अनुकरण करते हैं।

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खेत में लहलहाती पौध की सुरक्षा के लिए चतुर किसान उसके चारों ओर मेंड़ बाँधते, कँटीले तार रुँधते और समय-समय पर उसकी पहरेदारी करते हैं। तब कहीं उसे अन्य पशुओं से बचाना सम्भव होता है। बिना किसी देख-रेख के उसे छोड़ दें तो चिड़ियाँ, गिलहरियाँ, खरगोश आदि उन्हें चर जाते हैं। भली-भाँति सुरक्षित पौधे जल, वायु और सूर्य से पर्याप्त सामग्री ग्रहण कर धीरे-धीरे परिपक्व होने लगते हैं। इस क्रिया में कितना समय लगता है उसमें किसान को कितनी दौड़−धूप, श्रम और सावधानी बरतनी पड़ती है इसे सभी जानते हैं। बच्चा भी एक सुकुमार पौधा है, जिसे जिधर चाहो मोड़ दो। घर की चहार दीवारी में जहाँ बच्चे की सुरक्षा होती है वहाँ वह अपने जीवन-विकास की व्यावहारिक सामग्री भी अपने माता-पिता तथा अभिभावकों से ही प्राप्त करता है। वृक्ष की जड़ें अपने लिए जीवन तत्व धरती से चूसती रहती हैं-बच्चा अपना बौद्धिक पोषण-पदार्थ अपने अभिभावकों से प्राप्त करता है। सुकुमार अवस्था से बढ़कर पूर्ण नागरिक बनने तक बच्चे की सुरक्षा ऐसी ही होती है जैसे किसान अपने खेतों का रखवाली करता है।

बच्चे परमात्मा का स्वरूप होते हैं। उनमें निश्छलता स्वाभाविक और प्रकृतिदत्त होती है। बच्चे की सेवा भगवान् सबसे अच्छी सेवा मानी जा सकती है। उसमें जाति-पाँति-भाषा भेद के भाव नहीं होते। माता-पिता चाहें तो उसे विकसित कर चारित्रिक, नैतिक सद्गुणों का विकास कर दें अथवा उनका सम्पूर्ण नाश कर दें। वह कोरा कागज है जिस पर चाहे काली स्याही से लिख दें अथवा रंगीन कलाकृति ढाल दें। इसके लिए उनकी उंगली पकड़ कर सिखाने की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती जितनी मनोवैज्ञानिक तरीकों से उन पर प्रभाव डालने की। प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक आर्थर डिंग्ले ने कहा कि-बालक आप क्या कहते हैं उस पर अमल नहीं करेगा बल्कि क्या आप करते हैं वह सीखेगा।

घर का वातावरण बच्चों को प्रभावित करता है। स्वजनों में रहन-सहन के अनुरूप अपना निर्माण करता है। परिजनों का व्यक्तित्व उन पर प्रभाव डालता है। साफ -सफाई, सुरुचि और सदाचरण पूर्वक जीवन-यापन करने वाले दम्पत्ति ही उच्च मनोबल के मेधावी बालकों का निर्माण कर सकते हैं। ध्रुव, प्रह्लाद, श्रवण कुमार, भरत, लव−कुश, कच, अभिमन्यु-गोरा-बादल, फतहसिंह, जोरावर सिंह जैसे पुत्रों को उच्च श्रेणी का आदर्श छोटी आयु में ही प्रस्तुत करना उनके माता पिता और गुरुओं ने ही सिखाया था।

सती मदालसा ने जब चाहा कि उसका बालक ब्रह्मा-विद्या-विशारद हो तो वैसा-ही हुआ, जब चाहा तब उन्हें राज्य का उत्तराधिकारी बनने योग्य राजकुमार बनाया। राजकीय संरक्षण से वंचित शकुन्तला ने निर्जन वन में पुत्र को प्रसव किया और वहीं उसे यह शिक्षा दी कि वह एक दिन सम्पूर्ण आर्यावर्त का स्वामी बना। उसी भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। बच्चे गीली मिट्टी होते हैं जिन्हें जैसे ढाँचे में ढाला जाय वैसे ही निर्मित होते और वैसा ही आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

डाँट डपट से बालक में भय, विद्वेष, क्रोध और कटुता की भावनायें पैदा होती हैं जो उसके जीवन निर्माण में हानिकारक प्रभाव डालती हैं। इससे उसका साहस विलुप्त हो जाता है और दिनों-दिन भय और कायरता की हीनवृत्ति की ओर गिरता चला जाता है। सहयोग और सहानुभूति की भावनायें ऐसे शिशुओं में पनप भी नहीं पातीं जिससे वे अर्द्धविकसित रह जाते है और जीवन के किसी भी क्षेत्र में कैसी भी प्रगति नहीं कर पाते।

आज ऐसी ही सन्तति का सर्वत्र बाहुल्य है। बच्चों के आहत और मुरझाये हुए चेहरे देखते हैं तो बड़ी निराशा होती है। लगता है कल जिन नागरिकों के ऊपर राष्ट्र की आध्यात्मिक और भौतिक सम्पन्नता की आधार-शिला रखी जानी है वे आज इतने अशक्त और दुर्बल हैं तो भला वे इतने बड़े बोझ को कैसे वहन कर सकेंगे। इसके लिए किसी व्यवस्थित प्रशिक्षण की अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है जिसमें कम से कम लोग बच्चों के समक्ष सही आचरण प्रस्तुत करना सीखें। डाँटने का तरीका सदैव कटु होता है। इससे बालक में दुर्भावना पैदा होती है। स्वाभिमान की भावना उनमें भी होती है। इसे यदि बलपूर्वक दबा दिया गया तो उनकी सही दिशा चुनने की मौलिक शक्ति का पतन होता है। आत्म-निर्माण की मनोवृत्तियां कुण्ठित हो जाती हैं। जीवन में भी वे बाहरी साहस खोजते रहते हैं। इसके लिए वे अनैतिक दुष्कृत्य तक करते देखे जाते हैं।

बालक के अविकसित मस्तिष्क को उचित अनुचित या भले-बुरे की कोई विशेष पहचान नहीं होती। अखाद्य खाने में उन्हें संकोच नहीं होता। धूल के साथ भी खेलने में झिझक नहीं लगती। तोड़-फोड़ और हर चीज के साथ खिलवाड़ करने में उन्हें कुछ अनुचित नहीं लगता। इस पर यदि कोई दम्पत्ति नाराज हों अथवा उत्तेजित होकर उन्हें बेरहमी से पीट दें तो यही कहना पड़ेगा कि उन्होंने बालवृत्ति को समझने में भूल की है या फिर उनमें सहृदयता का अभाव है।

बच्चे की आयु के साथ उसका विवेक भी बढ़ने लगता है किन्तु सीमित ज्ञान के कारण वह अपने विवेक को अपने संरक्षकों, अभिभावकों और माता-पिता पर आरोपित करता है। वह बड़ी जिज्ञासा से यह अध्ययन करता रहता है कि माता क्या खाती है और उसे ही खाने के लिए दौड़ पड़ता है। पिता भाई और बहनों के आचरण में वह अपना निर्माण करता है। परिवार वाले यदि अस्वच्छ, मलिन स्वभाव के हुए तो यही मलिनता उसमें भी प्रवेश कर जाती है। बड़े हो जाने पर जो आदतें परिपक्व बन जाती हैं, उनका छोटा रूप घरवालों का ही दिया हुआ होता है। बालक में तो केवल विकास होता है आचरण की पौध लगाने के उत्तरदायी उसके घर वाले ही होते हैं।

घर के वातावरण से यदि अशुभ संस्कारों को, हीन वृत्तियों और ओछे कार्यों को निकाल दें, उनके स्थान पर यदि सुन्दर, सुरुचिपूर्ण और माँगलिक कर्मों को स्थान मिले तो ऐसे वातावरण में पले बच्चे भी सुन्दर आचरण, विचार वाले बनते हैं। पारिवारिक स्नेह, सौहार्द और सौजन्यता का जहाँ जितनी मात्रा में बाहुल्य होगा वहाँ बच्चों का नैतिक विकास भी उतना ही प्रगाढ़ और स्थिर होगा। बाह्य संस्कारों के प्रभाव की प्रतीक्षा करने से तो यही अच्छा है कि अपने आन्तरिक सद्गुणों को विकसित कर बालक की पाठशाला को सजाया जाए जिसमें वह शुभ गुण ग्रहण करे और श्रेष्ठ सत्कर्म करना सीखे।

इसके लिए हर घड़ी चतुर किसान के समान ही सावधानी और सुरक्षा बरतनी पड़ेगी। बालक पर रोकथाम लगाने के पहले आत्म-निरीक्षण करना पड़ेगा। “क्या कर रहा है” कहने के पूर्व “क्या कर रहे हैं।” जैसे सम्मान सूचक भाषण प्रयुक्त करने का प्रतिबन्ध अपने आप पर लगाना पड़ेगा। तभी यह स्थिति बन पड़ेगी जिसकी आज आकुलतापूर्वक प्रतीक्षा की जा रही है। युग-निर्माण अभियान यथार्थ में सुसन्तति को जन्म देने का आन्दोलन है। राष्ट्र का भावी सन्तान आज के बच्चों की प्रतिष्ठा पर अवलम्बित है। कल की बागडोर सम्हालने वाले आज के यह बच्चे ही हैं। फिर क्यों न आज से ही अपने उत्तराधिकारियों के निर्माण में लगें। इसी से हमारी संस्कृति, जाति और राष्ट्र की उन्नति हो सकेगी।

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