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Magazine - Year 1964 - Version 2

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श्रमदान से प्रवचन हाल का शुभारम्भ

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संजीवनी विद्या का प्रशिक्षण एवं चान्द्रायणव्रत तपश्चर्या का सम्मिलित सुयोग ऐसा है जिसका लाभ प्राप्त करने के लिये परिवार के सभी सदस्य आकुल हैं और सम्मिलित होने की स्वीकृति प्राप्त करने के लिये इतने पत्र आते हैं कि उनमें से बहुत थोड़ों को स्वीकृति दे सकना सम्भव हो पाता है। कारण यह है कि एक महीना ठहरने वाले को अपना भोजन आप बनाने वाले को उपयुक्त स्थान अभीष्ट ही है। पर गायत्री तपोभूमि में अलग कोठरियों की बहुत ही कम व्यवस्था है। जो परिवार समेत आते हैं उनके लिए तो किसी प्रकार कोठरियों की व्यवस्था हो जाती है, शेष सब को एक बड़े कमरे में इकट्ठे ही ठहरना पड़ता है जिसमें न तो उन्हें एकान्त मिल पाता है और न सामान ही यथास्थान व्यवस्थित रह पाता है।

इससे भी बड़ी कठिनाई यह है कि विद्या मन्दिर नामक छोटा कमरा जिसकी लम्बाई चौड़ाई 16&18 फुट है। बहुत ही कठिनाई से 50 व्यक्तियों के बैठने योग्य है। जून के तीनों शिविरों में लगभग 100-100 की उपस्थिति रही और इस आश्विन शिविर में उससे भी अधिक संख्या हो गई। यह प्रश्न विकट था कि इन्हें प्रवचन सुनने के लिए कहाँ कैसे बिठाया जाए? ठूँस ठाँसकर कमरे में भीतर तथा बरामदे में किसी प्रकार इन लोगों को बिठाया गया। फिर भी जिन्हें बाहर चबूतरे पर बैठना पड़ता था उन्हें भी सुनाई पड़ता रहे इसके लिए लाउडस्पीकर की व्यवस्था करनी पड़ी।

इन परिस्थितियों में 50 को स्वीकृति देने का ही हर शिविर में निश्चय किया जाता है पर वह संख्या रोकते-रोकते भी 100 हो जाती है। स्थान सम्बन्धी अभाव के कारण सभी आगन्तुकों को कष्ट उठाना पड़ता है। यद्यपि वे किसी प्रकार उसे सहन कर लेते हैं पर असुविधा तो आखिर असुविधा ही है। लगता है कि आगे 100 शिक्षार्थियों से कम के शिविर करने से काम न चलेगा। कम लोगों में भी हमें उतना ही समय लगाना पड़ता है जितना अधिक लोगों में। फिर आने वालों की आतुरता भावना एवं आवश्यकता को भी ध्यान में रखना पड़ता है। सफलताओं और उपयोगिताओं को देखते हुए कार्य का विस्तार होने ही वाला है। अतएव स्थान भी चाहिए ही।

इस समस्या की महत्ता को देखते हुए जबलपुर के श्री दाना भाई मेद्यजी राठौर ने सामान्य आर्थिक स्थिति होते हुए भी अपनी शक्ति से बाहर उदारता का परिचय देते हुए आठ परिवारों के ठहर सकने योग्य कमरे उनसे, लगी हुई कोठरी एवं बरामदों का निर्माण करा दिया है। उससे चान्द्रायणव्रत में आने वालों को बहुत कुछ राहत मिली। पर आवश्यकता को देखते हुए यह स्थान भी कम है। अभी कम से कम इतना ही स्थान ठहरने वालों के लिए और भी चाहिये। माता की इच्छा एवं प्रेरणा जब होगी। तब परिजनों में से कोई इन्हें भी पूरा कर देंगे। चन्दा माँगने का उनके लिये अपना कोई इरादा नहीं है।

तात्कालिक आवश्यकता प्रवचन हाल की है। ठहरने की बात तो किसी प्रकार चल भी सकती है पर प्रशिक्षण के लिए शिक्षार्थियों को एक स्थान तो चाहिए ही। वर्तमान स्थान उनके लिये सर्वथा अपर्याप्त है। इस तात्कालिक आवश्यकता को देखते हुए आश्विन शिविर में आये हुये शिक्षार्थी एवं तपस्वियों ने साहसपूर्ण कदम उठाया और उन्होंने आश्विन सुदी 5 का श्रम दान से इस हाल के बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया। फावड़े और दोवरे लेकर सभी लोग जुट पड़े और देखते-देखते नींव खोदी गई उसमें ईंटें भी बिछा दी गईं। अब धीरे-धीरे जैसे साधन मिलेंगे यह कार्य आगे बढ़ेगा। फिलहाल इस कार्य को श्रमदान से जारी रखा जायेगा। तपोभूमि में कुछ साधक स्थायी रहते हैं कुछ समय-समय पर आते रहते हैं। इन सबके लिये श्रमदान अनिवार्य रहेगा और धीरे-धीरे यह निर्माण कार्य चलता रहेगा।

हवन सामग्री द्वारा होने वाले अग्निहोत्र का जो महत्व है उससे कम महत्व ज्ञान यज्ञ का नहीं है। आहुतियाँ देने से जिस प्रकार आत्म कल्याण और विश्व मंगल होता है उसी प्रकार जीवन निर्माण के प्रवचनों द्वारा भी आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति होती है। इस दृष्टि से अग्निहोत्र की यज्ञशाला जितना ही इस ज्ञान-यज्ञ की यज्ञशाला का-प्रवचन हाल का भी महत्व है। इसके निर्माण में हर साधक को श्रमदान करते हुए प्रमुदित होना उचित भी है। चान्द्रायणव्रत शिविर में आने वालों ने इन्हीं भावनाओं के साथ श्रमदान किया भी।

यों कई साधक यह भी हिसाब लगा रहे थे कि इस ज्ञान यज्ञ की यज्ञशाला में अपनी ओर से एक हजार ईंटें लगवादें तो उसमें कितनी लागत आवे। ईंट, चूना, सीमेन्ट, लोहा, लकड़ी, मजूरी, जमीन खरीद, छत पटाव आदि का खर्च जोड़ने से यह लागत 100 के करीब निकली। कुछ व्यक्ति निर्धन होते हुए अपना भी इतना भाग लगाना चाह रहे थे। समयानुसार वे वैसा करेंगे भी। वे या कोई भी इस कार्य में न्यूनाधिक सहयोग देने के लिये स्वतन्त्र है। पर किसी को भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके लिए कहा नहीं गया है। यहाँ की पिछली परम्परा याचना की नहीं रही तो अब या आगे भी क्यों रहेगी?

श्रमदान से बड़े-बड़े काम हो सकते हैं। सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का तीन चौथाई काम परिजनों ने श्रमदान से ही पूरा कर लिया था। अब यह छोटा कार्य भी उस आधार पर क्यों पूरा न हो सकेगा? नवरात्रि में नये प्रवचन हाल का शुभारम्भ जिस उत्साह, जिस श्रद्धा और जिस भावना के आधार पर किया गया है उसे देखते हुए समयाडडडडडड और वह पूरा भी होना ही है। जब यह पूरा हो जाएगा और आने वाले के लिये स्वतन्त्र कोठरियों की व्यवस्था बन जायगी तो निर्धारित शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, एवं तपश्चर्या के विकास होने को अच्छा सुयोग भी मिल सकेगा।

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