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Magazine - Year 1964 - Version 2

Media: TEXT
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हमारा आत्म-विश्वास जागृत हो।

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जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य की एक महत्वाकाँक्षा काम कर सकती है, वह है शक्तिवान बनने की कामना। हर कोई यही चाहता है कि वह समीपवर्ती लोगों से अधिक उन्नति करे, अधिक सफलता प्राप्त करे। इससे दूसरों में प्रभाव पैदा करने, अपनी साख जमाने और सम्मान प्राप्ति की लोग आशा किया करते हैं। शक्तिवान बनने की यह प्रतिद्वन्द्विता स्वाभाविक तौर पर प्रायः सभी में होती है। किन्तु ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े होते हैं जो अपनी इस आकाँक्षा को उचित रीति से पूरी कर पाते हैं। सफलता के लिए अपनाये गये साधन यदि अनुचित हैं, छल और कपट-पूर्ण हैं, समाज को धोखा देने वाले हैं तो उस सफलता का लाभ स्थायी न होगा। जब लोग यह जान पायेंगे कि आपकी सफलता के पीछे कुटिल कर्म और अनुचित प्रयोग सम्मिलित हैं तो लोग आप से घृणा करने लगेंगे। सर्वत्र निरादर होने लगेगा। शक्तिवान बनने का यह मार्ग व्यावहारिक नहीं हैं।

शक्ति वृद्धि के लिए आदमी को आत्म- विश्वासी होना पड़ता है। आत्म विश्वास में वह शक्ति भरी रहती है। जो मनुष्य को सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देती है। ऐसा मनुष्य न तो किसी के उपहास की परवाह करता है और न विघ्न बाधाओं से डरता, घबराता हैं। आत्म विश्वास मानव जीवन का वह बल है जो संसार में बड़ा से बड़ा कार्य, कम साधनों के द्वारा भी सरलतापूर्वक सम्पन्न करा देता है।

इमर्सन ने कहा- “ अपने ऊपर विश्वास करो- आपका हृदय शक्ति से भर जायेगा।” हजारों लाखों वर्षों से लोग बाह्य उपकरणों का भरोसा करते रहे हैं, आज भी करते है। किन्तु जिन्होंने अपनी आत्मिक शक्तियों को पहचाना, उन्होंने कुछ ऐसी विभूतियाँ प्राप्त कीं, कि लोग उन्हें जननायक, विजयी और महान मानने के लिए विवश हुए। ऐसे मनुष्यों ने सदैव अपनी नैसर्गिक सरलता और मौलिक गरिमा का आवाहन किया जिससे उनमें वह तेजी आई-वह स्फूर्ति, वह शक्ति पैदा हुई - कि बड़े-बड़े पहाड़ उनके आगे झुक गये। सफलताओं ने स्वयं आगे बढ़कर उन्हें विजय माला पहनाई। मुगल सम्राट बाबर, विश्व- जीत नैपोलियन, जर्मन के प्रधान मन्त्री विस्मार्क आदि ऐसे ही महापुरुषों में थे जिन्होंने आत्म-विश्वास के बल पर आश्चर्य-जनक सफलताएं प्राप्त कीं।

यह कभी भी मत सोचिए कि आप अकेले हैं, आपकी शक्ति और सामर्थ्य बिल्कुल छोटी है, आपका ज्ञान, शारीरिक क्षमता सब कुछ स्वल्प हैं। इससे आपमें दीनता और हीनता की मारक भावनाएं पैदा होंगी जो आपके भविष्य को अन्धकारमय बना देंगी। सोचिए आपके पास है क्या नहीं? आप साहसी हैं, कर्मशील हैं, पौरुष दिखाने की क्षमता है। आपका शरीर मोटा तगड़ा न सही स्वस्थ तो है, निरोग तो है। महात्मा गाँधी का वजन तो कुल 86 पौण्ड था। फिर आप यह क्यों मान रहे हैं कि आपकी शक्ति सीमित हैं। इन शक्तियों का थोड़ा उपयोग तो कीजिए तब आपको पता चलेगा कि आप कितने बलशाली हैं। आप भी जार्ज हर्बर्ट के इस मंत्र को अपने जीवन में धारण करके तो देखें “बेखटके अकेले रहो। अपना आदर आप करो और देखो कि तुम्हारी आत्मा की क्या दशा है ? .............।” जिसके हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित है वह अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को एक ही केन्द्र बिन्दु पर जुटाकर आश्चर्यजनक लाभ तो प्राप्त कर ही सकता है।

आत्म-विश्वास का अर्थ है अपनी परिस्थितियों और समस्याओं का हल अपने आप में ढूंढ़ना। आप क्यों दूसरे लोगों से सहायता की याचना करते हैं। उनके पास भी तो वही उपकरण हैं तो परमात्मा ने आप को भी दिये हैं, क्यों नहीं अपने हाथ-पाँव चलाते। अपनी बुद्धि का उपयोग करते। बाहरी मनुष्य आपको सहायता देकर ऊँचे उठा नहीं सकता। इसके लिए आपको अपनी ही शक्तियों का सहारा पकड़ना पड़ेगा। प्रत्येक दशा में आत्म-विश्वास जागृत करना पड़ेगा।

इसका अभिप्राय यह नहीं कि आप सहयोग और संगठन की वृत्ति से अलग होने का प्रयत्न करने लगें। या आप औरों से सीख और उचित परामर्श भी लेने का परित्याग कर दें। सामाजिक जीवन में यह किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है। इसे तो मानसिक दुराग्रह या आत्मिक दुर्बलता ही कहा जायेगा। आत्म-विश्वास का अर्थ यह है कि हम अपने स्वत्वाभिमान को दुर्बल न होने दें। आत्महीनता की निराशापूर्ण भावनायें मनुष्य को भाग्यवाद की ओर प्रेरित करती हैं जिससे लोगों में अकर्मण्यता का संचार होने लगता है। आत्म-विश्वास का उपदेश करने का एक ही उद्देश्य है कि मनुष्य दैववाद के भ्रामक सिद्धान्त का प्रतिपादन न करने लगे। परन्तु परमात्मा की दी हुई शक्तियों को सदैव क्रियाशील रखने का नाम ही आत्म-विश्वास है।

आध्यात्मिक आस्थाओं के संसार में पग-पग पर सुरक्षा, निर्माण और सुख की परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं। आत्मा स्वयं पूर्ण है। वह अनन्त शक्तियों का भण्डार है। इसके आश्रय में आने वाला व्यक्ति ही इन शक्तियों का अधिकार प्राप्त करता है। जो इसका सदुपयोग करता है उसी का जीवन व्यवस्थित रहता है। दृढ़-इच्छा-शक्ति, अटूट परिश्रम, अनन्त धैर्य ये किसी भी बाह्य उपकरण से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। अपने जीवन के व्यवहार में इन्हें प्रयुक्त करिये, आपका भविष्य अवश्य उज्ज्वल बनेगा।

आत्म-विश्वास मनुष्य की सम्पूर्ण शक्तियों को एक स्थान पर संगठित करता है। संगठित शक्तियों को जीवन के जिस क्षेत्र में उतार देते है वहीं भारी उथल-पुथल मच जाती है। दूसरे लोग भी हमारा भरोसा करने लग जाते हैं। इसका श्रेय शक्तियों के संगठन को होता है। चित्त की एकाग्रता के प्रबल होने से मस्तिष्क की सम्पूर्ण कार्य-कारिणी शक्तियाँ विकसित होती हैं और उसी क्षेत्र में काम करने लग पड़ती हैं। आत्म-विश्वास ही हमारी गुप्त शक्तियों के जागरण का मूल मन्त्र है।

आत्म-विश्वास और दृढ़ प्रतिज्ञा के बिना मनुष्य परिस्थितियों का दास बना रहता है। हर घड़ी किसी न किसी सुयोग की चिन्ता में डूबा रहता है। कहीं से जमीन में गड़ा धन मिल जाए, कोई ऐसा आशीर्वाद दे जाय कि परीक्षा में उत्तीर्ण हो जायें, शादी-विवाह, रोजी-रोजगार आदि के लिए जो किसी घटना या संयोग की ताक में बैठे रहते हैं, उनकी आत्मिक शक्तियों में ऐसा जंग लग जाता है, जो जीवन भर छुटाए नहीं छूटता। अन्ततोगत्वा बुरे परिणाम, दुःखद परिस्थितियों और असफलता के प्रेत-पिशाच उन्हें आ घेरते हैं। तब पछतावा ही हाथ लगता है। पुरुषार्थ और प्रयत्न के क्षण तो तब तक समाप्त हो जाते हैं।

आत्म-विश्वास का पूरक भाव है दृढ़-इच्छा-शक्ति। यही तो वह रहस्य है जो बिगड़ी बनाता है, ऊँचे उठाता और समस्याओं से पार लगाता है। दृढ़-इच्छा-शक्ति से सम्पन्न किये हुये कार्य सदैव ही सफल हुए हैं, आगे भी होते रहेंगे। किंतु द्विविधापूर्ण निर्णय एक ही क्षण में सफलता का प्रवाह दूसरी ओर बदल देते हैं। जो व्यक्ति भूल करने के भय से अथवा बीच में ही कार्य के छूट जाने की आशंका से कोई निश्चित निर्णय नहीं कर पाते। उनसे सचमुच ही गलतियाँ होने लगती हैं। प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह एक सुदृढ़ आधार का निर्माण करके उसके सहारे जीवन को ऊँचा उठाता हुआ ध्येय पथ पर अनवरत आगे बढ़ता रहे। इसके लिये दृढ़ता, सुनिश्चितता एवं संकल्प शक्ति का आवाहन करना पड़ता है। आत्म-विश्वास इन तीनों गुणों का मिश्रित रूप माना जा सकता है।

मनुष्य सुँदर स्वास्थ्य, जीवन में स्वच्छन्दता व सफलता प्राप्त कर सकता है किन्तु अकर्मण्यता के द्वारा नहीं। इनके लिए अपनी आत्मिक शक्तियों को जगाना पड़ता है। लगन और तत्परतापूर्वक क्रियाशीलता का आश्रय लेना पड़ता है किंतु यह सब तभी सम्भव है जब हमारा आत्म-विश्वास सर्वप्रथम प्रगाढ़ बने। आत्म-विश्वासी लोगों का जीवन ही इस संसार में सच्चा-जीवन है। हमें भी आत्म-विकास के लिए, जीवन की सर्वांगपूर्ण समुन्नति के लिये आत्म-विश्वासी ही होना पड़ेगा। इसी से मानव-जीवन की सच्ची सफलता के दर्शन हो सकेंगे।

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