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Magazine - Year 1964 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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स्वास्थ्य के लिये व्यायाम की आवश्यकता

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मनुष्य का शरीर माँस पेशियों से बनी एक प्रकार की मशीन है। इसका यदि ठीक प्रकार से प्रयोग न करें तो जीवन शक्ति का ह्रास होता है। आलस्य में समय बिताने से माँसपेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, और पेट की नसें सुस्त पड़ जाती हैं। परिणाम यह होता है, कि स्वास्थ्य के मूल पेट में कब्ज, कोष्ठबद्धता आदि विकार उत्पन्न हो जाते है। स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगता है। इस शक्ति की प्राप्ति और शिथिलता को दूर करने के लिए किसी न किसी व्यायाम की आवश्यकता अनिवार्य रूप में होती है।

जीवन रक्षा और शक्ति-सन्तुलन के लिये जिस प्रकार आहार की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार नियमित रूप से व्यायाम करना भी स्वास्थ्य संरक्षण के लिये जरूरी है। मशीन में खरीद चढ़ाने से उसकी जंग छूट जाती है। उसी तरह व्यायाम से शरीर के दूषित मल विकार शिथिल पड़ जाते हैं और पसीने के रूप में बाहर निकल जाते हैं। चरक संहिता में व्यायाम की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुये लिखा है :-

“शरीर चेष्टाया चेष्टा स्थैर्याबल वर्धिनी।

देह व्यायाम संख्याता माभयाताँ समाचरेत्॥

अर्थात्-व्यायाम से शरीर की शक्ति स्थिर रहती है और बल बढ़ता है।”

स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिये व्यायाम का बड़ा महत्व है। व्यायाम की अति प्राचीन परम्परा आज भी हमारे यहाँ-दण्ड बैठक, कसरत कुश्ती डमबल-मुग्दर आदि के अभ्यास संसार में अपना गौरव पूर्ण स्थान रखती है। व्यायाम स्वास्थ्य से जहाँ सजीवता आती है वहाँ रोग-निरोधक शक्ति भी विपुल मात्रा में बढ़ती है। श्री लार्ड डर्वो का यह कथन अक्षरशः सत्य है “ यदि आप व्यायाम के लिये समय नहीं निकाल सकते तो आपको बीमारी के लिये समय निकालना पड़ेगा।” विजातीय तत्वों के कारण शरीर में जो विकार उत्पन्न होता है उसे नष्ट करने के लिये किसी न किसी रूप में व्यायाम करना पड़ता है। व्यायाम से स्वास्थ्य संवर्द्धन की दोहरी प्रक्रिया पूरी होती है। शारीरिक अंगों का विकास होता है और दृढ़ता आती हैं। अनावश्यक तत्व शरीर से निकल जाते है। स्वास्थ्य रक्षा के लिये यह दोनों ही नियम समान रूप से आवश्यक होते हैं।

व्यायाम स्वास्थ्य की नींव को मजबूत बनाता है, उसे चिरस्थाई रखता है। व्यायाम से शरीर स्वस्थ, हल्का, सुन्दर, सुदृढ़ तथा सुडौल बनता है। मानसिक शक्तियों का विकास होता है। निरोगता आती है। व्यायाम से रग-पुट्ठों और नसों में गति उत्पन्न होती है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया प्रखर होने से छाती और फेफड़ों में मजबूती आती है। हृदय की गति तीव्र होती है। और रक्ताभिषरण तेजी से होने लगता है। जिगर और गुर्दे चुस्त हो जाते हैं।

अवस्था के अनुरूप उचित परिमाण में व्यायाम सभी के लिये आवश्यक है। बालक, वृद्ध, किशोर और नवयुवक सभी व्यायाम के अभाव में सुस्त से दिखाई देते हैं। व्यायाम एक प्रकार की स्वाभाविक चेष्टा है। बच्चा जन्म लेने के कुछ दिन बाद ही हाथ, पाँव हिलाने-डुलाने, इधर उधर भागने, पलटने-उलटने, दौड़ने आदि के द्वारा अपना नियमित व्यायाम पूरा करता रहता है। जो बच्चे छोटी अवस्था से निश्चेष्ट दिखाई देते है उनका स्वास्थ्य प्रायः गिरा रहता है। इसी प्रकार वृद्ध जनों को भी चुपचाप बैठा नहीं रहना चाहिये! अवस्था के अनुरूप किसी न किसी रूप में उन्हें भी व्यायाम करते रहना चाहिये! तरुणों के लिये शेष जीवन के लिये शक्ति-संचय का यही समय होता है। वे व्यायाम के माध्यम से चाहें तो वृद्धावस्था तक स्वस्थ व निरोग बने रहने की शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त कर सकते हैं।

व्यायाम से पाचन क्रिया-प्रज्ज्वलित होती है और लिया आहार भली प्रकार पच जाता है। व्यायाम करने के 3 या 4 घंटे बाद भोजन करने से मंदाग्नि और अजीर्ण सम्बन्धी कोई भी शिकायत परेशान नहीं करती। अधिक व्यायाम के साथ अधिक शक्ति और प्रोटीन तथा चिकनाई वाले पदार्थ लिये जायें तो स्वास्थ्य और भी सुदृढ़ होता है। व्यायाम से पुराने और दुर्बल ‘कोष’ टूटकर मल के रूप में बाहर निकल जाते हैं। उसके साथ-साथ कुछ पोषक तत्व भी व्यय हो जाते हैं जिससे शरीर में थकान उत्पन्न होती है। इस थकान का पौष्टिक पदार्थों से दूर करते हैं और मालिश द्वारा भी यह थकावट दूर होती है। मालिश और व्यायाम का स्वास्थ्य-की दृष्टि से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। इससे माँस-पेशियों की थकावट दूर होती है और रक्त-प्रवाह में नाड़ियों को प्रोत्साहन मिलता है। व्यायाम से उत्पन्न थकावट को दूर करने के लिए पर्याप्त विश्राम, निद्रा और मनोविलास की भी आवश्यकता होती है।

शारीरिक स्थिति के प्रतिकूल अधिक व्यायाम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है इसलिए व्यायाम के समय थोड़ी-सी थकान या बोझ-सा मालूम पड़ते ही उसे बन्द कर देना चाहिए। अधिक व्यायाम से भोजन में अरुचि, वमन क्षय रक्तपित्त, ज्वर, श्वाँस, चक्कर आना, थकावट, खाँसी की शिकायतें उठ सकती हैं इसलिए व्यायाम की मात्रा और नियमितता पर ध्यान देना आवश्यक होता है। अधिक व्यायाम, लम्बी दौड़ या हाँफ-हाँफ कर कसरत करने से कब्ज की शिकायत हो जाती है। आँतें दुर्बल हो जाती हैं और मल कड़ा हो जाता है, मल की नली तेजी से सूखने लगती है। इसलिए अधिक शक्ति लगाकर जो व्यायाम किए जाते हैं उनकी उपयोगिता सरल व्यायामों से कुछ कम मानी जाती है। दण्ड-बैठक लगाना, डम्बल-मुग्दर ये भारी व्यायाम हैं। ये सर्वसाधारण के लिये उपयोगी नहीं हो सकते।

बच्चों और विद्यार्थी वर्ग के लिए खेलना सबसे अच्छा व्यायाम है। कुश्ती, कबड्डी, गेंद, फुटबाल, हाकी आदि खेलों से व्यायाम की आवश्यकता पूरी हो जाती है और मानसिक प्रसन्नता भी मिल जाती है इसलिए खेल सबसे अच्छा व्यायाम है।

घर पर किए जाने वाले व्यायामों में हाथ पैरों का चलाना, उछलना, कूदना, चक्की पीसना, धान कूटना आदि व्यायाम शारीरिक और व्यावसायिक दृष्टि से भी लाभदायक होते हैं।

टहलना भी एक प्रकार का उत्तम व्यायाम है। इस में भी शारीरिक और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। पेट सम्बन्धी शिकायतों के लिए टहलना सबसे अच्छा व्यायाम माना जाता हैं। अधिक उम्र के व्यक्तियों के लिए तथा दिन भर कार्यालयों में काम करने वालों को मनोरंजन और स्वास्थ्य दोनों दृष्टियों से साफ स्वच्छ और हरियाले स्थानों में अवश्य टहलना चाहिए।

किसी नदी या तालाब में तैरना भी एक प्रकार का सुन्दर व्यायाम है। तैरने में फेफड़े, छाती और अंग-प्रत्यंग में तनाव आता है और रक्त प्रवाह की गति तीव्र होती है और शरीर में स्फूर्ति आती है।

व्यायाम की सर्वांगपूर्णता की दृष्टि से पेड़ पर चढ़ना भी बड़ा उपयोगी होता है। पेड़ पर चढ़ने से प्रायः शरीर की सभी माँस पेशियों का प्रसारण होता है और सम्पूर्ण अंगों का यौगिक व्यायाम हो जाता है। साथ ही पेड़ से निकलने वाली ऑक्सीजन भी मिलती है। प्राचीन काल में पेड़ पर चढ़ने का विशेष “"गुलहर"“ खेल जाता था। आज भी देहातों में यह परम्परा किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक आरोग्य भी बढ़ता है।

व्यायाम के लिए जो भी साधन आप काम में लें उस का दैनिक जीवन में उपयोग होना चाहिए। बौद्धिक-शिक्षण की तरह व्यायाम की पद्धति भी केवल दूसरों के आश्रित न हो। अपने देश काल परिस्थिति और शारीरिक स्थिति के अनुरूप अब फिर से व्यायाम के नवीनीकरण की आवश्यकता है। साधन कोई भी हो उसके द्वारा बल, चपलता, क्रियाशक्ति और शारीरिक कुशलता प्राप्त करना ही अपना लक्ष्य हो। इस हिसाब से प्रत्येक मनुष्य को एक नियमित दिनचर्या बनानी चाहिए और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढालने का प्रयत्न करना चाहिए।

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