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Magazine - Year 1966 - Version 2

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परिष्कृत संस्कृत के महान् प्रणेता—महर्षि पाणिनि

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मनुष्य क्या और कितना कुछ कर सकता है, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। इसके सम्बन्ध में केवल यही कहा जा सकता है कि वह सब कुछ कर सकने में पूर्ण समर्थ है, यदि वह वास्तव में कुछ करना चाहता है। बात ऐसी भी नहीं है कि कुछ कर सकने की क्षमता कुछेक गिने चुने लोगों में ही है हर व्यक्ति बहुत कुछ कर सकने में समान रूप से समक्ष है।

अब यहाँ पर मनुष्यों के कर्त्तव्यों में असमानता इसलिये हो जाती है कि कुछ, कुछ कर दिखाने की चिन्ता करते हैं और हौसला रखते हैं बाकी अपने जीवन की सारी क्षमतायें छीना-झपटी, खाने-पीने और हा-हा, ही-ही में गवाँ देते हैं। मोटे तौर पर अपनी सामान्य क्रिया-शीलता को उपयोग में लाकर स्थूल रूप से चला-चली वाली जिन्दगी बिता जाते हैं। वे अपने अन्दर सुरक्षित उन विशेष शक्तियों का लाभ नहीं उठाते जिनको काम में लाने पर मनुष्य अनिवार्य रूप से ध्यानाकर्षण कार्य कर सकता है। जो अपने अंदर ठहरी इस विशेष कुमुक को काम में लाते हैं वे संसार के जीवन समर में सफल होकर अपने स्थायी स्मारक अवश्य ही छोड़ जाते हैं।

आचार्य पाणिनि उन्हीं बुद्धिमान व्यक्तियों में से थे जिनका ध्येय जीवन बिताना नहीं उसे पराकाष्ठा तक काम में लाना होता है, और जो अपनी बूँद-बूँद क्षमता का सदुपयोग करने में जरा भी मुरब्बत नहीं करते। इस, आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता के प्रबल शत्रु ने मानव शक्तियों के प्रमाण में जो प्रस्थापना लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व की वह “पाणिन अष्टाध्यायी” के नाम से आज भी अमर है और आगे भी रहेगी।

“पाणिन अष्टाध्यायी” वह व्याकरण शास्त्र है जिसने युगों से अदलती-बदलती आ रही भारतीय भाषा का संस्कार कर उसे एकरु पता के साथ स्थायित्व प्रदान किया। पाणिनि ने अपने इस महान कार्य से न केवल एक सर्वांगपूर्ण भाषा को ही जन्म नहीं दिया अपितु राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति को सदा सर्वदा के लिए अक्षुण्ण बना दिया। युग-युग की विचार-विभूति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिये सुरक्षित रख सकने के लिये एक परम पात्र की रचना कर दी।

साधारण आचार-व्यवहार से लेकर दर्शन तक और लोक कथाओं से लेकर इतिहास तक किसी राष्ट्र की जो भी सम्पदा होती है वह सब भाषा में ही संकलित रहती है और आगामी पीढ़ियाँ उसे माध्यम से प्राप्त कर लाभ उठाती हैं जिससे राष्ट्र की सभ्यता एवं साँस्कृतिक परम्परा चिरंजीवनी बनती है।

आज तक संसार में असंख्यों भाषाओं का उदय-अस्त हुआ। अनेक तो अपने बदले हुए रूप में चलती रही हैं, कुछ के स्थान पर कोई नवीन भाषा आ गई और कोई भाषा अपने में किसी को मिलाकर अथवा स्वयं किसी में मिलकर एक नवीन भाषा बन गई और बहुतों का अस्तित्व ही संसार से मिट गया। केवल एक ही भाषा संस्कृत ही ऐसी है जो हजारों वर्षों से आज तक अपने एक रूप में चली आ रही है। इसी संस्कृत भाषा का सर्वांगपूर्ण व्याकरण रचकर महर्षि पाणिनी ने उसे नियमबद्ध किया।

संस्कृत से पूर्व देश में कोई एक ऐसी सार्वदेशिक भाषा नहीं थी जिसके माध्यम से एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के लोगों से विचार-विनिमय कर सकते, और यह कमी राष्ट्र की एकता के लिये बहुत घातक थी। भारत का बहुमूल्य वांग्मय न जाने कितनी भाषाओं में बिखरा पड़ा था, जिसका अध्ययन कोई भी देश की लगभग सभी भाषाओं को पढ़े बिना नहीं कर सकता था और यह साधारणतः एक कठिनतम बात थी।

महर्षि पाणिनी ने इस देश की विशाल कमी को अनुभव किया और देश के सारे शब्द-भण्डार को एक व्यवस्थित रूप में रखकर, उनकी व्याख्या और अर्थ निश्चित करके एक नियमबद्ध भाषा का निर्माण करने का निश्चय कर लिया। यह काम साधारणतः कठिन ही नहीं बल्कि बहुत ही विराट् तथा असाधारण था। इस एक काम को पूरा करने के लिए कितनी शक्ति, कितने परिश्रम, कितनी लगन और कितने अध्ययन अनुभव एवं अविरतता की आवश्यकता थी, पाणिनी इससे अनभिज्ञ नहीं थे। किन्तु उन्होंने इसकी रंच मात्र भी चिन्ता न की। जहाँ उन्हें कार्य की कठिनता तथा विराटता का ज्ञान था वहाँ मानव की अनन्त क्षमताओं का भी पता था।

अपने नियम पूर्ण निर्माण और संयमशील आत्मा, प्रबुद्ध बुद्धि, अविचल मन और अखण्ड के बल पर पाणिनी को पूर्ण विश्वास था कि वे राष्ट्र की इस बड़ी कमी को अवश्य पूरा कर लेंगे। वे जानते थे कि उन्होंने अब तक के अपने श्रम से जो कर्मठता उपार्जित की है उसकी तेजस्विता के सम्मुख आलस्य, प्रमाद, विलम्ब अथवा दीर्घसूत्रता के पतंगे आ ही नहीं सकते। जब वे शरीर के साथ अपने मन मस्तिष्क को सम्पूर्ण रूप से नियोजित करके काम करना शुरू करेंगे तब उनकी क्रियाशीलता एक अविचल लगन के रूप में बढ़ती जायेगी और फिर ऐसी दशा में काम के अपूर्ण रह जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। निदान उन्होंने संसार के सारे सुख भोगों का विचार त्याग कर अपने जीवन का अणु क्षण उद्देश्य के प्रति समर्पित कर दिया। अपने स्वार्थ, वैयक्तिक सुख और व्यक्तित्व के साथ अस्तित्व को जन उपयोगी कार्य के लिए दान कर दिया।

अपने विद्वान गुरुवर्य से विद्या प्राप्त कर पाणिनी घर आने के बजाय देशाटन पर चल पड़े। उनके देशाटन कार्यक्रम में उनके दो साथी ब्याडि और पर रुचि भी सम्मिलित हो लिए।

अपनी यात्रा क्रम में पाणिनि सबसे पहले हिमालय पहुँचे जहाँ उनकी भेंट ईश्वर देव नाम के एक प्रकाँड विद्वान से हुई। पाणिनी ने उनका ध्यान देश की भाषाई कमी की ओर आकर्षित किया और उसे दूर करने की अपनी योजना बताई—उन्होंने बताया कि सम्पूर्ण देश में जितनी भी बोलियाँ, भाषायें तथा लोक भाषायें तथा भाषायें प्रचलित हैं उन सबका शब्द कोष इकट्ठा करके समानार्थक शब्दों को वर्ग बद्ध कर लिया जाये अनन्तर प्रत्येक शब्द का इस प्रकार परिष्कार किया जाए कि वे एक जातीय जैसे हो जायें। फिर उनके स्वरूप, प्रयोग अर्थ तथा आकार निश्चित कर दिया जाय और इस प्रकार भारत की तमाम भाषाओं की सहायता एक ऐसी राष्ट्र-भाषा का निर्माण कर दिया जाये जो देश की समग्र जनता को समान रूप से ग्राह्य हो श्री ईश्वर देव ने पाणिनि की इस योजना को उपयोगी ही नहीं आवश्यक बतलाते हुए उनकी प्रतिभा, दूरदर्शिता तथा सूझ-बूझ की बहुत प्रशंसा की और स्वयं भी हर प्रकार का सहयोग तथा सहायता देने का वचन दिया।

जिस राष्ट्र में उसका हित सोचने वाले सर्वत्यागी तपस्वी होते रहे उसका अनादि से अनन्त तक जीवित रहना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है! भारत की अज्ञात प्राचीनता का यही एक रहस्य है कि यह भूमि पाणिनि जैसे तपस्वियों से कभी खाली नहीं रही और जब तक इस प्रकार के महापुरुषों की परम्परा बनी रहेगी, भारत अपने गौरव के शिखर पर आसीन रहेगा ही। पाणिनि ने अपने उद्देश्य के अंतर्गत सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। वे अपनी इस यात्रा में केवल नगरों में ही नहीं जनपदों, कस्बों तथा छोटे-से-छोटे गाँव तक में गये, वहाँ रहे और अध्ययन के साथ अर्थ भाव तथा उच्चारण सहित अपार शब्द राशि संकलित की। शब्द राशि के अतिरिक्त पाणिनि ने प्रान्त-प्रान्त, नगर-नगर तथा ग्राम-ग्राम के रीति रिवाज आहार-विहार तथा आचार-विचार का भी अध्ययन किया! लोगों से मिलकर, बात कर और गहरी से गहरी खोज में उतर कर एक-एक शब्द की व्युत्पत्ति तथा उसके इतिहास का पता लगाया।

इतना बड़ा और व्यापक कार्य करने में पाणिनि को कितना श्रम करना पड़ा होगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता। पाणिनि अपनी खोज के लिए जहाँ भी गए होंगे वहाँ की भाषा सीखी होगी, निवासियों से अपनत्व प्राप्त करने के लिए आचार व्यवहार का अभ्यास किया होगा। वृद्धों एवं विद्वानों का सहयोग सहानुभूति पाने के लिए अपनी पात्रता सिद्ध की होगी, क्योंकि इसके बिना वे अपने कार्य में कृत कृत्य न हो सकते थे! निःसन्देह पाणिनि ने इस शब्द संकलन तथा स्थान-स्थान की भाषायें सीखने और उनके रीति-रिवाजों का अध्ययन एवं अभ्यास करने में आयु का बहुत बड़ा भाग लगा दिया होगा।

अपने इस यात्रा काल में वे भाँति-भाँति के अच्छे बुरे क्रूर-करुण, मूर्ख-विद्वान, स्त्री-पुरुषों के संपर्क में आये होंगे और निःसन्देह यह सारी यात्रा पैदल ही पूरी की होगी। किन्तु उनके जीवनवृत्त, कार्य-कुशलता तथा उद्देश्य की महानता से स्पष्ट है कि अपने लक्ष्य पथ के अतिरिक्त किसी अन्य मार्ग पर एक पद भी न चले होंगे। इतनी विराट् यात्रा में उनके सम्मुख हजारों बार भय, मोह अथवा स्वार्थ-प्रलोभनों के अनेक अवसर आये होंगे किन्तु उनकी सफलता इस बात की गवाही देती है कि वे इन मानवीय दुर्बलताओं से एक क्षण को भी प्रभावित न हुये होंगे! भूख प्यास, शीत-धाम तथा वर्षा के कष्टों को उठाते हुये पाणिनि निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर ही बढ़ते रहे होंगे। अन्यथा संसार की फिजूल बातों में अपने को उलझाकर वे इतना बड़ा काम न कर सके होते। जिनको जीवन में कुछ करने की लगन लगी होती है उनको सारी व्यक्तिगत आवश्यकताओं का अभाव हो जाता है। इस प्रकार अपने को निःस्वार्थ, निस्पृह एवं निर्विकार बनाये बिना इतना बड़ा काम सम्पादित कर सकना असम्भव ही होता है।

देश का अपार शब्द भण्डार इकट्ठा करके पाणिनि हिमालय के एक एकान्त स्थान में जा बैठे और अपना काम शुरू कर दिया। अब तक का सारा पुरुषार्थ उनके असली काम की तैयारी मात्र ही था। एक कुशल शिल्पी की भाँति अब पाणिनि ने अपने उपकरण जमा कर लेने के बाद महाग्रन्थ की रचना शुरू कर दी।

सर्वप्रथम उन्होंने उस विशाल शब्द संकलन को क्रम से वर्गों में बाँटा, उनका परिष्कार किया , अर्थ एवं आकार निश्चित किया, प्रयोग के नियम बनाये और इस प्रकार एक व्यापक व्याकरण की रचना करके संस्कृत नाम की भाषा को जन्म दिया, जो उसी समय से भारत की राष्ट्र-भाषा और सार्वदेशिक आचार-विचार का माध्यम मान ली गई।

पाणिनि का व्याकरण शास्त्र आठ अध्यायों में विभक्त है अतएव उसको अष्टाध्यायी कहा जाता है जिसमें वृत्ति तथा तद्वित एवं कृदंत सिद्धान्तों को भाषा के क्षेत्र में एक बड़ी क्राँति माना जाता है। उन्होंने शब्द निर्माण, अर्थ संकोच अथवा विस्तार तथा रुपार्थ के परिवर्तन के उन सिद्धान्तों की प्रतिष्ठा की कि जिनके आधार भाषा विज्ञान का जन्म हुआ।

अपने इस विशाल कार्य को पूरा करने के बाद पाणिनि पाटलिपुत्र में महाराज नन्द के दरबार में पहुँचे। उन दिनों नन्द का दरबार देश भर के बड़े-बड़े विद्वानों से भरा रहता था और वही विद्वानमंडली उन दिनों नये पंडितों द्वारा किये गये कार्यों को जाँच कर मान्यता प्रदान किया करती थी और किसी बहुत बड़ी नई खोज पर पंडित को ‘सन्नयन’ की उपाधि दिया करते थे।

उस विद्वानमंडली ने पाणिनि की अष्टाध्यायी की जाँच की और उनको ‘सन्नयन’ की उपाधि देकर यह भी घोषणा की कि पाणिनि के इस व्याकरण शास्त्र को जो अच्छी तरह समझ लेगा उसे भी एक हजार मुद्रायें पुरस्कार में दी जाया करेंगी।

भाषा शास्त्र में इस प्रकार एक क्राँति उपस्थित करने वाले महर्षि पाणिनि का जन्म गान्धार में सिन्धु तथा काबुल नदियों के संगम से चार मील ऊपर हट कर लहुर नामक ग्राम में हुआ था। किन्तु उनका पालन पोषण उनके ननिहाल के ग्राम शलातुर में हुआ था जहाँ उनके पिता जाकर बस गये थे। इनके पिता का नाम समान पाणिनि तथा बाबा का नाम विष्णु शर्मन पाणिनि था। केवल पाणिनि के नाम से प्रसिद्ध इनका नाम आहिक पाणिनि था। इनके वंशज बाल्हीक के रहने वाले थे, इनका जन्म ईसा पूर्व 480-410 माना जाता है और मृत्यु के विषय में प्रसिद्ध है कि अपनी खोज में तल्लीन पाणिनि को एक व्याघ्र ने भक्षण कर लिया था।

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