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Magazine - Year 1966 - Version 2

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असुर और राक्षस कौन?

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दुर्गुण जब स्वभाव की गहराई तक प्रवेश कर जाता है, तब उसे व्यवहार करने में न तो लाज आती है न आत्म-ग्लानि होती है। दूसरे की दृष्टि और लोक-भलाई की दृष्टि से वह बात अत्यधिक घृणित होती है, पर करने वाला उसे अपनी विशेषता, अपना गुण समझता है, इसलिये उसे चिन्ता भी नहीं होती कि कोई उसे निन्दित करेगा या दण्ड देगा। यदि ऐसे अनेक दुर्गुण का सामूहिक प्रसार हो जाय तो स्थिति बिल्कुल ही विपरीत हो जाती है। दुर्गुण-सद्गुण और सुखद जान पड़ने लगते हैं और सद्गुणों तथा सत्कर्मों का कोई महत्व नहीं रह जाता। बुरा-भला बन जाता है और भला-बुरा। आज की स्थिति ठीक ऐसी है, जिसमें से देवत्व और असुरत्व को अलग-अलग ढूँढ़ लेना कोई साधारण बात नहीं रही।

हर वर्ग, हर जाति, हर क्षेत्र में बुराइयाँ भर गई हैं, पर वे इतनी स्वाभाविक हो गई हैं कि लोग उनको करते हुए भी यह मान रहे हैं कि वे शुद्ध और निष्कलंक हैं। कहीं-कहीं तो देवताओं के गुणों से तुलना करके उसे मानवजाति का विशेषाधिकार ही माना जाने लगा है। छल, कपट, व्यभिचार, निन्दा, चोरी, पर द्रोह, स्वार्थ, माँसाहार, जुआ, नशाखोरी आदि बुराइयाँ आज के जमाने में सभ्य और शिक्षित व्यक्तियों में, असभ्य और अशिक्षितों की अपेक्षा अधिक मात्रा में बढ़ गई हैं, तो भी उन्हें समाज में किसी प्रकार की निन्दा या अपमान का सामना नहीं करना पड़ता और न ही इससे उनके सम्मान में किंचित कमी आती है। यह स्थिति निस्सन्देह अवाँछनीय और खेदजनक है।

प्रति वर्ष रावण, मेघनाथ, कुम्भकर्ण, सुबाहु, कंस आदि के पुतले जलाये जाते हैं और असुर, राक्षस आदि कहकर उनकी निन्दा की जाती है, उन्हें अपमानित किया जाता है। पर यदि बारीकी से देखा जाय और रावण-कुम्भकर्ण के स्वभाव का विश्लेषण किया जाय तो मालूम पड़ेगा कि वे भी आज के मनुष्यों के समान उच्च-कुलों से उत्पन्न हुए थे, पर दुर्गुणी होने के कारण उन्हें निशाचर कहा गया। आज के समाज में यदि दुर्गुणों का अत्यधिक प्रसार हो रहा हो तो लोगों को क्या कहा जा सकता है? यह अब प्रत्येक व्यक्ति को एकान्त में विचार करना चाहिए।

रामचरितमानस में एक बार निशाचरों की आकृति को लेकर सती-पार्वती को भी शंका हुई तो उन्होंने भगवान शंकर से समाधान कराया। शिवजी बोले—

शुभ आचरन कतहुँ नहि होई। देव विप्र गुरु मान न कोई॥

उहिं हरि भगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न वेद पुराना॥

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लम्पट परधन परदारा॥

मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥

जिन्हके यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥

हे पार्वती जी! जो लोग अच्छा आचरण नहीं रखते, देव, ब्राह्मण और गुरुजनों का सम्मान नहीं करते, ईश्वरभक्ति, यज्ञ, तप और ज्ञान से विमुख, स्वाध्याय में जिनकी अभिरुचि नहीं, चोर, जुआरी, लम्पट, व्यभिचारी तथा माता-पिता का अपमान करने वाले, सन्त-पुरुषों को कष्ट देने वाले—सब व्यक्ति जिनके ऐसे आचरण हों, निशाचर कहे जाते हैं।

बाल काण्ड में ही तुलसीदास जी ने इस व्याख्या को और भी विस्तृत करते हुए लिखा है—

सुनहु असन्तन्ह केर सुभाऊ। भूलेहु संगति करिअ न काऊ॥

दुष्ट व्यक्तियों के स्वभाव इस तरह होते हैं, उनकी संगति भूल कर भी नहीं करनी चाहिए—

खलन्ह हृदय अति ताप विसेषी। जरहिं सदा पर सम्पति देखी॥

जहँ कहुँ निन्दा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥

काम क्रोधमद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥

बैर अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥

बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥

परद्रोही परदार रत, परधन पर अपवाद। ते नर पाँवर पापमय, देह धरे मनुजाद॥

दुष्ट व्यक्तियों के हृदय में जलन रहती है, ईर्ष्यालु होते हैं, दूसरे की निन्दा से बड़े प्रसन्न होते हैं। काम, क्रोध, मद एवं लोभ में आकर डूबे हुए, निर्दयी, कपटी, कुटिल, मलिन वृत्ति के लोग सभी से अकारण ही बैर करते हैं। जो हित करता है, ये उसका भी अनहित करने से नहीं चूकते। आहार से लेकर रहन-सहन और प्रत्येक व्यवहार में केवल झूठ को ही आश्रय देने वाले, वाणी से मधुर, पर हृदय से कठोर, द्रोही, व्यभिचारी—यह सब मनुष्य शरीर होते हुए भी नीच निशाचर ही हैं।

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर वासन॥

काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। श्वाँस लेहिं जनु जूड़ी आई॥

जब काहू कै देखहिं विपती। सुखी भये मानहु जग नृपती॥

स्वारथ रत परिवार विरोधी। लम्पट काम लोभ अति क्रोधी॥

मातु पिता गुरु विप्र न मानहिं। आपु गये अरु घालहिं आनहिं॥

करहिं मोह बस द्रोह परावा। सन्त-संग हरि-कथा न भावा॥

अवगुन सिन्धु मन्दगति कामी। वेद विदूषक परधन स्वामी॥

अत्यन्त लोभी, शिश्नोदर परायण, दूसरे की प्रशंसा सुनकर दुःखी होने वाले, दूसरों के कष्ट सुनकर हार्दिक प्रसन्नता अनुभव करने वाले, परिवार विरोधी, कामी, क्रोधी, सत्संग और ईश्वर उपासना से विमुख, अवगुणी, अबुद्धि कामी तथा वेद का उपहास करने वाले व्यक्ति ही निंदनीय हैं। इसके कार्यों की सदैव निंदा की जानी चाहिए।

वर्ग विशेष के कर्तव्यों का बोध कराते हुए अयोध्या काण्ड में मानसकार ने बड़ा सुन्दर प्रसंग प्रस्तुत किया है। युवराज भरत अपने पिता सम्राट दशरथ की मृत्यु पर शोक करते हैं। गुरु वशिष्ठ ने शोकातुर भरत को अपने पास बुलाकर कहा—’भरत! इस संसार में जीवात्मा पुण्यार्जन के लिए विविध रूपों में प्रकट होती है। जो अपने जीवन लक्ष्य को पूरा करते हुए इस संसार से विदा होते हैं, उनके मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए। शोचनीय तो वे लोग होते हैं, जिन्होंने अपने धर्म का, अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया होता। इसी प्रसंग में महर्षि वशिष्ठ समझाते हैं-

शोचिय विप्र जो वेद विहीना। तजि निज धरम विषय लवलीना॥

सोचिय नृपति जो नीति न जाना। जेहिं न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि शिव भगति सृजानू॥

सोचिये पुनि पति वंचक नारी। कुटिल कलह-प्रिय इच्छा चारी॥

देवताओं और असुरों की आकृति में नहीं, प्रकृति में अन्तर होता है। जिनकी प्रकृति में दुष्टता, दुराचार, स्वार्थ-परता, संकीर्णता आदि दुर्गुणों का बाहुल्य है, वे असुर हैं असुरता की जितनी निंदा और भर्त्सना की जाय, उतनी ही कम है। इसी दृष्टि से रामायण आदि ग्रन्थों में असुरों के प्रति घृणा भावों की अभिव्यक्ति हुई है। रामलीला में प्रतिवर्ष रावण, मेघनाद, कंस आदि के रूप में यह असुरता ही सार्वजनिक रूप से जलाई जाती है।

आत्म-निरीक्षण करके हमें अपने भीतर की छिपी असुरता को ढूँढ़ निकालना चाहिए और उसका उसी तरह दमन करना चाहिए, जैसा कि भगवान राम ने किया था। इसी रीति-नीति को अपनाकर हम मनुष्यता को सार्थक कर सकेंगे और देवत्व की ओर बढ़ते हुए परम लक्ष्य तक पहुँच सकेंगे।

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