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Magazine - Year 1966 - Version 2

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अपव्ययी मत बनिये।

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अपव्ययता एक बहुत ही गर्हित दोष है। अपव्ययी वहाँ स्वयं दुःखी और अशान्त रहता वहाँ इस दोष के कारण उधार माँगकर और कर्ज लेकर दूसरों को भी परेशान करता रहता है। अपव्ययी का परिवार तो उसके इस दोष के कारण दुःखी रहता ही है उसके मित्र, परिचित तथा सम्बन्धी भी दुःखी होते हैं। एक तो उससे सहज सहानुभूति के कारण व्यग्र होते हैं, दूसरे वह उन पर पैसा आदि देने के लिये भी दूसरे की स्थिति का विचार किये बिना दबाव डाला करता है, मजबूर किया करता है।

अपव्ययता का दोष मनुष्य की अनेक मानसिक दुर्बलताओं के कारण पैदा होता है। इन कमजोरियों में एक कमजोरी अन्दर का थोथापन भी है। जो आदमी अन्दर से जितना हल्का और दरिद्री होता है वह ऊपर से उतना ही बनाव शृंगार किया करता है। ऐसा करने में उसका उद्देश्य यही रहता है कि लोगों की दृष्टि उसके बाह्याडम्बर पर ही अटकी रहे, उसकी अंदरूनी न्यूनता को न देख पाये! अधिक वाचालता जिस प्रकार अज्ञान की द्योतक होती है, उसी प्रकार ऊपरी बनाव भीतरी कृत्रिमता का विज्ञापन किया करता है। सदाचार, शिक्षा, विद्या, बुद्धि की कमी ही ऊपरी ठाठ-बाट में उभरा करती है। जो विद्यावान होता है, ज्ञानी और विचारक होता है, उसे बाह्याडंबर से घृणा हुआ करती है। कोई कितना ही पढ़ा लिखा क्यों न हो, यदि वह तड़क-भड़क और शान-शौकत के साथ रहता है, बनाव शृंगार में अधिक दिलचस्पी रखता है तो समझ लेना चाहिये कि या तो इसने शिक्षा का अर्थ नहीं समझा है अथवा शिक्षा इसके लिये ज्ञान के रूप में फलीभूत नहीं हुई हैं। शिक्षा की वास्तविकता तो ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के सार में निहित है। सादगी और शालीनता के अभाव में बड़ी-बड़ी उपाधियाँ किसी के लिये उसी प्रकार निस्सार है जैसे वादी से बढ़ा हुआ किसी का मोटा ताजा शरीर। जिस प्रकार जो वास्तव में स्वस्थ एवं शक्तिवान होगा, वह बाहर से अस्वाभाविक रूप से मोटा तुदा नहीं होगा, उसी प्रकार जो अन्दर से ठीक-ठीक सम्पन्न तथा भरा पूरा होगा वह बाहरी बनाव शृंगार से सदा दूर रहेगा।

अपव्ययता का दोष उत्पन्न करने में झूँठी-शान शौकत और अमीरी को दिखाने की भावना का भी बहुत हाथ रहा करता है, अपने को औरों के सामने अधिक से अधिक सम्भ्रान्त एवं सम्पन्न सिद्ध करने के लिये लोग न जाने कितना पैसा बेकार में फूंक डालते हैं। इस प्रकार का मिथ्याचार करने में लोगों का यह भाव रहता है कि उनकी तड़क-भड़क और शान-शौकत देखकर दूसरे लोग उन्हें बड़ा आदमी समझेंगे, उनका रौब मानेंगे। मित्र लोग प्रशंसा करेंगे और उनके प्रति अधिक आकर्षित होने लगेंगे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी आदर होगा।

समाज में प्रतिष्ठा और प्रशंसा पाने का लोभ एक मानसिक न्यूनता है और यह मानसिक न्यूनता तब मूर्खता की श्रेणी में पहुँच जाती है जब इस लोभ को पूरा करने के लिये शान-शौकत तथा दिखावे का सहारा लिया जाता है। सब जानते हैं कि समाज में वास्तविक प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा मनुष्य के सदाचार और सत्कर्मों से मिलती है। संसार में जिन्होंने भी आज तक आदर सम्मान पाया है, वह विद्या बुद्धि तथा चारित्रिक पवित्रता के बल पर ही पाया है। यदि वास्तविक प्रतिष्ठा कपड़ों लत्तों, साजवाज अथवा शान-शौकत के प्रदर्शन भर से मिल जाया करती तो संसार में इससे सस्ती कोई चीज ही न होती। तब लोगों को तप, त्याग, परोपकार, परिश्रम अथवा पुरुषार्थ की आवश्यकता ही न पड़ती। सदाचार, सदाचरण तथा चारु-चरित्र की कोई महिमा ही न रह जाती। लोग बिना समाज-सेवा, परोपकार अथवा परमार्थ के काम किये, जैसे बनता अपने को नाटक के पात्रों की तरह रंग रोगन, वेष-भूषा से सजा-सँवार कर समाज के सम्मुख प्रस्तुत कर देते और ढेरों प्रतिष्ठा एवं मान सम्मान लूट लेते। यदि मान सम्मान और पूजा प्रतिष्ठा वेष-भूषा, शान-शौकत तथा ‘पोज’ प्रदर्शन के ही अधीन होती तो महात्मा गाँधी, महर्षि अष्टावक्र, मनीषी सुकरात, जैसे कुरूपों को संसार का सबसे अधिक अप्रतिष्ठित व्यक्ति और रंग-बिरंगे, छैल-छबीले और फैशनेबुल छोकरों को, रूपवती वेश्याओं को मान सम्मान का सबसे अधिक अधिकारी पात्र होना चाहिये। सच्ची मान प्रतिष्ठा शान-शौकत के नहीं परमार्थ एवं परोपकार के अधीन रहा करती है। इसके लिये मनुष्य को बाहर से नहीं भीतर से सजना संवरना पड़ता है।

किन्तु निःसन्देह खेद का विषय है कि लोग अपनी इस कमजोरी को समझना नहीं चाहते । न जाने कितने इस झूँठी शान-शौकत और मिथ्या पूजा प्रशंसा के लोभ में नित्य ही अपनी आर्थिक-हत्या करते ही रहते हैं। यदि कोई किसी की शान-शौकत अथवा वेष-भूषा को देखकर प्रशंसा अथवा प्रतिष्ठा करता है, तो समझ लेना चाहिये कि या तो यह प्रशंसक स्वयं भी उसी तरह का मानसिक दरिद्री है अथवा किसी स्वार्थ साधन की भूमिका के रूप में वैसा कर रहा है और यदि ऐसा नहीं है तो निश्चय ही वह उसका मजाक उड़ा रहा है, मखौल कर रहा है, मूर्ख बना रहा है। इसलिये लोगों को शान-शौकत अथवा प्रदर्शन के आधार पर वास्तविक प्रशंसा प्रतिष्ठा पाने के धोखे में न रहना चाहिये।

अपव्ययता के दोष में मनुष्य का चटोरपन, दुर्व्यसन तथा नकली जरूरतों का भी बहुत योगदान रहता है। जिसका स्वभाव चटोरा होता है, जिसकी जीभ बिगड़ी हुई होती है, मिठाई, खटाई, चाट, आदि अनेक चीजों के लिये उसकी लार हरदम टपकती रहती है, ऐसे चटोरे व्यक्तियों को घर के सामान्य भोजन से सन्तोष ही नहीं होता है। घर पर ज्यों-ज्यों भोजन का भार उतारने के बाद बाजार में खोंचों वालों के पास अथवा किसी होटल रेस्टोरेन्ट की शरण जाकर अपनी चाटुता की तृप्ति किया करते हैं। यदि वहाँ न गये और परिवार में बाल बच्चों पर मेहरबानी कर दी जो घर पर ही, विविध प्रकार की भाजियां, मुगौड़े, पकौड़ी, पूरी पकवान का तारतम्य लगाकर होटल खुला देते हैं। कभी यह चीज, तो कभी वह चीज, बनवाते और खाते ही रहते हैं। ऐसी चटोरी आदत के कारण वे सामान्य भोजन की अपेक्षा इस प्रकार के स्वाद सिद्ध भोजन में कई-कई गुना खर्च करते हैं जिससे आर्थिक दृष्टि से शीघ्र टूट-फूट जाते हैं और जब अपना होटली कार्यक्रम नहीं चला पाते तो माथे पर हाथ रखकर अपनी गरीबी को रोया करते हैं अथवा समाज की आर्थिक विषमता को कोसा करते हैं।

अनुत्तर दायित्व की दुर्बलता तो अपव्ययता की जननी ही समझनी चाहिये। जो मनुष्य गम्भीर स्वभाव का होगा, जिसमें उत्तर-दायित्व की भावना होगी वह हर काम सोच विचार कर ही करेगा। वह पहनने, ओढ़ने में सादगी एवं शालीनता का ध्यान रखेगा। स्वयं वैसा ही खाने पीने में रुचि रखेगा, जिस तरह का भोजन वस्त्र वह अपने पूरे परिवार को दे सके और सदा देता सके। कभी भी समाज में झूँठी शान-शौकत दिखलाने का प्रयत्न नहीं करेगा—क्योंकि वह जानता होगा कि सच्चे संभ्रान्त लोग ढोल के भीतर पोल के दोष से घृणा किया करते हैं। उत्तरदायी व्यक्ति को अपने बनाव शृंगार, देखा-देखी और शान-शेखी की अपेक्षा अपने बच्चों एवं परिवार की उन्नति तथा वहबूदी का अधिक ध्यान रहता है। उत्तरदायी व्यक्ति अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकने में पैसे की सहायता का महत्व अच्छी तरह समझता है। वह यह भी जानता है कि अपव्ययता के दोष से मनुष्य को जब तब ऋणी होना पड़ता है जिससे समाज में अकारण ही अप्रतिष्ठा उठानी पड़ती है। इस प्रकार कोई भी उत्तरदायी व्यक्ति कभी कोई काम ऐसा न करेगा, जिससे वह अपना कर्तव्य ठीक से न निभा सके अथवा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उसे कोई जिल्लत उठानी पड़े या कोई उसकी भलमनसाहत पर उँगली उठाये या दाँत निकाले। दुर्व्यसन, दुराचार जैसे दोष तो दूर, उत्तरदायी व्यक्ति कृत्रिमता को भी पास नहीं फटकने देता।

इस प्रकार अपव्ययता के कारणों से बचकर जो व्यक्ति उत्तरदायित्व की भावना लेकर चलते हैं उनका हाथ सदा सधा रहता है, न उनको कभी आर्थिक कष्ट होता है और न दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है। वे एक भले मानुष की जिन्दगी जीते हुए हँसी खुशी के साथ दिन बिताते हैं।

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