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Magazine - Year 1966 - Version 2

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रामायण में यज्ञ की महत्ता

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सृष्टि के प्रादुर्भाव काल में जब पहले-पहल मनुष्य इस धरती पर अवतीर्ण हुआ तो यहाँ उसे बड़े अभाव, अशक्ति और कष्ट दिखाई दिये। मनुष्य अपने पितामह ब्रह्माजी के पास गये और अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। ब्रह्माजी कुछ देर तक विचार करते रहे, इसके बाद उन्होंने मनुष्य से कहा—”जाओ यज्ञ करो, आहुतियों से सन्तुष्ट हुए देवता तुम्हारी कामनायें पूर्ण करेंगे, शक्ति प्रदान करेंगे जिससे तुम्हारा जीवन सब प्रकार सुखी होगा।”

इसके बाद ब्रह्माजी ने ‘यजुर्वेद’ का निर्माण किया। जिस प्रकार ऋग्वेद के मन्त्रों में विश्व-दर्शन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म ज्ञान, तथा तात्विक मीमाँसायें भरी हुई हैं उसी प्रकार यजुर्वेद में यज्ञों से कामनाओं की पूर्ति होने का विशद विज्ञान भरा पड़ा है। इस यज्ञ-विद्या का पंडित होने के कारण ही भारतवर्ष किसी समय धन-धान्य से परिपूर्ण, सर्वसुखी एवं सर्व समुन्नत रहा है। यज्ञ की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्रकार ने उसे भारतीय संस्कृति का पिता कहा है और उसके द्वारा मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति होने की बात को प्रमाणित किया है।

यही कारण था कि किसी जमाने में घर-घर अग्नि-होत्र हुआ करता था। यज्ञ किये बिना लोग आहार नहीं ग्रहण करते थे, यज्ञ के बिना कोई मंगल कार्य नहीं पूरा होता था। दुष्ट प्रवृत्ति के लोग भी यज्ञ के तान्त्रिक विधानों से अपने मनोरथ सफल किया करते थे। इससे पता चलता है कि उस जमाने में यज्ञ-विद्या की कितनी गहन शोध हुई थी।

हमारा ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं जिसमें यज्ञ के महत्व पर प्रकाश न डाला गया हो। वेदों के अतिरिक्त भी उपनिषद्, दर्शन, पुराण, स्मृति, ब्राह्मण-ग्रन्थ, गीता आदि सभी ग्रन्थों में यज्ञ को संसार की सुख-शान्ति का प्रमुख उपाय बताया गया है। अनेक स्थलों पर बड़े-बड़े यज्ञों के विधान और वर्णन मिलते हैं। भारतीय-संस्कृति में एक नये अध्याय के प्रणेता महाकवि तुलसीदास जी की दृष्टि से भी वह महत्व छुप नहीं सका। रामायण में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जिनसे यज्ञ की महान महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।

भगवान राम स्वयं यज्ञ किया करते थे। राज-सिंहासन पर बैठने के बाद तो उन्होंने अनेकों बड़े-बड़े यज्ञ कराये। उत्तर-काण्ड में राम-राज्य के धर्म, सुख सम्पदा के प्रसार पर प्रकाश डालते हुये तुलसीदास जी ने लिखा है—

कोटिन्ह बाजि मेघ प्रभु कीन्हें। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हें॥

भगवान राम ने हजारों अश्व-मेध यज्ञ किये और अनेक ब्राह्मणों को दान दिया।

भगवान राम का जन्म भी यज्ञ के फलस्वरूप ही हुआ था। बालकाण्ड का बड़ा रुचिकर प्रसंग है—एक बार दशरथ जी को बड़ा दुःख हुआ कि उनके तीन रानियाँ होते हुये भी कोई सन्तान नहीं हुई। इस दुःख से दुःखी होकर सम्राट दशरथ गुरु वशिष्ठ के पास गये और उनसे अपनी अन्तर्व्यथा कही। महर्षि वशिष्ठ को मालूम था कि यदि शृंगी ऋषि द्वारा काम यज्ञ कराया जाय तो दशरथ को सन्तान हो सकती है। इस निश्चय के अनुसार—

शृंगी ऋषिहिं वशिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥

भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अग्नि चरु कर लीन्हैं॥

वशिष्ठ का आमन्त्रण पाकर श्रृंगी ऋषि अयोध्या आये और उन्होंने पुत्र की कामना से यज्ञ कराया। जब यज्ञ समाप्त हुआ तो अग्नि देव प्रकट हुये और उन्होंने वशिष्ठजी से कहा—

जो वशिष्ठ कछु हृदय विचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥

यह हवि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥

हे वशिष्ठ! आपने जिस इच्छा से हमें आहुतियाँ दीं उनसे मैं प्रसन्न हुआ। तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया। लो! इस हविषान्न को यथा-योग्य अपनी रानियों को बाँट दो।

वशिष्ठ जी ने वह खीर दशरथ जी को समर्पित कर दी। इसके बाद उसे बाँटने और रानियों के गर्भवती होने का वर्णन इस प्रकार किया है—

तबहिं राय प्रिय नारि बोलाई। कौसल्यादि तहाँ चलि आइ॥

एहि विधि गर्भ सहित सब नारी। भइ हृदय हरषित सुख भारी॥

राजा ने सभी रानियों को बुलाकर वह खीर वितरित की जिसे सबने प्रसन्नतापूर्वक खा लिया। इस प्रकार सभी रानियाँ गर्भवती हुई और उन्हें अपार सुख मिला।

यज्ञों से देव-शक्तियों का आवाहन होता है। वह देव-शक्तियाँ बड़े वैज्ञानिक ढंग से लोगों की कामनायें पूर्ण करती हैं—इस बात का बालकाण्ड में अन्यत्र भी संकेत किया गया है—

करिहहिं विप्र होम-मख सेवा। तेहि प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥

हे राजन्! जब ब्राह्मण लोग यज्ञ-मख आदि से देवताओं की सेवा करेंगे तो वे सहज ही में तुम्हारे वश में हो जायेंगे अर्थात् देवतागण तुम्हारी अभीष्ट कामनायें भी पूरी करेंगे।

देवताओं को प्रसन्न करने और देश में सुख-शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए ऋषिगण आश्रमों में यज्ञ किया करते थे पर आसुरी शक्तियाँ तो तब भी थीं। देवों असुरों का संग्राम सदैव से होता आया है। असुर लोग नहीं चाहते थे कि समाज में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ें और सदाचारी व्यक्तियों का बाहुल्य हो इसलिए वे उस जमाने में विघ्न उपस्थित किया करते थे। यज्ञ के महत्व से असुर भी अपरिचित न थे वे जानते थे कि यज्ञों से देव-शक्तियों का विकास होता है इसलिए जहाँ एक ओर ऋषि-मुनि यज्ञों का आयोजन किया करते थे वहाँ आसुरी प्रवृत्ति के लोग उनमें विघ्न डालने के कार्यक्रम बनाया करते थे। रामायण में इसका स्पष्ट दिग्दर्शन कराया है) यथा—

विश्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥

जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहिं डरहीं॥

देखत जग्य निसाचार धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुःख पावहिं॥

विश्वामित्र अपने आश्रम में ऋषि, मुनियों समेत जप तप और यज्ञ किया करते थे पर उन्हें मारीच तथा सुबाहु आदि शक्तिशाली राक्षसों का डर बना रहता था। जहाँ भी लोगों को यज्ञ करते देखते वहाँ पहुँचकर उपद्रव खड़ा कर देते जिससे मुनियों को बड़ा दुःख होता था।

इन असुरों की कोई अलग जाति नहीं थी। आजकल जिस प्रकार अपने ही समाज में से कुछ लोग इस प्रकार के सत्कर्मों का विरोध करने लग जाते हैं और उनका सहयोग देना तो दूर उल्टे अनेक प्रकार के विघ्न बाधाएं खड़ी कर देते हैं मारीच और सुबाहु भी ऐसे ही थे। यह मारीच और सुबाहु आज भी जगह-जगह फैले हैं। ये अच्छे कार्य और दूसरों का सुख कभी नहीं देख सकते अपनी महत्वाकाँक्षा के लिये दूसरों के कार्यों में विघ्न पैदा करना ही उनका जीवन उद्देश्य होता है। इसी में वे अपनी शान समझते हैं।

शक्ति का उच्छेदन शक्ति से होता है, बुराई के विरोध में वैसी ही शक्तिशाली भलाई को खड़ा कर दिया जाय तो बुराई परास्त हो जाती है। इस तथ्य को महर्षि विश्वामित्र ने अनुभव किया, और इसी निश्चय के अनुसार वे महाराज दशरथ के पास गये और उनसे कहा—

असुर समूह सतावहिं मोहीं। मैं जाचन आयऊँ नृप तोहीं॥

अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होव सनाथा॥

परन्तु दशरथ जी इसके लिए राजी न हुये। उन्हें पुत्रों का मोह सताने लगा। उस समय महर्षि वशिष्ठ भी वहाँ उपस्थित थे उन्होंने विचार किया कि यदि शुभ कर्मों में ही सहायता न दी जाय तो शक्ति और वैभव का महत्व ही क्या रहा? भलाई की शक्ति तो इसी से अजेय रह सकती है कि उसे सत्कर्मों में प्रोत्साहन भी मिले। इस विचार के साथ उन्होंने दशरथ को समझाया और यज्ञ की रक्षार्थ पुत्रों को सौंपने के लिए राजी कर लिया। राम और लक्ष्मण इससे बड़े हर्षित हुए, शुभ कर्म में सहयोग करने पर किसे हर्ष नहीं होता? वे तुरन्त विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए चल पड़े।

भगवान राम का जीवन ही यज्ञमय था फिर वे यज्ञ की रक्षा क्यों न करते? विश्वामित्र के आश्रम में पहुँच कर उन्होंने जिस प्रकार कठिन परिस्थितियों में यज्ञ की रक्षा की, रामायण में उसकी सुन्दर झाँकी देखने को मिलती है—

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय यज्ञ करहु तुम जाई॥

होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख की रखवारी॥

सुनि मारीच निसाचर कोही। लै सहाय धावा मुनि द्रोही॥

बिनु फर बान राम तहि मारा। सत योजन गा सागर पारा॥

पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु संघारा॥

इस प्रकार राम और लक्ष्मण ने असुरों को मार कर यज्ञ की रक्षा की।

भगवान राम ने जिन यज्ञों की रक्षा की थी, वे संसार की भलाई के लिए किये जाने वाले यज्ञ थे। निर्जन एकाँत में रहने वाले वैरागी मुनियों को न तो किसी प्रकार के लाभ की इच्छा थी, न उन्हें कोई अन्य महत्वाकाँक्षा थी। लोक-कल्याण की कामना से वे आहुतियाँ दिया करते थे। समस्त पृथ्वी मण्डल पर विचरण करता हुआ यज्ञ धूम लोगों के स्वास्थ्य और आरोग्य की रक्षा करता था। प्रकृति शुद्ध रहती थी, सात्विक वातावरण में लोगों के मन और चित्त-वृत्तियाँ भी सात्विक हुआ करती थीं। भगवान राम ने लोक-कल्याण की कामना से ही राक्षसी वृत्तियों का संहार किया और यज्ञों की रक्षा की।

ताँत्रिक यज्ञों में शत्रु-संहार की भी शक्ति है। रावण अपनी विजय के लिए एक ऐसा ही वाममार्गी यज्ञ कर रहा था। इससे राम-दल में चिन्ता उत्पन्न हुई और उस प्रयोग को असफल करने का प्रबन्ध किया गया।

लंका काण्ड में इसका वर्णन इस प्रकार है—

नाथ करई रावन एक जागा। सिद्ध भए नहिं मरिहिं अभागा॥

पठवहु नाथ बेगि भट बन्दर। करहिं विध्वंस आव दसकन्धर॥

जाइ कपिन्ह सो देखा वैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥

जग्य विध्वंस कुशल कपि, आये रघुपति पास चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ, त्यागि जिवन की आस॥

इस प्रकार के यज्ञ वाम-मार्गी कहलाते हैं, जो असुरों द्वारा ही सम्पन्न होते थे, इसी से कभी-कभी दूसरे धर्म के लोग हमारे यज्ञों पर आक्षेप भी करते हैं, किन्तु शास्त्रों में ऐसे यज्ञों का स्पष्ट निषेध है और ऐसा करने वालों को दण्ड देने की आज्ञा की गई है। भगवान राम ने भी रावण का ऐसा ही वाम-मार्गी यज्ञ नष्ट किया था।

शत्रु-विजय के लिए सात्विक प्रकृति के शक्ति-यज्ञ करने का विधान है, उसमें वनौषधियाँ ही प्रयुक्त होती हैं, पर उनका अपना एक स्वतन्त्र विधान है। चूँकि यह विद्या कठिन और दोषी हो जाने पर हानिकारक भी हो जाती है, इसलिए उसे गोपनीय रखा गया है। यह ऐसा ही है कि यदि बन्दूक चलाने वाले को उसकी प्रतिक्रिया का ज्ञान न हो तो वह दुश्मन को मारने की जगह अपना ही अहित कर सकता है।

रामायण के यह प्रसंग जहाँ यज्ञों की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं, वहाँ वे हमें इस बात के लिए भी प्रेरित करते हैं कि यज्ञ भारतीय संस्कृति का मूलाधार है, उसे हमारे सब महापुरुषों ने स्वीकार किया है तो हमें भी यज्ञ करना चाहिए, जहाँ यज्ञ हो रहे हों, तो वहाँ सहयोग देना चाहिए। यज्ञ से मनुष्य की भावनाएं शुद्ध और आवश्यकताएं पूर्ण होती हैं। यज्ञों से संसार में सुख-शान्ति का वातावरण पैदा होता है।

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