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Magazine - Year 1966 - Version 2

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अमर हुतात्मा-श्री गणेशशंकर विद्यार्थी

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देश की स्वाधीनता में बाधक बने साम्प्रदायिक विष को पीकर बलिदान हो जाने वाले श्री गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म आश्विन शुक्ल 14 सम्वत् 1947 (सन् 1890) को प्रयाग के अतरसुइया मौहल्ले में हुआ। उनका परिवार मध्यवर्गीय परिवारों में भी एक साधारण परिवार था। उनके पिता मुन्शी जयनारायण ग्वालियर रियासत में मुँगावली कस्बे के एक मिडिल स्कूल में सहायक अध्यापक थे।

विद्यार्थी जी के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, किन्तु वे बड़े ही मितव्ययी, सदाचारी और सादे स्वभाव के थे। सन्तोष को उन्होंने जीवन की सुख-शान्ति का मूलमन्त्र बनाया हुआ था। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे अपनी सन्तानों पर इतने पवित्र संस्कार डाल सके कि आगे चलकर उनके आदर्श पुत्र गणेशशंकर केवल कुटुम्ब का ही नहीं, प्रत्युत देश का मस्तक ऊँचा करके गाँधी जी जैसे महान् मनस्वी की प्रशंसा एवं प्रेम के पात्र बन कर दिखला सके।

मुँशी जयनारायण जी अपनी कठिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण अपने होनहार पुत्र गणेशशंकर को कुछ अधिक शिक्षा न दिला सके। वे उसे केवल अंग्रेजी मिडिल तक की शिक्षा दिलाने के बाद यह आशा करने लगे कि गणेशशंकर नौकरी करके परिवार का बोझ बटाये। गणेशशंकर ने पिता की विवशता अनुभव की और कानपुर में अपने बड़े भाई के पास नौकरी करने के लिये चले गये।

चलते समय उनके पिता ने कहा कि “गणेश! यह मैं अच्छी प्रकार जानता हूँ कि पढ़ने-लिखने में तुम्हारी रुचि है और तुम आगे पढ़ने-लिखने में तुम्हारी रुचि है और तुम आगे पढ़ने की इच्छा रखते हो, किन्तु परिवार की स्थिति से तुम अनभिज्ञ नहीं हो। मैं हर प्रकार से विवश होकर ही तुम्हें नौकरी करने की अनुमति दे रहा हूँ। यदि तुममें शिक्षा की सच्ची लगन होगी तो तुम नौकरी करते हुए भी आगे पढ़ सकने के लिये मार्ग निकाल लोगे। मनुष्य यदि अपने ध्येय का धनी है तो वह पर्वत के बीच भी अपना रास्ता बना लेता है।”

पिता के प्रेरणापूर्ण शब्दों ने गशेश शंकर पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला और वे मन ही मन यह संकल्प लेकर कानपुर के लिये विदा हो गये कि हजार बाधाओं के रहते हुए भी मैं जीवन की उन्नति और जन-सेवा का मार्ग निकाल लूँगा।

गणेशशंकर कानपुर में जब अपने बड़े भाई के पास पहुँचे और अपना मन्तव्य बतलाया तो उनके दूरदर्शी भाई ने उन्हें आगे पढ़ने के लिये प्रेरित किया। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनका उद्योगी एवं परिश्रमी भाई अधिक से अधिक शिक्षा पाये और जीवन में विकास करे। निदान उन्होंने अपने सीमित साधनों में से भी खर्च निकाल कर गणेशशंकर को इन्ट्रेन्स के पाठ्यक्रम की पुस्तकें खरीद दीं और कुछ खर्च देकर पिता के पास पुनः इस प्रार्थना के साथ भेज दिया कि वे उन्हें स्कूल में भरती कराकर आगे पढ़ने का अवसर दे दें। पिता की इच्छा में फूल खिल उठे और उन्होंने पुत्र को खुशी-खुशी इन्ट्रेन्स में भरती कराकर भगवान को धन्यवाद दिया।

गणेशशंकर ने खूब मन लगाकर पढ़ा और बहुत ही अच्छे नम्बरों के साथ इन्ट्रेन्स की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की। आगे पढ़ने के लिये उन्होंने इलाहाबाद में कायस्थ कॉलेज में प्रवेश लिया, किन्तु किसी प्रकार भी आगे का खर्च न चल सकने के कारण सात-आठ माह बाद उन्हें कॉलेज छोड़ देना पड़ा।

किन्तु इससे उन्होंने अपने उत्साह को मन्द नहीं होने दिया और कानपुर में करेन्सी कार्यालय में नौकरी कर ली। किन्तु स्वतन्त्र विचार के उद्योगी युवक गणेशशंकर को सरकारी गुलामी पसन्द न आई और उन्होंने करेन्सी की नौकरी छोड़कर कानपुर के पृथ्वी नाथ हाईस्कूल में अध्यापन का कार्य कर लिया। अपने अध्यापन काल में विद्यार्थी जी न केवल छात्रों को पढ़ाते ही थे, बल्कि उनके हृदय में देशभक्ति का संचार करते और पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखा करते थे। इसी समय दिल्ली दरबार के अवसर पर महाराजा बड़ौदा ने अपने स्वाभिमान की रक्षा में कोई ऐसा आचरण व्यक्त कर दिया, जो दरबार की प्रथा के अनुरूप न था। देश के सरकारी पिट्ठू अखबारों ने महाराजा बड़ौदा की बड़ी आलोचना की। गणेशशंकर से यह अन्याय सहन न हुआ और उन्होंने भारतीय स्वाभिमान की रक्षा करने वाले महाराजा बड़ौदा के आचरण को उचित ठहराते हुए बड़े ही तेजस्वी शब्दों में ‘कर्मयोगी’ आदि पत्रों में लेख लिखे।

गणेशजी का यह स्वतन्त्र साहस उनकी जिन्दगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। जनता ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्होंने जनता की आवश्यकता समझी। स्कूल के अधिकारियों ने गणेशशंकर के तेजपूर्ण विचारों को अहितकर बतलाया और उन्होंने स्कूल की नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया।

उसी समय ‘सरस्वती’ के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को एक योग्य सहायक की आवश्यकता थी। वे गणेशजी के विचारों की तेजस्विता और लेखनी की विशेषता से परिचित हो चुके थे। उन्होंने उनको अनुरोधपूर्वक ‘सरस्वती’ में बुला लिया और तीस रुपये मासिक पारिश्रमिक का प्रस्ताव करते हुए कहा—विद्यार्थी जी! सरस्वती के पास साहित्य-सेवा के अवसर के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं है। गणेशशंकर ने विनम्रतापूर्वक निवेदन करते हुए केवल पच्चीस रुपये ही इसलिए स्वीकार किये कि उनका अपना कोई विशेष खर्च नहीं है। पच्चीस रुपया पारिश्रमिक ही उनके लिये पर्याप्त होगा। उन्होंने अपना जीवन पैसे के लिये नहीं, किसी भी माध्यम से देश-सेवा के लिये समर्पित कर देने का निश्चय कर लिया है और ‘सरस्वती’ ने उन्हें इसका अवसर देकर कृतार्थ कर दिया है।

प्रस्तावित वेतन से पाँच रुपये कम लेकर श्रीगणेशशंकर ने सरस्वती में इतनी ऊँची लगन और गहरे परिश्रम से सेवा की कि आचार्य द्विवेदी ने एक स्थान पर व्यक्त किया—”विद्यार्थी जी जब तक मेरे साथ रहे, उन्होंने बड़ी मुस्तैदी और परिश्रम से सारा काम किया। वे रोज दो मील पैदल चलकर प्रातःकाल जुही जाते थे और सन्ध्या के बाद वापिस आते थे। उनकी शालीनता, सृजनता और परिश्रमशीलता ने मुझे मुग्ध कर लिया। विद्यार्थी जी में ज्ञानार्जन की इतनी लगन थी कि वे बहुधा रास्ते में चलते हुए भी कोई न कोई अखबार अथवा पुस्तक का अध्ययन किया करते थे।

सरस्वती की निष्काम सेवा ने उन्हें भारत के पत्रकार जगत में विख्यात कर दिया। जिसके फलस्वरूप उन्हें इलाहाबाद के ‘अभ्युदय’ साप्ताहिक ने द्विवेदी जी से माँग लिया। द्विवेदी जी ने उन्हें राजनीतिक विचारधारा विकसित करने का परामर्श देकर आशीर्वाद पूर्वक अभ्युदय का सम्पादन भार सँभाल लेने के लिए अनुमति दे दी।

देश की चिर वाँछित स्वाधीनता के लिए सेवा करने के इच्छुक गणेशजी को अब उपयुक्त क्षेत्र मिल गया था और उन्होंने निर्द्वन्द्व होकर कलम उठाई और अपने तेजस्वी विचारों से राजनीतिक वातावरण में एक हलचल भर दी। किन्तु कुछ समय बाद बीमार हो जाने के कारण उन्हें ‘अभ्युदय’ से हटना पड़ा।

स्वस्थ हो जाने के बाद वे फिर मैदान में आये। किन्तु अभ्युदय के माध्यम से नहीं, बल्कि ‘प्रताप’ नामक एक नये साप्ताहिक की योजना लेकर। अपनी बीमारी के समय उन्होंने ‘अभ्युदय’ के सम्पादक का पद जिन मित्र को समर्पित कर दिया था, उनसे वापिस लेना उचित न समझा। साथ ही देश में अच्छी पत्र-पत्रिकाओं की कमी की पूर्ति में योगदान करने के इरादे से उन्हें अपने नये पत्र का प्रकाशन करने की योजना उचित ही लगी।

‘प्रताप’ की योजना का प्रस्ताव करते समय उन्होंने अपने सहयोगी मित्र पं. शिवनारायण मिश्र के निराशापूर्ण प्रश्न का जो उत्तर दिया, वह वास्तव में कुछ करने की आकाँक्षा रखने वालों के लिए एक प्रेरणाप्रद शिक्षा से कम नहीं है। उन्होंने कहा—”रुपये-पैसे व प्रेस आदि अन्य साधनों की कमी को हम लोग अपने अनवरत परिश्रम एवं लगनशीलता से पूरी कर लेंगे। हम निःस्वार्थ भाव से जनता की सेवा का व्रत लेकर कार्य करेंगे और जनता हमारा सहयोग करेगी। मिश्र जी आप निराश न हों, आत्म-विश्वास के साथ पुरुषार्थ का सहारा लेकर मैदान में आइए तो हम लोग लेखन से लेकर चपरासी तक का सब काम जब स्वयं करेंगे तो कोई कारण नहीं कि हमारी जनोपयोगी योजना सफल न हो।”

श्रीगणेशशंकर विद्यार्थी ने ऐसा ही किया और साधनों की नीति किसान, मजदूर तथा देशी राज्यों की पीड़ित एवं घोषित जनता का हित-समर्थन बनाई। उन्होंने रायबरेली के किसानों, कानपुर के मिल-मजदूरों का समर्थन करते हुए चम्पारन में निहले गोरों के अत्याचार की कड़ी आलोचना शुरू करके जन-स्वाधीनता का संघर्ष छेड़ दिया। इस राष्ट्रीय सेवा के पुरस्कार स्वरूप उन्हें पाँच बार जेल-यात्रा करनी और यातना सहनी पड़ी।

श्री गणेशशंकर की इन जीवन्त सेवाओं ने उन्हें गाँधीजी के निकटस्थ कर उनका कृपा-पात्र बना दिया और तब तो उन्होंने होम रूल आन्दोलन, कानपुर के सूती मिल-मजदूरों की हड़ताल, रायबरेली कृषक-संघर्ष स्वदेशी बहिष्कार आन्दोलन और नमक सत्याग्रहों में सक्रिय भाग लेकर वह महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाया, जिसके लिये वे प्राँतीय राजनीतिक सम्मेलन के अध्यक्ष बनाये गये और जनता द्वारा 1925 में कानपुर के एक धन-कुबेर के मुकाबले चुनाव में जिताकर प्रान्तीय कौंसिल में भेजे गये। किन्तु उन्हें धारा सभा का निष्क्रिय जीवन पसन्द न आया। वे तो मैदान में सिपाही बनकर देश की स्वाधीनता के लिये सक्रिय सेवा करना चाहते थे। निदान उन्होंने 1929 में धारा सभा का त्याग कर दिया।

उसी समय जब वे कराची के अखिल भारतीय कांग्रेस सभा में भाग लेने के लिये जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी कानपुर में अंग्रेज सरकार ने हिन्दू-मुस्लिम दंगा करा दिया। श्री गणेशशंकर जी कराची जाना स्थगित करके उक्त साम्प्रदायिक विष पीने में लग गये। वे हिन्दू मुहल्लों से मुसलमानों और मुसलमानी मुहल्लों से हिंदुओं को निकालने और उन्हें समझाने में जुट गये इसी सेवा अवसर पर एक उत्तेजित मुस्लिम भीड़ को समझाते हुए वे एक धर्मान्ध मुसलमान की कुल्हाड़ी के शिकार हो गये।

बलिदान के दिन 29 मार्च सन् 1931 को श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के यह अन्तिम वाक्य युग-युग तक इतिहास में अंकित रहकर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा एवं शिक्षा देते रहेंगे।

“भाई! आप मुझे घसीटते क्यों हैं? मैं मृत्यु के भय से भागने वाला नहीं। एक दिन मरना ही है, तो फिर ऐसी महत्वपूर्ण मृत्यु से डरना ही क्या? यदि मेरे रक्त से आपकी प्यास बुझ सकती है, तो मैं सहर्ष बलिदान होने को तैयार हूँ। आप अपनी इच्छा पूरी करें, मैं अपने कर्तव्य पालन के लिये प्रस्तुत हूँ।”

इतना कहकर उन्होंने अपना सिर झुका दिया और आततायी की कुल्हाड़ी उनकी गर्दन के पार हो गई श्री गणेशशंकर का यह आदर्श बलिदान सदा सर्वदा के लिए अमर हो गया।

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