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Magazine - Year 1966 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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पशु-पक्षियों को इतना न सताया जाय।

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First 17 19 Last
आज संसार में पशुओं का उत्पीड़न जिस बुरी तरह से किया जा रहा है उसे देखकर किसी भी भावनाशील व्यक्ति का हृदय दया से भरकर कराह उठता है। पशुओं पर होने वाला अत्याचार मनुष्यता पर एक कलंक है। समस्त प्राणी-जगत में सर्वश्रेष्ठ एवं जेष्ठ कहे जाने वाले मनुष्य को पशुओं के साथ क्रूरता का व्यवहार करना कहाँ तक शोभा देता है?

साधारण-सी बात है कि संसार में रहने वाले सारे प्राणियों को उस एक ही परमपिता परमात्मा ने पैदा किया है। जब मनुष्यों सहित सारे जीव एक ही पिता के पैदा किये हुए हैं तब इस नाते वे सब आपस में भाई-बहन ही हैं। बुद्धि, विवेक तथा अधिकारों की दृष्टि से मनुष्य उन सबमें बड़ा है और अन्य समस्त प्राणी उसके छोटे भाई-बहन ही हैं। बड़े तथा बुद्धिमान होने से मनुष्य का धर्म हो जाता है कि वह अपने छोटे जीव-बन्धुओं पर दया करे, उन्हें कष्ट से बचाए, पाले और रक्षा करे। किन्तु खेद है कि बड़े भाई का कर्तव्य निभाने के बजाय मनुष्य उनसे क्रूर व्यवहार करता है।

यदि भाई-बहन की भावना तक न भी पहुँचा जाये तो भी मानवता के नाते उनके साथ निर्दयता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। हम मनुष्यों की तरह ही पशुओं को भी अपने प्राण प्यारे होते हैं, वे भी पीड़ा तथा सुख दुःख की इसी प्रकार अनुभूति करते हैं। मनुष्यों की तरह उनकी भी इच्छा रहती है कि उन्हें भी कोई मारे-सताये नहीं। पर मनुष्य इस साधारण सभ्यता, जो मनुष्यता का पहला लक्षण है, का भी निर्वाह नहीं करते और पशुओं पर अकथनीय अत्याचार किया करते हैं। जब तक जो मनुष्य अपनी ही तरह पशु-पक्षियों की पीड़ा अनुभव करना नहीं सीखता सच्चे मानों में उसे मनुष्य नहीं कहा जा सकता। उसे तो निर्दयी एवं न्याय हीन न जाने क्या कहा जायेगा। ठीक-ठीक मनुष्य तो उसे कहा जायेगा जो अपने छोटे भाई-बहनों की तरह ही अन्य पशु-पक्षियों एवं प्राणियों के साथ दया, करुणा तथा प्रेम का व्यवहार करे।

समता, दया एवं करुणा के आधार पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महान् सिद्धान्त हिन्दू धर्म की आधारशिला है। अपनी इसी उदारता के कारण ही यह धर्म संसार में सभी धर्मों का सिरमौर बना है। यदि हिन्दू धर्म से दया तथा करुणा का तत्व निकाल दिया जाये तो वह एक महान् धर्म न रहकर न जाने कौन-सा रूप धारण कर ले। धर्म की महत्ता उसके अनुयायियों का आचरण देखकर ही निर्धारित की जा सकती है। एक हिन्दू धर्म ही नहीं, संसार के सारे धर्मों में जीव-जन्तुओं पर दया करने का निर्देश किया गया है। ईसाई, यहूदी तथा मुसलमान आदि अनेक जातियाँ भौगोलिक एवं अन्नाभाव की परिस्थितियों की विवशता से माँस-मछली आदि खाते और पशुओं का वध करते हैं तथापि उनके धर्मग्रन्थों में जीव पर दया करने का ही निर्देश किया गया है कि ‘परमात्मा का आदेश है कि तुम सब जीवों पर दया करो।’ तीर्थ-यात्रा एक धर्म-कृत्य माना गया है। मुसलमानों को उनके पैगम्बर का आदेश है कि ‘मक्का की यात्रा पर जब जाओ और वहाँ से वापस आओ तब रोज़ा रक्खो, किसी जीव की हत्या न करो और न माँस ही खाओ।’

मुसलमानों के मूल पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब किसी पशु-पक्षी का माँस नहीं खाते थे। इसी प्रकार मुसलमानों के धार्मिक नेता हजरत अली ने कहा है, ‘तू अपने पेट को पशु-पक्षियों की कब्र मत बना।’ ईसामसीह का मुख्य उपदेश दया और अहिंसा ही है। उन्होंने एक स्थान पर कहा है, “तुझे संसार की सारी जड़-चेतन प्रकृति का ज्ञान क्यों न हो पर तेरे हृदय में यदि दया नहीं है तो तेरा वह ज्ञान परमात्मा के सम्मुख किसी काम न आवेगा।” यहूदी धर्म में कहा गया है कि ‘बकरों तथा बछड़ों के रक्त से नहीं , अपने ही परिश्रम, पुरुषार्थ एवं परमार्थ द्वारा ही स्वर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।’

इस प्रकार के निर्देश तो उन धर्मों में हैं जो अभारतीय हैं और जहाँ अन्न तथा फल-फूलों का अभाव रहता है। भारत तो धन-धान्य पूर्ण देश है। यहाँ वनस्पतियों एवं अन्नों की प्रचुरता रही है, तब भला यहाँ के धर्म में जीवों पर निर्दयता का समर्थन किस प्रकार किया जा सकता था। ‘दया धर्म का मूल है’ और हिन्दू धर्म इसी मूल पर स्थित है।

आत्मा अमर, व्यापक तथा समानरूपा है। वह एक समान ही सभी प्राणियों में विद्यमान है। आत्म-तत्व की दृष्टि से संसार के सारे प्राणी समान ही हैं। सबमें ईश्वर का अंश वर्तमान है। चींटी से लेकर हाथी तक में एक उसी आत्म-तत्व का प्रकाश हो रहा है। इस प्रकार एकात्मा का सम्बन्ध होने पर पशुओं का उत्पीड़न किया जाये तो इससे बढ़कर और कौन-सा अधर्म हो सकता है? किसी प्राणी को अकारण कष्ट देने वाले की आत्मा निर्बल हो जाती है। क्रूरता करने से मनुष्य के अंतरमन पर जो अशुभ संस्कार पड़ते हैं वे आजीवन साथ तो रहते ही हैं, अन्तकाल में भी स्मरण आते हैं जिससे मनुष्य की जीवात्मा अधोगति की ओर ही जाती है। पशु-पक्षियों के साथ निर्दय व्यवहार करने वाला मनुष्य कितना ही साहसी, लापरवाह और उपेक्षाशील क्यों न हो, उसका तर्क-कुतर्क उसकी आत्मा को उस पाप से बचा नहीं सकता और अन्त में उसे इस लोक में दण्ड न भी मिले तो परलोक अथवा पुनर्जन्म में उसका भोग करना ही होगा।

स्वार्थ, सुविधा, लाभ अथवा मनोरंजन किसी की प्रेरणा से भी क्यों न किया जाये, पशु-पक्षियों के साथ किया हुआ उसका अत्याचार उसकी आत्मा का पतन अवश्य कर देगा। जीवों के साथ क्रूरता का व्यवहार करने वाले व्यक्ति का हृदय भावनाशून्य होकर कठोर हो जाता है। ऐसा हृदयहीन व्यक्ति न तो आत्मिक उन्नति कर सकता है और न समाज में अपने आचरण को शालीन रख सकता है।

आज के उन्नति एवं विकास के युग में भी जो विनाश की सम्भावनाएँ संसार के सिर पर मँडराती दिखाई देती हैं, उसका मूलभूत कारण मनुष्य की हृदयहीनता ही है, जिसको उसने पशु-पक्षियों पर अत्याचार करने के फलस्वरूप पाया है। जब तक मनुष्य अपने में जीव दया, समस्त प्राणियों के प्रति सहानुभूति की वृत्तियों का विकास नहीं करेगा, बहुत कुछ भौतिक उन्नति कर लेने पर भी वह वास्तविक सुख-शाँति की प्राप्ति नहीं कर सकता। उसका आत्मिक, आध्यात्मिक,धार्मिक तथा सामाजिक जीवन यों ही हिंसा की आग में जल-जलकर नष्ट होता रहेगा। धर्म का मूल दया है और सच्ची सुख-शाँति का निवास प्रेम, सहानुभूति, सहृदयता में है, क्रूरता अत्याचार अथवा निर्दयता में नहीं।

जो व्यक्ति अन्य पशु-पक्षियों के प्रति सहानुभूति एवं दया का भाव नहीं रख सकता वह संसार में किसी के प्रति सद्भाव रखने में असमर्थ ही रहेगा। जहाँ सुमति एवं सद्भावनाएँ हैं, सुख-सम्पत्ति का निवास एवं विकास वहीं सम्भव है। जहाँ अन्याय, अत्याचार, निर्दयता एवं स्वार्थपरता है वहाँ विनाश का ही बोलबाला रहेगा यह एक सत्य एवं शाश्वत सिद्धान्त है।

मनुष्य पशु-पक्षियों पर कितना और किस-किस प्रकार अत्याचार करता है, किस बुरी तरह से उनका उत्पीड़न कर रहा है इसको आये दिन सामान्य जीवन में देखा जा सकता है। तिस पर यह और भी दुःख एवं खेद की बात है कि मनुष्य का यह अत्याचार उन्हीं पशु-पक्षियों पर चल रहा है जो उसके लिये उपयोगी, उसके मित्र, सेवक तथा सुख-दुःख के साथी तथा बच्चों की तरह ही भोले, निरीह और आज्ञाकारी हैं।

गाय, बैल, भैंस, भैंसा, घोड़ा, गधा, बकरी आदि मनुष्य के युग-युग के साथी और बहुत ही उपयोगी साधन हैं। किन्तु मनुष्य उन पर कितना अत्याचार करता है, यह किसी से छिपा नहीं है। गाय पालते हैं, उससे दूध प्राप्त करते हैं पर साथ ही उसे घटिया तरह का चारा देते और बूढ़ी अथवा दूध न देने की स्थिति में हो जाने पर या तो मारकर घर से निकाल देते हैं अथवा कसाई के हाथ कटने को बेच देते हैं। इतना ही नहीं, उसके जरा भी गलती करने पर अथवा कोई अप्रिय अभिव्यक्ति करने पर उस पर यह सोचे बिना डण्डे बरसाने लगते हैं कि आखिर यह है तो एक पशु ही, गलती कर सकती है। ग्वाले, चरवाहे अथवा वरधिये जब गायों का झुण्ड लेकर चलते हैं तब वे यों ही स्वभावतः किसी-न-किसी गाय अथवा बछड़े पर मार लगाते ही चलते हैं। उनको आसानी से हाँक कर अथवा घेरकर ठीक रास्ते पर रक्खा जा सकता है। किन्तु फिर भी जरा भी इधर-उधर होने पर गाय-बछड़ों पर लट्ठ तोड़ देते हैं। अपने खेत पर आ जाने पर तो लोग दूसरों के जानवरों को इस बुरी तरह मारते हैं कि बेचारे कभी-कभी तो चीखकर गिर तक पड़ते हैं।

बैल-भैंसों पर तो मनुष्य का अत्याचार देखकर यही भान होता है कि यह बेचारे पशु अपने पूर्व-पापों का दण्ड पा रहे हैं और इनका वाहक मनुष्य न होकर मनुष्य रूप में यमराज है जो कि इन्हें असहनीय यन्त्रणा दे रहा है। जेठ की दोपहरी में गाड़ी-ठेले पर तीस-तीस मन बोझ ढोने अथवा हल में चलने वाले अधिकाँश बैल-भैंसों के कन्धे घायल रहते हैं, वे जुआ अथवा हल की रगड़ से कट जाते हैं किन्तु उनका क्रूर स्वामी उसकी कोई परवाह न कर उन्हीं घायल कन्धों पर जुआ रख देते हैं, जिससे उस पीड़ित पशु के कन्धों में स्थायी घाव हो जाता है जो फिर आजीवन अच्छा नहीं होता। मक्खियाँ, कौवे तथा अन्य चिड़ियाँ उसके उस निर्जीव एवं घायल कन्धों को नोच-नोच कर खाती रहती हैं किन्तु क्रूर मनुष्य उसकी कोई चिन्ता नहीं करते।

इक्के-ताँगों में जुतने वाले घोड़ों की दशा देखकर रोना आता है। एक तो उनका मालिक उन्हें भरपेट खाना नहीं देता, जिससे वे यों ही बड़े रोगी तथा निर्बल रहते हैं। तिस पर मजदूरी के लोभ से आठ-आठ, दस-दस सवारियाँ भरते हैं और जब बेचारा जानवर ठीक से नहीं चल पाता तो उसे चाबुक अथवा डण्डों से बुरी तरह मारते हैं। न जाने कितने भूखे, प्यासे, कमजोर और बोझ से दबे घोड़े नित्यप्रति सड़कों पर गिरकर या तो मर जाते हैं या अंग-भंग हो जाते हैं। जो घोड़े इस प्रकार की मनुष्य-सम्भावित दुर्घटना के शिकार होकर मर जाते हैं वे एक प्रकार से भाग्यवान् ही होते हैं। किन्तु जो लंगड़े-लूले अथवा घायल होकर बच जाते हैं, उनकी यातना सौ गुनी बढ़ जाती है। निर्दयी इक्के-ताँगे वाले उन्हीं घायल घोड़ों को फिर जोड़ देते हैं और डण्डे के जोर से चलने को विवश करते हैं।

बेचारी घोड़यों की दशा तो और भी बुरी होती है। उन्हें वे सब अत्याचार तो सहन ही करने पड़ते हैं, जो घोड़ों को सहने होते हैं, इसके अतिरिक्त सद्यजातिका अथवा आसन्न प्रसवा होने पर भी उन्हें इक्के-ताँगों में भरी बेहिसाब सवारियों को ढोना पड़ता है। एक तो प्रसव अथवा गर्भ की पीड़ा से यों ही पीड़ित, तिस पर सवारियों का बोझ और उस पर डण्डों की मार। भला उस बेचारी की क्या दशा होती होगी, उसे तो वही जान सकती है अथवा सहृदय मनुष्य अपनी संवेदना के अनुपात से कुछ अनुभव कर सकता है। अनेक बार तो सवारियों को खींचते-खींचते गर्भवती घोड़ियों का प्रसव सड़कों पर ही हो जाता है अथवा यन्त्रणा से उनका गर्भपात हो जाता है। इसी प्रकार की यन्त्रणा बकरी, भैंस, भेड़ आदि हर उपयोगी पशु को सहन करनी पड़ती है।

पक्षियों का उत्पीड़न भी पशुओं से कम नहीं होता है। उन्हें पिंजड़े में बन्दी बनाकर रखना, बाँधकर अड्डों पर पालना, नशा पिलाकर लड़ाना और यहाँ तक लड़ाना कि जब तक वे मर न जायें, पक्षियों का उत्पीड़न ही तो है। मुर्गा, तीतर, बटेर तथा बुलबुल की लड़ाइयों को तो एक मनोरंजन बना लिया गया है।

इस प्रकार जिधर भी दृष्टि जाती है पशु-पक्षियों तथा कीट-पतंगों का उत्पीड़न दृष्टिगोचर होता है। जानवर-जानवर का या कीट-कीट का ऐसा उत्पीड़न नहीं करते जितना कि प्राणियों का उत्पीड़न संसार का सिरमौर कहा जाने वाला मनुष्य किया करता है। पशुओं का उत्पीड़न करना पाशविक ही नहीं, पैशाचिक वृत्ति है जिसका सुधार मनुष्य को करना ही चाहिए।

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