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Magazine - Year 1966 - Version 2

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विचारों की उत्तमता ही उन्नति का मूलमन्त्र है।

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यदि आप उन्नति नहीं कर पा रहे हैं, आपका उद्योग असफल होता जा रहा है तो अवश्य ही आप निराशापूर्ण प्रतिकूल विचारों के बीमार हैं। आप काम करते हैं किन्तु अविश्वास के साथ, सफलता के लिये उद्योग करते हैं तो असफलता की शंका के साथ, भविष्य की ओर देखते हैं तो निराश दृष्टिकोण से। अन्यथा कोई कारण नहीं कि मनुष्य प्रयत्न करें और सफल न हो। जीवन भर प्रयत्न करते रहिये, पुरुषार्थ एवं उद्योग में जिन्दगी लगा दीजिए किन्तु तब तक कदापि सफल न होंगे, जब तक अपने अनिष्ट चिन्तन के रोग से अपने को मुक्त करके उसके स्थान पर विश्वासपूर्ण विचारों की स्थापना नहीं करेंगे।

सर्वशक्तिमान का अंश होने से मनुष्य में उसकी वे सारी विशेषतायें उसी तरह रहती हैं जिस प्रकार बिन्दु में सिन्धु की विशेषताएं। मनुष्य की शक्ति अतुलनीय है। अपनी इस शक्ति का ठीक-ठीक सदुपयोग करके वह सब कुछ कर सकता है, जीवन में एक उल्लेखनीय सफलता पा सकना तो उसके लिये साधारण सी बात है। किन्तु खेद है कि अधिकतर लोग अपनी शक्ति का उपयुक्त उपयोग नहीं करते अथवा उसे क्षुद्र एवं तुच्छ बातों में नष्ट कर डालते हैं।

मनुष्य की यह शक्ति उसके विचारों में ही निहित रहती है। जिसके विचार सत्य-शिव सुन्दर रहते हैं, उसकी गति संसार का कोई भी अवरोध नहीं रोक सकता। वह अपने निर्धारित लक्ष्य तक अवश्य पहुँचेगा, यह ध्रुव सत्य है। इसके विपरीत विश्वास करने वालों को समझ लेना चाहिये कि वे विचार विपर्यय के रोगी हैं और इस बात की आवश्यकता है कि उनका मानसिक उपचार हो।

संसार की यह अद्भुत उन्नति सुविधा एवं साधनों का यह भंडार तथा सभ्यता, संस्कृति, साहित्य तथा कलाकौशल का विपुल विकास मानवीय शक्ति के ही तो परिचायक हैं। बड़े-बड़े कल कारखाने विलक्षण वाहन और वैज्ञानिक खोजें व आविष्कार मनुष्य शक्ति की महानता की ही तो घोषणा करते हैं। इन सब प्रमाणों को पाकर भी जो मनुष्य, मनुष्य की शक्तियों में विश्वास करने और यह मानने को तैयार नहीं कि पृथ्वी का यह प्राणी सब कुछ कर सकने में समर्थ है तो उसे बुद्धिमानों की कोटि में नहीं रखा जा सकता। इस प्रकार का अखण्ड विश्वास लेकर चलने वाले ही आज तक जीवन में सफलता पा सके हैं और इसी प्रकार के विचारवान व्यक्ति ही आगे सफलता प्राप्त भी कर सकेंगे। जिसे अपने में, मनुष्य की शक्तियों में विश्वास ही नहीं, उसकी शक्तियाँ उस जैसे अविश्वास व्यक्ति का साथ भी क्यों देने लगीं और तब ऐसी दशा में सफलता के लिये जिज्ञासु होना अनुचित एवं असंगत है।

विचारों की विकृति ही दुर्भाग्य एवं विचारों की सुकृति ही सौभाग्य है। विचारों के बाहर दुर्भाग्य अथवा सौभाग्य का कोई स्थान नहीं है। मनुष्य का भाग्य लिखने वाली विचारों के अतिरिक्त अन्य कोई शक्ति भी नहीं है। मनुष्य अपने विचारों के माध्यम से स्वयं अपना भाग्य लिखा करता है। जिस प्रकार के विचार होंगे, भाग्य की भाषा भी उसी प्रकार की होगी। जिसके विचार उन्नत, उज्ज्वल एवं उत्पादक होंगे, उसके भाग्य में सफलता, सम्पन्नता एवं श्रेय लिख जायेंगे, इसके विपरीत जिसके विचार क्षुद्र, तुच्छ, थोथे, मलीन अथवा निम्न कोटि के होंगे, उसकी भाग्य लिपि तीन अक्षरों के ‘नरक’ शब्द में ही पूरी हो जायेगी। सौभाग्य एवं श्रेय प्राप्त है तो विचारों को अनुरूप बनाना ही होगा। इसके अतिरिक्त जीवन में उन्नति करने का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

भाग्य यदि कोई निश्चित विधान होता और उसका रचने वाला भी कोई दूसरा होता, तो कंगाली एवं गरीबी की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में जन्म लेने वाला कोई भी मनुष्य आज तक उन्नति एवं विकास के पथ पर चलकर सौभाग्यवान न बना होता। उसे तो निश्चित भाग्य दोष से यथास्थिति में ही मर खपकर चला जाना चाहिये था। किन्तु सत्य इसके विपरीत देखने में आता है। बहुतायत ऐसे ही लोगों की है जो गरीबी से बढ़कर ऊँची स्थिति में पहुँचे हैं, कठिनाइयों को पार कर ही श्रेयवान बने हैं। महापुरुषों के उदाहरणों से इस बात में कोई शंका नहीं रह जाती कि भाग्य न तो कोई निश्चित विधान है और न उसका रचयिता ही कोई दूसरा है। विचारों की परिणति ही का दूसरा नाम भाग्य है जिसका कि विधायक मनुष्य स्वयं ही है। सद्विचारों का सृजन कीजिए, उन्नत विचारों का उत्पादन करिये, आप अवश्य भाग्यवान बनकर श्रेय प्राप्त करेंगे।

विचारों का प्रभाव मनुष्य के आचार पर अवश्य पड़ता है। बल्कि यों कहना चाहिये कि आचार विचारों का ही क्रियात्मक रूप है। क्रिया सम्पन्न करने वाले मनुष्य की कोई अपनी गति नहीं, इन्द्रियाँ विचारों की ही अनुगामिनी रहती हैं। जिस दिशा में मनुष्य के विचार चलते हैं, शरीर भी उसी दिशा में गतिशील हो उठता है। इसका कारण विचार वैचित्र्य ही है कि एक जैसा शरीर पाने वाले मनुष्यों में से कोई परमार्थ और कोई अनर्थ की ओर अग्रसर होता है। एक ही प्रकार की शक्ति तथा बुद्धि व विवेक-तत्व पाने वालों में से किसी का विज्ञान की ओर और किसी का व्यापार की ओर उन्मुख होना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मनुष्य अपनी विचारधारा के अनुसार ही जीवन का पथ प्रशस्त करता है। एक ही माता-पिता के दो पुत्रों में से एक का सदाचार और दूसरे का दुराचारी बन जाने का कारण उनकी अपनी-अपनी विचार-धारा ही होती है। इस सत्य में किसी प्रकार के सन्देह की गुंजाइश नहीं है कि आचार मनुष्य के विचारों का ही क्रियात्मक रूप है।

सफलता एवं श्रेय के महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने पास प्रतिकूल विचारों को एक क्षण भी नहीं ठहरने देते। बड़ी आपत्ति आ जाने और संकट का सामना हो जाने से वे न तो कभी यह सोचते हैं कि उनका भाग्य खोटा है, आया हुआ संकट उन्हें नष्ट कर देगा, उनमें इतनी शक्ति नहीं कि वे इस आपत्ति से लोहा ले सकें। निषेधात्मक ढंग से सोचने के बजाय वे इस प्रकार निषेधात्मक ढंग से ही सोचा करते हैं कि आने वाला संकट उनकी शक्ति की तुलना में तुच्छ है, जो वे उसका सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं, उनमें इतनी बुद्धि, इतना विवेक अवश्य है कि वे अपनी समस्या को अवश्य सुलझा सकते हैं। श्रेय पथ पर उनकी गति को कोई भी नहीं रोक सकता है। वे संसार में श्रेय एवं सफलता प्राप्त करने के लिये ही भेजे गये हैं, परिस्थितियों से परास्त होने, उन्हें आत्म समर्पण करने के लिये नहीं। अपने इन विधायक विचारों के बल पर ही, कठिनाइयों एवं संकटों को पारकर संसार के प्रसिद्ध पुरुषों ने श्रेय एवं सफलता प्राप्त की है।

निषेधात्मक विचार रखने से मनुष्य की सारी शक्तियाँ नकारात्मक होकर कुँठित हो जाती हैं, उसका आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार सृजनात्मक विचारों में संजीवनी का समावेश रहता है ठीक इसके विपरीत ध्वंसक विचारों में विष का प्रभाव रहता है जो मनुष्य की सारी क्षमताओं को जलाकर रख देता है। अपने भाग्य का आप निर्माता होते हुये भी मनुष्य अपनी वैचारिक त्रुटियों के कारण दुर्भाग्य का शिकार बन जाता है? अपने क्षुद्र विचारों के अनुसार ही वह अपने को तुच्छ एवं हेय बना लिया करता है। उसके विचार उसके व्यक्तित्व को घेरे हुये जन-जन को इस बात की सूचना देते रहते हैं कि यह व्यक्ति निराशावादी एवं मलीन मन्तव्यों का है। ऐसे कुविचारी व्यक्ति के पास वह ओज तेज नहीं रहने पाता जो दूसरों को प्रभावित करने में सहायक हुआ करता है? क्षुद्र विचारों का व्यक्ति समाज में क्षुद्र स्थिति ही पा सकता है।

हम अपने को जिस प्रकार का बनाना चाहते हैं अपने अन्दर उसी प्रकार के विचारों का सृजन करना होगा। उसके अनुरूप विचारों का ही मनन एवं चिन्तन हमको मनोवाँछित साँचे में ढाल सकता है। विचारों का प्रभाव आचरण पर पड़ता है और आचरण ही मनुष्य की मनोरूप सफलताओं का संवाहक होता है। यदि हम समाज में प्रतिष्ठा तथा संसार में प्रसिद्धि के इच्छुक हैं तो सबसे पहले अपने विचारों, भावनाओं तथा चिन्तन को स्वार्थ की संकुचित सीमा से बढ़ाकर विशालता तक विस्तारित करना होगा। यदि हम क्षुद्रताओं के जाल में ही पड़े रहे संकीर्णता के गढ्ढे से अपने विचारों का उद्धार न किया तो निश्चय जानिये हमारी महानता की इच्छा एक स्वप्न ही बनी रहेगी। क्षुद्र विचारों से प्रेरित होकर कोई क्षुद्र आचरण ही कर सकता है, तब ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का स्वप्न किस प्रकार पूरा हो सकता है।

निषेधात्मक अथवा निराशापूर्ण विचार वाले लोग प्रतिष्ठा एवं प्रसिद्धि पा सकना तो दूर अपने सामान्य जीवन में भी सुखी एवं सन्तुष्ट नहीं रह सकते। उनके हीन विचार उन्हें तो उन्नति नहीं ही करने देंगे, साथ ही दूसरों की उन्नति एवं विकास देख उनके मन में ईर्ष्या, द्वेष एवं अनिष्ट की भावना पैदा होगी, जिससे दूसरे का अनिष्ट चिन्तन करते-करते, वे स्वयं ही अनिष्ट के आखेट बन जाया करते हैं। जीवन में यदि उन्नति करना है, सफलता पाना है तो अपने विचारों को उन्नत एवं सृजनात्मक बनाना ही होगा, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है और यही ईश्वर के अंश मनुष्य के लिए उचित एवं योग्य है।

अनेक लोग कोई अन्य कारण न होने पर भी अपने अप्रसन्न विचारों के कारण ही दुखी तथा व्यग्र रहा करते हैं। सामने कोई प्रतिकूलता न होने पर भी भविष्य के काल्पनिक संकटों का ही चिन्तन किया करते हैं अपनी विकृत विचारा धारा के कारण वे प्रसन्नतापूर्वक कारणों में भी अप्रसन्नता के कारण खोज निकालते हैं। प्रतिकूल विचारों से अपने मन का माधुर्य मस्तिष्क की शक्ति नष्ट करते रहना उचित नहीं। मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है। इसे कुत्सित विचारों की आग में जलाने के स्थान पर उच्च विचारों, सद्भावनाओं तथा उनके अनुरूप सदाचरण द्वारा उच्च से उच्चतर स्थिति में पहुँचाना ही उचित है और यही मनुष्य का लक्ष्य है भी और होना भी चाहिये।

निराशापूर्ण अनिष्ट विचारों में फँस जाना कोई असम्भव बात नहीं है। कोई भी किसी परिस्थिति अथवा घटना के आघात से विचारों की इस दुरभिसंधि में फँस सकता है। किन्तु इनसे छुटकारा पा सकना भी कोई असम्भव बात नहीं है। यदि मनुष्य वास्तव में अपने अनिष्ट विचारों से मुक्ति चाहता है तो उसे दो उपायों को लेकर आगे बढ़ना चाहिये। एक तो यह कि वह ऊँचे तथा सृजनात्मक विचारों वाले व्यक्तियों तथा पुस्तकों के संपर्क में रहे, दूसरे उसे नियमित रूप से एकान्त में बैठकर अवकाश के समय अपने मन मस्तिष्क का सद् संकेत देना चाहिये। सद्विचारों के संपर्क में रहने से सद्-विचारों को प्रोत्साहन मिलेगा और मन मस्तिष्क को सद्संकेत देते रहने से उनका कुविचार व्यसन छूटने लगेगा।

एकान्त में बैठिये और अपने मन मस्तिष्क को समझाइये कि—”तुम ईश्वरीय शक्ति के केन्द्र हो, तुम ही वह शक्ति हो जो संसार में चमत्कारपूर्ण कार्य कर दिखाया करती है। अपने शिव संकल्पों का अवतरण करके अपने ईश्वरीय अंश को पहचानें। तुम महान हो, यह क्षुद्रता शोभा नहीं देती, इसे छोड़कर पुनः महान बनो और शरीर को महान कार्य करने की प्रेरणा देकर महत्व को प्राप्त करो।” इस प्रकार मन मस्तिष्क को उपदेश करता हुआ, मनुष्य अपने प्रति हीन भावना का भी परित्याग कर दे। वह अपने स्वरूप को पहचाने, अपनी शक्तियों में विश्वास करे और आत्म श्रद्धा के संवर्धन से व्यक्तित्व को विकसित करने का प्रयत्न करे। इस प्रकार कुछ ही दिनों में उसका विचार शोधन हो जायेगा, आचरण सुधर जायेगा और वह अपने मनोवाँछित लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेगा।

विचार ही आचार के प्रेरक हैं और आचार से ही मनुष्य कोई स्थिति प्राप्त करता है, इस मूलमन्त्र को ठीक से समझकर हृदयंगम करने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते यह निश्चय है।

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