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Magazine - Year 1966 - Version 2

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हमारी भावी कार्य-पद्धति और उसका स्पष्टीकरण

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अध्यात्म महाशक्ति का मानव-शरीर में ठीक तरह अवतरण हो, इसके लिए उसकी कुछ पात्रता चाहिए। स्वर्ग से गंगा जब पृथ्वी पर उतरी थी, तब उसने भागीरथ से यही पूछा था कि जब मैं नीचे उतरुँगी तब उस वेग को धारण कौन करेगा? ऐसा वेग धारण न किया जा सका, तो धरती में छेद हो जायगा और धारा पाताल को चली जायगी। भागीरथ ने वस्तुस्थिति को समझा और वे गंगा धारण करने वाले सत्पात्र की तलाश में निकले। यह कार्य भगवान शंकर ने पूरा किया। गंगा उनकी जटाओं में उतरी। यदि धारण करने वाला सत्पात्र न मिला होता, तो संभवतः गंगावतरण ही न हो पाता।

समर्थ गुरु रामदास के पास बड़ी आध्यात्मिक शक्ति थी। वे उसे किसी को देना चाहते थे, पर सत्पात्र न मिलने पर दें किसे? उन्होंने बालक शिवाजी की परीक्षा ली। आँखों में दर्द का बहाना किया और उसके उपचार में सिंहनी के दूध की आवश्यकता बताई। यदि शिवाजी स्वार्थी शिष्यों की तरह इस झंझट में पड़ने से कतरा गया होता, तो उसे न तो समर्थ गुरु का अनुग्रह मिला होता और न भवानी की दी हुई अपराजिता तलवार उपलब्ध होती।

गुरु गोविन्दसिंह हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुए थे। उन्हें अपने कुछ साथी-सहचरों की आवश्यकता थी। खोटे सिक्कों की तरह ओछे व्यक्तित्व के लोग किसी महत्वपूर्ण कार्य में नहीं आ सकते। उन्हें सत्पात्र साथियों की जरूरत थी। शिष्यों की भरी सभा में उन्होंने ऐसे सच्चे लोगों का आह्वान किया, जो अपनी बलि देने को तैयार हों। चतुर भाग खड़े हुए, केवल पाँच व्यक्ति शेष रह गये। उनने बलिदान की इच्छा प्रकट की। यह लोग छोटी जातियों के थे। गुरुदेव ने उनकी परीक्षा ली और अपने महान मिशन का कार्य उन्हीं पाँचों के ऊपर छोड़ दिया। वे ही ‘पंच प्यारे’ सिख-धर्म के प्रमुख संचालक कहलाये। इतना ही नहीं गुरु गोविन्दसिंह के प्राण-प्यारे पुत्र भी अपने को जीवित दीवार में चिनवा कर धर्म-निष्ठा की परीक्षा में पंच प्यारों से भी एक कदम आगे बढ़कर और भी खरे उतरे।

अरुणि, धौम्य, शुकदेव, नचिकेता आदि की गुरुओं द्वारा कठोर परीक्षा लिये जाने की कथाएँ प्रसिद्ध हैं। प्राचीन काल में जिन्हें भी तत्वदर्शी लोग ब्रह्म-विद्या का अनुदान देते थे, उनकी यह परीक्षा अवश्य कर लेते थे कि यह इस विभूति के धारण करने का पात्र भी है या नहीं? कुपात्रों को कुछ बड़ी चीज नहीं दी जा सकती— क्योंकि वह बेचारा न तो उसे धारण कर सकेगा और न उसकी रखवाली ही उससे बन पड़ेगी। ताँत्रिक उपासना का प्रथम सोपान यही है कि साधक के साहस और धैर्य की परीक्षा कर ली जाय। डरपोक प्रकृति के व्यक्ति तन्त्र-शक्ति को धारण नहीं कर सकते। इसलिए उस साधना-क्रम में प्रवेश करने वाले को आरम्भ में ही भय और प्रलोभन-भरी कितनी ही विभीषिकाओं का सामना करना पड़ता है। जो उनमें असफल हुआ उसे तन्त्र-शक्ति के अवतरण से वंचित रहना पड़ा।

हरिश्चन्द्र को अविनाशी यश पाने से पूर्व कड़ी परीक्षा की आग से गुजरना पड़ा। प्रहलाद की भक्ति झूठी है या सच्ची—यह उसने एक-से-एक भयावह संकटों को शिरोधार्य करके सिद्ध किया। निपुत्री दलीप गुरु वशिष्ठ से सन्तान का वरदान माँगने गये तो उनकी श्रद्धा गौ चराने और उसकी रक्षा का अड़चन-भरा कार्य सोंपकर, परखी गई। सिंह से गुरु की गौ बचाने के लिए जब वह अपना प्राण देने तक को तैयार हो गया, तभी यह जाना गया कि दलीप श्रद्धावान है। श्रद्धावान को ही आध्यात्मिक अनुदान मिलते रहे हैं।

यदि अध्यात्म-मार्ग की वास्तविक प्रगति के लिए थोड़ा-सा पूजा-पाठ ही पर्याप्त होता तो शिवि, दधीचि, हरिश्चन्द्र, मोरध्वज, ध्रुव, प्रहलाद, भर्तृहरि, बुद्ध, महावीर, सुदामा, शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, मीरा, सूर,तुलसी, अरविन्द, वन्दा वैरागी, गान्धी जैसे सभी धर्म-प्रेमियों को कष्टसाध्य जीवन अपनाने और त्याग-बलिदान के पथ पर अग्रसर होने की क्यों आवश्यकता पड़ती?

ईसा मसीह अपने शिष्यों से कहा करते थे कि जो सच्चा ईश्वर-भक्त है, वह अपना क्रूसा (मौत) अपने कन्धे पर रखकर मेरे पीछे-पीछे आये। संसार के प्रायः सभी ईश्वर-भक्तों, धम-परायणों, महा-मानवों और सत्पुरुषों को अपनी मनोभूमि को वास्तविकता की अग्निपरीक्षा देनी पड़ी है। जो ईंट भट्टो में पकने से पहले इनकार कर दे वह पानी की बूँद पड़ते ही गल जाने वाली निकम्मी चीज बनी रहेगी। मजबूती प्राप्त करने के लिए तो आग को अपनाना ही होगा। कच्चा लोहा भट्टियों में ही तो फौलाद बनता है। ऊबड़-खाबड़, ओछे और घिनौने, स्वार्थी और तृष्णा-वासना ग्रसित मनुष्य को आत्म-कल्याण के पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग सदा ही अपनाना पड़ा है। इसका और कोई विकल्प न तो था और न ही आगे हो सकता है।

‘अखण्ड-ज्योति’ अखबार की तरह न तो निकाली गई थी और न वैसी है। लोगों को कोरे मनोरंजन की सामग्री बेचने का व्यवसाय हमारे लिये असम्भव है। संस्कारवान जागृत आत्माओं को इस आकर्षण से एकत्र करने और उन्हें आत्म-कल्याण के मार्ग पर लगाने के उद्देश्य से यह आयोजन आरम्भ किया गया था और इसी प्रयोजन के लिये वह जीवित भी है। प्रारम्भिक कदम के रूप में पाठकों के सामने दो कार्यक्रम रखे गये थे (1)युग के अनुरूप अध्यात्म का व्यावहारिक स्वरूप जानने के लिए प्रस्तुत विचार-धारा को पढ़ना-सुनना, चिन्तन और हृदयंगम करना (2) गायत्री-उपासना जैसी आस्तिकता की प्रथम शर्त को पूरी करना। प्रसन्नता की बात है कि पाठक इन प्राथमिक कक्षा के दो पाठों को ठीक तरह पढ़ते चले आ रहे हैं।

पर स्मरण रखना चाहिए कि यह आदि था, अन्त नहीं। ऐसे-ऐसे अभी कई कदम आगे बढ़ाने हैं। अब प्रशिक्षण का दूसरा अध्याय आरम्भ हो गया। इसमें दो नये पाठ पढ़ाये जा रहे हैं—(1) एक घंटा समय, (2)दस पैसे रोज नित्य परमार्थ-प्रयोजन के लिए खर्च करना। इस कसौटी पर कसे जाने से परिवार छोटा हो जाना स्वाभाविक है। आज से 14 वर्ष पूर्व जब हमने गायत्री-प्रचार आरम्भ किया था, तो पाँच मिनट नित्य समय देकर एक माला गायत्री-जप करने वाले 24 लाख व्यक्ति हमारे गायत्री-परिवार में शामिल हो गये थे। जब सहस्र-कुण्डी यज्ञ हुआ था, तो लगभग इतने ही हमारे साथी थे। पीछे जब यह शर्त रखी गई कि पाँच मिनट का जप ही पर्याप्त नहीं, हमारे विचारों को—युग के अनुरूप प्राचीन अध्यात्म परम्परा के व्यावहारिक स्वरूप को भी समझना चाहिए, अखण्ड-ज्योति भी पढ़नी चाहिए, तो लोगों को अखरा। रोज इस स्वाध्याय का झंझट क्यों उठायें? साल में 4) खर्च क्यों करें? यह कसौटी सामने आते ही उस भीड़ में से अधिकाँश लोग हट गये। केवल 40 हजार सदस्य ही अखण्ड-ज्योति परिवार के रूप में रह गये।

अब तीसरी छाँट का समय आ पहुँचा। व्यक्ति, परिवार और परिवार-निमार्ण के लिए एक घण्टा समय और दस पैसे रोज देने की शर्त सामने आई तो अधिकाँश लोग अचकचा रहे हैं। उन्हें यह सब बहुत झंझट एवं असुविधा का काम लग रहा है। व्यस्त-जीवन में से एक घंटा भला कैसे निकलेगा! दस पैसे खर्च कर देने से तो उनकी आर्थिक स्थिति ही डाँवाडोल हो जायगी! इस प्रकार की सुविधाएँ असमर्थताएँ व्यक्त की जा रही हैं। हम जानते हैं कि बहुत-से लोगों के लिये यह दोनों कार्य इतने भारी पड़ेंगे कि वे अपना साथ छोड़ देंगे। युग-निमार्ण-परिवार की तीसरी रचना में 40 हजार से घटकर 4 हजार भी हमारे साथी रह जायँ तो बहुत बड़ी बात समझनी चाहिये। यह बात आश्चर्य की मानी जायगी कि जहाँ सभी संस्थाएं, सभी नेता अपने सदस्यों और साथियों की संख्या अधिकाधिक बढ़ाने के लिये जी जोड़ प्रयत्न कर रहे हैं, तब हम अपने परिवार को घटाते क्यों चले जा रहे हैं? 24 लाख सदस्यों का गायत्री-परिवार घटकर 40 हजार के अखण्ड ज्योति परिवार में सीमित हुआ और अब युग-निर्माण परिवार में केवल 4 हजार का लक्ष्य रखा गया, यह कैसी उलटी बात हो रही है? कितने ही पत्र इस सम्बन्ध में आते रहते हैं।

थोड़ा विचार करने पर इसका स्पष्टीकरण सहज ही हो जाता है। प्राइमरी कक्षा में हजार बालक पढ़ते हैं पर कॉलेज में इनमें से थोड़े ही पहुँचते हैं। इससे शिक्षा-संचालकों को मूर्ख नहीं बताया जा सकता। शिशु-सदनों की बाल-कक्षाओं में बालकों को जलपान भी दिया जाता है ताकि बच्चे उस प्रलोभन से भी उधर आना सीखें। कालेजों में काफी कड़ाई कर दी जाती है और लम्बी फीस ली जाती है। क्योंकि इस शिक्षा का महत्व और मूल्य अधिक है। प्राइमरी उत्तीर्ण छात्र और एम.ए. की सनद प्राप्त करने वाले छात्र की तुलना नहीं हो सकती है।

अपने प्रिय परिजनों को आत्मिक प्रगति के पथ पर क्रमशः अग्रसर करना हमारा लक्ष्य रहा है। प्रगति की मंजिलें जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगी, ऊँची उठेंगी वैसे-वैसे ही शर्तें कड़ी होती चली जाएंगी। इसमें हमारा दोष नहीं है, यह अनादि परम्परा है। यदि एक-दो माला जपने, हनुमान चालीसा पढ़ने, दस-पाँच आहुतियाँ दे लेने और थोड़ी-सी पूजा-पाठ का कर्मकाण्ड निपटा लेने से आत्मिक-प्रगति का लक्ष्य प्राप्त हो सकना संभव रहा होता तो हम अपने प्रियजनों को कदापि अधिकाधिक कष्टसाध्य वजन उठाने के लिए अनुरोध न करते। सस्ते में अधिक मूल्य की चीज मिल सकी होती तो हमसे अधिक और कोई प्रसन्न न हुआ होता। छुटपुट कर्मकाण्डों से ही आत्मा की प्राप्ति हो जाया करे तो कष्टसाध्य तपस्वी-जीवन में प्रवेश करने की आवश्यकता ही क्या रह जाय? हमें पूरे विश्वास के साथ यह मान लेना चाहिये कि कीमती चीजें उचित मूल्य चुकाने पर ही मिलती है। स्वास्थ्य, शिक्षा, यश, धन आदि साँसारिक विभूतियाँ उपार्जित करने में लोगों को कितना घोर प्रयत्न कितना साहस करना पड़ता है, फिर मानव-जीवन की सर्वोपरि सार्थकता-सबसे बढ़ा-चढ़ा लाभ-प्राप्त करने के लिए तनिक भी कठिनाई का सामना न करना पड़े, ऐसा किसी भी प्रकार संभव नहीं। जो सस्ते कर्मकाण्डों के सहारे स्वर्ग, मुक्ति, एवं आत्मिक प्रगति की आशा लगाये बैठे रहते हैं, उन्हें वज्र मूर्खों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं समझना चाहिये।

उन सट्टेबाजों, लाटरी खोरों और शेखचिल्लियों से हमें कुछ नहीं कहना जो अत्यन्त स्वल्प मूल्य में बड़ी-से-बड़ी ऋद्धि-सिद्धियाँ पाने और ईश्वरीय अनुकम्पा हड़पने के सपने देखा करते हैं। जिनके मन में यह वहम जम गया है कि “थोड़ा सा उपासनात्मक कर्मकाँड उन्हें जीवन-लक्ष्य प्रदान कर सकता है तो जीवन-निर्माण के लिये कष्ट-साध्य एवं त्याग-बलिदान भरी प्रक्रियाएं अपनाने की क्या आवश्यकता?” ऐसे लोगों को हम कृषक, श्रमिक, विद्वान्, धनी एवं अन्य सफल मनोरथ व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इतना ही कह सकते हैं कि वे उनके दैनिक-जीवन की कठिन श्रम-व्यवस्था को ध्यानपूर्वक देखें और समझें कि इस संसार में हर चीज का उचित मूल्य चुकाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं । ईश्वर-भक्त, धर्मनिष्ठ एवं श्रेय-साधक बनने के लिए व्यावहारिक जीवन में तनिक भी कष्टसाध्य हेर-फेर न करना पड़े, थोड़ी सी पूजा-पत्री उस प्रयोजन में सिद्ध कर दे, ऐसा कभी भी.... कभी भी.... कभी भी.... नहीं हो सकता। ईश्वर की विधि-व्यवस्था में हर कार्य वैज्ञानिक नियमों के आधार पर चल रहा है। आत्म-कल्याण के पथ का पथिक तृष्णा और वासना के कीचड़ में ही फँसता रहे, जीवन-शोध और परमार्थ की कष्टसाध्य प्रक्रिया से अछूता बना रहे, यह न तो भूतकाल में कभी हुआ है, न आगे हो सकता है। हम भ्रम में पड़े हैं, पड़े रहें, पर सृष्टि का नियम, ईश्वर का विधान तो अपनी जगह पर ही कायम रहेगा।

प्रिय परिजनों को हर आत्मिक प्रगति की मंजिल पर अपेक्षाकृत अधिक त्याग-बलिदान के लिए तैयार रहना होगा। अन्त में जब पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने का अवसर आवेगा तो साँसारिक पदार्थों का ही नहीं अपनी अंहता का भी विसर्जन ईश्वर के चरणों में करना पड़ेगा।

अभी तो उसका थोड़ा-थोड़ा अभ्यास कराया जा रहा है। 24 घन्टे स्वार्थपरता के कोल्हू में जुता रहने वाला 1 घंटा तो परमार्थ-प्रयोजन के लिये समय निकाले। अपनी सारी कमाई भौतिक प्रयोजनों के लिये खर्च करने वाला 10 नया पैसा जैसी डेढ़ छटाँक आटे की कीमत तो भावनात्मक उपलब्धियों को अधिग्रहण करने के लिए खर्च करे । यह अत्यन्त सरल,छोटे, नगण्य जैसे त्याग-बलिदान हैं। जो इतना भी नहीं कर सकते उनकी परिस्थितियाँ नहीं मात्र मानसिक दुर्बलता कारण मानी जायगी। इतने डरपोक व्यक्ति नर से नारायण बनने के महान् अभियान में अधिक दूर तक नहीं चल सकेंगे।

हमें स्वयं हमारे मार्ग-दर्शक ने इसी मार्ग पर चलाया है। उपासना हमने की है पर उसमें भी अधिक कष्ट-साध्य आत्मशोधन और त्याग-बलिदान के लिये अपने को जीवन के हर कदम पर प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने का अवसर आया। अगले पंच वर्ष जिन, साधारण लोगों को सुनने मात्र से विचलित करने वाली कष्टसाध्य तपश्चर्या का क्रम निर्धारित है, उसके पीछे भी स्वर्ग, मुक्ति का वैयक्तिक स्वार्थ नहीं वरन् विशुद्ध लोक-हित कर्म ही लक्ष्य है। यह एक प्रकट रहस्य है कि अरविन्द, रमण जैसे तपस्वियों ने भारत के राजनैतिक क्षेत्रों में जो चेतना उत्पन्न की थी उसमें गान्धी, नेहरू, पटेल, सुभाष, मालवीय आदि को शक्ति एवं सफलता मिली । आज वह बिजलीघर ठंडे हो गये तो एक-से -एक अधिक योग्यता वाले नेताओं के रहते हुए भी हमारे राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक आर्थिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में सन्नाटा पड़ा हुआ है। ऊँचे शक्तिशाली व्यक्तित्वों के अभाव में प्रगति हो भी कैसे? हमारी भावी तपश्चर्या के पीछे एकमात्र प्रयोजन उस ठण्डे पड़े बिजलीघर को पुनः चैतन्य करना है जिसके द्वारा अनेकों यन्त्र साथ में काम करने लगें और युग-परिवर्तन के उपयुक्त व्यक्तियों तथा परिस्थितियों का अभाव दूर हो सके। हमारे गुरुदेव ने हमारी भौतिक सुविधाओं को एक-एक करके घटाया है और त्याग-बलिदान की आग में अधिकाधिक तपाया है। हमारा अगला कदम आगे और भी अधिक कठोरता पूर्ण है। हमें अपने इस सौभाग्य पर अत्यधिक हर्ष और सन्तोष है क्योंकि हमें आत्मिक प्रगति की सुनिश्चित क्रम व्यवस्था का पता है। अनादि काल से प्रत्येक आत्मिक स्तर पर ऊँचा उठने वाले को यही रीति-नीति अपनानी पड़ती है। हमारे लिये भी और कोई नया मार्ग कैसे हो सकता था?

प्रिय परिजनों के लिये या उनकी आत्मिक प्रगति के लिये इसी राजमार्ग पर चलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। गान्धी जिन्हें प्यार करते थे उन्हें जेल भिजवाते थे। बुद्ध जिन्हें प्यार करते थे उन्हें प्रव्रज्या देते थे। हम भी परिजनों को असुविधाएं ही दे सकते हैं। ऊँचा उठने के लिये और कोई सरल मार्ग यदि हमारे हाथ में रहा होता तो उसे बताते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करते पर सस्ते मूल्य पर ऊँची उपलब्धियाँ पाने का जब कोई विधान ईश्वर ने रखा ही नहीं तो हमें विवशता ही व्यक्त करनी पड़ती है। कुछ भी त्याग न करने पर भी आत्म-लाभ हो सकने का झूँठा आश्वासन दे सकना भी तो हमसे बन नहीं पड़ता ।

युग-निर्माण परिवार की दोनों शर्तें जिन्हें कठिन मालूम पड़ती हों, वे प्रसन्नतापूर्वक साथ छोड़े दें। वर्तमान 40 हजार सदस्यों में से 4 हजार ही रह जायें तो पर्याप्त है। पात्रता होने पर ही तो किसी को कुछ मिलना या दिया जाना सम्भव हो सकता है। इसलिए यह कसौटी कड़ी जरूर है, पर प्रगति का पर्वत बना ही कुछ ऐसा है कि उस पर चढ़ने के लिए त्याग, साहस और दूरदर्शिता का परिचय देना ही पड़ता है।

हमें अपनी क्रिया-पद्धति अगले दिनों समाप्त करनी है अपने उत्तरदायित्व मजबूत कन्धों पर सोपने हैं। हमारी समस्त गतिविधियों का केन्द्र उत्कृष्ट व्यक्ति और उत्कृष्ट समाज की रचना है। इस प्रयोजन में जो लोग हमारा साथ दे सकते हों, वस्तुतः वे ही हमारे सच्चे आत्मीय ही सकते हैं। जुलाई अंक में संलग्न फार्म जिन्होंने अभी भरकर न भेजा हो वे साथ छोड़ने की सूचना भी निस्संकोच भेज सकते हैं, पर सूचना देनी अवश्य चाहिये। 36 हजार का साथ छूटने का तो अनुमान हमें पहले से ही है, फिर बुरा मानने या संकोच अनुभव करने की किसी को काई आवश्यकता भी क्यों होनी चाहिए?

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