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Magazine - Year 1966 - Version 2

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विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति इस तरह बनें

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प्रत्येक मनुष्य जीवन में अवश्य कुछ ऐसा बनना चाहता है जिससे लोग उसे विशेष व्यक्ति समझें। वह समाज में कुछ ऊँचा, कुछ विशिष्ट होकर चमके। लोग उसकी ओर आकृष्ट हों, उसका सम्मान करें, उसे प्रतिष्ठा दें।

समाज में ऐसी विशिष्टता पाने के लिये वह प्रयत्न भी कुछ न कुछ करता ही है। शान-शौकत से रहना, ऊँची-ऊँची बातें करना, धन संचय करना, दान देना, संस्थायें चलाना, पद एवं नेतृत्व प्राप्त करना आदि सभी प्रयास मनुष्य, समाज में विशिष्टता प्राप्त करने के लिये ही किया करता है।

विशिष्ट व्यक्ति लोगों के आकर्षण का बिन्दु होता है। लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, नमन करते हैं, मान देते और उससे अनेक प्रकार की आशायें बाँध लिया करते हैं। अपनी इस लोकप्रियता से उसके अहं को सन्तोष मिलता है, मन सुखी एवं प्रसन्न होता है। इसी अहं सुख के लोभ में अनेक व्यक्ति लोक लोलुप बनकर विविध प्रकार के आडम्बर रचने और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न किया करते हैं।

लोकेषणा निःसन्देह एक प्रचण्ड तृष्णा है जो मनुष्य को बहुधा मनुष्यता से गिराकर, ऐसे छल प्रपंच के काम करा डालती है जिनको कदाचित सामान्य स्थिति में विचार करने पर स्वयं करने वाला भी अच्छा नहीं बतलायेगा।

एक स्थिति के दो व्यक्ति समाज में आगे बढ़ने का प्रयत्न करते हैं। एक बढ़ने के लिये धन, लोक-प्रियता नाम, नेतृत्व आदि प्रदर्शन पूर्ण बातों को आधार बनाता है और दूसरों सेवा, सहानुभूति, सहायता सत्यता, त्याग और सादगी एवं सदाचार को उसका आधार बनाता है। दोनों अपने-अपने उद्देश्य पूर्ति में अपनी-अपनी तरह से लग जाते हैं। किन्तु जब देखा जाता है तब पता चलता है कि पहला व्यक्ति अपने उद्देश्य में असफल हो जाता है और दूसरा सफल। यद्यपि पहले ने धन, नाम, नेतृत्व आदि चीजों को प्रचुर मात्रा में इकट्ठी कर लिया और दूसरे के पास उतना भी नहीं रहा जितना कि उसके पास पहले था।

पर समाज में पहले व्यक्ति का धनाढ्य हो जाने और दूसरों से बहुत बढ़ जाने पर कोई आदर नहीं होता और दूसरे का पहले की अपेक्षा ज्यादा निर्धन हो जाने पर भी अधिक आदर सम्मान होता है। यह उल्टा परिणाम देखकर एक क्षण को आश्चर्य हो सकता है किन्तु वास्तव में इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। यह यों ही होना चाहिये था। यदि इसके विपरीत होता तो अवश्य ही आश्चर्य का विषय होता।

विशिष्टता के इच्छुक उन दोनों व्यक्तियों में से एक ने सोचा कि यदि वह किसी प्रकार अधिक से अधिक धन कमा ले, ऊँची कोठी बना ले, कार रख ले, एक लम्बा चौड़ा कारोबार स्थापित कर ले और उसी धन की सहायता से लोगों को आभारी करके, दान देकर अथवा किसी अन्य प्रकार से विवश करके अपनी ओर आकृष्ट कर ले तो धन की बदौलत वह समाज में नेतृत्व प्राप्त कर लेगा, अपनी प्रतिष्ठा जमा लेगा और प्रभाववान बनकर एक विशिष्ट व्यक्ति बन जायेगा।

अपनी तरह से उसने किसी हद तक ठीक ही सोचा। क्योंकि समाज में ऐसे लोगों की भी तो कमी नहीं होती जो धन देकर आदर खरीदने वालों को औपचारिक आदर सम्मान देकर धन ले लिया करते हैं। अपना उल्लू सीधा करने के लिये धनवान को प्रतिष्ठा के दो फूल चढ़ा दिया करते हैं। वह समझते हैं कि यदि किसी को बड़ा कह देने में, मतलब के लिये सम्मान कर देने में, उनकी जेब से जाता भी क्या है। हमारे इस आडम्बर से उसके अहं को संतोष मिल जाता है और हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार के परस्पर सिद्ध-साधकों की समाज में कमी नहीं है। किन्तु इन दोनों में से किसी को सच्चा सन्तोष नहीं मिलता। समझने के लिये कोई भी, अपनी इस योजना पूर्ण प्रतिष्ठा को विशिष्टता समझ भले ले किन्तु यह होती दरअसल विशिष्टता का आडम्बर ही है जो हर भले आदमी के लिये उपहास स्पंद ही होता है।

दूसरा, सत्य, सेवा और परोपकार आदि गुणों को आधार बनाकर आगे बढ़ता है। वह सोचता है संसार में धन वैभव की अनस्थिर छाया हटते देर नहीं लगती। धन के लालच में मनुष्य बुरे से बुरे काम करने को तैयार हो जाता है। धन के अभिमान में वह मनुष्य को पूरी तरह मनुष्य समझने में कृपणता करता है। धनवान व्यक्ति धन के बल पर लोगों की विवशता दत्त प्रतिष्ठा एवं आदर प्राप्त करने का प्रयत्न किया करता है। धन के आधार पर हर काम करने और हर चीज पाने का दम रखने वाला गुणों की गरिमा भूल जाता है। वह दूसरों के गुणों का तो आदर ही नहीं करता है बल्कि अपने गुण भी खो देता है और अवगुणी बन जाता है। लोगों द्वारा स्वार्थवश दिये गये आदर को वे जीवन की उपलब्धि समझकर झूठा संतोष कर लिया करते हैं। धन के बल पर सब कुछ पाने वाले और कुछ क्यों न पा लें, किन्तु समाज के समझदार व्यक्तियों से सच्च आदर नहीं पा सकते। लाख लोगों द्वारा आदर सम्मान दिये जाने पर भी यदि उनकी विशिष्टता अथवा प्रतिष्ठा सज्जन व्यक्तियों द्वारा प्रमाणित नहीं की जाती तो वह झूठी है, छल है, आत्म प्रवंचना है। सज्जनों द्वारा दिये जाने वाला बड़प्पन का प्रमाणपत्र धन अथवा युक्तियों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके लिये मनुष्य को गुणी बनकर समाज में प्रमाण देना व सिद्ध करना होगा कि उसके गुण सत्य हैं, स्वाभाविक हैं, असंदिग्ध एवं अहैतुक हैं। सज्जनों द्वारा दी हुई प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता ही सच्ची है बाकी सब झूठ है और सज्जन गुणी को मान देते ही हैं फिर चाहे वह धनी हो अथवा निर्धन।

एक ने समाज में अपनी धारणा के अनुसार अर्थ लाभ का जाल फैलाया। खूब यत्नपूर्वक उसको छिपाया भी। ठगी, चोरी, मक्कारी, काला बाजारी, मुनाफा तथा घूसखोरी से मनमाना धन कमाया। कोठी बनाई, कार खरीदी, कारोबार फैलाया, दान दिया और लोगों की आदर भावना खरीदी। बड़ी दूर तक अपना रुबाव-दबाव फैला लिया। समाज में दूर से दीखने लगे, अनेक प्रकार से प्रतिष्ठित होने लगे और संतोष कर लिया कि वे एक विशिष्ट व्यक्ति बन गये। उन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया और वे जीवन में सफल हो गये।

दूसरे ने अपनी धारणा के अनुसार सत्य का सम्मान किया। थोड़े में संतोष पाया, सादगी एवं सरलता को सुख समझा, अनुचित उपाय की अपेक्षा गरीबी का स्वागत किया। लोगों की सेवा की, यथासाध्य परोपकार किया। अपने सौजन्य एवं सज्जनता से लोगों की आँखों में नहीं हृदय में स्थान बनाया। कर्तव्यों का अधिक से अधिक पालन किया और अपने अधिकारों का दूसरों के हित में त्याग किया। वह धनवान न बन सका, न कोठी बन सकी, न कार रख सका और न लोगों को अपनी चाटुकारी करने के लिये विवश कर सका और न ध्वजा की तरह कलश पर दिखाई दे सका। तो भी उसने जो कुछ कमाया वह कुछ विशिष्ट था, ऐसा था जिसने उसे सच्चा सुख दिया, सच्ची शाँति दी।

इस प्रकार एक संग्रह के प्रयत्न में सम्पन्न बन गया और दूसरा विपन्न। किन्तु प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता के सम्बन्ध में सम्पन्न, विपन्न और विपन्न सम्पन्न बन गया। इसका पता इस प्रकार चला कि लोग सम्पन्न को देखकर दूसरे से कहने लगे कि धन कितना भी कमा लिया हो और कितनी ही इज्जत क्यों न इकट्ठी कर ली हो किन्तु यह आदमी ठीक नहीं है। धन के लोभ में न तो इसे किसी पर दया आती है और न भ्रष्टाचार करते संकोच होता है। पाप से धन कमाया तो क्या कमाया, लूटकर कोठी खड़ी की तो क्या बड़ी बात कर ली, और पैसे के बल पर इज्जत खरीद ली तो क्या बड़ा आदमी हो गया? जनमत की इस प्रकार की अभिव्यक्ति हुई नहीं कि सारे धन वैभव की और मान सम्मान पर कालिख पुती नहीं, अपने कोई हठ से भले ही अपने को प्रतिष्ठित एवं विशिष्ट समझता रहे।

उपकारी को लोग देखते हैं। श्रद्धा एवं सहानुभूति से आँखें सजल हो जाती हैं। माथा आप से आप आदर से झुक जाता है। लोग आपस में कहते हैं—”क्या आदमी है किसी का दुःख देखा नहीं कि संवेदना-सहानुभूति का अमृत लेकर दौड़ा नहीं। अपना करने योग्य कोई काम करा लो तुरन्त करेगा और लेने के लिए एक कौड़ी नहीं लेगा। जिन्दगी भर से सादा रह रहा है, रूखा-सूखा खा रहा है। साधारण मकान में रह रहा है, सस्ता मोटा पहन रहा है लेकिन अवसर होने पर भी क्या मजाल कोई एक पैसा देने में सफल हो जाये। भ्रष्टाचार किसे कहते हैं यह जानता ही नहीं। क्या ईमानदारी है, कि इसे तो मनुष्य मानने की इच्छा ही नहीं होती। हर तरह से देवता ही है—देवता। संतोष इतना मानो त्रिलोक की सम्पदा इसी के पास हो। बिना किसी स्वार्थ के हर समय सेवा तथा सहायता के लिये प्रस्तुत। गरीब है लेकिन कोई अवसर आ जाने पर यथासाध्य हर त्याग करने को सदा तत्पर रहता है।”

ऐसे ही आदमी तो वास्तव में आदमी कहलाने योग्य होते हैं, वैसे होने को तो दुनिया आदमियों से भरी पड़ी है। लोकमत ने इस प्रकार की अभिव्यक्ति की नहीं कि गरीबी मणि–माणिक की तरह चमक उठी। प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता मिल गई। जीवन सफल हुआ और लक्ष्य मिल गया।

यथार्थ में बात क्या है? बात वास्तव में यह है कि एक ने प्रतिष्ठा अथवा विशिष्टता पाने से पहले मनुष्य बनने की कोशिश की और दूसरे ने मनुष्य बनने से पूर्व और सब कुछ बनना चाहा। एक ने धन को सर्व शक्तिमान-कारक समझकर पूजा प्रतिष्ठा खरीदनी चाही और दूसरे ने अन्यों की सेवा करके, पूजा प्रतिष्ठा करके उसे अनायास ही पुरस्कार रूप में पा लिया।

हम जीवन में धनवान, बलवान, विद्यावान नेता, नायक, प्रशासक सब कुछ बन जाते हैं पर यदि ठीक-ठीक मनुष्य नहीं बन पाते तो हमारे जीवन पर यह सब भूषण असंगत दूषण जैसे ही लगेंगे। मनुष्यता के अभाव में शक्ति अथवा अधिकार सम्पन्नता दोष के रूप में ही अपनी अभिव्यक्ति करते हैं। दया, क्षमा, त्याग सेवा सहानुभूति आदि मानवीय गुणों रहित मनुष्य शक्ति पाकर बर्बर एवं अत्याचारी बन जाया करते हैं। इतिहास में मनुष्यता हीन न जाने ऐसे कितने शक्तिवान काले अक्षरों में लिखे हैं, जिनके नाम पर दुनिया आज तक थूकती आ रही है। उन्होंने बड़ी-बड़ी विजय प्राप्त कीं, लम्बे चौड़े साम्राज्य स्थापित किये, लाखों करोड़ों का नेतृत्व किया, न जाने कितनों से पूजा प्रतिष्ठा प्राप्त की, किन्तु तब भी वे अपने जीवन में पूरी तरह असफल ही रहे। जो मनुष्य होकर मनुष्य न बन सका, वह कुछ बन जाने पर भी असफल ही माना जायेगा।

सफलता-असफलता, पूजा एवं प्रतिष्ठा की सच्ची कसौटी यह है कि किसी को लोकमत किस भाव से याद करता है, किस दृष्टि से देखता है। तलवार अथवा शक्ति के बल पर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेने पर आदर में मस्तक झुकवा लेने वाले हजारों विजयवानों की अपेक्षा वह निर्धन, सज्जन कहीं अधिक पूजित, प्रतिष्ठित एवं विशिष्ट है जिसकी याद आँसुओं से भीगकर आती हो और जिसे देखकर मनुष्यों की आत्मा अनायास ही आत्मीयता का अनुभव करने लगे और जिसके प्रति लोगों का अखण्ड विश्वास रहे कि यह हमारा सच्चा हितैषी है, हमारा कल्याण कामी है, फिर चाहे वह परिस्थितियों के कारण किसी का कुछ हित साधन भले ही न कर पाये। इस प्रकार के मानवता पूर्ण मनुष्य अकिंचन होने पर भी उन हजारों विजगीषुओं, धनवानों एवं बलवानों के बीच विशिष्ट ही माने जायेंगे। उन्हें अपने जीवन काल में तो सच्चा सम्मान मिलेगा ही मरने के बाद भी वे थोड़े से लोगों के द्वारा ही क्यों नहीं—आदर के साथ याद किये जायेंगे। मनुष्यों की आत्मा जिन्हें आकर बड़ा स्वीकार कर ले वही व्यक्ति इस धराधाम के विशिष्ट होते हैं और यह स्वीकृति एकमात्र मनुष्यता के गुणों से ही मिल सकती है, धन अथवा शक्ति आदि से नहीं।

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