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Magazine - Year 1966 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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ज्ञान का विकास एवं प्रसार एक महान पुण्य कार्य है।

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उन्नति एवं प्रगति की आधारशिला मनुष्य के अपने विचार ही हैं। विचारों के अनुरूप ही उसका जीवन बनता-बिगड़ता है। विचारहीन मनुष्य प्रकृति-प्रेरणाओं के आधार पर अन्य मानवेत्तर जीवों की तरह ही अनुन्नत जीवन यापन किया करता है। वह उन सद्प्रवृत्तियों के सुख से सदैव वंचित रहा करता है, जो उच्च विचारों की प्रेरणा से किसी सुसंस्कृत मनुष्य में विकसित होती रहती हैं।

विचार-साँचे की तरह मनुष्य-जीवन को अपने अनुरूप ढाल लिया करते हैं। मनुष्य का जो भी रूप उसके सामने आता है, वह विचारों का ही प्रतिबिम्ब हुआ करता है। सुख-दुःख, सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, प्रसन्नता-खिन्नता अथवा तुच्छता-महानता की जो भी स्थिति प्राप्त होती है वह विचारों का ही प्रतिफल होता है। भूत, भविष्यत्, वर्तमान में मनुष्य जिस प्रकार भी रहा है, रहेगा अथवा रह रहा है उनका मूलभूत कारण विचार ही हैं। मनुष्य के विचार ही उसका स्वर्ग और विचार ही जीता-जागता नरक बना करते हैं।

मनुष्य जिस दिशा में बढ़ना अथवा प्रगति करना चाहता है, उसी के अनुरूप उसे अपने विचारों का निर्माण करना होता है। जिसके विचार अधोगामी हैं, उसका जीवन ऊर्ध्वगामी नहीं हो सकता और जिसके विचार ऊर्ध्वगामी हैं, उसका जीवन उन्नत दिशाओं में ही आगे बढ़ेगा। धार्मिक अथवा आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है—तदनुसार अपने विचारों को बनाना।

विचारों में अपार शक्ति सन्नहित रहा करती है, वे मनुष्य की क्रियाशीलता को उत्तेजित एवं प्रेरित करते हैं। आशावादी, उन्नत, उदार तथा धार्मिक विचार मनुष्य को आत्म-विकास की ओर बढ़ाते हैं, जबकि निम्न एवं निकृष्ट विचार उसे पतन के अपावन गर्त में गिरा देते हैं।

अपने आन्तरिक एवं बाह्य-जीवन को तेजस्वी, प्रखर, पूर्ण तथा पुरोगामी बनाने के लिये अपनी विचार-शक्ति को विकसित एवं परिमार्जित करना होगा। यह कार्य उन्नत विचारों के संपर्क में आने से ही पूरा हो सकता है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक जीवन-पद्धति सिद्ध करने के लिए ऐसे महान् पुरुषों एवं चरित्रवान व्यक्तियों के संपर्क में आना, उनका सत्संग का लाभ उठाकर उनके सद्विचारों एवं सदाचरण से अपने आचार-विचार को प्रभावित करना होगा। जिस प्रकार व्यवसायी की संगत से मनुष्य व्यावसायिक, व्यभिचारी के कुसंग से व्यसनी एवं दुराचारी बन जाता है, उसी प्रकार धर्म-निष्ठा सत्पुरुषों का सत्संग उसे एवं आत्म-कल्याण के लिये आवश्यक है कि मनुष्य महामना सदाचारियों का सत्संग करे और असद् व्यक्तियों से बचता रहे।

किसी को महान् व्यक्ति समझकर विचार-लाभ के लिये उसके संपर्क में आने और उसके विचारों में विश्वास करने से पूर्व आज इस बात की छान-बीन कर लेना आवश्यक है कि अमुक व्यक्ति वाणी से ही नहीं, आचरण से भी महान् है। आज-कल सत्संगों के नाम पर जगह-जगह ढोंगियों के ढोल बजते सुनाई देते हैं। अपनी वाचालता के बल पर जिधर देखो उधर ही रंगे स्यार लोगों में प्रवचन एवं प्रचार करते दीख पड़ते हैं। तत्व-ज्ञान के नाम पर न जाने कितनी बकवास रात-दिन होती रहती है। अनेक लोगों के उपदेशों में शास्त्र-सम्मत कुछ सार भी होता है, तो उनका आचरण तद्रूप नहीं होता। इस आडम्बरपूर्ण कोलाहल में मन-वचन-कर्म से शुद्ध सत्पुरुषों को खोज निकालना बहुत कठिन हो गया है। ऐसे सत्संग-योग्य सत्पुरुषों की संख्या बहुत विरल हो गई है, जो अपनी वाणी एवं कर्म की एकरूपता से हमारे बाह्य एवं आन्तरिक दोनों जीवनों को प्रेरणा देकर प्रकाशपूर्ण दिशा में अग्रसर कर सकें।

यदि एक-दो ऐसे प्रकाश-स्रोत कहीं पर हों भी, तो दूरवर्ती लोगों के लिये उनके पास पहुँच सकना और सत्संग का लाभ उठा सकना सरल नहीं है। इस व्यस्त और महंगे समय में लोगों के पास अतिरिक्त पैसे तथा अवकाश का नितान्त अभाव है। फिर महापुरुषों के पास भी इतना समय कहाँ, जो दूर देशों से आये जिज्ञासुओं पर्याप्त समय दे सकें और यदि किसी प्रकार वे समय निकालकर घण्टा-दो घण्टा दे भी दें, तो वर्षानु वर्ष के निरन्तर सत्संग से समझ में आने वाली जीवन-दर्शन जैसी गूढ़ समस्या उतने अल्प समय में हल भी नहीं हो सकती। अस्तु, जीवन एवं विचार विकास के लिये साक्षात सत्संग की सम्भावनाएँ नहीं के बराबर ही रह गई हैं।

अब सद्ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये केवल एक ही विकल्प शेष रह गया है और वह है—स्वाध्याय। लोग सत्पुरुषों की लिखी पुस्तकों का अध्ययन करें और उन्नति की ओर प्रेरित करने वाले विचारों को ग्रहण करें और उनके अनुसार अपने जीवन की रीति-नीति निर्धारित करते चलें।

महापुरुषों से सत्संग का आशय उनके विचारों के संपर्क में आने से ही है, न कि उनके शरीर से साक्षात्कार प्राप्त करने से। जो लाभ सन्त-महात्माओं के पास जाकर उठाया जा सकता है, वही लाभ उनकी पुस्तकें पढ़कर भी प्राप्त किया जा सकता है। वैचारिक लाभ के लिए आवश्यक नहीं कि उनके व्यक्तिगत संपर्क में आया ही जाये।

पुस्तकों के माध्यम से संसार के किसी भी सद् विचारक का किसी भी समय और किसी भी तरह संग प्राप्त किया जा सकता है। जिस विद्वान् की पुस्तक आपके पास है, वह विचाररूप में हर समय आपके पास उपस्थित है। पुस्तकों द्वारा आप ऐसे दिवंगत महात्माओं से संपर्क स्थापित कर सकते हैं, जिनको संसार से गये सदियाँ बीत चुकी हैं। यदि आप स्वाध्यायशील हैं और आपको पुस्तक रखने का चाव है, तो आपकी रुचि अथवा लक्ष्य का विचारक किसी समय आपसे दूर नहीं है। यदि आप उनसे आधी-रात को भी मिलना और उनके विचार जानना चाहें, तो अपने संकलन से उनकी पुस्तक निकाल लीजिये। पृष्ठ उलटिये और वे आपसे बातें करने, अपने विचार प्रकट करने लगेंगे। पुस्तकों द्वारा महापुरुषों का सत्संग स्वाध्यायशीलता के बल पर, आज सरलतापूर्वक पाया जा सकता है।

पुस्तकों का अध्ययन न केवल विचार-विकास द्वारा जीवन को समुन्नत करने का एक उपाय मात्र ही है, बल्कि एक पुण्य-कर्म भी है।

देवताओं की पूजा किसलिए की जाती है? इसलिये कि उनकी कृपा—आशा, उत्साह,चरित्र एवं पवित्रता के रूप में हमें प्राप्त हों, जिसके आधार पर हम अपने जीवन को सफल, समृद्ध एवं उन्नत बना सकें। सद्ग्रन्थ भी अपने जीते-जागते देवता ही होते हैं। उनकी कृपा से मनुष्य को ज्ञान का प्रकाश मिलता है। सत्प्रेरणा तथा मार्ग-दर्शन का लाभ होता है। प्रेरणादायक पुस्तकें निराशा का अन्धकार दूरकर, हृदय में आशा और उत्साह का संचार करती है। उनके पढ़ने से हृदय को हर्ष, आत्मा को प्रसन्नता मिलती है। परमात्मा भी ज्ञान-रूप ही है। योगी और साधक उसे अपने अन्तःकरण में ही अनुभव करते हैं। ज्ञान, मुक्ति का साधन है जो कि हमको अच्छी पुस्तकों की उपासना करने, उन्हें पढ़ने से सहजरूप में ही प्राप्त हो सकता है।

महापुरुषों, महात्माओं एवं पुण्य प्राण विद्वानों का आदर-सम्मान करना, उनकी शिक्षा मानना, उपदेश सुनना, हृदयंगम करके उन्हीं के अनुसार जीवन-क्रम का निर्माण करना निश्चय ही पुण्य-कर्म है जो कि मनुष्य को उच्च से उच्चतर आध्यात्मिक कक्षा में पहुँचा देता है। पुस्तकों में विद्वानों एवं महात्माओं की आत्मा निवास करती है, जिसकी उपासना करने से लाभ होता है और मनुष्य उन जैसे आदर्शों का अनुयायी बन जाता है।

आत्मोत्थान के लिये किये जाने वाले धर्म-कर्मों तथा साधन-साधनाओं में स्वाध्याय के लिये महत्वपूर्ण सद्ग्रन्थ पढ़ने से हृदय में निर्मलता और मन में एकाग्रता की वृद्धि होती है। विवेक उज्ज्वल और बुद्धि प्रखर होती है। मन को संयमित एवं सुशील बनाने में पुस्तकों का अध्ययन बड़ी सीमा तक सहायक होता है। निरन्तर प्रेरणाप्रद, जीवनोंपवागी पुस्तकें पढ़कर तन्मयता का गुण सहज रूप से बढ़ाया जा सकता है। सदाचार, सद्विचार तथा सद्वृत्तियाँ बढ़ाने में तो पुस्तकों का योगदान सबसे अधिक रहता है। पुस्तकों का अध्ययन अक्षर-ब्रह्म की उपासना ही है, जिसका पुण्य मनुष्य को आध्यात्मिक भावों से ओत−प्रोत कर दिया करता है।

पुस्तकें देवता हैं तो उनका निवास-स्थान पुस्तकालय देव मन्दिर होने ही चाहिये। इनकी स्थापना करना, इनको सहायता सहयोग देना भी एक महान् धर्म-कृत्य है। देव-मन्दिरों के समान ही ज्ञान-मन्दिरों की स्थापना भी सार्वजनिक आत्मोद्धारा का पुण्य कार्य है। मन्दिरों में जाकर जिस प्रकार लोगों की प्रवृत्तियों में पवित्रता का समावेश हो जाता है, उसी प्रकार पुस्तकालयों में प्रवेश करने पर भी लोगों के विचार अनायास ही ऊर्ध्वगामी होने लगते हैं। इस प्रकार का भावनात्मक प्रभाव जीवन-विकास में बड़ा ही उपयोगी सिद्ध होता है।

आत्म-कल्याण चाहने वाले ‘लोगों में धर्म-कर्म की इच्छा रहती है। वे मोक्ष, स्वर्ग अथवा मुक्ति पाने की इच्छा से अनेक परोपकार के कार्य किया करते हैं। देव मन्दिरों की स्थापना, मूर्तियों की प्रतिष्ठा, धर्मशाला, कुआँ, तालाब आदि का निर्माण करना ऐसे ही जनोपयोगी धर्मकृत्य हैं, जिससे पुण्य प्राप्त होने की आशा रहती है। किसी का कष्ट-निवारण करना, सेवा-सहायता करना भी वे परोपकारी कार्य हैं, जिनकी गणना परमार्थ में ही की जाती है।

ज्ञान रुपी परमात्मा के मन्दिर पुस्तकालयों की स्थापना करके अथवा उनकी स्थापना में सहयोग-सहायता देकर भी उसी प्रकार का पुण्य-लाभ किया जा सकता है। अँधेरे मार्गों में प्रकाश का प्रबन्ध करा देने के ही समान अज्ञानान्धकार में भटकती जनता के लिये पुस्तकालय जैसे प्रकाश-गृह की स्थापना करा देने से बढ़कर और कौन-सा पुण्य हो सकता है? संसार में हजारों-लाखों प्रकार के दुःख तथा कष्ट हैं, किन्तु अज्ञान का दुःख सबसे बड़ा माना गया है। अज्ञान से ग्रस्त मनुष्य की आत्मा का त्रास अकथनीय है। अज्ञानी मनुष्य का न कहीं आदर होता है और न उसका कोई प्रयास ही सफल होता है। अज्ञान ही वह मूल-बीज है, जिसमें नाना प्रकार के दुःख, क्लेशों का जन्म होता है। निराशा, अवसाद, विषाद, निरुत्साह, काम, क्रोध, लोभ, मोह, आदि विकारों का असहनीय दुःख अज्ञान के कारण ही उत्पन्न होता है। जीवन की सारी समस्याओं, प्रतिकूल परिस्थितियों, द्वेष-द्रोह एवं संघर्ष की घटनाओं के मूल में अज्ञान की ही प्रेरणा रहती है। अज्ञान का अन्धकार अजगर की तरह मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन को घेरकर मूर्छित कर देता है, जिससे आत्मोद्धार के पावन लक्ष्य की ओर अग्रसर होना तो दूर, मनुष्य सामान्य जीवन-क्रम को भी ठीक से नहीं चला पाता है। अज्ञान से बड़ा दुःख इस संसार में कोई नहीं है। अज्ञान का पाप मनुष्य के लोक-परलोक दोनों को बिगाड़ देता है। इतने बड़े दुःख से मनुष्य की आत्मा का उद्धार करने में सहायक होने से बड़ा कौन-सा परोपकार,परमार्थ अथवा पुण्यकार्य हो सकता है।

सद्ग्रन्थों की उपासना और पुस्तकालयों की स्थापना आज के युग में दो बड़े पुण्य-कार्य हैं। परमार्थ द्वारा आत्म-कल्याण की कामना रखने वाले लोगों को इन दोनों कार्यों को अपने जीवन-क्रम का एक भाग बना लेना चाहिये। घरों में व्यक्तिगत रूप से छोटे-छोटे पुस्तकालय ज्ञानमन्दिर के नाम से स्थापित किये जा सकते हैं। ग्राम-क्षेत्र अथवा नगर के अनेक लोग पारस्परिक सहयोग-सहायता एवं अनुदान देकर सामूहिक रूप से सार्वजनिक ज्ञान-मन्दिर की स्थापना करके पुण्य-लाभ के भागी बन सकते हैं। धन, भूमि, उपकरण, सुविधाएँ, सामग्री तथा पुस्तकें देने के साथ-साथ लोग अपनी स्थिति के अनुसार श्रम एवं समय-दान देकर भी पुण्य के भागी बन सकते हैं।

किन्तु इन ज्ञान-मन्दिरों की स्थापना की सार्थकता तभी है, जब इनमें केवल जीवनोपयोगी सत्साहित्य ही रखा जाये और लोगों में उसे पढ़ने की प्रेरणा भरी जाये।

कन्धे पर पुस्तकों का झोला लटकाये जब वे जनता में ज्ञानार्जन को जाग्रत करने के लिए पुस्तकें बाँटते और वापस लेते घूमेंगे, तो निस्संदेह उनका यह साधारण-सा प्रयास भी शंकराचार्य की भाँति ही होगा, जो उन्होंने गली-गली घूमकर वितंडावाद से प्रताड़ित सत्य-धर्म का उद्धार करने के लिये किया था। अतः स्वयं से लेकर सार्वजनिक ज्ञान-वर्धन का पुण्य अर्जन कर आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त ही करना चाहिए।

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