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Magazine - Year 1966 - Version 2

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Language: HINDI
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स्थायी सदस्यों के लिए 20 आवश्यक सूचनायें

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(1) जिन पाठकों ने जुलाई अंक में संलग्न सूचना फार्म अभी भर कर न भेजा हो, उनसे अनुरोध है कि अब यथासम्भव जल्दी ही भर कर भेज दें।

(2) जिन्होंने पाँच साल तक हमारे सहचर रहने और एक घण्टा समय तथा दस पैसे नित्य देने का व्रत लिया है, उन्हें अपनी प्रतिज्ञा की गरिमा को ठीक तरह अनुभव करना चाहिए और उसका पालन बिना आलस्य-प्रमाद के आरम्भ कर देना चाहिए।

(3) स्थायी सदस्यों को ‘अखण्ड ज्योति’ की भाँति ही ‘युग निर्माण योजना’ मँगाना भी आवश्यक है। जिनने युग निर्माण का चन्दा अभी न भेजा हो उन्हें अब उसे भेज देना चाहिए।

(4) एक घंटा समय देने की प्रतिज्ञा करने वालों को उसे निम्न चार कार्यों में व्यय करना चाहिये।

(अ) परिवार के लोगों को इकट्ठे कर उन्हें अपनी विचारधारा सुनाने में ।

(ब) अपने मित्र, सम्बन्धी, परिचित लोगों को नव-निर्माण साहित्य पढ़ने देने और वापिस लेने में।

(स) सदस्यों के घरों में संस्कारों के अतिरिक्त तथा सामूहिक रूप से किन्हीं उत्सवों का प्रचलन करने में।

(द) शाखा कार्यालय की स्थापना और वहाँ पुस्तकालय, पाठशाला, सत्संग आदि ज्ञानवर्धक आयोजन चलाने में।

(5) स्थायी सदस्यों को सबसे आधिक ध्यान इस बात पर देना चाहिये कि अपने घर का एक भी व्यस्क व्यक्ति ऐसा न हो जो दोनों पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ता या सुनता न हो। घर में जो थोड़ा भी पढ़े-लिखे हों उन्हें आग्रहपूर्वक इस साहित्य को पढ़ने की प्रेरणा दी जाय । जो बिना पढ़े हो उन्हें एक नियत समय पर पढ़े व्यक्ति पढ़कर सुनायें। सदस्यों का पूरा परिवार अपनी विचारधारा से भली प्रकार परिचित एवं प्रभावित हो इसके लिए पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाय।

(6) रात्रि को परिवार गोष्ठी के लिए समय निर्धारित हो जिसमें कथा-कहानी प्रेरक समाचार तथा दोनों पत्रिकाओं एवं ट्रैक्टों के कुछ अंश सुनाकर परिवार का मनोरंजन एवं ज्ञान संवर्धन किया जाता रहे। यह कार्य आरम्भ स्वयं करें, पीछे इस व्यवस्था को घर के किन्हीं दूसरे प्रबुद्ध सदस्यों को सौंपा जा सकता है।

(7) प्रतिदिन एक घटा का तात्पर्य है महीने में 30 घंटे। उपरोक्त चार कामों में यह समय अपनी सुविधानुसार खर्च किया जा सकता है। नित्य समय न मिलता हो तो छुट्टी के दिन अथवा अन्य काम-धंधे करने के साथ-साथ इस ज्ञान संवर्धन के लिए नियत समय का उपयोग किया जा सकता है।

(8) स्थायी सदस्यों को एक डायरी रखनी चाहिये। जिसमें 30 घन्टे मासिक समय का उपयोग किस तरह किया इसका ब्यौरा रखा जा सके। एक घंटा तो न्यूनतम समय है। प्रयत्न यह करना चाहिये कि इससे अधिक समय लगा करे।

(9) दस नया पैसा कोष का उपयोग अपने घर में ज्ञान मंदिर घरेलू पुस्तकालय स्थापित करने, बढ़ाने और चलाने में खर्च किया जायगा और किसी कार्य में यह पैसा खर्च नहीं किया जाना चाहिये।

(10) इस समय 70 नए ट्रैक्ट तैयार हैं। यह बहुत ही उपयोगी हैं। 20 नये पैसा प्रति के हिसाब से इनका मूल्य 14) होता है। 15 प्रतिशत कमीशन के 2) 10 काट 11) 90 हुए। डाक खर्च 2) 85 जोड़कर कुल 14) 75 के पास बैठेगा। घर में ज्ञानमंदिर पुस्तकालय आरम्भ करने के लिए इस सैट को मंगा लेना चाहिये।

(11) हर महीने 3) मथुरा भेजने की आवश्यकता नहीं । यह पैसे अपने पास जमा रखे जायँ । समय वाली डायरी में ही इनका भी हिसाब रखा जाय। (1) अखण्ड ज्योति (2) युग निर्माण योजना (3) ट्रैक्ट-इन तीन प्रकार के साहित्य में यह पैसा खर्च किया जाता रहे।

(12) ट्रैक्ट हर महीने छपेंगे पर 6-6 महीने (जनवरी,और जून) में दो बार में ही यह ट्रैक्ट भेजे जाया करेंगे। जिनका मूल्य हर बार लगभग 10-10 रुपया हुआ करेगा।

(13) यों 3) मासिक भी इस ज्ञान मंदिर पुस्तकालय के लिए जमा करते रहा जा सकता है पर भावनात्मक नित्य नवीनीकरण होते रहने की दृष्टि से प्रतिदिन एक गुल्लक में दस पैसे जमा करना ही अधिक उपयुक्त है। इससे यह स्मरण होता रहेगा कि हमारे आवश्यक नित्य-कर्मों में एक कार्य ज्ञान-यज्ञ के लिए नित्य नियमित रूप से कुछ कर्तव्य करना भी जुड़ा हुआ है।

(14) स्थायी सदस्य अपने आस-पास के उन लोगों से संपर्क बनाये रहें जो केवल अखण्ड-ज्योति या युगनिर्माण-योजना के सदस्य रहना चाहते हैं। उनका चन्दा वसूल करलें और अपने नाम उनके अंक भी मँगवाकर उनके पास पहुँचा दिया करें। इस प्रकार ऐसे ग्राहकों को निराश भी न रहना पड़ेगा और हमें भी हर साल बनने-टूटने वाले ग्राहकों के रजिस्टर बनाने का झंझट न उठाना पड़ेगा।

(15) जो सज्जन समय एवं पैसा नित्य खर्च नहीं करना चाहते, ट्रैक्ट नहीं लेना चाहते, वे भी साधारण ग्राहक तो बन सकते हैं, पर उनसे भी अनुरोध यही है कि वे एकाध वर्ष का मनीआर्डर मथुरा न भेजकर स्थायी सदस्यों की मार्फत अपना अंक मँगाने का प्रयत्न करें। यदि कोई स्थायी सदस्य वहाँ न हो तब ही सीधा मनी-आर्डर भेजें । हर साल बनने-टूटने वाले अस्थिर मति ग्राहक बनाने में अब हमें कोई रुचि नहीं है। यों जिनके मनीआर्डर सीधे आ जायेंगे, पत्रिका भेजेंगे तो उन्हें भी।

(16) जो केवल अखण्ड-ज्योति के ग्राहक रहना चाहते है, उनसे अनुरोध है कि हो सके तो युग-निर्माण-योजना भी साथ-साथ मँगाने का साहस और भी कर लें। अब दोनों पत्रिकाएँ एक-दूसरे की पूरक बन गईं हैं। अपने मिशन की विचारधारा अखण्ड-ज्योति में है और कार्य-पद्धति युग-निर्माण योजना में रहती है। दोनों के मिलने से ही एक पूरी बात बनती है। एक ही पत्रिका को दो अंकों में विभाजित करके 15-15 दिन के अन्तर से भेजते हैं, यह मानना चाहिये। अखण्ड-ज्योति को हो पाक्षिक हो गई समझना चाहिए। इसलिए प्रयत्न यह किया जाय कि दोनों पत्रिकाएँ साथ-साथ मँगाई जायँ, दोनों का चन्दा इकट्ठा भेजा जाय।

(17) जहाँ अधिक किफायत की बात हो, वहाँ ऐसा किया जा सकता है कि दो सदस्य मिलकर एक ही पते पर दोनों पत्रिकाएँ मँगाना आरम्भ कर दें। इससे हमारे रजिस्टर हलके रहेंगे। हिसाब एक के ही नाम चलेगा, पर पत्रिकाओं का चन्दा दो या अधिक सदस्य मिलकर इकट्ठा कर लिया करेंगे। इसी प्रकार ट्रैक्टों के स्थायी सदस्य बनने के लिये भी कई सदस्य मिलकर इकट्ठे हो सकते हैं।

(18) जुलाई में संलग्न फार्म में स्थायी सदस्यों की जन्म-तिथियाँ पूछी गईं हैं। जिनने उन फार्मों में न लिखी हों, वे अलग से हमें सूचित कर दें। इस जानकारी की हमें विशेष रूप से आवश्यकता पड़ेगी।

(19) इस वर्ष नवम्बर दिसम्बर में ही ‘अखण्ड-ज्योति’ का चन्दा जमा कराया जायगा, ताकि जनवरी का अंक नियत संख्या में ही छापा जाय। पाठकों से अनुरोध है कि वे सन् 67 के लिये तकाजा आने की प्रतीक्षा किये बिना ही नवम्बर या दिसम्बर में अपना चन्दा भेज दें।

(20) स्थायी सदस्य यह प्रयत्न करें कि उनके नाम एक-एक ही अंक न पहुँचे, वरन् दोनों पत्रिकाओं के कई-कई अंक पहुँचते रहें । इसके लिए उन्हें समीपवर्त्ती अस्थायी ग्राहकों से संपर्क बनाकर तथा अपने नये प्रयत्न का अनुमान कर अपने जिम्मे कुछ अधिक ग्राहकों की पत्रिकाएँ ले लेनी चाहिये। हम आशा करेंगे कि स्थायी सदस्य कम-से-कम तीन-तीन अखण्ड-ज्योति और दो-दो युग-निर्माण-योजना के छुटपुट सदस्य अपने द्वारा बनाये रखने का उत्तरदायित्व तो संभाले ही रहेंगे।

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