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Magazine - Year 1970 - Version 2

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अनासक्त कर्मयोग और उसका दर्शन

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संसार में ऐसे बहुत-से व्यक्ति होंगे, जो जीवन में बहुत दूर चलकर भी वापिस लौट आये होगे। उनकी बड़ी-बड़ी आशायें, आकाँक्षायें और अभिलाषायें रही होंगी। पर वे जीवन में कुछ ऐसे हताश और निरुत्साह हो गये कि ऊँचाई की ओर दूर तक यात्रा करके नीचे उतर आये। उनके इस पुनरावर्तन के दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि जीवन-पथ पर आने वाली प्रतिकूलताओं से वे परास्त हो गये अथवा उनके कर्तृत्व की असफलता ने उन्हें निराश कर दिया।,

जीवन-पथ पर, कोई ऊँचा ध्येय लेकर चलने वालों को प्रायः बहुत बार ही असफलताओं का सामना करना होता है। जीवन में असफलताओं का आगमन कोई अप्रत्याशित घटना नहीं होती। सफलता-असफलताओं के आलोक अन्धकार से होकर ही मनुष्य को अपने ध्येय तक जाने का अवसर मिलते हैं। यदि जीवन में असफलताओं से संघर्ष न करना पड़े और प्रारम्भ किया हुआ अभियान अव्यवधानित रूप से लक्ष्य तक चला जाये, तो कोई भी सामान्य से सामान्यतम व्यक्ति भी लक्ष्यजयी बनने का श्रेय प्राप्त कर सकता है और तब उस लक्ष्य अथवा जीवन परिधि का कोई मूल्य-महत्व ही न रह जाये। वह एक सामान्य यात्रा बनकर ही रह जाये।

जीवन में बाधाओं और असफलताओं को पार करते हुए लक्ष्य की ओर साहसपूर्वक बढ़ते जाना ही मनुष्य की महानता है। जिनको ऊँचाई पर पहुँचने के लिये कोई संघर्ष न करना पड़ा हो, असफलताजन्य निराशा पर विजय पाने के लिये और अधिक उत्साह और साहस की कुमुक न बढ़ानी पड़ी हो, उसे लक्ष्य-प्राप्ति का कोई विशेष श्रेय नहीं मिल सकता है। श्रेय का महत्व कंटकाकीर्ण मार्ग को पार करके आगे बढ़ते रहने में ही मिलता है। जो पथ की बाधाओं और व्यवधानों से भयभीत होकर पीछे लौट आता है, उसे विद्वानों ने कापुरुष की संज्ञा दी है। असफलता और व्यवधान जीवन-पथ की सहज संभावनायें हैं। इनसे कोई भी लक्ष्यवान व्यक्ति अछूता नहीं रह सकता। जीवन में लक्ष्य निर्धारित न करना तो केवल एक अश्रेयष्कर सामान्यता ही है। पर लक्ष्य निर्धारित करने के बाद, बाधाओं और व्यवधानों के भय से उसे छोड़ देना कायरता है। इस कायरता का कलंक किसी भी सत्पुरुष को नहीं लेना चाहिये।

बीच रास्ते से लौट आने वाले निःसन्देह बड़े दयनीय व्यक्ति होते हैं तथापि असफलता का आघात होता बड़ा कठोर है। जल्दी ही लोग इसे सहन नहीं कर पाते और निराश होकर हतगति हो जाते हैं। जीवन में कुछ करना भी है और उससे निराशा एवं निरुत्साह का भय भी सदा सम्भाव्य ही है, तब आखिर ऐसा कौन-सा उपाय ग्रहण किया जाये, जिससे निराशा एवं निरुत्साह का भय जाता रहे और असफलताओं से टक्कर लेते हुए सफलताओं की ओर बढ़ते रहा जा सके। यह शक्ति और साहस आखिर किस प्रकार प्राप्त हो सकती है।

इसका उपाय है, और बड़ा ही अमोघ उपाय है, वह है- ‘अनासक्त कर्मयोग’। यह अनासक्त कर्मयोग का जीवन दर्शन स्वयं भगवान वासुदेव का अनुमोदित दर्शन हैं। गीता में इसकी बड़ी ही विशद तथा विस्तृत व्याख्या की गई है। भगवान ने स्वयं इसका उपदेश करके कर्म-विमुख होकर बैठ रहने वाले अर्जुन की क्लीवता दूर की थी। अनासक्त कर्मयोग जीवन का एक बहुत बड़ा समाधान है। जीवन-पथ पर इसका अनुसरण करने वाला कर्मयोगी असफलताओं एवं प्रतिकूलताओं से प्रभावित होकर निराश अथवा हतोत्साह नहीं होता। वे सफलताओं-असफलताओं के बीच हँसते-खेलते समभाव पूर्वक आगे बढ़ते जाते हैं। न तो उन्हें सफलता प्रभावित कर पाती है और न असफलता। दोनों स्थितियों में उनका मानसिक संतुलन एक जैसा बना रहता है। कर्म और कर्मफल में अपना अधिकार न मानना ही अनासक्ति कही गई है। कर्म में कर्तापन का भाव रखना और उसके फल में अपना अधिकार मानना ही आसक्ति है। आसक्तिवान व्यक्ति जल्दी ही परिस्थितियों तथा परिणामों से प्रभावित हो उठता है। किन्तु कर्म और उसके अच्छे-बुरे, अनुकूल-प्रतिकूल परिणामों का बोझ अपने ऊपर न लेने वाला किन्हीं विषमताओं से प्रभावित नहीं होता-फलतः उसका सुख, चैन, शाँति और संतोष अक्षुण्य बना रहता है। न तो वह कभी निराश होता है और न हतोत्साह। वह जीवन-पथ पर निर्द्वन्द्व भाव और अप्रतिहत गति से बढ़ता चला जाता है। इसके विपरीत जो कर्म और कर्मफल को आत्माधारित करता है, वह अच्छे-बुरे परिणामों एवं परिस्थितियों से क्षण-क्षण प्रभावित होता हुआ लहराधीन व्यक्ति की तरह इतस्ततः आन्दोलित होता रहता है। इससे उसकी शक्तियाँ जल्दी ही शिथिल हो जाती हैं। और वह एक निष्क्रिय निराशा से घिरकर हतोत्साह हो जाता है।

शास्त्रों तथा मनीषी चिन्तकों ने गहरे अनुसंधान के बाद घोषित किया है कि कर्मों एवं कर्मफल में आसक्ति ही भव-बंधन का कारण है और बंधनों के कारण ही मनुष्य को अशाँति, असंतोष, शोक, संताप और आवागमन की यातना भोगनी पड़ती है। जिस दिन मनुष्य कर्म-बंधन से छूट जाता है, उसी दिन भव सागर से भी मुक्त हो जाता है। सूक्ष्म अथवा तात्विक विचार से अलग रहकर भी यदि साधारण तौर पर भी विचार किया जाये, तब भी पता चल जायेगा कि कर्मासक्ति निश्चय ही बंधनों का हेतु होती है। जिन कर्मों को हम अपना मानकर करेंगे और उसमें कर्तापन का अभिमान रखेंगे, तो उनका सारा दायित्व अपने ऊपर ही तो आ जायेगा और तब हमें उनके फलों से बंधना होगा, उनका भोग करना होगा। जिन कर्मों को हम करने जा रहे हैं, उनके विषय में अधिकारपूर्वक यह नहीं जान सकते कि आदि से लेकर अन्त तक हमारी कर्मगति निष्कलंक एवं निष्पाप है अथवा रहेगी। उनके आदि, मध्य अथवा अवसान तक कहाँ पर कौन-सा सूक्ष्म पाप उसकी लपेट में आ सकता है- इस बात को स्पष्ट अथवा प्रामाणिक रूप से नहीं जाना जा सकता। कर्मगति को, इसलिये बड़ा सूक्ष्म कहा गया है। कार्य के कारण उसकी प्रेरणा अथवा प्रवाह में कहाँ पर कौन सा स्खलन विनिहित हो सकता है। इसका आधिकारिक ज्ञान कार्यव्यस्त व्यक्ति के लिये संभव नहीं। यद्यपि यह अज्ञान क्षमा नहीं किया जा सकता। कर्मों में कर्तापन का भाव अथवा आसक्ति रखने पर उसका दायित्व अपने पर आयेगा ही। फलतः उसके बंधन में बंधना ही होगा।

यदि एक बार यह भी मान लिया जाये कि हमारी कर्म-शृंखला आदि से अन्त तक निष्कलंक एवं निष्पाप रहती है, तब भी उसमें आसक्ति रखने पर बन्धनों का अधिकारी बनना होगा। पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म दोनों ही, यदि वे आसक्ति से प्रेरित हैं, निश्चय ही बंधनों के कारण बताये गये हैं। बंधनों से रक्षा का केवल एक ही उपाय है कि कर्मों अथवा उनके फलों में कर्तापन का भाव अथवा आसक्ति न रखी जाये।

जब हम कर्म कर रहे हैं और स्पष्ट देख और समझ रहे हैं कि स्वयं ही इनको कर रहे हैं, तब भी उनमें कर्तापन का भाव न आये, यह बात भी कुछ कम कठिन नहीं है। तथापि तत्व-वेत्ताओं ने इसका भी बड़ा सरल उपाय बताया है- और वह इस एक उपनिषद् वाक्य में निहित है-

यद्यत् कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रह्मण समर्पयेत्।

‘जो-जो कर्म करें वह सब ब्रह्म को समर्पित कर दें।’

अपने समस्त कर्म, तदनुसार कर्मफल यदि परमात्मा को समर्पित कर दिये जायें, तो उनका कोई दायित्व अपने पर न रहे। ऐसी निरपेक्ष स्थिति द्वारा ही बंधनों से बचे रहा जा सकता है अन्यथा नहीं। समर्पण की इस भावना से सारे कर्मों का भार परमात्मा अपने ऊपर उसी प्रकार ले लेता है, जिस प्रकार तत्कृते कार्य करने वाले कर्मचारी के काम का दायित्व बड़ा अधिकारी अपने ऊपर ले लेता है। कर्म और कर्मफल में आसक्ति रखने पर मनुष्य को जिन अनुकूल-प्रतिकूल परिणामों के बीच से गुजरना पड़ता है और जिसके फलस्वरूप आशा-निराशा के झटके खाने पड़ते हैं, समर्पण की दशा में उसकी संभावना शेष नहीं रह जाती। मनुष्य सफलता-असफलता से प्रभावित हुए बिना निर्द्वन्द्व भाव से कर्तव्य-पथ पर अग्रसर होता रह सकता है। अपने कर्म और कर्मफल परमात्मा को समर्पित कर देने पर मनुष्य सफलता में हर्षातिरेक के कारण स्थगन और असफलता में निराशा के कारण प्रत्यावर्तन, इन दोनों अयोग्यताओं से बच जाता है।

किसी के काम से सफलता-असफलता दोनों ही सम्भाव्य हैं। दोनों का प्रभाव निष्क्रियता का कारण बन सकता है। तथापि सफलता की अपेक्षा असफलता का आघात अधिक गहरा होता है। इसको न सहन करने वाले बहुधा निराश ही हो जाते हैं। इस घातक स्थिति से बचे रहने के लिये कर्म और कर्मफलों को ब्रह्मार्पण कर देना एक पवित्र तथा अप्रतिहत उपाय है। ऐसा समर्पणशील व्यक्ति न कभी चिन्तित होता है और न निराश। अपने लक्ष्य के प्रति उसका आशावाद अजर-अमर बना रहता है, जिसके आधार पर वह निरन्तर बाधा-व्यवधानों की उपेक्षा करता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है-उसे पीछे लौटने की प्रवृत्ति नहीं होती। आशावाद ही जीवन और उसकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य है। इसका महत्व बतलाते हुए तत्ववेत्ता अरस्तू ने कहा है- ‘अपने कर्मों और उसके फल को ईश्वर पर छोड़ देने से आशावाद अजर-अमर बनता है। ईश्वर सभी तरह आशावाद का केन्द्र है। आशावाद और ईश्वरवाद एक ही रहस्य के दो नाम हैं।’

अपने कर्म और उनका परिणाम ईश्वर पर छोड़ देने से, कर्तव्यों का अपार भार सिर पर होने और लाख सफलता, असफलता आने पर भी मनुष्य तटस्थ बना रहता है। उसे आशा-निराशा, चिन्ता, दुष्चिन्ता कुछ भी नहीं होती। वह सदैव एक-सा प्रसन्न तथा स्वस्थ बना रहता है। संसार के महान उद्योग संचालक हेनरी फोर्ड ने एक प्रश्न के उत्तर में अपने व्यस्त तथापि स्वस्थ जीवन का रहस्य बतलाते हुए एक स्थान पर कहा हैं- ‘मैं ईश्वर को अपने कार्यों का प्रबंधक मानता हूँ तथा स्वामी मानता हूँ और अपने आपको काम करने वाला श्रमिक। ईश्वर को अपने काया का प्रबंधक और स्वामी माँगने से फिर मुझे कोई चिन्ता नहीं रहती और इसी निश्चिन्तता के कारण मैं अधिक स्वस्थ और संतुष्ट रहता हूँ।’

इस प्रकार, कहना न होगा कि अनासक्ति कर्मयोग जीवन का एक बहुत बड़ा समाधान है। यदि आप चाहते हैं कि जीवन के उन्नत लक्ष्य तक पहुँच सकें, हारकर बीच रास्ते से न लौटना पड़े, तो अपने सारे कर्म और कर्मफल ब्रह्मार्पण करके अनासक्त कर्मयोग का आश्रय लीजिये और जीवन में लक्ष्य की सफलता के साथ कर्म-बंधन से मुक्त रह कर संसार-सागर से पार हो जाइये।

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