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Magazine - Year 1970 - Version 2

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वासनाओं के कुचक्र में आत्मबल का ह्रास

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जिस दिन मनुष्य इस सत्य को स्वीकार कर लेगा कि संसार के भोग-विलासों का सुख मिथ्या है और यह अन्ततः अधःपतन के कारण होते हैं, उसी दिन से वह देवत्व की ओर अग्रसर हो उठेगा।

मूर्खता की परिभाषा इन शब्दों में की गई है कि किसी काम की प्रत्यक्ष हानि को देखते हुए भी उसे न छोड़ना और करते रहना मूर्खता है। विषय-लिप्सा ऐसी ही एक मूर्खता है। सभी जानते हैं कि विषय का विष न केवल ओज, तेज और बल पौरुष को ही नष्ट करता है, बल्कि आयु को भी कम कर देता है। जो कुछ आयु बचती भी है वह भी अशक्तता तथा व्याधियों के कारण बोझ बन जाती है।

इसी संदर्भ में लोग एक मूर्खता और भी करते हैं वह यह-वासनाओं की पूर्ति द्वारा वासना-तृप्ति का प्रयत्न, यह सोचकर कि इस समय का विकार संतुष्ट कर लिया जाये, आगे फिर इसका अवसर न आयेगा। किन्तु होता यह है कि तात्कालिक वासना की पूर्ति तत्काल ही खत्म हो जाती है और फिर वही वासना नई होकर उठ पड़ती है। भूत काल की क्षणिक तृप्ति न वर्तमान में काम आती है और न भविष्य में। यह क्रम यों ही चलता रहता है और मनुष्य ‘केवल इस बार और’ के भ्रम में आजीवन इसी में फंसा रहता है। वासनाओं से दूषित मृत्यु मरने से, उसे परलोक से भी वंचित होना पड़ता है।

ऐसे एक नहीं अनेक पुरुष हुये हैं, जिन्होंने प्रारम्भ में वासना के दोष से बच कर बड़े-बड़े तप तथा सराहनीय साधनायें की हैं। उल्लेखनीय सिद्धियाँ प्राप्त कीं और कथनीय कार्यों को कर दिखाया। फिर वही तपस्वी तथा तेजस्वी व्यक्ति वासनाओं के दलदल में फंसे और शोचनीय अन्त को प्राप्त हुए। इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग हुए जिनका प्रारम्भिक जीवन वासनापूर्ण रहा। पर जब उन्होंने उसकी निःसारता को समझा और उसका त्याग किया तो उनका वही निकृष्ट जीवन उत्कृष्ट हो गया। वे संसार के महान् पुरुष बन गये।

विषय-वासनाओं की तृष्णा एक ऐसी प्यास के समान होती है, जिसकी पूर्ति उसके बढ़ने में सहायक होती है। लोग यह सोचकर बड़ी भूल करते हैं कि अभी तो जवानी है। शरीर में रक्त और शक्ति है- जी भर कर भोग-विलास और विषय-वासनाओं का आनन्द क्यों न ले लिया जाये। जब बुढ़ापा आने लगेगा तब संयम कर लेंगे, जबकि सोचना यह चाहिये कि अभी से इस प्रबल शत्रु काम को विजित करने का प्रयत्न किया जाये। शरीर सक्षम होने से अभी कोई भी साधन तथा संयम बन सकता है। आगे चलकर जब बुढ़ापा आ जायेगा, शरीर निर्बल हो जायेगा, जीवन की आशा धुँधली पड़ जायेगी तब यह अजर-अमर शत्रु मारे न मरेगा।

गलत ढंग से सोचने वाले सत्य से अनभिज्ञ बने भोग-विलासों के सेवन में लगे रहते हैं। जिसका फल यह होता है कि उनकी वासनायें तो बलवती होती जाती हैं और आयु तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। जल्दी ही वह समय आ जाता है कि अब तो कोई काम करने योग्य ही न रह जाये। शरीर और इन्द्रियाँ जर और जर्जर हो गई हैं, पर वासनाओं तथा विषय भोगों की तृष्णा और भी अतृप्त हो गई है। अब तो इस अशक्तता की स्थिति में न तो इन्हें तृप्त किया जा सकता है और न जीता जा सकता है। निःसंदेह यह विवशता कितनी कष्ट तथा पश्चातापदायिनी होती होगी, इसे भुक्तभोगी ही जान सकते हैं। इसी अनुताप में अन्त होता है और तब राजा ययाति की तरह गिरगिट या राजा साहसिक की तरह गधे की योनि भोगनी पड़ती है।

राजा ययाति कुछ कम प्रतापी और धर्मात्मा राजा नहीं थे। चक्रवर्ती राज्य था, पतिव्रता पत्नी थी। तेजस्वी शरीर और इन्द्र जैसे देवताओं से मित्रता थी। उनके प्रतापी तथा योग्य होने का एक प्रमाण तो यही है कि असुर-गुरु शुक्राचार्य ने अपनी प्राणप्रिय बेटी देवयानी का इनके साथ विवाह कर दिया था और असुर राज वृषपर्वा ने अपनी बेटी शर्मिष्ठा को सेविका के रूप में भेंट कर दिया था।

इस प्रकार प्रतापी राजा ययाति बहुत समय तक कुशलतापूर्वक राज्य और जीवन संचालित करते रहे। किन्तु संयोगवश एक बार उन्होंने संयम की डोर ढीली कर दी। वासनात्मक विचार को प्रश्रय दे दिया और बस तभी से उनकी दुर्दशा के दिन प्रारम्भ हो गये।

एक बार अपनी सेविका शर्मिष्ठा को वासनात्मक दृष्टि से देख लिया। मनुष्यता के प्रबल शत्रु काम को अवसर मिल गया। वह तुरन्त राजा ययाति के ढीले मन में घुस बैठा और लगा अपना जाल बिछाने। संयम की उपेक्षा करने वाला ययाति उसमें एक बार फंसा तो फंसता ही चला गया। जप-तप, पूजा-पाठ तो छूट गया और भोग-विलास शुरू हो गया। राजा ययाति ने इस परिवर्तन को आँका जरूर, पर सोचने में वही गलती कर गया- अभी तो यौवन काल है, क्यों न थोड़ा भोगों का भी सुख ले लिया जाये। जब वय-वार्धक्य होगा, विषयों को तिलाँजलि दे दूँगा और फिर परमात्म-चिन्तन में लग जाऊंगा।

एक दिन इस विषय-सुख को छोड़ ही देना है- इस अहंकार में बेचारा ययाति एक गलती और कर गया। वह यह कि वह कुछ असामान्य गति से भोग-विलास में निमग्न हो गया। यदि वह सामान्य रूप से भोगों को भी भोगता रहता और कुछ भजन-पूजन भी करता रहता तो शायद उसकी वह दुर्दशा न होती, जो हुई और कुछ सत् संस्कार बने रहते, जो बुढ़ापे में संबल बनकर सहायक होते। लेकिन वह भोगों के फन्दे को साधारण ग्रन्थि मानकर भूल कर गया।

विषयानुविषय का क्रम तेजी से चल पड़ा, जिसकी वेदी पर पुण्य, संस्कार, शक्ति, आयु और भविष्य बलि होते चले गये। ययाति ज्यों-ज्यों तृप्ति की तृष्णा से विषयों में गहरा उतरता चला गया त्यों-त्यों निम्न से निम्नतर डूबता चला गया।

उसकी वासना की पहली शिकार शर्मिष्ठा बनी। उस असुर कुमारी ने भी वह अवसर पाकर राजा को होश में नहीं आने दिया और उसकी वृत्तियाँ यहाँ तक दूषित कर दीं कि वह राजा ययाति व्यभिचारी बन गया और बहुनारी गमन में प्रवृत्त होने लगा। परिणाम यह हुआ कि उसका तेज, तप और शरीर जल्दी-जल्दी क्षीण हो गया, बुढ़ापे ने घेर लिया। उस बुढ़ापे ने नहीं, जिसे सम्माननीय आयु कहा जाता है बल्कि जरठता ने-जिसमें शरीर झुलस जाता है, त्वचा लटक जाती हैं आँखें धंस जाती हैं, वात-पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाता है, दाँत गिर जाते हैं, आँखें मर जाती हैं, कान जवाब दे जाते हैं और देह में कम्प रहने लगता है। बाल उखड़ने लगते हैं और रीढ़ झुक जाती है। अत्यधिक वीर्य नाश के कारण तेजस्वी राजा ययाति इसी प्रकार के घृणित बुढ़ापे का बंदी बन गया। तिस पर अनुताप यह कि जिन भोगों को कभी भी छोड़ देने का दम भरता था वे उसे और भी अधिक सताने लगे। अशक्त शरीर की प्रबल वासनायें जो यातना देती हैं वह राजा ययाति को मिलने लगीं उनका मन-मस्तिष्क दिन और रात जलने गलने लगा। उसकी बुद्धि पराकाष्ठा तक नष्ट हो गई। विवेक उस व्यभिचारी का साथ छोड़कर चला गया। ययाति इस सीमा तक हतबुद्धि हो गया कि अपने बेटों से जवानी उधार माँगने लगा। तेजस्वी बेटों में क्षमता थी कि यदि वे चाहते तो अपना यौवन उसे दे सकते थे। किन्तु एक को छोड़कर सभी बेटों ने इन्कार कर दिया। पर सबसे छोटे लड़के पुरु को पिता की दयनीय याचना पर दया आ गई उसने अपना यौवन उसे दे दिया।

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