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Magazine - Year 1970 - Version 2

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अधूरी साधना-अपूर्ण फल

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‘देव-सेना का सञ्चालन एक मनुष्य को सौंपकर हमें अपयश का पात्र न बनायें देवराज ! क्या सम्पूर्ण देवलोक में एक भी देवता ऐसा नहीं रहा, जो देव-सेना का सेनापतित्व कर सके ? क्या वस्तुतः हमें एक मनुष्य की अधीनता स्वीकार करनी ही पड़ेगी ?, देवराज इन्द्र के सामने खड़े सहस्रों देवताओं ने एक स्वर से प्रश्न किया और लज्जावश अपने शीश नीचे झुका लिये।

‘हम विवश हैं देवताओं !’ इन्द्र आहत वाणी में बोले-प्रजापति ब्रह्मा की ऐसी ही इच्छा है। उनका कथन है कि असंयम में डूबे देवगण अपनी सामर्थ्य जब नष्ट कर डालते हैं तब उनकी रक्षा भी कोई मनुष्य ही करता है। महाराज मुचकुंद यद्यपि मनुष्य हैं, पर संयम और पराक्रम में उन्होंने देवताओं को भी पीछे छोड़ दिया है। इसलिये आज सम्पूर्ण पृथ्वी और देवलोक में उनके समान प्रतापी एवं बलशाली और कोई दूसरा नहीं रहा। प्रजापति का कथन है कि संयमी और सदाचारी व्यक्ति मनुष्य तो क्या, देव-दनुज सभी को परास्त कर सकता है। अतएव हम विवश हैं, उनकी आज्ञा शिरोधार्य करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा भी तो नहीं रहा।’

दूसरे दिन युद्ध के लिये देव-वाहिनियाँ चलीं, तब उनका संचालन महाराज मुचुकुन्द कर रहे थे। संयम और तपश्चर्या का अपूर्व तेज उनके मुख-मण्डल पर चमक रहा था। मनुष्य-शरीर होते हुए भी वे साक्षात् देव-प्रतिमा से लग रहे थे। आह्लाद चित्त मुचुकुन्द ने युद्ध की इच्छा से शंख-ध्वनि की, तो सम्पूर्ण दिशायें प्रकम्पित हो उठीं। असुरों के हृदय विदीर्ण करने वाला यह नाद सुनकर देवगण पुलकित हो उठे- उन्हें अपनी विजय का विश्वास हो गया।

एक मास तक घनघोर युद्ध हुआ। असुरों की सेना सम्राट मुचुकुन्द ने ऐसी बिगाड़ डाली जैसे जंगली शूकर हरी-भरी खेती को। बीसियों सेनापति बदल डाले, पर मुचुकुन्द के पराक्रम के आगे असुरों की एक न चली। सारे संसार में तब एक ही स्वर गूँज रहा था-धन्य हो मुचुकुन्द का संयम, इन्द्रिय-विजय और धन्य हो उनका शौर्य, जिसने देव-दनुज दोनों को ही लज्जित करके रख दिया।

इधर अपनी प्रशंसा सुनते-सुनते मुचुकुन्द के मन में अहंकार बढ़ने लगा। प्रजापति ब्रह्मा ने मुचुकुन्द के हृदय में पनप रहे विष-बीज को देखा, तो वे चिन्तित हो उठे। उन्होंने पुनः इन्द्र को बुलाया और कहा- ‘तात ! मुचुकुन्द की साधना अधूरी रह गई लगती है। संयमी और पराक्रमी होने के साथ उसे निरहंकारी भी होना चाहिये था। संयम से स्वर्ग जीत जाते हैं, सो अब तुम अविलम्ब स्वामी कार्तिकेय के पास जाओ और उन्हें सैन्य संचालन के लिये राजी कर लो।’

इन्द्र द्वारा उक्त कथन से असहमति होने पर ब्रह्माजी ने मनुष्य में अहंकार से ही उसके पतन होने की बात समझाई। तब देवराज इन्द्र ने विधाता की आज्ञा को स्वीकार किया और वहाँ से चल पड़े। लौटने पर ज्ञात हुआ कि वस्तुतः प्रजापति का अनुमान गलत नहीं था। कल तक केवल युद्ध में ही ध्यान लगाने वाला मुचुकुन्द आज अहंकारवश सुरा और सुन्दरियों की लपेट में आ गया है और अपनी सारी शक्ति उसी में नष्ट कर रहा है। देवराज तत्काल लौटे और भगवान् कार्तिकेय को सैन्य-संचालन के लिये राजी किया। देवताओं की जागरुकता ने उन्हें बचा लिया अन्यथा मुचुकुन्द ने नाव बीच में ही डुबो दी होती।

मुचुकुन्द को असुरों ने बन्दी बनाकर पुनः पृथ्वी पर जा पटका, तब उन्हें अपनी भूल का पता चला। किन्तु अब पश्चाताप से भी तो कुछ नहीं हो सकता था। निराश मुचुकुन्द के पास प्रजापति ब्रह्मा स्वयं पहुँचे और बोले- ‘तात ! तुम्हारी साधना अधूरी रह गई थी, उसी का यह फल है। अब फिर से शक्ति की साधना प्रारम्भ करो, पर देखना इस बार अहंकार भूलकर भी न करना।


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