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Magazine - Year 1970 - Version 2

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हम अणु से ही उलझे न रहें ‘विभु बनें’

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प्राग (चैकोस्लोवाकिया) में एक ऐसी मशीन तैयार की गई है, जो धातु की पतली चादरों और जल्दी पिघलने वाली धातुओं को काटने या छेद करने के काम आती है। यह मशीन एक मिलीमीटर के सौवें भाग तक सही कटाई कर सकती है। इतनी सूक्ष्म और सही (एक्युरेट) किसी तेज अस्त्र, चाकू या आरी से नहीं की जाती। यह कार्य इलेक्ट्रॉनों की किरण फेंककर किया जाता है। इलेक्ट्रान की एक किरण की विद्युत क्षमता 60000 वोल्ट होती है। फिर यदि कई किरणों का समूह (बीम) प्रयुक्त किया जाये, तो उससे कितनी शक्ति प्रवाहित हो सकती है?- इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है।

इलेक्ट्रान परमाणु का ऋण विद्युत आवेश मात्र है। वह 0.00000001 मिलीमीटर व्यास के अति सूक्ष्म परमाणु का एक अंश मात्र है। लेकिन परमाणु का स्वयं भी कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप से केवल इसका प्रभाव देखा जा सकता है। परमाणु का सबसे आश्चर्यजनक जगत तो उसकी चेतना, केन्द्रक या नाभिक (न्यूक्लियस) में विद्यमान है। इस सम्बन्ध में हुई खोजे बड़ी महत्वपूर्ण हैं और नाभिकीय विद्या (न्यूक्लियर साइन्स) के नाम से जानी जाती हैं। उसका प्रारम्भ 1895 में प्रो. हेनरी बेक्वेरल ने किया और जेम्स चैडविक ने उसे विकसित किया। नाभिक में प्रसुप्त शक्ति को खोजा प्रो. एनारेको फर्मी ने। उन्होंने न्यूट्रॉन के अनेक रहस्यों का पता लगाकर सारे विज्ञान जगत में तहलका मचा कर रख दिया।

नाभिकीय शक्ति का पता लगाकर प्रो. फर्मी को भी कहना पड़ा था- ‘हम छोटी-छोटी वस्तुओं में उलझे पड़े हैं। वस्तुतः संसार में महान शक्तियाँ भी हैं, जिनसे सम्बन्ध बनाकर हम अपने आप को और अधिक शक्तिशाली तथा प्रसन्न बना सकते हैं।’

यह शक्तियाँ, जिनका पता लगाया गया है, परमाणुओं की हैं और यह बताती हैं कि छोटी-से-छोटी वस्तु भी इतनी शक्तिशाली हो सकती है, तो यदि विश्व-विराट के केन्द्रक (न्यूक्लियस) का पता लगाया जा सके, तब तो मनुष्य की क्षमता का वारापार ही न रहे।

परमाणु के नाभिक व्यास 0.0000000000001 मिलीमीटर होता है, उसके भीतर केले के पत्तों की तरह मूल रूप से तीन कण विद्यमान रहते हैं- (1) प्रोट्रॉन, (2) न्यूट्रॉन और नाभिक की कक्षा में चक्कर लगाने वाले (3) इलेक्ट्रान। प्रोट्रॉन और न्यूट्रॉन की संख्या लगभग समान होती है, पर प्रोट्रॉन में धन विद्युत होती है जबकि न्यूट्रॉन में कोई आवेश नहीं होता। परमाणु का सारा भार इसी पर आश्रित है। यह तत्त्व विश्व में शक्ति और पदार्थ या प्रकृति और परमात्मा की तरह हैं। इलेक्ट्रान तो उस जीव की तरह है, जो अपने मूल बिन्दु से भटक जाने के कारण अशान्त घूमता रहता है। जब तक वह ईश्वरीय स्वरूप को प्राप्त नहीं कर लेता, कई कक्षाओं में अशान्त इधर-से-उधर घूमता रहता है। पर उसे शान्त चित्त बैठकर अपनी क्षमता पर वैसे ही विचार करने का मन नहीं आता, जिस तरह मनुष्य अपने शरीर, अपनी इन्द्रियों के चक्कर में ऐसा पड़ा रहता है कि वह शरीर के अणु-अणु में भरी आत्म-चेतना की ओर ध्यान ही नहीं कर पाता।

इलेक्ट्रान की मात्रा तो एक प्रोट्रॉन के लगभग 1845 वें हिस्से के ही बराबर होती है, तब उसमें इतनी शक्ति होती है कि प्राग में बनी मशीन चलाई जा सकती है, यदि उसके नाभिक की शक्ति का अनुमान करना पड़े, तो बुद्धि ही काम न दे।

पानी में जिस तरह भँवर उठा करते हैं, उसी प्रकार नाभिक (न्यूक्लियस) एक प्रकार की ‘ऊर्जा भँवर’ ही होती है। नाभिक कोई स्थूल पदार्थ नहीं, वरन् एक प्रकार की चेतन सत्ता है, जिसमें शक्ति भी है और भार भी। यदि हम उसे धारण कर सकें, तो योगियों के समान पदार्थ पर नियन्त्रण प्राप्त कर सकते हैं।

बनारस जिले में गुजी नामक स्थान के निकट जन्मे पवाहारी बाबा के बारे में प्रचलित है कि वे स्थूल अन्न ग्रहण नहीं करते थे। पव अर्थात् वायु, आहारी अर्थात् ग्रहण करने वाला पवाहारी अर्थात् जो केवल वायु का ही आहार ग्रहण करता था। वे काठियावाड़ के गिरनार पर्वत पर रहकर साधना करते थे। महीनों गुफा के अन्दर बन्द रहते थे। कई बार तो लोगों को सन्देह होता था कि वे मर गये। पर जब वे निकाले जाते थे, तो उनके शरीर-स्वास्थ्य में कोई अन्तर नहीं आता था। अमेरिकी डाक्टरों के एक दल ने एक बार उनकी जाँच करके बताया था- ‘आहार द्वारा जो तत्त्व शरीर ग्रहण करता है वह सब तत्त्व उनके शरीर में हैं।’ जबकि वे खाना खाते ही नहीं थे। श्री पवाहारी बाबा अपनी विचार व भावनाओं के चेतना-प्रवाह द्वारा हवा में पाये जाने वाले अन्न और खनिज के सभी तत्त्व खींच लेते थे और इसी का परिणाम था कि वे बिना खाये जीवित बने रहते थे। मानसिक चेतना द्वारा पदार्थों के हस्तान्तरण के ऐसे सैकड़ों उदाहरण और चमत्कार हिमालय में रहने वाले कई योगियों में आज भी देखे जा सकते हैं। यह सब अन्तःचेतना की शक्ति के विकास से ही सम्भव होता है। पदार्थ के नाभिक की शक्ति का साधारण अनुमान उसकी इलेक्ट्रानिक शक्ति से लगाते हैं, तो आत्म-चेतना की शक्ति का तो अनुमान ही नहीं किया जा सकता।

ऊर्जा कोई स्थूल पदार्थ नहीं है। ताप, विद्युत और प्रकाश के सम्मिलित रूप को ही ऊर्जा कहते हैं। प्रकृति का प्रत्येक कण इस तरह एक शक्ति है, जबकि आत्मा उससे भी सूक्ष्म और उस पर नियन्त्रण करने वाला है। इसलिये उसे ताप, विद्युत या प्रकाश के लिये बाह्य साधन भी अपेक्षित नहीं। यदि हम आत्मा को प्राप्त कर सकें, तो इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति हम अपने भीतर से ही कर सकते हैं। घोर अन्धकार में भी आत्मदर्शी निर्भय चला जाता है, क्योंकि उसका प्रकाश उसे साथ देता है। जिस तरह हम दिन के प्रकाश में चलते हैं। योगी घने अन्धकार में भी वैसे ही चलता है। विद्युत एक ऐसी शक्ति है, जिससे शेर-चीते भी बस में किये जा सकते हैं। वह मनुष्य के पास हो, तो वह हथियारों से लैस सेना से भी क्यों डरेगा ? स्वामी रामतीर्थ हिमालय की तराइयों में घूमा करते थे, तब शेर-चीते भी उनके पास ऐसे आ जाते थे जैसे छोटे-छोटे बच्चे अपने पास खेला करते हैं। उनके शरीर में उतनी शक्ति होती है, जिससे प्रकृति के किसी भी परिवर्तन को आसानी से सहन किया जा सके। सूर्य के मध्य भाग में 50000000 डिग्री ताप होता है, पर वह इस शक्ति का 200000 वाँ हिस्सा ही उपयोग में लेता है। हमारी सामान्य दीखने वाली शक्तियाँ भी संचित सूर्य की ताप-शक्ति के समान हैं। पर उन्हें न जानने के कारण हम दीन-हीन स्थिति में पड़े रहते हैं।

एक पौण्ड यूरेनियम 235 को तोड़ा जाता है, तो उससे उतनी ऊर्जा प्राप्त होती है, जितनी 20000 टन टी.एन.टी. के विस्फोट से। यह शक्ति इतनी अधिक होती है कि उससे 100 वॉट पावर के दस हजार बल्ब पूरे वर्ष दिन-रात जलाये रखे जा सकते हैं। स्ट्रासमान ने सर्वप्रथम इसी शक्ति का उपयोग नागासाकी और हिरोशिमा को फूँकने में किया था। यह सब शक्ति तो आत्मिक चेतना या नाभिक के आश्रित कणों की शक्ति है। यदि नाभिक को तोड़ना किसी प्रकार सम्भव हो जाये, तो विश्व-प्रलय जैसी शक्ति उत्पन्न की जा सकती है- इसे आत्मदर्शी योगी जानते हैं।

परमाणु का भार अचिन्त्य है और उसकी शक्ति अकूत। वैज्ञानिक बताते हैं कि यदि सारी पृथ्वी को पीटकर नाभिकीय घनत्व के बराबर लाया जाये, तो वह कुछ घन फुट में ही समा जायेगी। इसी से नाभिक की लघुता का अनुमान किया जा सकता है। किन्तु इस घनीभूत की गई पृथ्वी का एक अंगूर के बराबर टुकड़ा काटें, तो उसका भार साढ़े सात करोड़ टन होगा। ऐसी मजबूत चादरों के ऊपर यदि इस टुकड़े को रख दिया जाये, जिन्हें छेदना सम्भव न हो, तो यही टुकड़ा पृथ्वी को भगाकर अन्तरिक्ष में कहीं और लेकर भाग जायेगा। यदि उसे खुली मिट्टी पर रख दिया जाये, तो वह पृथ्वी को फाड़ता हुआ चला जायेगा और सम्भव है पृथ्वी को छेदकर वह स्वयं भी कहीं अन्तरिक्ष में जाकर भटक जाये। परमाणु के अन्दर इस नाभिक की शक्ति से वैज्ञानिक आश्चर्यचकित है।

यह सूक्त बताते हैं कि भारतीय योगियों की सूक्ष्म दृष्टि भी वैज्ञानिकों की तरह ही रही है और उन्होंने चेतन सत्ता के नाभिक की जानकारी कर ली है। पदार्थ का परमाणु हमें सूक्ष्म-से-सूक्ष्म सत्ता की शक्ति की अनुभूति तो कराता है, पर वह चेतन सत्ता की जानकारी नहीं देता। भारतीय तत्ववेत्ताओं ने भी ऐसे ही चेतन परमाणु और उसके विभु नाभिक का पता लगाया। उसे चेतन सत्ता आत्मा या ईश्वरीय प्रकाश के रूप में माना है और उसकी विस्तृत खोज की है। उपलब्धियाँ दोनों की एक तरह की हैं। उपनिषद् उसे- ‘अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा’ (आत्मोपनिषद् 15।1) अणु से अणु और महान से महान बताती है। योग-वशिष्ठ में उसे इस प्रकार व्यक्त किया है-

अतीतः सर्वभावेभ्यो बालाग्रादप्यहं तनुः।

                          इति तृतीयो मोक्षाय निश्चययो जायते सताम्॥    -5।17।15


                 परोऽणु सकलातीत रुपोऽहं चेत्यहं कृतिः।  -5।73।10


                         सर्वस्माद्वयतिरिक्तोऽहं बालाग्र शतकल्पितः।   -5।33।51


मुक्ति दिलाने वाला यह आत्मा बाल की नोंक के सौवें भाग से भी सूक्ष्म परमाणु और दृश्य पदार्थों से विलग रहने वाला है। उसे जानने वाला सब कुछ जानता है।

देवी भागवत में आत्म-सत्ता की प्रार्थना - या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण तिष्ठति। ‘हे भगवती सम्पूर्ण भूत प्राणियों में शक्ति रूप से आप ही निवास करती हैं’ - की गई है। उस शक्ति और आत्म-चेतना के विज्ञान को भारतीय आचार्यों ने इतना अधिक विकसित किया कि भौतिक उपलब्धियों से जब उसकी तुलना करने लगते हैं, तो लगता है कि आज के वैज्ञानिकों ने जो कुछ पाया है, वह उस अथाह ज्ञान-सागर का जल-बिन्दु मात्र है।



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