• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • जीवन कलाकार हाथों से सँजोया जाय
    • इस वर्ष का महत्वपूर्ण कार्यक्रम एक लाख यज्ञ एवं सामूहिक मंत्रोच्चारण
    • भय से बचे रहें
    • Quotation
    • अध्यात्म का प्रथम चरण परिमार्जन
    • मन को समुन्नत बनाने का एक मात्र राजमार्ग
    • Quotation
    • तत्व ज्ञान का तीसरा चरण
    • कृतज्ञता और प्रत्युपकार (kahani)
    • Quotation
    • आध्यात्म साधना और आहार शुद्धि
    • व्यामोह में फंसे (kahani)
    • प्राणशक्ति और वैज्ञानिक अभिमत
    • चिकित्सा क्षेत्र में ध्यानयोग का प्रवेश
    • Quotation
    • अजपा जप-सोऽहम् साधना
    • सिद्ध पुरुष (kahani)
    • मनःक्षेत्र में चित्त की भूमिका
    • साम्यवाद के जन्मदाता (kahani)
    • प्रगति में लगन का योगदान
    • हमारा जन्म सिद्ध अधिकार (kahani)
    • कुण्डली साधना की पृष्ठ भूमि
    • महाराज प्रसिचेत (kahani)
    • आये दिन की समस्याएँ और उनके समाधान
    • Quotation
    • विज्ञानमय कोष और दिव्य दर्शन
    • वैराग्य का नशा (kahani)
    • मनुष्य में संव्याप्त जैव विद्युत
    • ब्रह्माजी के पास पहुँचा (kahani)
    • मानवी काया का अदृश्य अस्तित्व
    • स्वेच्छा मरण- एक उलझी गुत्थी
    • Quotation
    • संकल्पशक्ति सर्वोपरि
    • जीवन के अन्तिम दिन (kahani)
    • रोग निवारण हेतु मनोबल का उपयोग
    • Quotation
    • पूर्वार्त्त और पाश्चात्य लोगों का बुढ़ापा
    • सत्याग्रह की योजना (kahani)
    • यह सब कैसे सम्भव हुआ?
    • सदा के लिए वह कुप्रथा बन्द (kahani)
    • धर्मतंत्र के परिशोधन मार्टिन लूथर
    • Quotation
    • चौथी क्रान्ति सर्वनाश नहीं ला रही
    • चन्द्रगुप्त के शासन काल में (kahani)
    • विशेष धारावाहिक -लेखमाला-सावित्री-सविता की ऊर्जा एवं आत्मा
    • VigyapanSuchana
    • यज्ञ द्वारा प्राण पर्जन्य की वर्षा
    • शान्तनु ने स्वप्न देखा (kahani)
    • ब्राह्मणत्व का उद्देश्य एवं स्वरूप
    • राजा महेन्द्र प्रताप (kahani)
    • अपनों से अपनी बात
    • सब कुछ कहने के लिए विवश न करें
    • जिन्दगी का स्वरूप
    • जिन्दगी का स्वरूप (kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1986 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


अजपा जप-सोऽहम् साधना

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 15 17 Last
प्राणायाम की एक विधा विशुद्ध आध्यात्मिक है, जिसे अजपा जप-सोऽहम् साधना या हंस योग कहते हैं। इसका सामान्य प्रयोग बहुत सरल है। स्थिर शरीर और शान्ति चित्त होकर श्वास के आवागमन की क्रिया आरम्भ की जाय। साँस लेते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम’ की ध्वनि श्रवण पर चित्त एकाग्र किया जाय।

इस विधान में कई प्रयोजन एक साथ जुड़ जाते हैं। नादयोग में सूक्ष्म ध्वनियों के श्रवण का अभ्यास किया जाता है और उसके लिए शब्द तन्मात्रा को विकसित करके दिव्य कर्णेन्द्रियों का प्रयोग किया जाता है। अन्यथा खुले कानों से तो आस-पास की हलचलों का कोलाहल ही सुनाई पड़ता है। श्वास के साथ धुली हुई ‘सो’ और ‘हम्’ की ध्वनियों को सुनने के लिए सूक्ष्म कर्णेंद्रियों की साधना करनी पड़ती है। इसलिए इस योगाभ्यास में नादयोग जुड़ा हुआ माना जा सकता है।

इस साधना में ध्यानयोग भी जुड़ा हुआ है। श्वास के आवागमन पर चित्र एकाग्र करना पड़ता है। वह न बन पड़े तो वायु प्रवेश के साथ ‘सो’ की और निकलने साथ ‘हम्’ के श्रवण का तालमेल ही नहीं बैठता। हर साँस की गतिविधि पर ध्यान रखना पड़ता है। इतना ध्यान जम जाने के उपरान्त ही ध्वनि श्रवण का अगला कदम उठता है।

‘सोऽहम्’ वेदान्त मन्त्र है। ‘सो’ का अर्थ वह और ‘हम्’ का अर्थ मैं है। ‘वह परमात्मा मैं हूँ, “मैं परमात्मा के समकक्ष हूँ की भावना का विकसित करना वेदान्त तत्वज्ञान का आधार है। तत्वमसि, शिवोऽहम्, सोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् अयमात्मा ब्रह्म, आदि सूत्रों में इसी तत्वज्ञान का प्रतिपादन है कि आत्मा और परमात्मा के मध्य अविच्छिन्न एकता है। दोनों के मध्य अंश, अंशी का सम्बन्ध है। चिनगारी और ज्वालमाल जैसा। इस अनुभूति का दर्शन एवं प्रयोग ‘पंचदशी’ आदि ग्रन्थों में विस्तार पूर्वक बताया गया है। उस अद्वैत साधना का अभ्यास भी इस प्रयोग प्रयोजन के साथ जुड़ जाता है।

गायत्री मन्त्र चौबीस अक्षरों का है। उसमें तीन व्याहृतियां भी संयुक्त हैं। किन्तु उस महामन्त्र में अनायास ही अचेतन जप किये जाने से प्रत्येक साँस के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का, ईश्वर दर्शन का, प्रयोजन भी सधता है। इसलिए इसे अजपा गायत्री जप भी कहा गया है। गायत्री साधना में उच्चस्तरीय भूमिका में प्रवेश करते हुए साधक को सोऽहम् साधना का भी अभ्यास करना पड़ता है। इसलिए यह जहाँ गायत्री का सार तत्व है वहीं सुसंचालित साधना क्रम भी। अन्य जपों में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना होता है, पर यह अनायास ही बन पड़ता है। साँस के साथ स्वसंचालित रीति से यह बिना प्रत्यक्ष प्रयत्न किए हुए ही अनायास होता रहता है। यह श्वसन क्रिया सोते-जागते हर समय होती रहती है और साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है। इसलिए उसे बिना जप किये जप- “अजपा जाप” भी कहा जाता है।

योगों के अगणित प्रयोगों और विधानों में एक हंस योग भी है। हंस इसलिए कहा गया है कि ‘सोह’ को उलट देने पर हंस बन जाता है। जैसे लगातार बिना रुके राम-राम कहा जाय तो वह उलटकर अथवा गति चक्र के आधार पर मरा-मरा जैसा प्रतीत होने लगता है। संस्कृत में एक विधा के अनुसार ‘हिंस’ अर्थात् हिंसक शब्द उलटकर सिंह बन गया है। सोऽहम् में भी ऐसी ही बात है। ‘स+अहम्’ इसका वास्तविक रूप है। अ का इस मिश्रण में लोप हो गया है। उसके उलट जाने पर ‘हंस’ शब्द बनता है।

भगवान के चौबीस अवतारों में एक हंसावतार भी हुआ है। इसे उसकी साधना भी कहा जा सकता है। हंसयोग का प्रतिफल ‘राजहंस’ या परमहंस के रूप में प्रकट होता है। यह दोनों ही अध्यात्म क्षेत्र की उच्च स्थितियाँ हैं।

हंस का गुण है- नीर-क्षीर विवेक। वह दूध और पानी के सम्मिश्रण को अलग कर देता है। दूध को ग्रहण करता और पानी को छोड़ देता है। अर्थात् श्रेष्ठ को ग्रहण करने और निकृष्ट को त्याग देने की उसकी प्रवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति साधक में विकसित हो तो समझना चाहिए कि हंस वृत्ति का अवतरण हुआ। हंस श्वेत होता है। साधक का जीवन क्रम वैसा ही हो तो समझना चाहिए कि कबीर की वह उक्ति सार्थक हुई, जिसमें उनने कहा था- ‘दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया।”

हंस के सम्बन्ध में कहते हैं कि वह मानसरोवर में रहता है। मोती चुगता है, कीड़े नहीं खाता। यह प्रतिपादन राजहंस स्तर के साधक की मनोवृत्ति का परिचय है। अन्यथा पक्षी हंस तो अन्य जलाशयों में रहते और कीड़े खाते भी देखे गये हैं। मोती ही खाने वाले हंस उस प्रवृत्ति के प्रतीक हैं कि भले ही भूख से प्राण निकले, घोर कठिनाइयाँ सहें पर अपना स्तर नीचे नहीं गिरने देते।

‘सोऽहम्’ की ध्वनि प्रकृति और पुरुष के मिलन से प्रादुर्भूत होती है। कहा गया है कि सृष्टि के आदि में परब्रह्म की इच्छा हुई कि मैं अकेला हूँ। अकेलेपन में क्या आनन्द, इसलिए मुझे एक से बहुत हो जाना चाहिए। यह इच्छा ही प्रकृति बन गई। प्रकृति जड़ थी, पुरुष चेतन। दोनों के संयोग से ही यह विश्व ब्रह्मांड बन सकता था। इसलिए दोनों का मिलना शब्दब्रह्म के रूप में प्रकट हुआ। जिस प्रकार घंटा, घड़ियाल में मोगरी की चोट पड़ने से झंकार थरथराहट जैसी ध्वनि होती है, वैसी ही कुछ प्रकट होने पर उस शब्द ब्रह्म को ओंकार कहा गया। प्रकृति और पुरुष के मिलन से जब जीव की उत्पत्ति हुई तो उसका वाचक शब्द हम् भी मिल गया। परमात्मा ‘स’। जीवन ‘अहम्’। दोनों के मध्यवर्ती प्रकृति का लोप हो गया। आत्मा और परमात्मा दो ही रह गये। उस द्वैत भाव का प्रतीक सोऽहम् है। इस प्रकार यह भी ओंकार का सहचर है। सृष्टि के आदि से ही इसका अस्तित्व है।

सोऽहम् साधना में आत्म बाध तत्व बोध का मिश्रित समावेश है। मैं कौन हूँ? उत्तर- ‘परमात्मा। इसे जीव और ईश्वर का मिलना, आत्म -दर्शन ब्रह्मदर्शन भी कह सकते हैं और आत्मा परमात्मा की एकता भी। यही ब्रह्मज्ञान है। ब्रह्मज्ञान के उदय होने पर ही आत्मज्ञान सद्ज्ञान, तत्वज्ञान, व्यवहार ज्ञान आदि सभी की शाखाएँ, प्रशाखाएं फूटने लगती हैं।

सोऽहम् साधना को अतीव उच्चकोटि की बताया गया है। उसे अद्वैत ब्रह्म की उपासना और वेदान्त दर्शन का सार संक्षेप भी कह सकते हैं।

First 15 17 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • जीवन कलाकार हाथों से सँजोया जाय
  • इस वर्ष का महत्वपूर्ण कार्यक्रम एक लाख यज्ञ एवं सामूहिक मंत्रोच्चारण
  • भय से बचे रहें
  • Quotation
  • अध्यात्म का प्रथम चरण परिमार्जन
  • मन को समुन्नत बनाने का एक मात्र राजमार्ग
  • Quotation
  • तत्व ज्ञान का तीसरा चरण
  • कृतज्ञता और प्रत्युपकार (kahani)
  • Quotation
  • आध्यात्म साधना और आहार शुद्धि
  • व्यामोह में फंसे (kahani)
  • प्राणशक्ति और वैज्ञानिक अभिमत
  • चिकित्सा क्षेत्र में ध्यानयोग का प्रवेश
  • Quotation
  • अजपा जप-सोऽहम् साधना
  • सिद्ध पुरुष (kahani)
  • मनःक्षेत्र में चित्त की भूमिका
  • साम्यवाद के जन्मदाता (kahani)
  • प्रगति में लगन का योगदान
  • हमारा जन्म सिद्ध अधिकार (kahani)
  • कुण्डली साधना की पृष्ठ भूमि
  • महाराज प्रसिचेत (kahani)
  • आये दिन की समस्याएँ और उनके समाधान
  • Quotation
  • विज्ञानमय कोष और दिव्य दर्शन
  • वैराग्य का नशा (kahani)
  • मनुष्य में संव्याप्त जैव विद्युत
  • ब्रह्माजी के पास पहुँचा (kahani)
  • मानवी काया का अदृश्य अस्तित्व
  • स्वेच्छा मरण- एक उलझी गुत्थी
  • Quotation
  • संकल्पशक्ति सर्वोपरि
  • जीवन के अन्तिम दिन (kahani)
  • रोग निवारण हेतु मनोबल का उपयोग
  • Quotation
  • पूर्वार्त्त और पाश्चात्य लोगों का बुढ़ापा
  • सत्याग्रह की योजना (kahani)
  • यह सब कैसे सम्भव हुआ?
  • सदा के लिए वह कुप्रथा बन्द (kahani)
  • धर्मतंत्र के परिशोधन मार्टिन लूथर
  • Quotation
  • चौथी क्रान्ति सर्वनाश नहीं ला रही
  • चन्द्रगुप्त के शासन काल में (kahani)
  • विशेष धारावाहिक -लेखमाला-सावित्री-सविता की ऊर्जा एवं आत्मा
  • VigyapanSuchana
  • यज्ञ द्वारा प्राण पर्जन्य की वर्षा
  • शान्तनु ने स्वप्न देखा (kahani)
  • ब्राह्मणत्व का उद्देश्य एवं स्वरूप
  • राजा महेन्द्र प्रताप (kahani)
  • अपनों से अपनी बात
  • सब कुछ कहने के लिए विवश न करें
  • जिन्दगी का स्वरूप
  • जिन्दगी का स्वरूप (kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj