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Magazine - Year 1986 - Version 2

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पूर्वार्त्त और पाश्चात्य लोगों का बुढ़ापा

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इन दिनों बच्चों की अधिक उत्पत्ति की तरह बूढ़ों की संख्या में भी अतिशय बढ़ोत्तरी हो रही है। एक अनुमान के अनुसार इस सदी के अन्त तक तीन चौथाई जनसंख्या बूढ़ों की होगी। इसे चिकित्सा शास्त्री अपनी औषधियों का चमत्कार और अर्थशास्त्री सुविधा सम्वर्धन का प्रतिफल मानते हैं। पर वस्तुतः इसमें खुशी मनाने जैसा कोई कारण नहीं है। यह बढ़ती हुई विपत्ति का चिन्ह है।

आहार-विहार में उत्तेजनाओं की भरमार होने से कामुकता भड़कती है। इस भड़काव में अश्लील साहित्य, कामुक फिल्मों का उत्तेजनात्मक वातावरण बनाने में भी असाधारण योगदान मिलता है। फलतः अल्पायु में ही प्रजनन महत्वाकाँक्षा उभर पड़ती है। नर-नारी के बीच रहने वाला एक झीना अन्तर चिरकाल से चला आया है। इसके फलस्वरूप इस प्रसंग में थोड़ी रोकथाम भी थी। पर अब उस प्रकार का प्रतिबन्ध उठ जाने से नर-नारी का कार्यक्षेत्र घुल-मिल गया है। सहशिक्षा से लेकर दफ्तरों में साथ काम करने तक की परिपाटी ने उन प्रतिबन्धों को उठा लिया है जो नर-नारी के सहचरत्व में अब तक बाधक होते रहे हैं। उस नैतिकता की भी एक प्रकार से समाप्ति हो गई जो नर-नारी के बीच पवित्रता बनाये रखने वाला पूज्यभाव रखती थी। अब पशु परम्परा का मनुष्यों में भी प्रचलन बढ़ा है। भगिनी, पुत्री, माता और पत्नी का अन्तर पशु वर्ग में नहीं होता। मनुष्य भी अब प्रकृति अनुगमन की दुहाई देकर उसी मार्ग पर चलने लगा है। वह लज्जा और संकोचशीलता अब उठती जा रही है जो इन वर्गों को विशेषतया एक दूसरे से पृथक रखती थी। अब बचपन के बाद सीधे यौवन आने लगा है। किशोरावस्था में बे-हिसाब कटौती हुई है। अल्पायु में ही किशोर अब माता-पिता बन जाते हैं और जो व्यवस्था प्रजनन संख्या को रोकती थी, वह किशोर प्रजनन के रूप में नये सृजन का आधार बनती जा रही है। अल्पायु में उभरी हुई कामुकता, गर्भपात, कृत्रिम निग्रह के रूप में स्वास्थ्य पर घातक असर डालती है। विशेषतया लड़कियाँ तो इस दबाव में बुरी तरह पिस जाती हैं। पढ़ने में मन नहीं लगता। गृहस्थी का अरुचिकर काम सम्भालना पड़ता है। बच्चे की उपेक्षा, नारी को सुलभ वात्सल्य नहीं करने देता। कृत्रिम साज-सज्जा भी जिनकी विवशता है अन्यथा वे रूपवती कैसे लगे और पुरुष वर्ग में अपना आकर्षण कैसे स्थिर रहे, इस कुचक्र में पाश्चात्य जगत की एवं आधुनिकता की शिकार अपने देश की नारियाँ बुरी तरह पिसती हैं और वे किसी प्रकार बाहरी साज-सज्जा बनाये रहकर भी भीतर से खोखली होती जाती हैं।

पुरुष को उपार्जन के लिए श्रम तो करना ही पड़ता है। पाश्चात्य देशों में और कितनी ही बुराइयाँ क्यों न हों, आलस्य नहीं है। पूरा वेतन प्राप्त करने के बदले उन्हें पूरा श्रम भी करना पड़ता है। इस थकान को वे शराब सिगरेट से पूरा करते हैं। नशे से थकान तो कुछ हलकी होती है पर नींद लाने का काम उतने भर से नहीं होता, इसके लिए नींद की गोलियाँ का आश्रय अलग से लेना पड़ता है।

इतनी वस्तुएँ मिलकर उनकी जीवनी शक्ति का सफाया करती जाती हैं। यों वंश परम्परा के कारण शरीरों की बनावट भारी भरकम बनी रहती है।

आज पूरे समुदाय में विनोद, आनन्द का माध्यम कामुकता ही रह गया है। मानसिक क्षेत्र में उसे उत्तेजित करने और शारीरिक क्षेत्र में जीवन रस को निचोड़ने की दुहरी मार से शरीर इस योग्य नहीं रहता कि उचित वेतन मिलने के लिए जितना श्रम आवश्यक है उतना कर सके। ऐसी दशा में उनकी गणना वयोवृद्धों में होने लगती है। वयोवृद्ध होने का अर्थ है- “जवानी में पाली हुई कुटैवों को पूरा करने के लिए प्रचुर परिणाम में सामर्थ्य व धन उपलब्ध न कर सकना।” बुढ़ापे के साथ यह एक नई व्यथा और सम्मिलित हो जाती है।

जिनने अपने शरीर को असंयम से खोखला और विषाक्त औषधियों से गीली लकड़ी जैसा बना लिया है वे धुंआ तो बहुत देर देते रहते हैं पर न जलने की स्थिति में होते हैं, न बुझने की। जिनने जवानी में असंयम और दुर्व्यसनों से अपने को जीर्ण-शीर्ण बना लिया है वे नशे की तरह बीमारियों के भी अभ्यस्त हो जाते हैं। न वे जल्दी मरते हैं ने अच्छे होते हैं। धुंआ देने वाली लकड़ी की तरह अपना अस्तित्व भर देर तक बनाये रहते हैं।

पूर्वार्त्त बुढ़ापे में एक अच्छाई यह है कि वे आयु को भगवान की देन मानते हैं। वृद्धावस्था को वे सन्तोषपूर्ण काट लेते हैं। अपने जैसे अन्य साथियों से मेल मिलाप रखते हुए बुढ़ापे में सन्तोषपूर्वक रहने की बात स्वभाव में सहज ही उतार लेते हैं। अच्छा परलोक प्राप्त करने की आशा में भजन-पूजन, तीर्थ यात्रा आदि में समय काट लेते हैं। साधु-सन्तों का दरवाजा ऐसे ही खाली समय वाले लोगों के साथ बेतुकी बातें करने के लिए खाली रहता है। नाती-पोते, परपोते आदि के हाथों लकड़ी मिल जाने पर स्वर्ग सद्गति की आशा करते हैं। इन सब बातों को लेकर बढ़ती आधुनिकता व टूटते परिवारों के बावजूद पूर्व के वृद्धों का जीवन अपेक्षाकृत अधिक अभाव ग्रस्त होते हुए भी चैन पूर्वक बीतता है। वे अपने यत्किंचित् पूजा पाठ या देवी देवताओं की सहायता से स्वर्ग सद्गति की आशा अपेक्षा करते हैं। मन हलका रहने के कारण मृत्यु के समय व्यथा वेदना भी कम होती है।

पाश्चात्य जीवन की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। उन्हें भविष्य नहीं, भूत याद आता है। भूतकाल में जो विलासिता-कामुकता व्यवहार में लाते रहे, उसकी स्मृतियाँ उन्हें बहुत बेचैन करती हैं। धन और यौवन के अभाव में भूतकालीन विलासिता की वन्दना भर कर सकते हैं। व्यवहार में परिणत करने की कोई स्थिति “ओल्डमेन्स होम” में रहते हुए बनती नहीं।

पाश्चात्य मरणोत्तर जीवन बहुत लम्बा होता है। धारण यह है कि प्रलय के बाद नया जन्म मिलता है, तब तक कब्र में जीवन की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी यह लम्बे समय की कष्टसाध्य प्रतीक्षा की चिन्ता ही निराशा उत्पन्न करती है। संयुक्त परिवार प्रथा न होने के कारण अंश-वंश के कितने ही सदस्य होते हुए भी यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे लोग कम से कम मन बहलाने के लिए ही सही, कभी-कभी, पर्व पर ही सही साथ हो लिया करेंगे। उठती आयु वालों को अपनी समान आयु के सहचर चाहिए। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच इतनी बढ़ी खाई पैदा हो चुकी है कि उनका साथ-साथ रहना तो दूर, यदा-कदा मिलना-जुलना भी दुर्लभ होता है। ऐसी दशा में उन्हें सर्वथा नीरस और निराश जीवन जीना पड़ता है। यों वयोवृद्धों को सरकारी पेन्शन मिल जाती है, पर उनसे निर्वाह भर ही कठिनाई से पूरा हो पाता है। साथी सहचर कोई होता नहीं। होता है तो वे सभी मिल-जुलकर अपने भूतकाल के साथ वर्तमान की तुलना करते हुए खिन्न निराश और वर्तमान स्थिति के प्रति असन्तोष व्यक्त करते ही पाये जाते हैं।

वृद्धों की आयु तो भारत में भी बढ़ी है। पर वे बाल-बच्चों के साथ खेलने-खिलाने में अपने बीते बचपन को वापस लौटा लेते हैं। साथ ही भजन और देवी देवताओं की कृपा से परलोक में सद्गति के सपने भी देखते हैं। इस प्रकार पूर्वात्य वृद्धजनों का बुढ़ापा अपेक्षाकृत अधिक शक्ति से बीत जाता है। हर कोई वानप्रस्थ लेकर समाजसेवी बना जाएगा। यह कल्पना तो नहीं करनी चाहिए। फिर भी अभावों के बावजूद पूर्व के देशों के वृद्धों की आयुष्य का उत्तरार्ध पश्चिम की तुलना में अधिक शान्तिदायक है। फिर भी बुढ़ापा एक समस्या तो है ही।

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