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Magazine - Year 1986 - Version 2

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चौथी क्रान्ति सर्वनाश नहीं ला रही

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पिछली तीन शताब्दियों में तीन क्रान्तियाँ हो चुकीं, अब चौथी की तैयारी है। यह सिलसिला क्रमशः इसी प्रकार से चलता नहीं रहेगा, वरन् इन उथल-पुथलों को विराम लेकर किसी निर्णयात्मक केन्द्र पर पहुँचना पड़ेगा।

पहली श्रमिक क्रान्ति थी जिसे सामाजिक क्रान्ति भी कह सकते हैं। जिसमें दास-दासी सेवक और स्वामी, राजा और प्रजा के मध्य चलते रहे जमीन आसमान जैसे अन्तरों को समतल पर लाया गया। इसके लिए कोई संगठित सार्वभौम क्रान्ति नहीं हुई। जहाँ-तहाँ ज्वालामुखी फूटे वहाँ उन्होंने समय की गति से सबको अवगत कराया। इसमें मनुष्य को, उसके मौलिक अधिकारों की मान्यता मिली। साम्राज्यवाद का शिकंजा ढीला हुआ और वह उपनिवेशवाद में बदल गया। इसे राजनैतिक क्रान्तियों का युग भी कह सकते हैं जिसने जनतन्त्रों की नींव रखी।

दूसरी क्रान्ति को वैज्ञानिक क्रान्ति कह सकते हैं। यह आविष्कारों का युग रहा। इसमें सुविधा-साधनों का सम्वर्धन किया गया और व्यवसायी उनके आधार पर बड़े उद्योग खड़े करने लगे। इसे पूँजीवाद का युग भी कह सकते हैं। इसमें धनी वर्ग के हाथों अपार शक्ति आई। उसने इतना उत्पादन बढ़ाया, जिसने खपाने की- आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं वरन् खपाने की समस्या भी खड़ी कर दी। परिवहन के लिए रेल और जलयान भी आशातीत संख्या में बढ़े ताकि सुविधा साधनों को दूसरे देशों तक ही नहीं, छोटे देहातों तक भी पहुँचाया जा सके। यह पूँजीवादी जमाना रहा।

तीसरी क्रान्ति प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के निमित्त राजनेताओं की आपा-धापी और प्रतिस्पर्धा चरम सीमा तक पहुँची। पिछले दो युद्ध उसी की देन हैं। उसने वायुयानों से लेकर डायनामाइट तक के अनेकों उत्पादन किये। बम आयुध उसी की देन है। यह मण्डियों को कब्जे में करने का प्रच्छन्न साम्राज्यवाद था। यही माहौल विश्व युद्धों के रुक जाने पर भी अभी तक बना हुआ है। अब तक 134 के करीब क्षेत्रीय युद्ध हो चुके हैं। विज्ञान की प्रौढ़ता के साथ-साथ उसका लोभ संवरण शासक न कर सके और वह प्रगति अन्तरिक्षीय उपग्रहों, मिसाइलों और अणु आयुधों तक समय को घसीट लाया।

इसी बीच एक बड़ी घटना जापान पर अणु बम गिराने की थी। उसका मतलब था “दबो या मरो” पर उसका भी एकाधिकार न रहा। रूस प्रतिद्वन्द्वी के रूप में उभरकर आया। समुन्नत जापान रूस के साथ मिलकर शक्ति सन्तुलन न बना ले, इसी प्रयोजन के लिए जापान को आतंकित किया गया था। इसे आतंकवाद के महादैत्य का जन्म कह सकते हैं, जिसके बाल-बच्चे छापा मारों के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय बेरुत से लेकर जापान, अमेरिकी तक दे रहे हैं।

चौथी क्रान्ति क्या अणु आयुधों की वर्षा से होगी? क्या उसमें अन्तरिक्ष युद्ध छिड़ेगा और धरती का वातावरण मनुष्यों और प्राणियों रहने लायक न रह जायेगा?

इस संदर्भ में अनेक दृष्टिकोणों और तथ्यों को सामने रखकर विश्वदर्शी महा-मनीषी ऑरवेल एवं हक्सले कामा ने सुविस्तृत विवेचन किया है। उनकी पुस्तक है “व्रेव न्यू वर्ल्ड”। इसी स्तर के दो ग्रन्थ और पिछले दिनों सामने आये हैं एलविन टाफलन का “दि थर्ड वेव” एवं फ्रिटजॉफ काप्ना का “द टर्निंग पाइण्ट”। इनमें बताया गया है कि चौथी क्रान्ति अति निकट है। वह आरम्भ भी हो गई है और अपना प्रभाव अगले दिनों चमत्कारी ढंग से प्रकट करने लगेगी।

उपरोक्त तथ्यान्वेषी और क्रांतिदर्शी कहते हैं कि मनुष्य की मूर्खता में कमी नहीं पर वह इतनी अधिक कभी भी नहीं बढ़ सकेगी कि विपक्षी की जीतने के लालच में अपना भी सर्वनाश कर बैठे। जो माहौल कभी जापान पर बम गिराकर उत्पन्न किया गया था वही अब नये रूप में “स्टार वार” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। धमकी बरकरार है कि ‘दबो या मरो’। किन्तु स्पष्ट है कि प्रतिपक्ष भी समय रहते काट निकाल लेगा और स्थिति वही बनेगी जिसमें अणु आयुध बनते और जमा होते रहें पर उनके प्रयोग का अवसर नहीं आए। जापान ने सिद्ध कर दिया कि एकाधिपत्य का प्रयास जो प्रथम बार हुआ वह अन्तिम भी था। अब उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती। भले ही धमकी के साधन कितने ही बड़े एवं बहुसंख्या में बनते रहें।

चौथी क्रान्ति महाविनाश की दीखती भर है पर वह होगी नहीं। उसका स्थान समझदारी ग्रहण करेगी और नव सृजन की हवा चलेगी। यह सृजन कृत्य धीमी चाल से चल सकता है पर सर्वतोमुखी एवं सफल होकर रहेगा। यह समता का युग होगा। सम्पन्नता और प्रभुता का उन्माद समय रहते उतर जायेगा और प्रयास वे चलेंगे जिसमें विषमता ही नहीं विलगता भी अपना अस्तित्व गवाँ दे।

औसत आदमी सोचने लगा है कि अब समता और एकता की ओर बढ़ने से ही काम चलेगा। विषमता और विलगता से टकराव ही उत्पन्न होते रहेंगे और उनमें शक्ति का अपव्यय करने के अतिरिक्त और किसी प्रकार की उपलब्धि किसी के हाथ नहीं लगेगी।

यह चिन्तन हवा के साथ उड़ रहा है और वास्तविकता से जन-जन को अवगत कर रहा है। वह समय बहुत पीछे रह गया जब लोक चिन्तन का कोई महत्व न था। जब समर्थों की मनमानी चलती थी। अब लोक मानस अपने आप में एक शक्ति बनकर उभरा है और अपनी सामर्थ्य को इस सीमा तक विकसित परिपुष्ट कर रहा है कि आज के सामर्थ्यवानों को कल अपना सिर नीचे झुकाना पड़ेगा दुनिया में इतने साधन मौजूद हैं कि वर्तमान जन समुदाय का उससे भली-भाँति निर्वाह हो सके और सभी सुख पूर्वक जी सकें। महत्वाकांक्षाऐं अगले दिनों आपा-धापी में नहीं लगेंगी, वरन् उनकी दिशा धारा होगी- न्याय और विवेक का कार्यान्वयन। प्रकारान्तर में यही आदर्शवादिता है इसी के साथ मानवी गरिमा भी जुड़ी हुई है।

पुरुषार्थ भरे चिन्तन और प्रयास का ही परिणाम है कि आदिम युग से अब तक कछुए की चाल चलता हुआ वन्य मनुष्यों जैसा जीवन जिया जा रहा था, धरती पर थोड़े से साधन थे और थोड़े से मनुष्य, परन्तु अब इन शताब्दियों में यह वैभव विस्तार इतना बढ़ गया है , मानो आसमान से उतरा हो। क्या यह प्रगतिक्रम भविष्य में रुक जायेगा? क्या इस प्रगति क्रम की परिणति दुर्भाग्यपूर्ण होगी? क्या रुदन ही मनुष्य के भाग्य में बदा है?

प्रकृति के अन्तराल में से आश्वासन उभरता है कि आशंकाएं और सम्भावनाएं कुछ भी क्यों न हों, अन्ततः मनुष्य की समझदारी और दूरदर्शिता जीतेगी। साथ ही न्याय निष्ठा भी जीवित रहेगी। चौथी क्रान्ति सर्वनाश की विभीषिकाओं से भरी-पूरी दीखती भर है। पर यह बन्दर घुड़की मात्र है। हमें उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का स्वप्न देखना चाहिए और नव सृजन का ताना बाना बुनना चाहिए।

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