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Magazine - Year 1986 - Version 2

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अध्यात्म का प्रथम चरण परिमार्जन

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गीता में अध्यात्म की विवेचना एवं व्याख्या में बहुत कुछ कहा गया है। पर जब अर्जुन ने पूछा- “जो आपका निर्देशन हो उसे कहिए, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा।”

तब भगवान ने साधक को अपने बलबूते संकेतों को न समझ सकने की स्थिति में देखा तो स्पष्ट शब्दों में कहा-

“मामनुस्मर युद्धय श्च” “युद्ध स्व विगत ज्वरः” जहि शत्रु महावाहो काम रूपं दुराशनम्”

इन शब्दों में भगवान ने निश्चित निर्देशन दिया है और लड़ने के लिए कहा है। किससे लड़ा जाय? यह भी उपरोक्त निर्देशनों में स्पष्ट हो गया है। अपने भीतर जो दोष दुर्गुण भरे पड़े हैं जिन कुसंस्कारों ने अड्डा. जमा लिया है उनको देख और उखाड़ फेंकने के लिए परिश्रम कर।

गीता आध्यात्मिक ग्रन्थ है। उसमें शान्ति प्राप्ति और धर्म धारणा का प्रमुख प्रसंग है फिर भी भगवान उसे ध्यान धारणा, प्रत्याहार समाधि आदि की शिक्षा न देकर लड़ने के लिए प्रोत्साहन देते हैं। यह बात कुछ अटपटी लगती है। बुद्धि उसे सहज स्वीकार नहीं करती। वह उन प्रयोगों में सरलता देखती है जो घर के एक कोने में बैठकर जप ध्यान आदि कष्ट साध्य कार्यों का समर्थन करती है। पूजा-पाठ में वह समय लगता है जो व्यापार व्यवसाय का नहीं होता। इसलिए उन कृत्यों में कुछ खर्च भी नहीं पड़ता। बैठे रहने, जीभ या उँगलियां धीरे-धीरे हिलाते रहने भर से जब स्वर्ग मुक्ति जैसे लाभ मिल जाते हैं। आत्म साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन या अनुग्रह का लाभ मिलता है, तो उस सस्ते सौदे को क्यों छोड़ा जाय? बुद्धि तो थोड़ी लागत में बड़ा लाभ उठाने की तरकीबें सोचती रहती है। उसे जुआ सट्टा लाटरी स्तर के काम पसन्द आते हैं, या फिर छल प्रपंच में दूसरों को फंसाकर उल्लू सीधा करने का तरीका अच्छा लगता है। जोखिम उठाने और साहस पराक्रम का दायित्व वहन करने के लिए मन की दुर्बलता सहज सहमत नहीं होती। सरल छोड़कर कठिन काम के निर्देशन का जब आदेश मिलता है तो अपने इन्हीं भावों को, दलीलों को प्रस्तुत करते हुए अर्जुन कहता है- “तत्किं कर्मणि घोरे मो नियोजयसि माधवः” तब मुझे युद्ध जैसे घोर कर्म में क्यों नियोजित किया जाता है। मैं सरल को छोड़कर कठिन के झंझट में क्यों पडूँ?

अर्जुन जैसी मनःस्थिति में ही प्रायः साधक तर्क करते रहते हैं। सरल को ढूंढ़ते और कठिन से भागते हैं। पर उनकी मर्जी से तो संसार का विधान चक्र नहीं चलता। यहाँ तो उचित मूल्य चुकाने पर ही उपयुक्त वस्तु मिलने का शाश्वत नियम है। काँच सस्ता बिकता है पर असली हीरा तो उचित मूल्य चुकाने पर ही मिलेगा। एम. ए. की डिग्री प्राप्त करने के लिए चौदह वर्ष का कठोर श्रम और पुस्तक फीस आदि का पैसा चुकाना पड़ता है। पर यदि सस्ती डिग्री चाहिए तो कोई भी उन्हीं अक्षरों को उलटा करके लगा सकता है। AM (एम) का अर्थ होता है- “हूँ”। अपने नाम के आगे इस प्रकार कोई भी साक्षर लगा सकता है। इसमें कुछ भी खर्च नहीं करना होगा और फेल होने जैसा जोखिम भी नहीं है। किन्तु MA (एम. ए.) हर कोई अपने नाम के आगे नहीं लगा सकता।

अध्यात्म के सम्बन्ध में अनेकानेक लोगों की तरह अर्जुन की भी यही धारणा है। पर जब भगवान उसे वस्तुस्थिति बताते हैं। तब वह अपने भ्रम को स्वीकारता है और कहता है। “कार्पण्य दोषोपहत स्वभाव, पृच्छामित्वां धर्म संमूढ़ चेतः” मेरी बुद्धि तो सस्ते में महंगा पाने की कृपणता से भरी गई है। लोक व्यवहार का तो मुझे ज्ञान है कि बड़े पुरुषार्थ से ही बड़े काम सधते हैं पर धर्म के सम्बन्ध में मेरी स्थिति मूढ़मति लोगों जैसी हो गई है, और अनेकों की देखा-देखी मुझे भी यही सुहाता है कि जीभ की नोंक से कुछ शब्द कहते रहने भर से जब आध्यात्मिक उद्देश्य की- धर्म प्रयोजन की सिद्धि होती है तो जोखिम भरे दुस्साहस अपनाने का झंझट क्यों उठाऊँ?”

अर्जुन की बाल बुद्धि पर हँसते हुए, उसके तर्कों को झुठलाते हुए भगवान ने बहस में पड़ने की अपेक्षा स्पष्ट निर्देशन देना ही उचित समझा और कहा- तस्मात् युद्धाय युजस्व”- तो युद्ध के लिए तैयार हो और जुट।” अन्त में अर्जुन ने भी यही उचित समझा कि थोथे तर्क और ओछे उदाहरण प्रस्तुत करते रहने में कोई लाभ नहीं। निर्देशन का पालन करना ही उचित है। उसने अन्तिम क्षण कहा- ‘करिष्ये वचनं तव’ आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। उसने गाण्डीव उठाया और साथ ही जोखिम भी।

“ईश्वर उन्हीं की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं।” जब अर्जुन ने कठोर कर्त्तव्य पालन का साहस दिखाया तो भगवान ने उसे दो आश्वासन दिये। रथ के घोड़े चलाने का भी और विजय श्रीवरण करा देने का भी।

भगवान के मार्ग पर चलना, उनके बताये हुए निर्देशनों निर्धारणों को अपनाना ही प्रभु की सच्ची भक्ति है। सच्चे भक्त का लक्ष्य तक पहुँचना निश्चित है, पर उसे निमित्त मात्र तो बनना पड़ता ही है। ‘निमित्त मात्रं भव सत.य साचित” निमित्त मात्र बनाने में भी कुछ तो करना ही पड़ता है। इस कर्तृत्व पर ही भगवान का सारा जोर है। पूजा तो अर्जुन करते ही थे। मित्र भी थे और सम्बन्धी भी। हमेशा साथ में प्रत्यक्ष ही रहते थे। चित्र या प्रतिमा की बात भी नहीं थी कि उसे पूजा गया और फल न मिला। भगवान तो कर्म को देखते हैं। उन्हें किसी के शिष्टाचार उपचार मात्र, बच्चों की तरह फुसलाये जाने की आदत नहीं है। अर्जुन ने जब वस्तुस्थिति को समझ लिया तब कहा- “करिष्ये वचनं तव”- आपका कहना मानूंगा आपके आदेश अनुशासन का निर्वाह करूंगा।” उसने भगवान का मन्तव्य समझा और कर्मयोग अपनाया।

आत्मा को परमात्मा तक पहुंचाने के लिए जो प्रथम प्रयास करना पड़ता है परिमार्जन परिशोधन। गन्दगी हटाकर स्वच्छता का संस्थापन। पूजा गन्दे स्थान में कहाँ बन पड़ती है। मन्दिर में प्रवेश करने से पूर्व पैर धोकर भीतर जाने की प्रथा है। पुजारी भी भगवान की अर्चा करने से पूर्व उस कक्ष की पूरी तरह शुद्धि करते हैं। इसी परिशोधन को प्राथमिकता देने का भगवान का निर्देशन है।

अध्याय योग में अन्तरंग में जड़ जमाये हुए दोष दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों के निराकरण की आवश्यकता होती है। अपनी आदतों को सुधारना पड़ता है और स्वभाव में शालीनता का गहरा संस्थापन करना हाता है। मलिनता हटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। वह अनायास ही नहीं छूट जाती। मनोरथ करने भर से वह सब नहीं हो जाता, वरन् हर क्षण उनके उभरने की सम्भावना पर कड़ी नजर रखनी होती है और जहाँ भी जब भी वह उफान आया, आदर्शों का स्मरण दिलाते हुए उस पर तत्काल पानी डालना पड़ता है। दूध जब उफनने लगता है तो उसमें तनिक सा ठण्डा. पानी डाल देते हैं। यह बात सर्वतोमुखी आत्म-संयम अपनाने वाले को भी करनी पड़ती है। उपेक्षा करने से काम नहीं चलता।

मलीनता भगवान को सर्वाधिक अप्रिय है। बच्चे के कपड़े, हाथ पैर टट्टी में सने हों तो पहले माँ उसे भली प्रकार धोती है। नहलाती है, नये कपड़े बदलती है। इतना करने क बाद ही वह गोदी में उठाती है। ऐसा किये बिना वह बच्चे के रोने या आग्रह करने पर ध्यान नहीं देती और शुद्धि कृत्य पूरा होने तक उसे दूर ही रखती है। गीता के आरम्भ में भगवान और अर्जुन के बीच जो विवाद हुआ उसका यही सारांश है।

बात आंतरिक शुद्धि तक ही सीमित नहीं है। वह बाहरी क्षेत्र में भी कार्यान्वित होनी चाहिए। परिवार में, समाज में फैली हुई गन्दगियों से भी हमें जूझना चाहिए। अवाँछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध भी हमें लोहा लेना चाहिए। अपना पड़ौस, संपर्क क्षेत्र एवं प्रभाव क्षेत्र पर हमें अपने शरीर और मन की तरह ही दृष्टि रखनी चाहिए और उनका परिमार्जन करने के लिए गाण्डीव उठाना- प्रतिरोध करना भी ईश्वर का आदेश ही मानना चाहिए।

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