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Magazine - Year 1989 - Version 2

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परमसत्ता के अनुदान हर जीवधारी को एक समान

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परमात्म सत्ता की विधि व्यवस्था इस विराट ब्रह्माण्ड का संचालन बड़ी निराली सुदक्षता के साथ कर रही है। इसका प्रत्येक प्राणी-प्रत्येक घटक अपना जीवन क्रम निर्बाध रूप से चला सके, इसलिए उसने सभी को परिस्थितियों के अनुरूप सक्षम बनाया है। यद्यपि मनुष्य को अनेकानेक विभूतियाँ एवं विशेषताएँ मिली हैं इसी कारण वह सभी जीवों में ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं है कि मनुष्येत्तर प्राणियों के प्रति उसकी उदारता व प्यार में न्यूनता है।

जीवजगत का अध्ययन करने पर पता चलता है कि इन कनिष्ठ समझी जाने वाली अन्यान्य सन्तानों को भी ऐसी विलक्षण एवं अद्भुत क्षमताएँ प्रदान की हैं जिससे कि वे सभी अपने जीवन व्यापार का निर्वाह सक्षमता और सफलता पूर्वक कर सकें।

जीव जन्तुओं की नाना विधि विलक्षणताएँ उनकी उपयोगिता आवश्यकता के अनुरूप ही हैं। सभी जीवधारी अपनी दृष्टि, श्रव्य, घ्राण आदि संवेदन क्षमताओं के आधार पर विश्व उद्यान में सफलता पूर्वक विहार करते और इसी आधार पर सहयोग सहकार अपनाते देखे जाते हैं। इनमें दृष्टि क्षमता एक ऐसी विभूति है, जिसके द्वारा इस विश्व उपवन की सुन्दरता को देखा एवं उसमें से उपयोगी को चुना जा सकता है। पक्षियों में यह क्षमता आश्चर्यजनक रूप से अधिक होती है। बहुत ऊँचे उड़ने वाले गीध, बाज जैसे पक्षी ऊपर से ही छोटे-छोटे कीड़ों को देख लेते हैं और उन्हें उठाकर आहार बना लेते हैं। इनकी यह दृष्टि क्षमता मनुष्य की अपेक्षा आठ गुनी अधिक है।

कुछ अन्य जन्तु जो दृष्टि क्षमता में हीन होते हैं उनमें वैश्व चेतना ने इस अभाव को विशिष्ट प्राण शक्ति को देकर उन्हें आश्चर्यजनक रूप से सक्षम बनाया है। उदाहरण के लिए कुत्तों में जहाँ रंग बोध प्रायः नहीं के बराबर होता है और वे संसार को धुँधले धूसर रंग का ही देख पाते हैं। वहीं उनकी घ्राण शक्ति विलक्षण रूप से विकसित होती है। एक एलसेशियन कुत्ते में लगभग 2200 लाख घ्राण कोशिकाएँ पायी जाती हैं। मनुष्य में इन कोशों की संख्या मात्र 50 लाख होती है अतः वह केवल अधिकतम 10 हजार प्रकार की गंधों को पहचान सकता है, जबकि कुत्तों में लाखों गुना अधिक गन्धों को पहचानने की क्षमता पाई जाती है।

नेवले के सूँघने की शक्ति मनुष्य तो क्या कुत्ते से भी अधिक होती है। कोलम्बों के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मादक पदार्थ की तस्करी की रोकथाम के लिए प्रशिक्षित नेवलों का उपयोग किया जाता रहा है। तस्करी का माल ढूंढ़ निकालने या विस्फोटक सामग्री को खोज निकालने में इन क्षुद्र कहे जाने वाले जीवों की अद्भुत क्षमता देखते ही बनती है। इस कार्य के लिए नेवलों को प्रशिक्षित करने का कार्य अमेरिका में बृहद् पैमाने पर किया जा रहा है। प्राणि विशेषज्ञों का कहना है कि नेवला एक अत्यधिक समझदार और सूझबूझ वाला प्राणी है। किसी भी प्रकार की सूक्ष्म गंध को सूँघ सकने में वह सक्षम है।

कुछ जीवधारी ऐसे भी हैं, जिसमें मात्र निज के उपयोग की एक ही प्रकार की गंध पहचानने की अद्भुत सामर्थ्य है। जैसे कि एक प्रकार के गुबरैले का लार्वा। यह अपना भोजन अंगूर की जड़ों से प्राप्त करता है। इनसे निकलने वाली कार्बन डाई आक्साइड गैस की गंध को यह आश्चर्यजनक रूप से पहचानता है। भूमि के ऊपर से इस गंध को पहचान कर उसके सहारे जमीन के अन्दर घुसकर जड़ों तक पहुँच जाता है।

कुछ जीव-जन्तुओं की परिस्थितियाँ एवं विहार काल असामान्य होते हैं और तदनुरूप उनका व्यवहार भी। जैसे कि रात्रि विचरण। ऐसे जन्तुओं में दृश्येन्द्रियों का कोई विशेष महत्व उपयोग नहीं होता। अतः इनमें परम सत्ता की कृपा एक अन्य विशिष्टता-श्रव्य क्षमता के रूप में प्रस्फुटित होती है। चमगादड़ प्रतिध्वनि द्वारा स्थिति का निर्धारण शत प्रतिशत सही ढंग के करते हैं। ये जन्तु कुछ विशिष्ट प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं जिनमें से मात्र कुछ एक ही मनुष्य के लिए श्रव्य हैं। इनकी प्रतिध्वनियों द्वारा ये अपने शिकार का पता लगा लेते हैं साथ ही उड़ते समय मार्ग में पड़ने वाले अवरोधों, विघ्नों को भी जान लेते हैं। इस प्रकार बिना किसी विघ्न-बाधा के सुरक्षित विचरण करते हैं। प्रत्येक अपनी स्वतः उत्पन्न की हुई ध्वनि की प्रतिध्वनि द्वारा ही मार्गदर्शन प्राप्त करता है और साथ साथ अपने अन्य साथियों की प्रतिध्वनियों से भ्रमित भी नहीं होता। उनकी यह अप-श्रव्य-पराश्रव्य ध्वनि एवं प्रतिध्वनि उत्पादन तथा वर्गीकरण प्रक्रिया वैज्ञानिकों के लिए आज भी एक रहस्य बनी हुई है।

एक और अन्य आश्चर्यजनक सुनने का तरीका उत्तरी अमेरिका की इक्न्यूमान मक्खी में पाया जाता है। इसके पैरों में कान होते हैं। इनका अधिकाँशतया उपयोग वह हार्नटेल लारबा के लकड़ी चबाने से उत्पन्न ध्वनि को सुनने में करती है।

अन्याय जन्तु संवेदनात्मक संकेतों के प्रति आग्रही होते हैं। उनके क्रिया-कलापों का संचालन इन्हीं पर निर्भर है, उदाहरणार्थ मधुमक्खी पहले फूलों की गंध से अत्यधिक आकर्षित होती है। वे पत्तियों के आधार पर उनकी आकृति एवं रंग की पहचान करती हैं। भोजन चूस लेने के पश्चात् वे सीधे अपने छत्ते की ओर आकर्षित होती हैं। ठीक उसी प्रकार जिस तरह पूर्व में पुष्पों की ओर थी। अब कोई भी पुष्प चाहे कितना ही आकर्षक एवं सुगंधित क्यों न हो उन्हें लुभा नहीं सकता। नियामक सत्ता ने एक विशिष्टता इन्हें प्रदान की है। वह है पराबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशीलता। इसी क्षमता के द्वारा वह सूर्य की सही स्थिति का निर्धारण करने में सक्षम होती हैं। चाहे वह कितने ही घने बादलों में क्यों न छिपा हो? इसी से दिशा-निर्धारण प्रक्रिया सम्भव होती है।

परमात्मा को अपनी सृष्टि के प्रत्येक घटक से कितना प्यार है, उसने उनकी आवश्यकतानुरूप कैसी कैसी विचित्रता- विशिष्टता प्रदान की हैं। इसके अनेकानेक उदाहरण वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही नित्य निरन्तर नवीन खोजों के रूप में सामने आ रहे हैं। इन्हें हम भले ही अपने मनोनुकूल किस भी भाषा या शब्दावली में व्यक्त करें। किन्तु हर दशा में यह समस्त विशिष्टताएँ विभूतियाँ वस्तुतः परमसत्ता की सरल समदर्शिता को ही प्रदर्शित करती हैं।

ऐसी ही एक नवीन विलक्षणता का पता सन् 1952 में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो.डा. टी.एच. बुलाँक ने लगाया। उन्होंने बताया कि रैटिल सर्प में तृतीय नेत्र भी पाया जाता है। यह नासाद्वार एवं आंखों के बीच 2 छोटे गढ्ढों के रूप में होते हैं और ऊष्मा संवेदन के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। इनके माध्यम से वह रात्रि विचरण के समय घोर अँधेरे में भी अपना शिकार भली प्रकार खोज लेते हैं।

ऐसी अनेकों विशेषताएँ-विलक्षणताएँ परम पिता ने अपनी सन्तानों को उनकी आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुरूप प्रदान की है। ताकि वे सब इस विश्व वाटिका में सुगमता एवं सक्षमता पूर्वक विहार कर सकें।

सचमुच उस सत्ता का स्नेह प्यार अगाध है। संसार का कोई पदार्थ या व्यक्ति जितना समीप हो सकता है उसकी अपेक्षा ईश्वर की निकटता और भी अधिक है। फिर भी आश्चर्य है, इतना सब होते हुए सृष्टि का सर्वाधिक बुद्धिमान कहा जाने वाला मनुष्य अपनी बुद्धि के आवरण में लिपटा उससे अरबों-खरबों-कोसों दूर है। उसकी समीपता की अनुभूति के साथ जिस परम आनन्द और सन्तोष का अनुभव होना चाहिए वह उसे कभी हुआ ही नहीं।

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