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Magazine - Year 1989 - Version 2

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देव संस्कृति की विशिष्टता-विविधता!

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भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्ति के सामंजस्यपूर्ण विकास को मानव जीवन का उद्देश्य माना जाता रहा, जिसका सम्बन्ध मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा से है। ये विशेषताएँ ऐसी थी, जिनके कारण यहाँ के व्यक्तियों में समन्वयवादिता, उदारता, सहिष्णुता, गतिशीलता, सूक्ष्मदर्शिता जैसे दिव्यगुणों का समावेश था। चूँकि व्यक्तियों के संस्कार से ही संस्कृति का निर्माण होता है अतः यहाँ की संस्कृति में भी ये गुण पाये गये।

भारतीय संस्कृति समन्वयात्मक है। यहाँ के मनीषियों ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमेशा मेल-मिलाप करने का ही सफल प्रयास किया। यह संस्कृति ऐसे सार्वभौम सत्यों पर खड़ी है कि किसी भी संस्कृति के साथ इसका टकराव हो ही नहीं सकता, वरन् विभिन्न धाराएँ जैसे समुद्र के गर्भ में समा जाती हैं, वैसे ही विभिन्न देशों की संस्कृतियाँ भी इसमें समाहित हैं। साँस्कृतिक दृष्टि से वह देश और वह जाति अधिक शक्तिशाली और महान समझे जाने चाहिए, जिसने विश्व के अधिक से अधिक देशों, अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियों को अपने भीतर समा करके, पचा करके नये साँस्कृतिक रस का निर्माण किया हो। टकराहट के कटुता का वातावरण बनता है, जिसमें विकास की कोई संभावना नहीं रहती है। चाहे वह व्यक्ति हो या संस्कृति। भारतीय संस्कृति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है, क्योंकि यहाँ की संस्कृति में अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियाँ समाई हुई हैं। रविंद्रनाथ टैगोर ने अपनी रचना ‘एई महामानेवर सागर तीरे’ में कहा है “किसी का भी अब अलग अस्तित्व नहीं है। वे सबके सब मेरे भीतर विराजमान हैं। मुझसे कोई भी दूर नहीं है। मेरे रक्त में सबका सुर ध्वनित हो रहा है।” इसकी समन्वयवादी महत्ता को रामधारी सिंह दिनकर ‘संस्कृति का प्राण’ कहते हैं।

भारतीय संस्कृति की दूसरी प्रमुख विशेषता उसकी उदार प्रवृत्ति है। विद्वान बर्ट्रेण्ड रसेल ने संस्कृति का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहा है- “दूरदर्शी, विवेकवान, चरित्रनिष्ठ और उदारमना नागरिकों का होना इस बात का चिन्ह है कि संस्कृति को समझा और अपनाया गया।” ‘व्हाट लाइफ शुड मी टू यू’ ग्रन्थ में एडल लिखते हैं-”अपनत्व को परिवार एवं धन वैभव की संकीर्ण सीमा में केन्द्रित न हरने देकर यदि उसे व्यापक बनाया जा सके, तो समझना चाहिए कि यहाँ मानवी संस्कृति ने अपना प्रभाव छोड़ा है” भारतीयों का यह व्रत रहा है कि अपने विकास की साथ ही दूसरों के विकास तथा उत्थान की भी चेष्टा तथा सहायता की जाती रहे। भारत भूमि को “स्वर्गादपि गरीयसी” इसीलिए कहा जाता है कि यहाँ के शिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत लोगों की यह नीति रही है, जो पाया है, उसे बिना अपने पराये का भेदभाव किये बाँटा-बिखेरा। इस विभाजन वितरण में विशेषता अधिक जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने की नीति का पूरा पूरा समावेश किया गया। सूर्य की उष्मा, बादलों की सरसता एवं वायु की सजीवता बनकर यहाँ के निवासी उदारमना दृष्टिकोण से सम्पूर्ण भूमण्डल में ज्ञान का आलोक फैलाते रहे।

स्वर्गलोक के निवासियों की सम्पदा उन्हीं के काम आती है। धरती वाले उस वैभव की लाभ कहाँ उठा पाते हैं? देवताओं में देने की प्रवृत्ति तो है, पर साथ ही यह इस स्तर की है कि, जो अनुनयपूर्वक माँगे उसी को अनुग्रह रूप में दिया जाय। बिना माँगे स्वतः विपन्नता को तलाशना एवं बिना याचना के उस विषमता को निरस्त करने के लिए जा पहुँचना, यह विशेषता धरती के देव मानवों में ही पाई जाती है। इन्हीं देवमानवों ने भारतीय संस्कृति की आधारशिला रखी है।

त्याग एवं उदारता की इस पराकाष्ठा पर आकर भारतीय संस्कृति विदेशियों को भी मुग्धकर लेती है किसी भी संस्कृति के आदर्शों को अपनाने में भारतीय को कभी कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। यह भारतीय संस्कृति की अनुपम उदारता का ही लाभकारी परिणाम था कि अनेकों संस्कृतियों ने अपने आपको भारतीयता के रंग में रंग कर भारतीय कहलाने में गौरव समझा।

भारतीय संस्कृति के बहिरंग में वैविध्य या अनेकता दिखाई पड़ती हैं परन्तु अन्तरैक्य ने इस वैविध्य और अनेक्य को अपने आँचल में समेट रखा है। यहाँ की मूल विशेषताओं में एक है-”अनेकत्व में एकत्व की भावना।” सारे देश के मनुष्य चाहे कहीं भी रहते हों, उनकी कोई भी भाषा हो, उनके संस्कार भिन्न ही क्यों न हों, यह अनुभव करने के लिए बाध्य हैं कि सभी भाई-भाई हैं। यहाँ के लोगों की मान्यता है “अध्यात्म का सार, नवनीत; अनेकता में एकता” का हमने अपनी माँ के दूध के साथ ही पान किया है। अनेक सम्प्रदाय, धार्मिक अनुष्ठान तथा उपासना पद्धति बाह्य रूप में भले ही भिन्न दिखाई देती हों, परन्तु उसका मूल “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” में निहित है। यह एक ऐसे गुलदस्ते के समान है, जिसमें अनेक पुष्प सुशोभित हो रहे है। यह उस इन्द्र धनुष के समान है, जिसमें सात रंगों की चमक स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने पर भी वह रहता एक ही है।

‘अवसरानुकूलता लचीलापन तथा गतिशीलता” इस संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। परिवर्तन और क्रान्ति के द्वार सदा खुले रहते हैं। तीव्र आँधी में लता की तरह जो आँधी के बहाव के साथ झुक जाते हैं वही अपनी अमरता को बनाये रखते हैं। इसके विपरीत जो नहीं मुड़ते, अपने पूर्वाग्रहों हठवादिता को नहीं छोड़ते, स्थिर बने रहते हैं, उन्हें जड़ मूल सहित उखड़ना पड़ता है। युगों के परिवर्तन के साथ यहाँ के आदर्श और प्रचलन के मानदण्ड बदलते रहते हैं। प्रत्येक दिशा या द्वार से आने वाली प्रेरणा या प्रकाश को प्राप्त करने के लिए अपने मस्तिष्क और मन के गवाक्ष पूर्णतः खुले रहने की भावना यहाँ रहती है। यही कारण है कि यह संस्कृति प्रत्येक युग में सतत बढ़ती और विकसित होती रही है, जबकि इस अवधि में कई संस्कृतियाँ नष्ट हो गयीं, विलुप्त हो गयीं।

यहाँ के लोग भौतिक की तुलना में पराभौतिकता, स्थूल की तुलना में सूक्ष्म, जड़ की तुलना में चेतन एवं तत्व चिन्तन को प्रधानता देते रहे। यही कारण है कि इस पुण्य भूमि पर विचारक मनीषियों की न्यूनता कभी नहीं रही। प्राचीन भारत के ऋषियों ने जीव व ब्रह्म की गुत्थियों को सुलझाकर उनमें एकत्व के दर्शन किये। परमात्मा को आदर्शों एवं सिद्धान्तों के समुच्चय के रूप में देखा एवं अपनाया। मानव सेवा को ही परमात्म सेवा समझा। सहस्रों वर्षों पूर्व के युग में विश्व के अन्य देशों में रहने वाले लोग अन्न वस्त्र जैसी दैनिक जीवन और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नरत थे, उसी समय भारत के ऋषि इसकी पूर्ति से निश्चित और इनसे बहुत ऊपर उठकर लोक से परे के रहस्योद्घाटन में व्यस्त थे। “भारत का प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक है” यह धारणा सर्वथा निर्मूल नहीं। भारतीय संस्कृति के आदि काल से ही व्यक्त की अपेक्षा अव्यक्त और स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म को अधिक महत्व दिया जाता रहा है। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म की अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति ने जहाँ दार्शनिकता का विकास किया, वहीं दूसरी ओर भौतिक की अपेक्षा आत्मिक विभूतियों को श्रेय मानने की प्रवृत्ति ने भारतीय आचार शास्त्र तथा नीतिशास्त्र को प्रभावित किया।

समन्वयवादिता, उदारता, सहिष्णुता अनेकता में एकता, अवसरानुकूलता, गतिशीलता, पराभौतिकता एवं सूक्ष्मता ऐसे दिव्य गुण हैं जो शाश्वत एवं सनातन हैं। इन्हीं गुणों के आधार पर व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र सही अर्थों में प्रगति कर पायेगा। आने वाले दिनों में सारे विश्व के व्यक्ति इन गुणों को अपने जीवन में स्थान देकर भारतीय संस्कृति की गौरव-गरिमा बढ़ायेंगे एवं इन्हीं सूत्रों के द्वारा यह बृहत्तर भारतवर्ष पुनः “स्वर्गादपि गरीयसी” कहलायेगा।

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