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Magazine - Year 1989 - Version 2

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प्रकृति से छेड़छाड़ हमें बड़ी महँगी पड़ेगी

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मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें किसी तरह के परिवर्तन उसे प्रभावित किए बिना नहीं रहते। बदलते मौसम में खाँसी-जुकाम बुखार आदि आदि की बातों से हम सभी परिचित हैं। पर वर्तमान मनोविज्ञान ने अपने अध्ययन के द्वारा एक और चीज प्रमाणित की है। वह है पर्यावरण की हलचलें जो न केवल हमारे शरीर को प्रभावित करती हैं, बल्कि हमारा मन भी उससे बड़ी नजदीकता से जुड़ा हुआ है। इस सम्बन्ध में अध्ययन कर्ताओं का मत है कि पर्यावरण और अन्तःकरण दोनों को एक दूसरे से बड़ा घनिष्ट संबद्ध मानना होगा।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के मनो विशेषज्ञ ई. ब्रुन्सविक ने “सिस्टेमेटिक एण्ड रिप्रेजेन्टेटिव डिजाइन ऑफ साइकोलॉजिकल एक्सपेरीमेण्टस” में पहले पहल इस चीज का विवरण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार प्राकृतिक वातावरण की अच्छाई-बुराई हमारे व्यवहार को बहुत हद तक प्रभावित करती है। किसी न किसी रूप में सभी इससे प्रभावित होते हैं भले कुछ कम हों और कुछ ज्यादा।

पिछले दिनों मनुष्य ने विकास की दौड़ में प्रकृति के साथ बड़ी नोंच खसोट की है। इस तरह के बर्ताव ने समूचे पर्यावरण को चरमरा दिया है। डब्लू. के. इस्टेस ने “सोशल इकालॉजी एण्ड ह्यूमन विहेवियर” में इसके प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि “इससे मनुष्य की मानसिकता विकृत हुई है, जिसके परिणाम हिंसा, अपराध, विघटन आदि के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं”।

विकसित अथवा विकासशील देशों में जहाँ भी वातावरण गड़बड़ाया है, किया गया अध्ययन उपरोक्त बात को सही साबित करता है। अमेरिका को दुनिया का सबसे अधिक विकसित देश माना जाता है। यहाँ के न्यूयार्क, वाशिंगटन, न्यूजर्सी जैसे बड़े शहरों के साथ कस्बे भी ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि से ग्रसित हैं। यहाँ का अध्ययन करके अपराध मनोविज्ञानियों ने एक ब्यौरा प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार हर पांचवें सेकेंड में एक डकैती होती है। हर छठवें मिनट में किसी नारी के साथ बलात्कार की घटना होती है। हर पच्चीसवें मिनट में एक हत्या हो जाती है। हर अड़तीसवें सेकेंड में एक व्यक्ति पर प्राणघातक हमला होता है। हर तीसरे सेकेंड में एक आर्थिक गड़बड़ी का अपराध दर्ज हो जाता है। हर दसवें सेकेंड में सेंधमारी होती है, जबकि औसत अमरीकी की आय बीस हजार डालर से अधिक है। हर चौथे सेकेंड में तस्करी का एक मामला दर्ज होता है। हर छब्बीसवें सेकेंड में एक मोटर गाड़ी चोरी हो जाती है। यही नहीं सर्वेक्षण कर्ताओं के अनुसार वहाँ के मैनहट्टन क्षेत्र में स्थिति यहाँ तक है कि कुछ सड़कों में रात सात बजे के बाद निकलना बाहरी व्यक्ति के लिए जान हथेली पर ले निकलने जैसा है। यह स्थिति सबके लिए समान है चाहे वे विदेशी हों अथवा अमेरिकी।

पर्यावरण की गड़बड़ी से मनःस्थिति को गड़बड़ाने की व्याख्या सोशल साइन्स रिसर्च इन्स्टीट्यूट, सदर्न कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सरनाँफ मेडनिक ने की है। उनके अनुसार वातावरण की विकृति मन के चेतन स्तर पर तनाव पैदा करती है। साथ ही अवचेतन स्तर के पाशविक संस्कारों को उद्दीपित भी करती है। तदनुरूप ही दुर्भावनाएँ-दुर्विचार पनपते हैं।

इसकी प्रक्रिया बतलाते हुए आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा.जे.जेड यंग का “प्रोग्राम्स आफ दि ब्रेन” ग्रंथ में कहना है कि पशु संस्कारों का उभार चेतन मन पर प्रतिक्रिया करता है। इन दोनों की मिली-जुली क्रिया स्नायुतंत्र एवं अंतःस्रावी तंत्र में परिवर्तन लाने वाली होती है। डा. मेडिनक ने डेनमार्क के अपराधी मानसिकता वाले युवकों का अध्ययन करने पर पाया कि ऐसे लोगों में मस्तिष्क की अल्फा तरंगों की क्रियाशीलता कम होती चली जाती है। डा. यंग का कहना है कि इसके साथ तंत्रिकाएँ उद्दीपित हो एड्रीनल ग्रन्थि को एड्रीनेलिन निकालने हेतु उत्तेजित करती हैं, जिससे व्यक्ति आक्रामक बनता है।

इन वैज्ञानिक अध्ययनों की गहराई भले न समझ में आने वाली हो पर एक बात तो स्पष्ट हो ही जाती है, कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना कितना खतरनाक है। इस काम को जिस डाल पर बैठे है, उसी को काटने की संज्ञा दी जा सकती है। इसके स्थान का क्षेत्र बहुत लम्बा चौड़ा और गहरा है।

वैज्ञानिक अनुसंधानों से जो नतीजे सामने आए हैं, उनसे यह भी पता चलता है कि पर्यावरण की प्रदूषित स्थिति मन में गड़बड़ी पैदा करने, प्राणों में उत्तेजना लाने तथा व्यवहार को हिंसक बनाने तक सीमित नहीं है। जेनेटिक्स के विशेषज्ञों ने बताया कि अपराध की प्रवृत्ति व्यक्ति के गुणसूत्रों तथा जीन्स में परिवर्तन लाने वाली सिद्ध होती है। जे.लायन तथा एम.पेना ने अपने संयुक्त अध्ययन “द स्टडी ऑफ ह्यूमन एगे्रशन” में बताया है कि अपराधी व्यक्तियों के गुण सूत्र असामान्य हो जाते हैं। यह असामान्यता एक अतिरिक्त वाई गुणसूत्र के रूप में दिखाई देती है। इससे लिपटे जीन्स अपराध का सन्देश एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने वाले होते हैं।

सम्भव है अपराधी के लड़के में अपराध प्रवृत्ति न दिखाई दे। पर इसका कारण यह नहीं है कि उसमें यह जीन्स नहीं पहुँचे। अपराधी व्यवहार के दिखाई न देने का कारण इन जीन्स का अप्रभावी होना है जो आनुवांशिकी के नियमानुसार किसी भी अगली पीढ़ी में अपने गुण धर्म को प्रकट कर सकते हैं।

कितना गहरा है वातावरण का हमारे ऊपर प्रभाव। इसको बेडौल और कुरूप करने का मतलब है अपने को बेडौल और कुरूप बना लेना। प्रकृति से लूट-खसोट का मतलब है अपने आधार को समाप्त कर लेना। मनुष्य जाति के वर्तमान क्रियाकलापों को सरल ढंग से समझाते हुए विख्यात दार्शनिक बर्ट्रेण्डरसेल का “इम्पैक्ट ऑफ साइन्स आन सोसाइटी” में कहना है कि हम एक ऐसे जीवन प्रवाह के बीच हैं-जिसका साधन है मानवीय दक्षता और साध्य है मानवीय मूर्खता। अगर मूर्खता ही लक्ष्य हो तो उसको पाने के लिए उठाया गया हर कदम बुराई की ओर ले जाता है। रसेल की बात कड़वी होने पर भी पूरी तरह सही है। विकसित बनने के फेर में सही गलत का अन्तर मिटा दिया है। ऐसी दशा में परिणाम बुरे हों तो अस्वाभाविक नहीं है।

बिगड़ी हुई स्थिति को बनाने के लिए जरूरी है उल्टे को सीधा करना। प्रकृति सीधी सौम्य गाय भी है और रुष्ट सिंहनी भी। यदि उसके साथ अनर्गल और अनौचित्यपूर्ण व्यवहार न किया जाय तो अनन्त काल तक अपने दूध रूपी अनेक तरह की सम्पदाओं से हमारा पालन पोषण करती रह सकती है। पर यदि नोंच खसोट, छीना झपटी का दुर्व्यवहार किया तो क्रुद्ध सिंहनी की तरह अंग भंग करने-चीरने फाड़ने में भी वह कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

अच्छा यही है कि हम उसकी गोल में फलें-फूलें। इसके लिए ध्यान रखना होगा कि हम अपने आस-पास के वातावरण को सुरम्य और सौम्य बनाएँ। मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन से स्पष्ट किया है कि जो स्थान प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर हैं जहाँ हरियाली, नदी-तालाब हैं, प्रदूषण से मुक्त हैं। वहाँ जाने पर अपने व्यवहार में सौम्यता एवं मन में प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है। ऐसे स्थानों पर स्वास्थ्यवर्धक ऋण आयन्स भी प्रचुर मात्रा में पाये गए हैं।

इससे सिद्ध होता है कि यदि प्रकृति को संरक्षण दिया जाय तो वह हमें भी संरक्षण प्रदान करेगी। सोशल इकालॉजी के विद्वान ए.एम.शू ने सामाजिक परिवेश के उन्नत और अपराध मुक्त होने के उपायों को अपनी रचना “सोसाइटी एण्ड इनवायरन्मेण्ट” में सुझाया है। उनके अनुसार यह “जिम्मेदारी विश्व वसुधा पर रहने वाले हममें से प्रत्येक की है कि वह आचरण और व्यवहार में नैतिक मूल्यों का समावेश करें। इसका पहला कदम यही है कि स्थान और परिस्थिति के अनुसार प्रकृति का संरक्षण करें, उसे प्रदूषित होने नष्ट होने से रोक कर उसे बढ़ाने में सहायक बनें।

भारतीय चिन्तन में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को देवता माना गया है। इसके अनुसार मनुष्य जाति इनसे सहयोग का व्यवहार करके प्रसन्न बने रहकर समृद्धि से भर पूर हो सकेगी। गीतकार के शब्दों में -”इन देवताओं को मनुष्य संरक्षण दे तो देवता मनुष्य को संरक्षण देंगे”। दोनों इस प्रकार सहयोग का आचरण करते हुए उन्नति व विकास को प्राप्त होंगे। यही है वह मार्ग-जिस पर चलकर पशुता की ओर जा रही मानव जाति देवत्व की ओर बढ़ सकती है।

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