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Magazine - Year 1989 - Version 2

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गौरव एवं बड़प्पन की कसौटियाँ

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वास्तविक गौरव वह है जो विचारशीलों द्वारा श्रद्धा सम्मानपूर्वक सहज स्वाभाविक रूप में प्रदान किया जाय। ऐसी गरिमा सज्जनता-शालीनता के बदले ही उपलब्ध होती है। सद्गुणों की सम्पदा ही ऐसे ऊँचे स्तर की है कि उसके कारण अपनी छाप हर किसी के मन पर पड़ती है। इसी की प्रतिक्रिया गौरव गरिमा के रूप में अपने को उपलब्ध होती है। इसी का प्रतिफल आत्मसंतोष के रूप में हस्तगत होता है।

थोपा हुआ बनावटी प्रदर्शन-बड़प्पन के आधार पर गढ़ हुआ दिखावा केवल दूसरों की आँखों में चकाचौंध पैदा करता है। कुछ क्षण के लिए वस्तुस्थिति समझने से वंचित कर देता है पर यह स्थिति देर तक नहीं रहती। वस्तुस्थिति प्रकट होकर ही रहती है। न भी हो तो भी किसी का वैभव किसी दूसरे को लाभान्वित नहीं करता। जिससे लाभ न हो उसके प्रति सहानुभूति कैसी?

सजधज के आधार पर मात्र यह सिद्ध किया जा सकता है कि प्रदर्शन के निमित्त किस हद तक पैसे और समय की बर्बादी की गयी? यह एक प्रकार से रिश्वत देकर ली गयी वाहवाही है। इसकी जड़ें नहीं होती। बालू की भीत में टिकाऊपन कहाँ होता है? कभी ठाटबाट की चकाचौंध दूसरों की आँखों में बड़प्पन की धाक जमाना माना जाता रहा होगा पर अब तो यही सोचा जाता है कि जिसके पास सजधज के लिए मौजमस्ती के लिए, लोगों को चकित करने के लिए फालतू पैसा है, उसका व्यक्तित्व ओछा बचकाना होना चाहिए। समझा जाता है कि हराम की कमाई ही गुलछर्रे उड़ाने में खर्च हो सकती है। जिसने परिश्रम पूर्वक कमाया होगा वह तो हजार बार सोचेगा और जो अत्यन्त उपयोगी है उसी के लिए खर्च करेगा।

निष्ठुरता अपनाये बिना किसी के पास भी सम्पत्ति जमा नहीं हो सकती। उदारचेता मिल बाँट कर खाते हैं। कमाने में जिनका श्रम सहयोग लगा है उन्हें भी अपनी ही तरह सुख सुविधा प्रदान करते हैं। ऐसी मनोवृत्ति रहने पर किसी के पास व्यक्तिगत धन इतनी मात्रा में जमा नहीं हो सकता कि उसे शान शौकत के लिए खर्च किया जा सके।

विवेकवान पैसे का उपयोग समझते हैं। उसे नीतिपूर्वक ही कमाते है और नीति-मर्यादा के अनुरूप ही खर्च करते हैं। अपव्यय का समर्थन चाटुकार, चापलूस ही कर सकते हैं। जिनका उससे कुछ निजी स्वार्थ सधता हो, वे भी उसके लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। पर विचारशीलों की बिरादरी में ऐसा बचकानापन ओछी बुद्धि का ही चिन्ह माना जायगा।

साहस, कौशल, विवेक जैसे सद्गुण भी सूक्ष्म स्तर के वैभव ही हैं। वितरण इनका भी होना चाहिए। दुर्गुणों को भी दरिद्रता से कम नहीं आँका जाना चाहिए। धन का सम विभाजन औचित्य का प्रत्यक्ष स्वरूप है। उसे एक निमित्त तो माना जाना चाहिए पर यह नहीं समझ लेना चाहिए कि यही सब कुछ है उसके अतिरिक्त अभ्युदय के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ भी एक बड़ी बात है। व्यक्तित्व को विकसित करने वाले सद्गुण भी एक पूँजी हैं। इन्हें मात्र अपने पास ही बटोर कर बैठ जाना भी अनौचित्य का एक पक्ष है। सम्पन्नता की तरह ही सज्जनता का अभिवर्धन, उन्नयन एवं समान वितरण होना चाहिए। गौरवशाली जीवन उन्हीं का है जो सबकी उन्नति एवं सबकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मानते हैं।

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