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Magazine - Year 1989 - Version 2

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समझदारों के समझने योग्य कुछ तथ्य

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संसार को विज्ञान की आँखों से देखा जाय तो ब्रह्माण्ड भर में ताप, प्रकाश और ध्वनि की तरंगें भर दौड़ती दृष्टिगोचर होंगी। अणु परमाणुओं के अन्धड़ चलते दृष्टिगोचर होंगे। पदार्थों के बीच आकर्षण विकर्षण का क्रम चलता दीखेगा। जादू की नगरी की तरह कोई बाजीगर यहाँ चित्र विचित्र खेल-खिलवाड़ रचता और बिगाड़ता प्रतीत होगा। यही है संसार का वास्तविक रूप जो दीखता तो स्थिर है पर उसके अन्तराल में भारी हलचलें चलती हुई समझी जा सकती हैं। पदार्थ अपने अपने पृथक रंग रूप में विद्यमान दीख पड़ते हैं। पर वे देर तक स्थिर नहीं रहते। उनमें तेजी से परिवर्तन होता रहता है। शरीर के भीतर जीवाणु जिस क्रम से चलते और कार्यरत रहते हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। विश्व की समस्त संरचना आश्चर्य चकित करने वाली है। उसकी गतिशीलता सामान्य बुद्धि की समझ में नहीं आती। स्थिरता जैसी प्रतीत होती है। पर वह है कोरी भ्रान्ति।

इस गतिशीलता को जीवन के साथ जोड़ा जाय तो हम यथार्थता के अधिक निकट पहुँचते हैं। शुक्राणु और डिम्बाणु के सम्मिश्रण से बना बिंदु-कलल क्रमशः भ्रूण के रूप में विकसित होता है। गर्भ रूप में पकता है। पककर संसार में आता है। शैशव, बचपन के रूप में विकसित होते हुए किशोरावस्था और यौवन की वय आ पहुँचती है। ढलान आता है। वार्धक्य आ धमकता है। शरीर निर्बल, जराजीर्ण होता जाता है और काया मृत्यु के मुख में चली जाती है। दृश्य अदृश्य बनता है और फिर नये जन्म के लिए जिस तिस दिशा में भटकता है। फिर वही क्रम, फिर वही गति, फिर वही नियति। हम परिवर्तन चक्र में परिभ्रमण करते हैं। जो दिन बीत जाता है, फिर लौटकर नहीं आता। जन्म से आरम्भ होकर मरण तक पहुँचने वाली यात्रा निरन्तर चलती रहती है। फिर भी आश्चर्य यह है कि मनुष्य अपने को स्थिर ही मानता है। परिवर्तन और विघटन पर ध्यान नहीं देता। वर्तमान में ही उलझा रहता है भविष्य की बात सोचता तक नहीं। इस भ्रान्ति का दुष्परिणाम तब सामने आता है जब समय बीत चुका होता है और पछतावे के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता।

वर्तमान को सब कुछ और चिरस्थायी मान बैठने की भ्रान्ति ऐसी है जिसे समझदार भी ना समझे की तरह ही अपनाये रहते हैं। समय बदलने के साथ परिस्थितियाँ भी बदल जाती हैं। शैशव की स्थिति बचपन में नहीं रहती। बचपन जवानी आते ही विदा होता है। बुढ़ापे में जवानी का भी कोई चिन्ह नहीं बचता। इस पर भी मनुष्य है जो समझदारी के दिनों में भी तेजी से चल रहे परिवर्तन पर ध्यान नहीं देता और स्थिति के अनुरूप जो सोचा जाना चाहिए, उसे नहीं सोचता। जो करना चाहिए उसे नहीं करता।

दृष्टि भविष्य पर रहनी चाहिए। उसके साथ तालमेल बिठाते हुए वर्तमान की रूप रेखा विनिर्मित करनी चाहिए। बच्चे सयाने होने पर अभिभावक उनकी शिक्षा, शादी, आजीविका के बारे में गहराई से सोचते हैं और उसकी व्यवस्था बनाने के लिए आवश्यक भागदौड़ करते हैं। वर्षा आने से पूर्व खेत की मेंड़ ठीक की जाती है और छप्परों की मरम्मत के लिए आवश्यक प्रबंध कर लिया जाता है। जाड़े के कपड़े सिल लिए जाते हैं और गर्मी आने से पूर्व उसके अनुरूप व्यवस्था बदल ली जाती है। पर जीवन में चलते परिवर्तन को देखते हुए भविष्य को सही बनाये रहने के लिए क्या पूर्व तैयारी करनी चाहिए इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसे वैचारिक जड़ता कहना चाहिए ऐसी भूल तो किसान भी नहीं करता। वह बीज बोने के उपरान्त उसमें खाद पानी देने की रखवाली करने की तत्परता पूर्वक तैयारी करता है। स्वयं न करे तो उसे फसल काटने का अवसर न मिलेगा। बोया हुआ बीज भी व्यर्थ चला जायगा।

मनुष्य जन्म सुर दुर्लभ उपहार है। भगवान की वह सर्वोपरि कला–कृति है। अन्य प्राणियों को यह सुविधा सरंजाम नहीं दिया गया। मात्र मनुष्य को ही इसलिए सौंपा गया है कि वह उसकी जिम्मेदारी समझेगा और इस स्तर का सदुपयोग करेगा जिससे वह अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदल सके। स्रष्टा के विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य बनाने में अपने कौशल का प्रदर्शन कर सके। यही है वह दूरदर्शी विवेक-शीलता, जिसका सत्यपरिणाम स्वर्ग स्तर के सुखी जीवन और मुक्ति स्तर के दृष्टिकोण के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।

पर यह सब बन पड़े तब जब वर्तमान की महत्ता और भविष्य की संभावना को ध्यान में रखते हुए निर्धारण किया जाय और कार्यक्रम बनाया जाय। यह बन तभी सकता है जब विश्व व्यवस्था के साथ साथ जीवन क्रम की बदलती परिस्थिति को भी ध्यान में रखा जाय। साथ ही उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में भी चूक न की जाय। तत्वदर्शियों ने आश्रम धर्म का चार भागों में विभाजन इसीलिए किया है कि जीवन के चार मोड़, चार चौराहे अपनी अपनी दिशा का संकेत और प्रयत्न की प्रेरणा देते रहें।

बचपन में युवावस्था की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर शरीर को स्वस्थ और मस्तिष्क को विकसित प्रशिक्षित बनाने के लिए उस स्थिति के अनुरूप जुटे रहना पड़ता है। जिसका बचपन सही मार्ग अपनाये रह सका, समझना चाहिए कि उसका यौवन समर्थ और सुव्यवस्थित हो गया। जिसने यौवन में पारिवारिक जिम्मेदारियों को हल्का करते रहने का, अर्थव्यवस्था को जीवन के अंतिम दिनों तक काम देने योग्य बना लिया, समझना चाहिए कि विवेक से काम लिया। संयम साधना का भी यही समय है। जिस प्रकार बचपन में व्यायाम और अनुशासन में रुचि ली जाती है। उसी प्रकार यौवन में संयम और पुरुषार्थ का निर्वाह पूरी तरह किया जाना चाहिए। अन्यथा ढलती आयु खोखलेपन के कारण कष्टदायक भी होगी। वानप्रस्थ की ढलती प्रौढ़ावस्था को सदुपयोग इसी में है कि जिस जीवन निर्वाह में असंख्यों का असंख्य प्रकार से सहयोग मिला है, उसका ऋण चुकाने के लिए लोक सेवा प्रयोजनों में, सत्प्रवृत्ति संवर्धन में प्राण पण से जुटा जाय। इस अवधि में परिवार के लोगों को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने का क्रम लगभग पूरा हो जाता है। इसलिए पूरा या अधूरा यह समय लोक मंगल के लिए ही समर्पित किया जाना चाहिए। चौथी अवस्था संन्यास की निर्धारित थी। अब समय के अनुसार उसे वानप्रस्थ में ही जोड़ देना चाहिए। आयुष्य का पूर्वार्ध भौतिक प्रयोजनों के लिए और उत्तरार्ध परमार्थ कार्यों के लिए सुनिश्चित रखना चाहिए। यह आश्रम व्यवस्था व्यक्तित्व के विकास और समाज के अभ्युदय का प्रयोजन पूरा करने के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर है।

पर यह निर्धारण कार्यान्वित नहीं हो पाता। लोग आदि से अंत तक गृहस्थ ही बने रहते हैं। दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाले आदर्शों को अपनाने की अपेक्षा समूची आयु, प्रायः स्वार्थ साधना में ही निकल जाती है। लोभ, मोह और अहंकार के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। वासना तृष्णा की खाई पाटने का प्रयत्न किया जाता है पर वह इतनी गहरी है कि सब कुछ खपा देने पर भी उसे पूरा करने की संभावना बन नहीं पाती। तथ्यों को विस्मृत कर देने का ही यह परिणाम है।

वर्तमान वस्तुतः भूत और भविष्य के मध्यवर्ती कुछ क्षण हैं, जिन्हें दौड़ते हुए समय के साथ जोड़ा जा सकता है। यह वर्तमान ही सौभाग्य की चमकती हुई बिजली है, जिसकी श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से चूका नहीं जाना चाहिए। आलस्य और प्रमादरूपी दो दानव इसे नष्ट करते रहते हैं। इस आक्रमण से शरीर को बचाया जाना चाहिए और वह किया जाना चाहिए जिससे भविष्य बनता हो। यह सोचना चाहिए जिससे अगले दिनों के लिए अभ्युदय की स्थिति बनती हो।

जन्म से पूर्व और मृत्यु के पश्चात् की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। चौरासी लाख क्षुद्र योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त यह जन्म मिला है। उसकी अवधि भी स्वल्प है। पूरी आयु तो आधे लोग भी नहीं जी पाते। शेष आधे तो अल्पायु में ही अकाल मृत्यु के ग्रास बनते देखे गए हैं। कौन जाने किसके साथ क्या बीते? समय तेजी से आगे खिसकता जाता है और यात्रा तो मृत्यु की मंजिल पूरी करने के लिए द्रुतगति से आगे बढ़ती रहती है। जो काम का समय है, वह आज का ही है। कल कोई भी ऐसी स्थिति आ सकती है जिसमें लम्बे समय तक चलने वाली रुग्णता या अपंगता घेर ले। ऐसी दशा में स्वयं कुछ कर सकना तो दूर, यह भी हो सकता है कि परावलम्बी तिरस्कृत उपेक्षित बन कर रहना पड़े। इन आशंकाओं को भुला नहीं दिया जाना चाहिए। सतर्कता इस तथ्य पर नियोजित करनी चाहिए कि भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाले प्रयासों में शिथिलता न आने पाये। सतर्कता में इतनी कमी न आने पाये, जिसके कारण कुछ सूझ ही न पड़े। कुछ करते धरते ही न बन पड़े।

स्वार्थ वह नहीं है जिसकी परिणति अनर्थ में होती है। वास्तविक आवश्यकता स्वल्प है। शरीर का निर्वाह औसत नागरिक स्तर अपना कर भी भाँति चलाया जा सकता है। महत्वाकाँक्षाओं का दमन किया जा सकता है और संयम के साथ सादगी में जिया जा सकता है। यह रीति अपनाने पर उस परमार्थ के लिए अवसर अवकाश मिल सकता है जो संतोष, सम्मान, सहयोग और प्रतिष्ठा प्रशंसा का कारण बन सकता है। यह लौकिक लाभ हुए। परमार्थ के साथ लोक और परलोक का उज्ज्वल भविष्य भी जुड़ता है। परमार्थिक जीवन के लिए विपुल संसाधनों की आवश्यकता नहीं है। उनके अभाव में बहुत कुछ हो सकता है। श्रम, समय की पूँजी भी कम महत्व की नहीं है आत्मीयता, उदारता, नम्रता, सज्जनता और सेवा भावना अपना कर भी अपना स्वभाव देवोपम बनाया जा सकता है। सामान्य लोक व्यवहार के साथ सेवा सहायता का पुट लगाये रहा जा सकता है। इतने भर से परमार्थ सध जाता है। सामान्य क्रियाकलापों में भी आदर्श जुड़ा रह सकता है।

आवश्यक नहीं कि कोई स्मारक खड़ा करके ही अपना यश चिरस्थायी बनाया जाय। यह भी हो सकता है कि जीवन इस तरह जिया जाय जिससे दूसरे लोग उत्कृष्टता अपनाने की प्रेरणा ग्रहण करें। कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग पर चलें। यह परोक्ष अनुदान ऐसा है जिसके बदले व्यक्ति विशेष की ही नहीं, समूचे समाज की अन्तरात्मा कृतज्ञ बन सकती है। विनम्र एवं उदार व्यवहार से दूसरों का मन जीता जा सकता है। सज्जनता की प्रतिक्रिया सज्जनता के रूप में ही होती है। इस परम्परा को चलाना और बढ़ाना ऐसा कृत्य है जिससे सर्वतोमुखी श्रेय सम्पादन होता है। अपना ही नहीं, दूसरों का भी भविष्य उज्ज्वल बनता है।

शालीनता अन्तरात्मा के गहन स्तरों तक प्रवेश कर जाती है और वह जन्म जन्मान्तरों तक साथ जाती है। पुण्यात्मा का भविष्य अन्धकारमय नहीं बन सकता। मनुष्य जीवन की सार्थकता ऐसी विधा अपनाने में ही है। आवश्यक नहीं ऐसी उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए कोई बहुत बड़े तप किये जायँ। सज्जनता भरा जीवन यापन कर सकना भी एक योग साधन है। जो सबके लिए सरल भी और सुलभ भी।

भूलों में सबसे भयंकर भूल यह है कि आत्मसत्ता के अस्तित्व एवं हित-अनहित को भुला दिया जाय। शरीर की वासना तृष्णाओं को सब कुछ मान कर उनके लिए मरते खपते रहा जाय। जीवन का महत्व और उद्देश्य न समझा जाय। मृत्यु को भुला कर अपनी सुविधा भरी स्थिति को चिरस्थायी मानकर उन बचकानी बाल क्रीड़ाओं में समय गँवाया जाय, जिनका मनोरंजन कालक्षेप के अतिरिक्त और कोई महत्व नहीं है। अच्छा हो, समय रहते वस्तुस्थिति को समझा जाय और भविष्य को शानदार बना सकने वाले उपक्रम को अपनाया जाय।

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