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Magazine - Year 1989 - Version 2

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अध्यवसाय से अर्जित प्रामाणिकता

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आगे बढ़ने, ऊँचा उठने, कीर्तिमान स्थापित करने की महत्वाकांक्षा उस हद तक सराहनीय भी मानी जाती है और अन्यान्यों के लिए प्रेरणाप्रद भी बनती है जब वह नीति-मर्यादाओं के अन्दर रहती है। आतुरता अपनाकर जब लोग बड़े बनने के लिए अनीति का अपवाद अपनाते हैं तो उन प्रगति प्रयासों का स्वरूप अनाचार जैसा बन जाता है। उस तरह अपनाई गई सफलता भी गर्हित मानी जाती है और बड़प्पन लूटने की अभिलाषा को जन समुदाय की दृष्टि में हेय एवं घृणित बना देती है।

अपने देश में संतोष के उच्च अध्यात्म आदर्श को आलस्य और प्रमाद में परिणत कर लिया जाता है। फलतः उत्कर्ष की प्रगतिशीलता अपनाने के लिए मन में उत्कण्ठा ही नहीं उभरती। उभरती भी है तो उस संदर्भ में यह समझा जाता है कि इसके लिए अनीति अपनाना चालबाजी धोखेबाजी, बेईमानी का आश्रय लेना अनिवार्य है। वे उसी कुपंथ पर चल पड़ते हैं और इस प्रकार जो कमाते हैं उसकी तुलना में अपनी बहुमूल्य प्रामाणिकता गवाँ बैठते हैं। दबाव या प्रलोभन के बिना उस सहयोग को अर्जित नहीं कर सके जो प्रगति का मूलभूत आधार है।

एकाकी व्यक्ति अपने बलबूते एक छोटी सीमा तक ही उत्कर्ष कर सकता है। व्यापार से लेकर लोक-नेतृत्व तक में किसी न किसी प्रकार जन सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह सम्बन्ध घनिष्ट और भाव भरे होने चाहिए। आत्मीयता और मैत्री का आधार यही है। शिष्टाचार लोकाचार से तो मात्र इतना ही लाभ है कि गाड़ी अपनी लाइन पर चलती रहे। किसी से टकराये नहीं। उसे उस स्तर तक विकसित करना जिससे स्वेच्छा सहयोग एवं आत्मभाव उभरने लगे-यह अनायास उपलब्ध नहीं होता। इसके लिए आवश्यक तो प्रतिफल लेकर लौटने वाली सेवा सहायता भी चाहिए पर उतना न बन पड़े तो भी इतना तो होना ही चाहिए कि व्यक्ति को कमेठ और प्रामाणिक समझा जाय। इसके बिना श्रद्धा नहीं जगती और सहयोग नहीं मिलता।

जिस प्रकार बड़े क्षेत्र में नेतृत्व करने वाले लोगों को जनता का व्यापक समर्थन चाहिए उसी प्रकार अपने क्षेत्र में जिनसे काम लेना है जिनकी सहायता करनी पड़ती है उनकी सद्भावना अर्जित करना न्यूनतम वह कार्य है जो सफलता एवं प्रगति के इच्छुकों को करना ही चाहिए। परिवार को अनुशासित, सुसंस्कारी, प्रगतिशील एवं समुन्नत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उस परिकर में सद्भावना का स्तर बढ़ा चढ़ा हो। इसके उपरान्त उन्हें मार्गदर्शन देना किसी दिशा में मोड़ना सरल पड़ता है। अन्दर दुर्भावनाएँ भरी हो तो सत्परामर्श का भी उपहास उड़ाया जाता है और अनुशासन के शिकंजे में कसने पर विद्रोह खड़ा होता है। परिवार की तरह व्यवसाय, कारोबार, उत्पादन, संगठन आदि के बारे में यही बात है। प्रगतिशीलता के इतिहास में इन्हीं तथ्यों का समावेश है। आकाश से टूटकर अनायास ही सफलता तो किसी विरले को ही मिलती है। जमीन में गड़ा खजाना तो किसी को कदाचित ही मिलता है।

वैज्ञानिक, विद्वान, पहलवान, धनवान स्तर के लोगों के प्रगतिक्रम का पर्यवेक्षण किया जाय तो उनमें से कदाचित ही कुछ मिलें जो सरलतापूर्वक सस्ती सफलताएँ पा सके हों। उन सभी ने अध्यवसाय का आश्रय लिया है। अपने स्वभाव को मृदुल एवं लगनशील बनाया है। जिम्मेदारियों को समझा है और कठोर परिश्रम नियमित रूप से करने का उपक्रम बनाया है। वैज्ञानिकों, विद्वानों, संगठनों, सृजेताओं में अन्य विशेषताओं की तुलना में यही वर्चस्व बहुलतापूर्वक पाया गया है जिसमें सफलताओं के पीछे परिष्कृत व्यक्तित्व काम करता हुआ दिखाई देता है।

अमेरिका और योरोप के देशों में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी जन्मजात परिस्थितियाँ गई गुजरी थीं पर उनकी प्रगति आकाँक्षा सही दिशा में चली और सफलता के घेरे में सीमा तक पहुँची। कार्यक्षेत्र कोई भी क्यों न हो, उपलब्धियाँ किसी भी प्रकार की क्यों न हों पर उन सब के मूल में एक ही तथ्य काम करता है-कर्मनिष्ठ उत्तरदायित्वों से भरा साहसी और मधुर जीवन, मिलनसार स्वभाव और आत्मीयता सद्भावना। इसी आधार पर वे संपर्क क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को विशिष्ट सहयोगी बना सके। उनकी प्रशंसा सहकारिता के आधार पर ऊँचे उठ सके, आगे बढ़ सके।

गत वर्ष अमेरिका के अरबपतियों की गणना हुई। जिनके पास अरबों खरबों की सम्पदा थी उनकी संख्या 400 के लगभग पाई गई। इनमें से मात्र 5 ही ऐसे थे जिन्हें पैतृक सम्पदा के रूप में कुछ काम आरम्भ कर सकने योग्य पूँजी मिली थी। शेष सभी ऐसे थे जिनने गरीबी की स्थिति में जन्म लेते हुए भी अपने सद्गुण बढ़ाये और संपर्क में आने वालों को अपनी प्रामाणिकता से प्रभावित करके उनके सहयोग आकर्षित किये। इसी आधार पर उनके व्यवसाय पनपते रहे और बढ़ते रहे।

उपरोक्त 400 अरबपतियों में 78 महिलाएँ भी हैं। उनमें से कुछ की शिक्षा तो मैट्रिक से भी कम है। वे धनिकों की पत्नियाँ या बेटियाँ भी नहीं हैं। उनने अपने स्वतन्त्र अध्यवसाय और परिश्रम से प्रगति की। इस मार्ग में सबसे अधिक कारगर हुआ उनका मधुर स्वभाव, प्रामाणिक व्यक्तित्व तथा दृढ़तापूर्वक अपनाया गया आत्मानुशासन।

यह ठीक है कि प्रगति के लिए परिस्थितियों की अनुकूलता भी अपनी महती भूमिका निभाती है। सम्पन्न देशों में फलने फूलने वाले व्यवसाय आसानी से हाथ लग जाते हैं और उनके गति पकड़ने में देर नहीं लगती। निर्धन देशों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है जिसमें सफलतापूर्वक धनी बना जा सके। फिर भी इतना तो निश्चित है कि समृद्धि के सम्बन्ध में अपवाद मानते हुए भी अन्यान्य सभी क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आसानी से प्रगतिपथ पर बढ़ा जा सकता है। उदाहरणार्थ स्वास्थ्य और ज्ञान जैसे क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आत्मानुशासन और उत्साह भरा प्रयास ही अनेकानेक उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर देता है। कालिदास और बरदाज जैसे जन्मतः मूढ़मति समझे जाने वाले भी जब धुरन्धर विद्वान बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि मध्यवर्ती मानसिक संरचना के व्यक्ति अध्ययन शील बनकर मन की तत्परता एवं तन्मयता के सहारे आरम्भिक स्थिति की तुलना में असाधारण रूप से प्रगतिशील न बन सकें। यही बात स्वास्थ्य के सम्बन्ध में भी है। सुविधा साधनों की दृष्टि से गई बीती स्थिति में रहने का व्रत लेकर गान्धी, विनोबा कबीर और बुद्ध जैसे व्यक्ति भी दीर्घजीवन के अधिकारी बन सके।

वैज्ञानिकों में से कितने ही ऐसे हैं जिन्हें पिता की प्रयोगशाला या खोज के लिए आवश्यक पूँजी नहीं मिली फिर भी वे अपनी आकाँक्षा के अनुरूप वातावरण एवं सहयोग प्राप्त कर सके और ऐसे आविष्कार कर सकने में सफल हुए जिनकी परिणति पर संसार भर को चकित होना पड़ा है। यह लगनशीलता और प्रामाणिकता ही है जो किसी को भी प्रगतिपथ पर आगे बढ़ाने में समर्थ होती है।

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