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Magazine - Year 1991 - Version 2

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आत्मबोध और तत्वबोध की जीवन साधना

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प्रातः काल आँख खुलने से लेकर चारपाई में नीचे उतरने में थोड़ा समय लगता है। इसी समय को नया प्रभात,नया जीवन मान कर बिस्तर पर पड़े-पड़े ही आत्मबोध की साधना करनी चाहिए।

इसी प्रकार रात को बिस्तर पर जाने से लेकर नींद आने के बीच में जो थोड़ा समय मिलता है उसे तत्वबोध की साधना में लगाना चाहिए।

आत्मबोध अर्थात् हर दिन नया जन्म। तत्वबोध अर्थात् हर रात को नया मरण। जन्म और मरण के साथ जुड़ी हुई विचारणा पर सच्चे मन से विचार करने पर मनुष्य अपने भीतर एक नई हलचल अनुभव करता है और अपने क्रियाकलाप को, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाकर एक प्रकार से आत्मिक कायाकल्प की दिशा में कटिबद्ध और अग्रसर होता है।

हर दिन प्रातः काल उठते ही बिस्तर पर बैठकर अपने आप से इस संदर्भ में तीन प्रश्न पूछने चाहिए, उनके उत्तर भी स्वयं ही उपलब्ध करने चाहिएं। पर प्रश्नोत्तर प्रातः काल जीवन का क्रम आरम्भ करते हुए नित्य ही दुहराने चाहिए,ताकि जीवन का स्वरूप, उद्देश्य और उपयोग सदा स्मरण बना रहे और स्मरण के आधार पर अपनी दिशाएं ठीक रखने में भूल-चूक न होने पावे। अपने आप से प्रथम प्रश्न यह पूछना चाहिए कि -

(1) भगवान को सभी प्राणी समान रूप से प्रिय पात्र हैं। फिर मनुष्य को ही बोलने, लिखने एवं असंख्य सुख -सुविधाएँ प्राप्त करने का विशेष अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में इतना असाधारण श्रम क्यों किया?

उत्तर एक ही हो सकता है- “अपने उद्यान-इस संसार को अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी और अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी - मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया। विशेष साधन-सुविधाएँ दी, ताकि इसके द्वारा यह ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति ठीक तरह कर सके।

(2) दूसरा प्रश्न अपने आप से पूछना चाहिए कि -जो सुविधाएँ, विभूतियाँ, सम्पदाएँ हमें उपलब्ध हैं, उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं, तो इनमें क्या कोई हर्ज है?

उत्तर एक ही मिलेगा-अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी भी बौद्धिक, आर्थिक प्रतिभायुक्त एवं अन्य किसी प्रकार की विशेषताएँ हैं, वे विश्वमानव की ही पवित्र अमानत हैं और इनका उपभोग लोक-मंगल के लिए ही किया जाना चाहिए। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरणों के अतिरिक्त इन साधनों का विश्व-कल्याण के लिए ही उपयोग किया जाये।

(3) तीसरा प्रश्न अपने आप से करना चाहिए कि- “क्या इस सर्वदुर्लभ मानव शरीर का सही उपयोग हो रहा है?”

उत्तर यही मिलेगा - “हम सदाचारी, संन्यासी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हँसमुख, सेवाभावी बनें। बिना मानव-जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिए इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवनयापन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का, सभ्यता और सज्जनता का, पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश करना चाहिए।”

इन्हीं प्रश्नोत्तरों का अध्यात्म आत्मबोध प्रश्न जीवन की महान समस्या के रूप में सामने आये और उन्हें सुलझाने के लिए हम विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवनयापन के लिए एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि इस तत्वबोध को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका, तो आकांक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिलक्षित होगा जैसे आत्मज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिए।

इसके बाद “हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत” इस सूत्र को मन ही मन दुहराना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि आज का दिन हमें एक नये जन्म के रूप में मिला है। वस्तुतः निद्रा और जागरण- मृत्यु और जन्म का ही एक छोटा नमूना है। इसमें असत्य भी कुछ नहीं। सचमुच की मृत्यु भी एक लम्बी रात की गहरी नींद मात्र है। हर दिन को एक जन्म कहा जाय, तो ऊपर से ही हँसी की बात लगती है, वस्तुतः यह एक स्थिर सच्चाई है। अतएव इस मान्यता में अत्युक्ति और निराधार कल्पना जैसी भी कोई बात नहीं है।

आज का नया जन्म अपने लिए अनमोल अवसर है, कहते हैं कि 84 लाख योनियों के बाद एक बार मनुष्य शरीर मिलता है, उसका सदुपयोग कर लेना ही शास्त्रकारों ने सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता कहा है। अस्तु हमें प्रातःकाल चारपाई पर पड़े-पड़े ही विचारना चाहिए कि आज का दिन अनमोल अवसर है, उसे अधिक से अधिक उत्कृष्टता के साथ व्यतीत करना चाहिए। कोई भूल, उपेक्षा, अनीति, दुर्बुद्धि उसमें न रहे। आदर्शवादिता का, सद्भावना और सदाशयता का उसमें अधिकाधिक समावेश रहे, ऐसा दिन भर का कार्यक्रम बना कर तैयार किया जाय।

आमतौर से आलस्य, ढील पोल, शिथिलता में हमारा अधिक से अधिक समय बरबाद होता है। तत्परता, स्फूर्ति, परिश्रम और दिलचस्पी के साथ करने पर जो कार्य एक घण्टे में हो सकता है, उसी को अधिकतर लोग दो-दो, चार-चार घण्टे में पूरा करते हैं। आलस्य, अधूरा मन, मन्दगति, रुक-रुक कर शिथिलतापूर्वक काम करने में और ऐसे वैसे ज्यों-त्यों बेकार बहुत सा समय गुजार देने की आदत बहुतों को होती है और उनका आधा जीवन प्रायः इस आलस्य-प्रमाद में ही बरबाद हो जाता है। यह बुरी आदत सम्भव है,थोड़ी बहुत मात्रा में अपने में भी हो तो बारीकी से तलाश करनी चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि आज हर काम पूरी तत्परता और फौजी उत्साह के साथ करेंगे। समय ही जीवन है। यही ईश्वर प्रदत्त हमारी एक मात्र सम्पत्ति है। समय का सदुपयोग करके ही हम अभीष्ट आकाँक्षा पूर्ण करने और मंगलमयी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने में सफल हो सकते हैं। समय की बरबादी एक प्रकार की मन्द आत्महत्या है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन सबने अपने समय का एक-एक क्षण ठीक तरह उपयोग करके ही अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त की हैं।

इसलिए आज समय के सदुपयोग की, एक पल भी बरबाद न होने की, आलस्य, शिथिलता एवं अन्यमनस्कता से लड़ने की पूरी तैयारी करनी चाहिए और दिन भर के समय विभाजन की दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए, जिससे वक्त की बरबादी के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे। जो आवश्यक काम पिछले कई दिनों से टलते चले जा रहे हैं, जिनकी उपयोगिता अधिक हो उन सबको, सुविधा हो, तो आज ही करने के लिए नियम कर लेना चाहिए। दिनचर्या ऐसी बने जो सुविधाजनक भी हो और सुसंतुलित भी। अति उत्साह से ऐसा कार्यक्रम न बना लिया जाय, जिसको पूरा कर सकना ही कठिन पड़ जाय।

शारीरिक कार्यक्रम के साथ-साथ मानसिक क्रिया-पद्धति भी निर्धारित करनी चाहिए। किस कार्य को किस भावना के साथ करना है, इसकी रूपरेखा मस्तिष्क में पहले से ही निश्चित करनी चाहिए। समय-समय पर बड़े, ओछे, संकीर्ण, स्वार्थपूर्ण विचार मन में उठते रहते हैं। सोचना चाहिए कि आज के अवसर पर किस प्रकार का अनुपयुक्त विचार उठने की सम्भावना है, उस अवसर के लिए विरोधी विचारों के शस्त्र पहले से ही तैयार कर लिये जायँ।

इस प्रकार हर दिन नया जन्म वाले मन्त्र का आधा भाग रात को सोते समय तक पूरा होता रहना चाहिए। हर घड़ी अपने को सतर्क, सक्रिय, जागरुक रखा जाय,चूकों के लिए सतर्क रहा जाय-उत्कृष्टता का जीवन में अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रयत्न किया जाय, तो निस्सन्देह वह दिन पिछले अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक सन्तोषप्रद, अधिक गौरवास्पद होगा। इस प्रकार हर दिन पिछले दिन की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक आदर्श बनता चला जायगा और कर्मयोग के तत्वदर्शन में हमारी जीवन पद्धति ढलती चली जायेगी।

इस भावना में वैराग्य का अभ्यास है। अनासक्ति का प्रयोग है। उपलब्ध वस्तुओं में से एक भी अपनी नहीं, साथी व्यक्तियों में से अपना एक भी नहीं। वे सब अपने, परमेश्वर के और अपने कर्तव्य की उपज हैं। हमारा न किसी पर अधिकार है न स्वामित्व। हर पदार्थ और हर प्राणी के साथ कर्तव्य बुद्धि से ठीक व्यवहार कर लिया जाय, यही अपने लिए उचित है। इससे अधिक मोह-ममता के बन्धन बाँधना स्वामित्व और अधिकार की अहंता जोड़ना- निरर्थक है। अपना तो यह शरीर भी नहीं-कल परसों इसे धूलि बनकर उड़ जाना है तब जो सम्पदा, प्रयोग सामग्री, पद, परिस्थिति उपलब्ध हैं उस पर अपना स्वामित्व जमाने का क्या हक? अनेक प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अपने कर्म-भोगों को भुगतने अनेकों के साथ आये दिन संयोग वियोग करते रहते हैं। अपने साथ भी आज कितने ही प्राणी एक सज्जन साथी की तरह रह रहे हैं, इसके लिए कर्तव्य-धर्म का ठीक तरह पालन किया जाना इतना ही पर्याप्त है। उनसे अनावश्यक ममता जोड़ कर ऐसा कुछ न किया जाय जिससे अनुचित पाप कर्मों में संलग्न होना पड़े।

यह विवेक हमें रात को सोते समय जाग्रत करना चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अहंता और ममता के बन्धन तोड़कर एकाग्र भाव से भगवान की मंगलमय गोदी-निद्रा -मृत्यु में परम शान्ति और सन्तोषपूर्वक निमग्न हुआ जा रहा है।

इस प्रकार की मनोवृत्ति का विकास होने से जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रगति होने की सम्भावना रहती है और अन्त में मानव जन्म की सार्थकता उपलब्ध हो सकती है, इस प्रकार की भावना बनी रहने से मनुष्य माया-मोह के हानिकर बन्धनों से अधिकाँश में विमुक्त रहता है और आत्मोद्धार का वास्तविक लक्ष्य उसकी दृष्टि से ओझल नहीं होने पाता। इस प्रकार जो साधक जीवन के वास्तविक रहस्य को हस्तगत कर लेता है, उसको फिर बन्धनों के जंजाल में नहीं फँसना पड़ता।

किसी दिन सचमुच ही मृत्यु आ जाय तो इन परिपक्व वैराग्य भावनाओं के आधार पर बिना भय और उद्वेग के शान्तिपूर्वक विदा होते हुए मरणोत्तर जीवन में परम शान्ति का अधिकारी बना जा सकता है। यह भावना लोभ और मोह की जड़ काटती है। कुकर्म प्रायः इन्हीं आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण बन पड़ते हैं। हर रात को एक मृत्यु मानने से लोभ और मोह का निराकरण और हर दिन को नया जन्म मानने में जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्ट का समावेश करने की प्रेरणा मिलती है। यही प्रेरणा कर्मयोग की आधारशिला है।

हममें से प्रत्येक को “हर दिन नया जन्म-हर रात में नई मौत” के भाव मन्त्र की भावना करनी चाहिए। इससे स्थूल शरीर में कर्मयोग का समावेश इस क्षेत्र में होगा और देवत्व के जागरण की एक महती आवश्यकता पूरा करने का सरल मार्ग उपलब्ध होगा। उपासना की सफलता के लिए आत्मशोधन की यह प्रक्रिया कभी बन्द नहीं करनी चाहिए।

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