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Magazine - Year 1991 - Version 2

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अंतर्जगत का प्रबलतम पुरुषार्थ

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आध्यात्मिक साधना की सफलता के लिए सबसे पहला एवं अनिवार्य कदम “इन्द्रिय निग्रह” है। यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं, पर उनमें से दो ही प्रधान हैं पहली- स्वादेन्द्रिय और दूसरी कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है। उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। रसना को जिसने जीता, वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं, विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आता ही नहीं। इसलिए इन्द्रिय-निग्रह की तपश्चर्या संयम, साधना, स्वाद को, जिव्हा को वश में करके आरंभ की जाती है। चटोरेपन की वेदी पर न केवल आरोग्य और दीर्घ जीवन बलि चढ़ जाता है, वरन् आत्मसंयम की साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।

आरोग्य ही नहीं, मन को वासनासिक्त होने से रोकने के लिए भी यह आवश्यक है कि रसनेन्द्रिय पर अंकुश लगाया जाय। इस दृष्टि में नमक या मीठा दोनों में से एक को छोड़ने के रूप में आरंभिक कदम उठाया जा सकता है। यह एक निराधार भय है कि इन्हें छोड़ देने से स्वास्थ्य खराब हो जायगा। सच तो यह है कि इस संयम से पाचनक्रिया ठीक होती है, रक्त शुद्ध होता है, इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, तेज बढ़ता है और जीवन काल बढ़ जाता है। इससे भी बड़ा लाभ यह है कि मन काबू में आता है।

नशेबाजी, अभक्ष्य भक्षण एवं चटोरेपन को रोक देने से वासना पर जो नियंत्रण होता है, वह धीरे-धीरे सभी इन्द्रियों को वश में करने वाला सिद्ध होता है। जिस प्रकार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में जिव्हा और ज्ञानेंद्रिय प्रबल हैं, उसी प्रकार स्वाद के षट्रसों में नमक और मीठा प्रधान हैं। चटपटा, खट्टा, कसैला आदि तो उनके सहायक रस मात्र हैं। इन दो प्रधान रसों पर नियंत्रण कर लेना षट्रसों को त्यागने के बराबर है। जिसने स्वाद और काम प्रवृत्ति को जीता, उसकी इन्द्रियाँ वश में हो गई, ऐसा ही समझना चाहिए। मन को वश में करने के लिए यह संयम-साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही होती है।

संयमी और सदाचारी ही प्राणवान, शक्तिवान, स्वस्थ एवं संस्कारी बनते तथा भौतिक और आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि कर सकते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी एवं मनस्वी होने का अर्थ है मन, वचन तथा कर्म से सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना। ब्रह्मचर्य इसे ही कहा जाता है। इसका पालन न तो कठिन है न असंभव। आवश्यकता मात्र ऊर्ध्वरेता बनने और ऊंचा उठने की आकाँक्षा की है। इस संबंध में महात्मा गाँधी का कहना है कि आत्म संयम की साधना करने वाले को सर्वप्रथम अपनी रसना को वश में रखना अनिवार्य है। इसके लिए स्वाद नियंत्रण परमावश्यक है। उनके अनुसार जो रसना अर्थात् जीभ के स्वाद पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह विषयों वासनाओं पर भी विजय नहीं प्राप्त कर सकेगा। इसलिए ब्रह्मचर्य पर जिनकी आस्था है, उन्हें अस्वादव्रत लेना चाहिए और सात्विक आहार भूख से कम खाना चाहिए।

आहार शास्त्रियों एवं मनोचिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि उत्तेजना पैदा करने और वासना को भड़काने वाले कारणों में आहार एक प्रमुख कारण है। इस सम्बन्ध में जर्मनी के मूर्धन्य मनोविज्ञानी डॉ. कैलाग ने गहन अनुसंधान किया है और निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी कृति- “प्लेन फैक्ट्स” में लिखा है कि प्रायः यह आम मान्यता है कि आहार एक साधारण सी वस्तु है, किन्तु यह सबसे बड़ी भ्रान्ति है। वस्तुतः मनुष्य जैसा भी, जो कुछ भी, भक्ष्य-अभक्ष्य स्वादवश या पोषण हेतु खाता है, उसका सीधा असर उसके मन पर पड़ता है। मन का पोषण खाद्य वस्तुओं के सूक्ष्म प्राण का अवशोषण करने पर होता है। उनकी दूषणता या सात्विकता के अनुरूप ही मन की चंचलता या स्थिरता निर्भर करती है। शरीर क्रिया विज्ञानियों ने भी अब इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि हमारे विचार खाद्य वस्तुओं के अनुरूप ही बनते बिगड़ते रहते हैं। जो व्यक्ति सुरापान करते, माँस-मछली भक्षण करते अथवा धूम्रपान करते हैं, उनके लिए अपने विचारों को पवित्र रख सकना तथा इन्द्रिय निग्रह कर सकना आसमान में बिना पंख के विचरण करने की आशा करने के समान है। यदि वह पवित्र जीवन व्यतीत कर सकें, तो एक चमत्कार होगा, किन्तु मानसिक पवित्रता रख सकना तो उनके लिए सर्वथा असंभव ही होगा।

इसी तरह का शोधपूर्ण निष्कर्ष डॉ. आर्थर कोवेन का है। अपनी पुस्तक- “साइन्स आफ न्यू लाइफ” में उनने लिखा है कि “काम वासना को उत्पन्न करने के कारणों में दूषित आहार मुख्य है। यह कल्पना करना कि खान-पान में माँस, मदिरा, अण्डा, बीड़ी-सिगरेट, मिर्च-मसाला, आचार, खटाई, मिठाई, और चाय-कॉफी आदि का स्वाद जिव्हा चखती रहे और व्यक्ति कामुकता से बचा रहे, एक असंभव कल्पना है।” यदि इस तरह का आहार आसमान के फरिश्ते को भी दिया जायगा, तो उसे खाने से उसमें वासना-विकृति उत्पन्न हुए बिना न रहेगी, फिर सामान्य मनुष्य का तो कहना ही क्या, जिसमें हजारों कुसंस्कार पहले से ही विद्यमान हों। ऐसे में न तो इन्द्रिय संयम सध सकता है, न मानसिक नियंत्रण में दृढ़ता आ सकती है। कामुकता से जीवन रस तथा स्नायु शक्ति दोनों का ह्रास होता है और अनेकानेक शारीरिक-मानसिक उपद्रव उठ खड़े होते हैं।

अपनी वासनाओं पर काबू रखना, उन्हें कुमार्ग पर न जाने देना मनुष्य के शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ का प्रधान चिन्ह है। मनः क्षेत्र में कुहराम मचाने वाली उत्तेजनाएँ, आवेश, असंतुलन एवं विकार इन्द्रियों के असंयम के ही परिणाम होते हैं। जब तक स्वाद या चटोरेपन के वशीभूत हो स्वादेन्द्रिय पेट पर अत्याचार करती रहेंगी, तब तक इन विकारों से छुटकारा पाना संभव नहीं।

वस्तुतः आहार का, खान-पान का अदृश्य शरीर रूपी इंजन को सुचारु रूप से गतिशील रखने के लिए पर्याप्त ईंधन प्रदान करना है, न कि स्वादेन्द्रिय की कभी न पूरी हो सकने वाली इच्छापूर्ति, जैसा कि वर्तमान में प्रचलन है। भोजन को आवश्यकता से अधिक महत्व देना तथा स्वादपूर्ण आहार का सेवन करने को बिनोवा ने एक प्रकार की हिंसा कहा है। उनका यह कथन सर्वथा उचित भी है, क्योंकि खाद्य पदार्थों में कृत्रिम रस पैदा करना अंततः शरीर व मन को उत्तेजित करना है। ये विकार ही हिंसा को उत्पन्न करते या वासना को भड़काते हैं। स्वाद-नियंत्रण की उपलब्धियों के बारे में विवेकानंद का कहना है “मैंने अपने सोने और खाने पर इच्छित नियंत्रण रखा है। इसी आधार पर मैं अपना मनोबल, पराक्रम और धैर्य विकसित कर सका। इन्द्रिय संयम अर्थात् ब्रह्मचर्य पालन के लाभों में यह लाभ भी सम्मिलित है।

मन को वश में करने तथा कामेन्द्रियों सहित अन्याय इन्द्रियों को नियंत्रित रखने-निग्रहीत करने के लिए स्वादेन्द्रिय की संयम साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही चाहिए। इस दिशा में एक कदम उठना ही चाहिए, भले ही वह आरंभ में अस्वाद व्रत के रूप में ही क्यों न हो। वस्तुतः अस्वादव्रत अपने आप में एक महाव्रत है। महात्मा गाँधी ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और अपने सप्तमहाव्रतों में इसे प्रमुख स्थान दिया है। यह एक ऐसा महाव्रत है, जिसे उन्होंने स्वयं एवं विनोबा जैसे अनेकों महामानवों ने अपनाया और उस आधार पर अपने आहार विहार को उत्तरोत्तर शुद्ध-सात्विक बनाते हुए साधना पथ पर आगे बढ़े और अभिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए। सप्ताह में एक दिन भी इसे पालन किया जाय, तो मन की संयम शक्ति और दृढ़ता बढ़ती है। यह बढ़ोत्तरी धीरे-धीरे मनुष्य में उन गुणों का भी विकास कर देती है, जो महापुरुषों-महामानवों में होने ही चाहिए।

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